गुरुवार, 10 अक्टूबर 2024

भारत के रत्न "रतन टाटा"..

कुछ सुबहें पूरी फिजा को ग़मगीन कर देती है..
आज की सुबह कुछ वैसी ही थी..
मानो पूरी प्रकृति मौन हो..
मुंबई के बादलों को शायद पता था..
इसीलिए बादलों की छांव ने एकदिन पहले से ही मुम्बई को ढक दिया था..
और सिसक-सिसक कर बूंदे गिरो रहा था..
क्योंकि एक रत्न जो भारत को हरेक क्षेत्र में अग्रणी और उसके सम्मान के लिए सब कुछ न्यौछावर करने के लिए सबसे अग्रणी रहता था..
वो चुपचाप सबको छोड़के जाने वाला था.।।

रतन टाटा भारत के वो रत्न थे,जिनसे सब प्यार करते थे..वो आज इस प्रकृति में विलीन हो गए..


टाटा सिर्फ नाम नही बल्कि भारत का गौरव है..
भारत जिस-जिस क्षेत्र में पीछे था..
उस क्षेत्र में टाटा ने अग्रणी भूमिका निभाई और दूसरे कंपनियों के लिए पथ-प्रदर्शक की भूमिका निभाई..
चाहे वो लक्ज़री ब्रांड हो(लैक्मे,टाइटन),या फिर IT,स्टील,लक्सरी गाड़ियां, लक्सरी होटल,उन सभी क्षेत्र में टाटा ने भारत को विश्व मे पहचान दिलाई..
टाटा को ग्लोबली पहचान दिलाने में रतन टाटा का अहम योगदान था..



रतन टाटा का जन्म मुम्बई में 28 दिसंबर 1937 को हुआ इनके पिता नवल टाटा और माँ सोनू टाटा थे..
जब ये 10 साल के थे तो इनके माता-पिता का तलाक हो गया जिसके बाद इनकी परवरिश इनकी दादी नावजबाई टाटा ने की
इन्होंने शुरुआती पढ़ाई मुम्बई से ही किया और इन्होंने कॉर्नवाल विश्वविद्यालय से आर्किटेक्चर में स्नातक किया..



1961 में टाटा स्टील में काम करना शुरू किया.. फिर इनके चाचा J.R.D TATA ने घाटे में चल रही कंपनी Nelco का कमान दिए इस कंपनी को दो साल में ही घाटे से उबारकर मुनाफे में ला दिया।(और इसी समय TCS का बीज इन्होंने अपने अंदर बो दिया..जो आज वटवृक्ष बन चुका है..जिससे स्वंतंत्र होकर कई वृक्ष(इंफोसिस,HCL etc) पूरे विश्व मे अपना परचम लहरा रहे है)


1991 में  J.R.D Tata ने इन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाया  जो 2012 तक बने रहें..
इन्होंने अपने कार्यकाल में टाटा समहू का वैश्वीकरण किया..और अपने 21 साल के कार्यकाल में टाटा समूह के राजस्व को 40 गुणा बढ़ाया और लाभ 50 गुणा बढ़ाया..।।
और आज टाटा समूह अपने राजस्व का 50% अंतराष्ट्रीय बाजार से अर्जित करता है..।।



रतन टाटा ने अपने स्तर पर कई छोटे स्टार्टअप कंपनी को सपोर्ट किया चाहे वो स्नैपडील हो या ओला कैब और ढेर सारी कंपनियां जिसे उन्होंने अपने स्तर पर सपोर्ट किया..।।

रतन टाटा सच में एक संत थे..
जिन्होंने अपने सारे गमों को अपने अंदर दफन करके देश और समाज के कल्याण के लिए सबकुछ न्यौछावर कर दिया..
 
- उन्होंने जिस विश्वविद्यालय से पढ़ा (कॉर्नेल विश्वविद्यालय) उसे 2008 में 50 मिलियन $ दान दिया जो अब तक के इतिहास में किसी विश्वविद्यालय को इतना बड़ा दान नही दिया गया है..
-कोरोना काल मे सर्वाधिक दानदाताओं में सबसे अग्रणी थे..



वास्तविकता तो ये है कि उनका जन्म ही देने के लिए हुआ था..
टाटा ग्रुप आज भी अपने लाभ का 60% चैरिटी करता है..।

रतन टाटा के जिंदगी में भी कई मोड़ आये मगर वो हारे नही..
10 साल के उम्र में ही माता-पिता का तलाक..
अमेरिका में जॉब के दौरान जिससे प्रेम किया उस रिश्ते को लेकर परिवार खुश नही था जिस कारण उससे शादी नही किया और ताउम्र कुँवारे ही रहे..
2011 में उन्होंने कहा था "मैं चार बार विवाह के निकट पहुंचा किंतु प्रत्येक बार किसी भय या किसी अन्य कारण से पीछे हट गया"..(शायद माता-पिता का तलाक या अपने प्रेम के प्रति सम्मान रहा हो)

इनका जिंदगी भी एकांकी भरा था मगर उन्होंने इसे अपने ऊपर हावी नही होने दिया..

इन्होंने पूरे वसुधा को ही अपना कुटुंब मान लिया..
इसीलिये तो आज की सुबह उनके निधन की खबर सुनकर पूरा वसुधा ग़मगीन हो गया..।।



रविवार, 6 अक्टूबर 2024

हे प्रभु अब हार चुका हूं..

जिंदा हूँ..
सांसे चल रही है..
ये काफी है..
फिर से खड़े होने के लिए..
और कुछ कर गुजरने के लिए..।।

मगर मर चुका हूं..
बस सांसे चल रही है..
और दिन बिताए जा रहा हूं..
सुबह से रात, और रात से सुबह होती जा रही है..
और यू ही जिंदगी जाया किये जा रहा हूँ..।।

मालूम नहीं कब..
जिंदगी के महत्ता का भान होगा..
और खुद पे गुमान होगा..
और उस प्रकृति का मुझपे अहसान होगा..।।

आधा जिंदगी यू ही जाया कर चुका हूं..
बची आधी जिंदगी को भी जाया किये जा रहा हूँ..
मालूम नही कब वास्तविकता का भान होगा..
और स्वयं के अंदर बदलाव होगा..

सच तो ये है कि..
सबकुछ का भान होकर भी अनजान हूँ मैं..
अपने हरेक परिस्थितियों के लिए स्वयं जिम्मेदार हूं मैं..
अपनी कमजोर इच्छाशक्ति और संकल्प शक्ति के कारण बेहाल हूं मैं..
अपने आलस्य और वासनाओं का गुलाम हूं मैं..

मालूम नही कैसे इससे पार पाऊंगा..
अपने आलस्य और वासनाओं को पार कर कैसे स्वयं का जीर्णोद्धार करूँगा..



हे प्रभु अब हार चुका हूं..
अब आपका ही आसरा है..
इस जिंदगी की डोर को
अब आप ही थाम लो..
भटक चुका हूं
इस मायावी दुनिया मे..
धस चुका हूं
कुकर्मो के दलदल में..
खुद से तो बहुत प्रयास किया..
मगर हर बार खड़ा हुआ 
और हर बार गिर गया..
हे प्रभु अब हार चुका हूं..
अब आपका ही आसरा है..
इस जिंदगी की डोर को
अब आप ही थाम लो..


गुरुवार, 3 अक्टूबर 2024

मेरी माँ

क्या खुदा है..??
मालूम नही...
मगर मेरे लिए है..
मैं जितनी दफा याद करता हूँ..
मेरी माँ का फोन आ जाता है..।।
और मेरी खैरियत पूछ कर ..
फिर फोन काट देती है..।।

मैं ही नकारा हूँ..
जो याद करके भी..
फोन नही कर पाता हूँ..।।

शायद उस खुदा के साथ भी यही होता होगा..
उसके चाहने वाले भी..
उसे याद करके उसके पास नही जा पाते होंगे..
उस खुदा का दिल माँ की तरह थोड़े ही होगा..
जो खुद ही हर बार कॉल कर देती है.. ।।




बुधवार, 25 सितंबर 2024

प्यार की पांति..

वो इस कदर खोई मुझसे..
की फिर उसे ढूंढ नही पाया मैं..
न जाने कंहा खो गई..
उसे फिर ढूंढ नही पाया मैं..

मैं ही नाकाबिल था..
जो ढूंढ नही पाया उसे..

उसके दिल के पास न सही..
उसके घर के इतने पास आकर भी..
उससे इतनी दूरियां होगी..
कभी सोचा नही था..

मैं ही नाकाबिल था..
की उसके काबिल न बन सका मैं..।।

शुक्रवार, 20 सितंबर 2024

मैं मर चुका हूं..

मैं मर चुका हूं..
फर्क बस इतना है कि सांसे चल रही है..
सच में, 
मैं मर चुका हूं..
बस ये हांड-मांस का शरीर जिंदा है..
मैं मर चुका हूं..
मैंने स्वयं ही, 
स्वयं को मारा है..
और अब जो ये हांड-मांस बचा हुआ है,
उसे भी खोखला कर रहा हूँ..
मैं मर चुका हूं..
मैं हर रात,अगली सुबह जिंदा होने का सोचता हूँ..
मगर मैं, दिन चढ़ते ही धराशायी हो जाता हूँ..

सच में, मैं मर चुका हूं..
सिर्फ सांसे चल रही है,और ये हांड-मांस काम कर रही है..

इन सांसों में अभी भी ऊर्जा भरी जा सकती है..
इस हांड-मांस को फिर से नए कीर्तिमान रचने के लिए उपयोग किया जा सकता है..
क्योंकि सांसें यू ही नही चल रही है,
और ये हांड-मांस अब तक यू ही साथ नही दे रहा है..
कुछ तो वजह है..
की सांसे अब भी चल रही है..

गुरुवार, 19 सितंबर 2024

प्यार की पांति..

तुम अभी भी मेरी जेहन में हो..
तुम्हारा अक्स सहसा किसी चेहरा में ग़र दिख जाता है..
तो तुम याद आ जाती हो..
तुम सिर्फ याद ही नही बल्कि..
मुझे अपनी असफलताओं को याद दिला के चली जाती हो..

मालूम नही तुम कंहा हो..
आशा करता हूँ..
जंहा भी हो तुम...
खुश रहो..

संघर्ष

अगर आपको लगता है कि आपके जिंदगी में बहुत संघर्ष है..
तो घर से बाहर निकलिये...
आपसे भी ज्यादा संघर्ष औरों के जीवन मे है..
मगर वो संघर्ष से भाग नही रहे है..
बल्कि वो संघर्ष से लड़ रहे है और उस पर विजय पा रहे है..

आपने हाल ही मैं पैराओलंपिक में भारतीयों को पदक लेते हुए देखा होगा(अफसोस भारत की 75% आबादी को पता ही नही है)उन पैराओलंपिक खिलाड़ियों में आधे से ज्यादा के जीवन मे इतना संघर्ष था कि उनके चाहने वालों भी उनके मरने की कामना करते थे..।।

आपके चाहने वाले आपको जीता देखना चाहते है..।।

संघर्ष से घबराए नही..
बल्कि मुस्कुराते हुए सुनहरा भविष्य का स्वागत करने के लिए तैयार हो जाइए..

संघर्ष ही तो मनुष्य को निखारता है..
भला कौन है इस धरा पे जिसे बिना संघर्ष के कामयाबी मिला है..