गुरुवार, 17 नवंबर 2022

हिम्मत नही है..


 हिम्मत नही है कि फोन करू,

या फिर मैं,निर्लज्ज हूँ..

शायद निर्लज्ज ही हूँ,

इसिलए तो असफलताओं की इमारत बनाये जा रहा हूँ।।

इस इमारत में,

मेरा ही नही , मेरे माता-पिता का भी दम घुट रहा है..

मेरे चाहने वालों को भी जख्म हो रहा है..।।

कब इन इमारतों को धराशायी करके,

सफलता का इमारत गढुंगा मैं..??

इन असफलताओं की बढ़ती हुई इमारतों की तरह,

मेरे उम्र के साथ,मेरी आकांक्षाएं भी धूमिल हो रही है...।।

शायद मेरी सफलता ही.. 

सिर्फ और सिर्फ मेरी सफलता ही...

इन असफलताओं के इमारतों के साथ मेरे ढलते हुई उम्र को भी धराशायी कर सकता है..

मगर कब..??

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2022

भारत में सिनेमा का सफर।

 भारत में सिनेमा का सफर।


20वीं शताब्दी में सिनेमा की कला अपने अविष्‍कार के कुछ वर्षों के भीतर भारत आ गई। भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहेब फाल्के ने 1913 में पहली मूक फीचर फिल्म राजा हरिशचंद्र रिलीज़ की।


इसके बाद यह इतिहास बन गया। और
पहली बोलने वाली फिल्म आलम आरा अर्देशिर ईरानी ने 1931 में बनाई।


द्वितीय विश्व युद्ध के बाद गीतों, नृत्य और रोमांस से मिली जुली फिल्म जिन्‍हें इंडियन मसाला कहा गया वो सामने आईं। 1940 के दशक में भारत के लगभग आधे सिनेमा हॉल्स और भारत की कुल फिल्‍मों में से करीब पचास फीसदी फिल्‍में बनाने वाला दक्षिण भारत सांस्कृतिक पुनर्जीवन का माध्यम बन गया।


स्वतंत्रता के बाद भारतीय सिनेमा का वास्तविक विस्तार शुरू हुआ। सरकार ने 1948 में फिल्म प्रभाग स्थापित किया


जो विश्व के विशाल डॉक्युमेंट्री 
फिल्म निर्माताओं में गिना गया और इसने वर्ष भर में दो सौ से अधिक लघु डॉक्युमेंट्री बनाईं जो प्रत्येक 18 भाषाओें में रिलीज़ की गई। देश में स्थाई फिल्म थिएटरों के लिए नौ हजार प्रिंट तैयार किए गए। देखते ही देखते विश्व में भारत फीचर फिल्मों का सबसे बड़ा निर्माता बन गया। देश में 2019 तक छह हजार तीन सौ 27 सिंगल स्क्रीन और तीन हजार दो सौ मल्टीपलेक्स स्क्रीन सिनेमा थे। और फिर विभिन्न भाषाओें के फिल्म उद्योग के कारण सामने आया भारतीय सिनेमा। 2021 में हिंदी में 495 फिल्में इसके बाद कन्नड़ में 336तेलगु में 281, तमिल में 254मलयालम में 219, बांग्ला में 193 और मराठी में 164 फिल्में बनीं। भोजपुरी में 101, गुजराती में 80, पंजाबी में 63, उड़िया में 42, असमी में 34 फिल्में बनीं। इनके अलावा अंग्रेंजी में 28 फिल्में बनाई गईं। तुलु में 16 और मणिपुरी में 15 फिल्में बनाई गईं।

भारत में हिन्‍दी सिनेमा के सफर की कहानी


बॉलीवुड के नाम से मशहूर हिंदी फिल्म उद्योग आज भारत में फिल्‍मों से होने वाली कुल आय में करीब चालीस फीसदी का हिस्‍सेदार है। अब यह अमरीकी फिल्‍म उद्योग हॉलीवुड को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे बड़ा फिल्‍म निर्माण केंद्र बन चुका है। व्यावसायिक फिल्मों के साथ-साथबगैर किसी नाच गाने वाली एक विशिष्ट शैली की यथार्थवादी कला फिल्में भी हिन्‍दी सिनेमा का ही हिस्‍सा हैं। "बॉम्बेऔर "हॉलीवुडके मेल से बना शब्द बॉलीवुड तब अंतरराष्ट्रीय चर्चा में आया जब 1957 में महबूब खान की फिल्म मदर इंडिया


सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के तौर पर अकादमी पुरस्कार के लिए नामांकित होने वाली पहली भारतीय फिल्म बन गई
पचास और साठ के दशक में बनाई गई अनेक हिंदी फिल्मों में सामाजिक मुद्दों को उठाया गया और उनका संगीत भी लोगों की जुबान पर चढ़ गया।

ऑस्कर पुरस्कार की सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म श्रेणी में आधिकारिक रूप से नामांकित सभी तीन भारतीय फिल्में मदर इंडियासलाम बॉम्बे और लगान हिंदी में बनी थीं।

भारत में तेलुगु सिनेमा के सफर।।


तेलुगू सिनेमा में मूक फिल्मो का निर्माण 1921 में रघुपथी वेंकैया नायडू र आर. एस. प्रकाश की "भीष्म प्रतिज्ञा" के साथ शुरू हुआ। 1932 में पहली तेलुगु टॉकीज फिल्म भक्त प्रह्लाद का निर्माण एच. एम. रेड्डी ने किया जिन्होंने पहली दक्षिण भारतीय टॉकीज फिल्म कालिदास (1931) निर्देशित की थी।


भारत के 10167 फिल्म थिएटर में से सर्वाधिक 2809 थिएटर आंध्र प्रदेश और तेलेंगाना राज्यों में है जहाँ तेलुगू भाषा में फिल्मो का निर्माण होता है। गिनेस वर्ल्ड रिकॉर्ड के अनुसार विश्व का सबसे बड़ा फिल्म निर्माण स्थल रामोजी फिल्मसिटी हैदराबाद में है। प्रसाद आईमैक्स, हैदराबाद विश्व का सबसे बड़ा और सबसे ज़्यादा दर्शकों वाला 3D आईमैक्स स्क्रीन है।


भारत में तमिल सिनेमा का सफर


भारत में प्रदर्शित पहली तमिल मूक फिल्म कीचक वधम वर्ष 1918 में आर. नटराज मुदलियार ने बनाई थी। वर्ष 1931 मेंआलम आरा के प्रदर्शन के सात महीनों के भीतरएचएम रेड्डी द्वारा निर्देशित एक तमिल फिल्‍म, कालिदासरिलीज़ हुई थी। मद्रास जिसे अब चेन्नई के नाम से जाना जाता हैउस समय दक्षिण भारतीय फिल्मों की फिल्म राजधानी और हिंदी फिल्मों के साथ-साथ श्रीलंकाई सिनेमा के लिए द्धितीय फिल्‍म केंद्र बन गया था। 

द्रविड़ आंदोलन के नेता सीएन अन्नादुरई ने वर्ष 1949 में वेलैक्करी और 1951 में ऑर इरावु फिल्‍म का लेखन किया। तमिलनाडु के पूर्व मुख्‍यमंत्री और पूर्व दक्षिण भारतीय फिल्‍म अभिनेता एम करुणानिधि ने वर्ष 1952 में ब्लॉकबस्टर फिल्‍म पराशक्ति का लेखन किया और देश के महानतम अभिनेताओं में से एक शिवाजी गणेशन किया को फिल्‍मों में लेकर आए।


इन तीन फिल्मों के बाद, तमिल फिल्‍म उद्योग में एक क्रांतिकारी बदलाव आया। एमजी रामचंद्रन एक दमदार नायक के रूप में उभरे और तमिल मूल्यों तथा संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाले सुपरस्टार बन गए। फिल्मों का राजनीतिक प्रभाव इतना अधिक था कि फिल्म उद्योग के पांच अभिनेताओं जैसे सीएन अन्नादुरई, एम. करुणानिधि, एम.जी. रामचंद्रन, वी.एन.जानकी और जे. जयललिता को मुख्यमंत्री बनते हुए देखा गया।


एमएस विश्वनाथन राममूर्ति, इलियाराजा और एआर रहमान जैसे महान संगीतकार अब भी तमिल फिल्‍म जगत पर छाये हुए हैं।


आकाशवाणी के संगीत कार्यक्रमों जैसे थेनकिन्‍नमउंगल विरुप्पम और साउंडट्रैक ओली चित्रम ने तमिल सिनेमा को काफी मदद की

 20वीं शताब्दी की अंतिम तिमाही मेंतमिल फिल्में सिंगापुरश्रीलंकामलेशियाजापानमध्य पूर्व एशियाअफ्रीका के कुछ हिस्सोंओशिनियायूरोपउत्तरी अमरीका और अन्य देशों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शित की गई


भारत में कन्‍नड और मलयालम सिनेमा की यात्रा


पहली मलयालम फिल्‍म विगतकुमारम वर्ष 1930 में बनी और वर्ष 1938 में बालन सिनेमा गृह में रिलीज की गई। लेकिन मलयालम फिल्‍मों का निर्माण सक्रिय रूप से 20वीं सदी के दूसरे उत्‍तरार्द्ध में ही शुरू हो सका। मलयालम सिनेमा कथानक पर आधारित रहा और उसकी प्रकृति राजनीतिक रही

अभिनेता प्रेम नजीर ने रिकॉर्ड 520 फिल्‍मों में मुख्‍य भूमिका निभाकर गिनीज वर्ल्‍ड रिकॉर्ड बुक में अपना नाम दर्ज कराया


पहली कन्‍नड फिल्‍म वर्ष 1934 में वाई वी राव ने सती सुलोचना निर्देशित की। राजकुमारविष्‍णुवर्धन और अम्‍बरीष को कन्‍नड सिनेमा का त्रिमूर्ति माना जाता है।

अभिनेता यश की केजीएफ श्रृंखला का निर्देशन प्रशांत नील ने किया और इसने राष्‍ट्रीय स्‍तर पर बॉक्‍स ऑफिस पर इतिहास रच दिया।


कहा जाता है कि जनवरी से जुलाई 2022 तक कन्‍नड सिनेमा का घरेलू फिल्‍म बाजार में आठ प्रतिशत हिस्‍सा रहा है। इससे यह भारतीय फिल्‍म बाजार का चौथा सबसे बडा हिस्‍सेदार बन गया है।


मराठी, बंगाली, गुजराती, पंजाबी और भोजपुरी फिल्मों की यात्रा ।।


मराठी फिल्‍मों का निर्माण मुंबई में ही हिंदी सिनेमा के साथ-साथ होता है। दादासाहेब फाल्के और वी शांताराम जैसे दिग्गजों ने मराठी फिल्मों के लिए आधार तैयार किया जो अपने विषय-वस्‍तु के मूल्यों के लिए जाने जाते हैं।


बंगाली फिल्में ऑस्कर लाइफ टाइम पुरस्‍कार विजेता सत्यजीत रे की अनुकरणीय फिल्मों के लिए जानी जाती हैं।


द अपू ट्राईलॉजी ऑफ रे ने सभी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में वाहवाही हासिल की। वर्ष 1955 में ट्राईलॉजी के पहले भाग पाथेर पांचाली के साथ सत्‍यजीत रे ने भारतीय सिनेमा में अपनी पहचान बनाई।


गुजराती सिनेमा उद्योग ने 1930 के दशक में अपनी स्थापना के बाद से, 1,000 से अधिक गुजराती फिल्मों का सफलतापूर्वक निर्माण किया है। मौजूदा दौर की कुछ फिल्मों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्‍त की है। उपेंद्र त्रिवेदी सबसे सफल गुजराती अभिनेताओं और निर्माताओं में से एक थेकेतन मेहता द्वारा निर्देशित भावनी भवई ने राष्ट्रीय एकता के लिए सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता।



पंजाबी सिनेमा पहली बोलती फिल्म, हीर रांझा, वर्ष 1932 में रिलीज़ हुई थी। के.एल. सहगल, पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार, देव आनंद और धर्मेंद्र जैसे प्रमुख अभिनेताओं और मोहम्मद रफी, नूरजहां और शमशाद बेगम जैसे गायक-गायिकाओं ने पंजाबी फिल्म उद्योग के फलने-फूलने में महत्‍वपूर्ण योगदान दिया।



भोजपुरी सिनेमा की पहली बोलती फिल्म, गंगा मैय्या तोहे पियारी चढाईबो, वर्ष 1963 में प्रदर्शित हुई थी। 1980 के दशक में कई उल्लेखनीय और महत्‍वपूर्ण भोजपुरी फिल्‍में चंदवा के ताके चकोर, गंगा किनारे मोरा गांव और संपूर्ण तीर्थ यात्रा रिलीज हुई थी। भोजपुरी फिल्में उत्तरी अमरीका, यूरोप और एशिया के विभिन्न हिस्सों में देखी जाती हैं जहां दूसरी और तीसरी पीढ़ी के प्रवासी अभी भी भोजपुरी भाषा बोलते हैं। इसके साथ ही गयाना, त्रिनिदाद और टोबैगो, सूरीनाम, फिजी, मॉरीशस और दक्षिण अफ्रीका में भी भोजपुरी फिल्‍में देखी जाती हैं। 




रविवार, 26 जून 2022

कर्मों का फल..

 


क्या हमें दूसरों के कर्मों का भी परिणाम भुगतना होता है...??

हां, भुगतना ही होता है,जिससे आप स्नेह करते है।चाहे वो कोई भी हो...।

साधारण उदाहरण से समझिए ..

अगर आपका चाहने वाला आम का पेड़ लगाता है तो आप आम खाएंगे,अगर खजूर लगाएगा तो... शायद आप न खाना चाहे, हो सकता है आप खाये भी नही। मगर आपको प्रकृति किसी न किसी तरह से खिला ही देगी,भले आप न खाए,हो सकता है आपके संतति को खाना पड़े। मगर खाना ही पड़ेगा। क्योंकि आपने आम जो खाया है...।।

ये प्रकृति का नियम है,अगर आपके हिस्से में किसी के द्वारा खुशियां आएगा तो हो सकता है दुःख भी आये,और इसे आपको स्वीकारना ही होगा..।।

आप एक परिवार का ही उदाहरण ले..

आपके पिताजी बाजार से मिठाइयां लाते है और सब खाते है... मिठाइयां ज्यादा मीठी होने के कारण सबको जुकाम हो जाता है। मगर आपको नही क्योंकि आपने मिठाइयां नही खाई होती है। मगर आपको भी कुछ दिनों के बाद जुकाम का असर होने लगता है... आखिर क्यों...?? क्योंकि आपके पिताजी ने आपके लिए भी मिठाइयां लाया था।। 

ये ब्रह्मांड ऐसे ही काम करता है,यंहा हरेक कुछ एक दूसरे से जुड़ा हुआ है..।।

आपके शब्द भी,आपके कर्म भी, इस ब्रह्मांड में काम कर रहा है।।

आपने अपने समाज में देखा होगा... एक व्यक्ति, है तो बहुत अच्छा मगर उसे दुःख का सामना करना पड़ रहा है..       आखिर क्यों..?? हो सकता है उस दुःख का कारण वो स्वयं न हो .. उसका कारण वो हो सकता है,जिसके ऊपर वो या फिर उसके ऊपर जो आश्रित है/था ।।

प्रकृति इसी तरह काम करती है...।।

आपको सिर्फ अपने कर्मों का ही नही बल्कि अपने चाहने वालों के कर्मों का भी फल भुगतना होता है।।

अगर आपके पिताजी ने आम का पेड़ बोया है तो आप आम ही खाएंगे,अगर उन्होंने बेर का पेड़ बोया है तो आप बेर ही खाएंगे। तबतक, जबतक की आपने कुछ और न बोया हो.. ये चक्र चलता ही रहेगा.. तबतक, जबतक की आप अपने कर्मों के द्वारा इसमें बदलाव न लाएं..।।

हमारा कर्म हमारे परिवार और समाज से इस तरह जुड़ा हुआ है, जिस तरह जड़ पेड़ से, और पेड़ वन से..।।


गुरुवार, 23 जून 2022

कैसे कहूँ माँ..

 कैसे कहूँ माँ..

मैं अपनी असफलता के लिए खुद ही जिम्मेदार हूँ।

तू भोली है,तू निश्छल है..

तुझे कैसे समझाऊँ माँ,

मैं अपनी असफलता के लिए खुद ही जिम्मेदार हूँ।।

वो भगवान,वो इंसान क्या करेगा माँ,

जिसे तुम कोसती हो,

क्योंकि मैं अपनी असफलता के लिए खुद ही जिम्मेदार हूँ।

मैं तुम्हारी व्यथा को उस तरह नही समझ सकता माँ,         जिस व्यथा से तुम गुजर रही होगी.. 

मगर मैं ये जानता जरूर हूँ, मेरी असफलता से सबसे ज्यादा तुम्ही दुखी हो..माँ।।

मैं अपनी असफलता के लिए खुद ही जिम्मेदार हूँ, माँ..।

इन असफलता को सफलता मैं बदलूंगा जरूर माँ.. ।।

बस तुम मत उदास हो..।।

बुधवार, 15 जून 2022

क्या समय को खरीदा जा सकता है..??

एक सवाल आपसे पूछता हूँ..

क्या समय को खरीदा जा सकता है..??



है न अजीब सा सवाल.. जरा सोचिए....                       सोचना क्या है.. जबाब या तो हां में होगा या फिर न में..।         

मेरा जबाब है, हां में।                                                    जी हां समय को खरीदा जा सकता है,बीता हुआ समय को नही बल्कि आने वाले समय को खरीदा जा सकता हैआप दो तरह से समय को खरीद सकते है।

1. मुद्रा से

2.बार्टर सिस्टम के माध्यम से

आप जितना कीमत चुकाओगे उतना समय खरीद सकते हो..।।

अगर आपको दिल्ली से बॉम्बे जाना हो तो आप कैसे जायेंगें..? पाँव-पैदल,बस से, ट्रैन से या फिर प्लैन से..।।                        अधिकांश लोग ट्रैन से ही जायेंगे.. क्योंकि ट्रैन की टिकट खरीदने में आज हरेक लोग सक्षम है।                              मगर आप सोचिए आपके पास एक पैसा भी नही है और आपको दिल्ली जाना ही है तो आप कैसे जायेंगे..।।                 तब आप पाँव-पैदल ही जाओगे न.. पैदल जाने में आपको महीने लग जाएंगे... अगर आप ट्रैन से जाते हो तो आप 24 घंटे में पहुंच जाओगे...। 

जरा सोचिए अगर आपके पास ट्रैन की टिकट खरीदने का पैसा है तो आप 29 दिन बचा लेते हो।                                  अगर आपके पास फ्लाइट की टिकट खरीदने का पैसा है तो आप सिर्फ 29 दिन नही बल्कि 30 वे दिन का 22 घंटा भी बचा लेंगे .... 

मगर इसके लिए कीमत चुकानी होगी..।

दूसरा तरीका है बार्टर सिस्टम जिसके माध्यम से हम कुछ समय को अदला बदली कर सकते है कुछ त्याग करके....            अगर आप 24 घण्टे में 16 घंटे जागते हो और 8 घंटे सोते हो और आपको जागने के लिए और 2 घंटा चाहिए तब आप क्या करोगे..??                                                                 यही न कि अब आप सिर्फ 6 घण्टे सोओगे...

इस प्रकृति में हमें कुछ भी मुफ्त में नही मिलती हमें हरेक चीज की कीमत चुकानी होती है..।। 

मगर मनुष्य जबसे चालाक और बुद्धिमान हुआ तबसे वो  प्रकृति से मुफ्त में ही सबकुछ ले रहा है, बदले में कुछ चुका नही रहा है.. हां प्रकृति आपदा में वो लोग अपनी जान की आहुति देकर जरूर कीमत चुका रहे है,जिसने प्रकृति को तनिक सा भी नही खरोंचा है।।


सोमवार, 30 मई 2022

अब थक जाता हूँ चलते-चलते

 अब थक जाता हूँ चलते-चलते,रुक जाता हूँ चलते-चलते।    ज्योही ख्याल आता है मंजिल का त्योंही थकान दूर हो जाता है। फिर से चल पड़ता हूँ मंजिल की और।

                  कब खत्म होगी ये अनवरत यात्रा                मालूम नही।

            लगता है अभी तो यात्रा शुरू भी नही किया है,              और कब खत्म होगा ये सोचने लगा हूँ।

अब थक जाता हूँ चलते-चलते,रुक जाता हूँ चलते-चलते।    ज्योही ख्याल आता है मंजिल का त्योंही थकान दूर हो जाता है। फिर से चल पड़ता हूँ मंजिल की और।

मंगलवार, 17 मई 2022

सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध बनने की यात्रा...



सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध बनने की यात्रा कोई बड़ी घटना नही थी,
इस तरह की घटना हरेक क्षण घट रही है..
हरेक क्षण कोई बूढा हो रहा है,फिर बीमार, उसके बाद मृत्यु हो जा रहा है।
बुद्ध ने इसी परिदृश्य को तो देखा था,
जिसके बाद उनके जीवन में इतनी बड़ी क्रांति हुई कि एक नए युग का शुरुआत हो गया..।।
मगर इस तरह की क्रांति अब तक और किसी के जीवन में क्यों नही हुआ,जबकि इस तरह की घटना तो हम रोज घटते हुए देख रहे है। 
तो आखिर फिर क्यों नही और बुद्ध बन पा रहें है..??
जबकि बुद्ध ने पहली बार इस घटना को देखा और बोधिसत्व पाने के लिए व्याकुल हो गए। और अंधेरे रात में पत्नी यशोधरा और अपने बेटे राहुल को सोए हुए छोड़ कर घर का त्याग कर दिए।।



त्याग ही इंसान को महान बनाता है।

महात्मा बुद्ध का जन्म 563ई०पूर्व में नेपाल के लुंबनी में हुआ,ज्ञान की प्राप्ति जिस स्थान पे हुआ वो बौद्ध गया कहलाया। जंहा प्रथम उपदेश दिए वो सारनाथ था,और जंहा उनकी मृत्यु हुई वो जगह कुशीनगर था।

हमारे जीवन में कब कंहा क्या होगा ये कोई नही जानता.. 

 हममें से कोई अभी तक बुद्ध क्यों नही बना..??
क्योंकि हमलोगों ने अपना सीमा को पार करने की कोशिश नही की.. 
बुद्ध ने अपना सब कुछ त्याग दिया वो आलीशान महल जिसे ऋतुओं के अनुसार बनाया गया था,जब ऋतु बदलता था तो उनका महल भी बदल जाता था।
यशोधरा जैसी  सुंदर पत्नी और राहुल जैसे बेटे को अंधेरी रात में चुपके से छोड़ करके निकल गए।।
क्या हमलोगों में से कोई ऐसा कर सकता है.. हम तो अपनी गंदी आदत तक नही छोड़ना चाहते।

क्या हमने अपना पथ-प्रदर्शक चुना है..??
बुद्ध गृह-त्याग करने के बाद गुरु को तलाशना शुरू किए,उन्होंने अलारकलाम और उद्दक रामपुत्र से शिक्षा लिया,और ज्ञान की तलाश में निकल गए।।
क्या हमलोग कुछ करने से पहले किसी चीज की तैयारी करते है,कुछ करते ही नही,कुछ थोड़े बहुत ही करके मैदान में कूद जाते है जिसका परिणाम भी हमें वही मिलता है । इसीलिए पथ-पदर्शक का होना जरूरी है,तबतक जबतक सही रास्ता न दिख जाए।

हम कितना प्रयत्न करते है..??
महात्मा बुद्ध 6 साल तक लगातार ज्ञान की प्राप्ति के लिए भटकते रहें..
मगर हम सामान्य जन तो किसी काम को 6 महीने भी नही करते अगर उसे करते वक्त कुछ सफलता न मिले तो..।।

हम अपने कल्याण के साथ-साथ और किसका कल्याण करते है..???
महात्मा बुद्ध जब ज्ञान प्राप्ति के दौरान एक महिला के हाथों से खीर खाया तब उनके मित्रो ने उन्हें भ्रष्ट मानकर उन्हें अकेले छोड़ दिया।
मगर बुद्ध को जब ज्ञान की प्राप्ति हुई तब उन्होंने सर्वप्रथम उपदेश उन्ही 5 मित्रों को दिया।।
क्या हम आमजन ऐसा कर सकते है,हमसे कोई उल्टी मुँह बात कर ले तो हम उससे बात करना छोड़ देते है...।।

क्या हममें गलती स्वीकारने की हिम्मत है..??
महात्मा बुद्ध ज्ञान प्राप्ति के कुछ दिनों बाद अपने पत्नी और परिवार से माफी मांगने जाते है,क्योंकि उन्होंने किसी को बिना कहें ही गृह त्यागा था जो गलत था।।
क्या हमलोगों में इतनी शक्ति है कि हम अपनी गलती स्वीकार कर दूसरों से माफी मांग सके,तब तो और नही जब आप सफल हो जाये..।।

क्या हम हरेक परिस्थिति में सम रह सकते है...??
महात्मा बुद्ध हरेक परिस्थिति में सम रहते थे जब कोई उनके ऊपर पत्थर फेंके तब भी या फूल फेंके तब भी..।।
मगर हम सामान्य जन तो गिरगिट की तरह रंग बदल लेते है।।

क्या हम मानवों में इन गुणों में से कोई गुण है...
शायद नही।
इसिलए तो...फिर कोई दूसरा बुद्ध अवतरित नही हुआ..।।
आज भी लोग बूढा होते है,आज भी लोग बीमार होते है,
आज भी लोग मर रहे है,और इस घटना को घटते हुए हम रोज देख रहें है..
मगर फिर भी कोई दूसरा बुद्ध अभी तक अवतरित नही हुआ..।।
आखिर क्यों...??
खुद से पूछिए...।।
क्योंकि बुद्ध ने अंतिम समय में कहा था-
"अप्प दीपों भवः"



Yoga for digestive system