बुधवार, 11 सितंबर 2024

असफलता और सफलता का बोझ..

असफलता का बोझ रुई के समान हल्का है..मगर इसे ढोना असहनीय है..।
इसीलिए असफल होने के बाद हम जल्दी उबर जाते है,फिर से सफल होने के लिए..
अगर फिर से सफल न हुए तो...??



असफलता का बोझ भले ही रुई के समान हल्का हो,मगर उसे हम उतार के फेंक नही सकते..
इसे आजीवन ढोना पड़ता है..।।

ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती जाएगी त्यों-त्यों असफलता का बोझ बढ़ता जाएगा..
कुछ लोग इसे नही ढो पाते,जिस कारण उनकी जिंदगी बर्बाद हो जाती है..
जो लोग ढो पाते है उनकी भी जिंदगी उम्र बढ़ने के साथ-साथ दयनीय होती जाती है,वो अलग बात है कि इसका अहसास सिर्फ उन्हें ही होता है..।।

असफलता का बोझ उतार फेंकने का एक ही उपाय है..
वो है सफल होना..।

सफलता का बोझ पत्थर के समान है..मगर सहनीय है..
सफलता का बोझ भी कई लोग नही संभाल पाते क्योंकि उन्होंने वो सफलता अपने इच्छा से नही पाई होती..
जिस कारण वो सफल होक भी ताउम्र दुःखी ही रहते है..
मगर उनके पास विकल्प होता है..
सफलता के बोझ को उतार फेंकने का..
और अपने अनुरूप जिंदगी जीने का...।।

सफल होना इसलिये जरूरी है कि, आप अपने बोझ को जब चाहे तब उतार के फेंक सके..
अन्यथा असफल होने पर ताउम्र असफलता का बोझ ढोना ही पड़ता है..।।

सफल होना जरूरी है,
भले ही 100 बार ही क्यों न असफल हो..
आपके एक बार की सफलता 100 बार की असफलता पर भारी पड़ेगा..।।
सफल होना जरूरी है..

रविवार, 8 सितंबर 2024

प्यार की पांति..

ना कभी उनसे गले मिले..
ना कभी उनसे हाथ मिला..
ना कभी उनसे नजरें ही दो-चार हुए..
फिर भी न जाने क्यों उनसे ही दिल लगा..

और भी कई थे..
न जाने फिर भी क्यों, उनसे ही दिल क्यों लगा..

अब..
न उनका कोई पता है..
न उनका कोई खबर है..
बस कभी-कभी अचानक हवा का झोंका आता है..
और मुझे उनके यादों में सराबोर कर देता है..।।

बहुत जस्तजू की..
झूठ बोलता हूं..
अगर सच में तुझे पाने की जस्तजू की होती..
तो शायद तुम्हारी भीनी खुश्बू को,
कभी-कभी हवा में महसूस नही करता..
बल्कि हमेशा स्वयं मैं ही महसूस करता..।।

अब कोई उम्मीद नही है..
न ही गलती से..
न ही अचानक से ही, 
मिलने का..
ग़र मिल भी गया..
तो मैं तुम्हें पहचानने से मना कर दूंगा..
क्योंकि मैं अबतक उस काबिल नही बन पाया..
की मैं तुम्हें प्यार का इजहार कर पाऊ...।।


शनिवार, 7 सितंबर 2024

सोचियेगा..

शाम में रास्ते से गुजर रहा था.. तो लगभग 10-11 साल की दो बच्ची स्कूल से घर जा रही थी..
और आपस मे बात कर रही थी कि इस स्कार्फ के कारण मेरा सर दुखने लगता है..मम्मी को बोलती हूं तो मुझे ही डांटने लगती है..
तुम्हें मैं,क्या बताऊँ..मेरी अम्मी मेरी सुनती ही नही है..


जब मैं, ये सुना तो मैं सोचने को विवश हो गया..
वो छोटी-छोटी,प्यारी -प्यारी मासूम बच्चियों को स्कार्फ़ से सिर और नाक तक ढक दिया जाता है...
आखिर क्यों..??

सोचता हूँ... 
लड़की होना अभिशाप है..
अगर किसी मुस्लिम परिवार में जन्म हुआ तो ये अभिशाप थोड़ा और बढ़ जाता है..
अगर किसी मुस्लिम देश मे जन्म हो गया तो ये अभिशाप और भी बढ़ जाता है..।।
अगर लड़की/महिलाओं की स्थिति सबसे ज्यादा कंही दयनीय है तो वो मुस्लिम समुदाय के मध्यम वर्ग में सर्वाधिक है..।।

इस्लाम ने महिलाओं को जितनी आजादी दी थी,इस्लाम के पैरोकारों ने उतना ही महिलाओं का शोषण करना शुरू कर दिया..।।

काश वो छोटी बच्ची मुस्लिम घर मे ना पैदा होकर किसी और परिवार में जन्म ले लेती तो उसे स्कार्फ के कारण सर दर्द का सामना नही करना पड़ता..।।

हमें लगता है तकलीफ सिर्फ हमारे ही जिंदगी में है..
यंहा कौन है...??
जिसके जिंदगी में तकलीफ नही है...
कुछ खुशगवार है,जिन्हें अपने तक़लिफों का कारण पता है,
और उसे दूर करने में लगे है..
कुछ बदकिस्मती है,जिन्हें अपने तक़लिफों का कारण ही नही पता है..
जो उसे दूर कर सके..


गुरुवार, 5 सितंबर 2024

शिक्षक/गुरु कौन है..??

क्या आप एकलव्य को जानते है..??
हां जरूर जानते होंगे..
क्योंकि उनके साथ बहुत ज्यादती हुआ ना...??



अब आप जरा ये सोचिये...
अगर द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा उससे गुरु दक्षिणा के रूप में नही लिया होता,तो क्या कोई एकलव्य को जान पाता..।।


एकलव्य कोई राजा या राजकुमार या कोई धनाढ्य घर से नही आते थे..वो एक जनजाति से आते थे..जिसकारण वो कभी भी युद्ध में शामिल नही हो पाते..और इनका धनुर्विद्या जाया ही होता..।

ये सब जानते हुए द्रोणाचार्य ने एकलव्य से गुरुदक्षिणा में अंगूठा लेकर,स्वयं को कलंकित कर एकलव्य को अमर कर दिया..।।

अगर आप मेरे बात से सहमत नही है..
तो जरा बताइए..
आप महाभारत कालीन कितने यौद्धा को जानते है..
पांच पांडव,कर्ण, युधिष्ठिर, दुस्सासन और एक दो चार को जानते होंगे...
जितने भी युद्ध मे शामिल हुए सब राजा या राजकुमार ही थे..
मगर अमरत्व सबको नही मिला..
यंहा तक कि हम-आप कृष्ण के पुत्र को भी नही जानते होंगे..??

हां तो हम कंहा थे...
शिक्षक/गुरु कौन होता है..??
गुरु वो है,जो स्वयं अपमान का विष पी कर अपने शिष्य को अमृतपान कराए..
गुरु वो है, जो निःस्वार्थ भाव से अपने शिष्यों को ज्ञान प्रदान करें..
गुरु वो है,जो अपने शिष्यों को अपने से ज्यादा ऊंचाइयों पे जाने की कामना करें..।।

शिष्य कौन है..
जो सच्चे गुरु की पहचान कर,निःस्वार्थ भाव से गुरु के चरणों मे शीष चढ़ाने को हर वक़्त तैयार रहें...।।

द्रोणाचार्य सच्चे गुरु थे,और एकलव्य सच्चे शिष्य..।।
एकलव्य ने अपने शिष्यत्व से द्रोणाचार्य को इतना प्रभावित किया कि द्रोणाचार्य ने गुरुदक्षिणा में अंगूठा लेकर उसे अमरत्व प्रदान किया..।।


रविवार, 1 सितंबर 2024

अवगुणों से छुटकारा..

हम सब अवगुणों से घिरे है..
हम सब मे कोई न कोई अवगुण होता ही है..
और कभी-कभी ये अवगुण जिंदगी में अवरोधक बन जाता है,
इतना बड़ा की जिंदगी में आगे बढ़ने ही नही देता है..।।



और हममें से कुछ लोग इन अवगुणों के अभ्यस्त हो जाते है..
और हमें फर्क नही पड़ता कि इसका असर हमारे जिन्दगी पर क्या पड़ रहा है..।

आपने कभी सोचा है..
आपके असफलता का क्या कारण है..??
जरा सोचिए..🤔
हम जब भी असफल होते है..
उसके पीछे हमारा कोई न कोई अवगुण का ही हाथ होता है..

खुद से पूछे...
हम अपने अवगुण के बारे में कितना जानते है..??
हमारे क्या-क्या अवगुण है..??
किन अवगुणों के कारण सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है, या पड़ रहा है..??
क्या हमने कभी इस पर विचार किया है...??
शायद नही..

विचार करना शुरू करें...
जब ही विचार करना शुरू करेंगे..
इन अवगुणों से छुटकारा मिलना शुरू हो जाएगा..।।
विश्वास करें, ये काम करता है..
अपनी डायरी खोले और अपने अवगुणों को लिखना शुरू करें..
इसके कारण,किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ा है,उन सबको लिखना शुरू करें..
और देखिए जिंदगी कैसे बदलती है😊...।



घर से बाहर निकलिए

घर से बाहर निकलिए...
और निकलते ही मोबाइल से बाहर निकल जाइये..
और प्रकृति से अंगीकार कीजिये..
प्रकृति से नही,
खुद को खुद से अंगीकार कीजिये..
क्योंकि हम कंही खो गए है..
कंहा..??
मोबाइल में..
हमने अपना दायरा सीमित कर लिया है...
कितना..??
खुद तक..
इसीलिए तो छोटे-छोटे समस्याओं से घबरा जाते है..।।

घर से बाहर निकलिए...
आपके हरेक समस्याओं का समाधान होगा..
प्रकृति के पास आपके हरेक समस्याओं का समाधान है..।





शनिवार, 31 अगस्त 2024

विश्वास रखें प्रयास से परिणाम बदलते है..

1940 में अमेरिका के बेथेलहेम में एक लड़की का जन्म होता है,वो अपने माता-पिता के 22 संतानों में 20वी थी..
पिता रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करते थे,और माँ किसी के घर पर साफ-सफाई का काम करती थी..
वो जन्म से ही लगातार बीमार रहती थी..4 साल के उम्र में निमोनिया हो गया,बचते-बचते बच गई.. मगर कुछ समय बाद पोलियो ग्रस्त हो गई..इस बार उनका बायां पैर लगभग लकवाग्रस्त हो गया..
डॉक्टरों का कहना था...ये फिर कभी इस पाँव का इस्तेमाल नही कर पायेगी..

अब आपको क्या लगता है..
क्या ये लड़की कभी दौड़ पाएगी..??
अगर दौड़ पाएगी भी तो कितना दौड़ पाएगी..??
क्या इतना तेज दौड़ पाएगी, की दुनिया इसे याद रखें..??


हां वो लड़की सिर्फ दौड़ी ही नही,
बल्कि 1960 के रोम ओलंपिक में इतना स्पीड दौड़ी की 3 गोल्ड मैडल जीत गई..
100मीटर,200मीटर,4×100मीटर रिले में..


वो विल्मा रुडोल्फ थी..
जिसने असंभव को संभव बनाया..
मगर इसमें उनके परिवार वालों का भी अहम योगदान था..
वो अपनी माँ के साथ हरेक सप्ताह अपने घर से 80km दूर इलाज के लिए जाती थी..ये सिलसिला 2 साल तक चलता रहा..
उसके बाद घर पर ही दिन में 4 बार इनके पाँव को मसाज किया जाता था..ये सिलसिला 8 साल तक चला..

और 12 साल के उम्र में उन्होंने लेग ब्रेस और आर्थोपेडिक जूते उतार कर फेंक दिया..
और अपने स्कूल में सबसे पहले बास्केटबॉल खेलना शुरू किया फिर दौड़ना शुरू किया..

वो क्या चीज था..
जिसने विल्मा रुडोल्फ को दौड़ने के लिए मजबूर किया..??

इच्छा शक्ति,दृढ़ संकल्पता और सतत प्रयास के द्वारा परिणाम बदला जा सकता है..

क्या आप तैयार है..अपने उन अवगुणों के अपंगताओ को त्यागने के लिए..??
विश्वास रखें...प्रयास से परिणाम बदलते है..।।

Yoga for digestive system