शुक्रवार, 1 नवंबर 2024

कभी-कभी...

कभी-कभी जान बूझकर हंसता हूँ मैं..
अपने गम को छुपाने के लिए..
कभी-कभी यू ही भीड़ का हिस्सा बन जाता हूँ मैं..
अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए..
कभी-कभी यू ही पेड़-पौधों से बात करने लगता हूँ मैं..
अपने होने का भान होने के लिए..
कभी-कभी यू ही समुन्द्र का सैर कर लेता हूँ मैं..
अपने अंदर छुपी उद्वेग को दूर करने के लिए..
कभी-कभी यू ही रात में आसमां को निघारने लगता हूं मैं..
अपने अस्तित्व को जानने के लिए..
कभी-कभी यू ही इस ब्रह्मण्ड के बारे में सोचने लगता हूँ मैं..
इसका उत्तराधिकारी होने के नाते😊..
कभी-कभी खुद के बारे में सोचने का प्रयास करता हूँ मैं..
मगर मैं,का भान होने से पहले ही, कंही भटक जाता हूँ मैं..।
कभी-कभी..यू ही _ख  ले_ हूँ मैं..
अपने मन को बहलाने के लिए..😊



बुधवार, 30 अक्टूबर 2024

इस दीवाली.."अप्प दीपो भवः"

महात्मा बुद्ध के अंतिम क्षणों में उनके शिष्य आंनद ने उनसे पूछा- महात्मन हमलोगों के लिए क्या संदेश है..
उन्होंने कहा- "अप्प दीपो भवः"
यानी अपना दीपक स्वयं बने...।।

मगर वर्तमान में क्या हो रहा है..
आप जरा सोचिए बचपन से लेकर अबतक आप दूसरों के विचारों से ही प्रभावित है,आप आज जो कुछ कर भी रहे है कंही न कंही उसपे दूसरों का प्रभाव ही है..

वास्तविकता तो ये है कि वर्तमान समय मे हम खुद से कुछ निर्णय लेने की स्थिति में है ही नही..।।

आपको अगर कुछ खरीदना है तो आप कमेंट और रिव्यु देखते है,इंस्टा पर रील देखकर फैशन का चयन करते है..
Tv और मोबाइल पे ऐड देखकर आप समान खरीदते है..।।

जरा सोचिए आपने आखरी बार कब अपनी पंसंद की वस्तु खरीदी थी..जिसके लिए आपको ऐड और रिव्यु नही देखना पड़ा था..।।

वर्तमान में हमारी नई जेनरेशन पूर्णतया दूसरों पे आश्रित होते जा रहे है..
वो कुछ भी निर्णय करने की स्थिति में आज नही है..
वो क्या पहनेंगे,क्या खाएंगे,क्या पियेंगे,क्या करेंगे..
इसका निर्णय कोई और कार रहा है..
अब ये स्थिति ग्रामीण क्षेत्र में भी अपना विशालकाय रूप धारण करने को अग्रसर है..।।

इसलिय इस दीवली एक दीप अपने लिए जलाए..
और स्वयं ही "अप्प दीपो भवः " होए..

एक नया कीर्तिमान रचना है..

सब जिंदगी के किसी न किसी मुकाम पे पहुंच गए..
मैं जंहा था,वंही ही रह गया..
एक समय था जब मैं खुद से कहा करता था..
मैं इतनी लंबी छलांग लगाऊंगा की मैं सबसे आगे निकल जाऊंगा..
और सबसे आगे निकल जाऊंगा..।

आज फिर खुद को देखता हूँ..
तो खुद को वंही पाता हूँ,
जंहा सालों पहले थे..
और जो मुझसे आगे थे,
वो सच में बहुत आगे निकल गए..।।

मेरा होड़ किसी से नही है स्वयं के सिवा..
मैं खुद को ही नही हरा पा रहा हूँ..
तो औरों की बात क्या है..।।

एक लंबी छलांग तो लगानी है..
अपनी सारी असफलताओं को ठेंगा दिखाकर..
एक नया कीर्तिमान रचना है..।।

क्योंकि..
मैं कल भी आशावादी था,
मैं आज भी आशावादी हूँ,
मैं कल भी आशावादी रहूंगा..😊


रविवार, 27 अक्टूबर 2024

प्यार की पांति...मालूम नही तुम क्यों..

मालूम नही,तुम क्यों याद आती हो..
जब भी याद आती हो..
आंखें नम करके चली जाती हो..
मालूम नही तुम क्यों याद आती हो..।

जब भी मैं एकाकी महसूस करता हूँ
(जब भी कुछ ज्यादा हो गया😊)
सहसा तुम्हारा ख्याल आता है..
शायद मैं तुम्हारा ऋणी हूँ..
इसीलिए शायद तुम याद आती हो..।

वास्तविकता तो ये है..
की सालों से तुम्हारा कोई खबर नही है..
इस डिजिटल युग मे भी तुम,
न जाने कंहा गुम हो..।

अब तुम्हारी याद भी..
अरब सागर के सुनामी की तरह ही आती है..
मगर फिर भी..
मालूम नही तुम क्यों याद आती हो..।।

वैसे भी हम कभी पैंजिया थे ही नही..
कुछ उम्मीदें जगी भी,
मगर जगने से पहले ही हम,
अंगारलैंड और गौंडवानलैंड में बट गए..
मैं तुम्हारा पीछा करते-करते 
दक्षणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध मैं पहुंच गया..
मगर तुम्हारा कुछ पता ही नही चला..
मगर तुम्हारा अस्तित्व है अभी भी,
इसीलिये तो भूकंप की तरह,
मेरे अंदर उद्गार मारती हो कभी-कभी..।।
मालूम नही तुम क्यों याद आती हो..।।



क्या आप भी संडे को आराम फरमाते है..

आपने अक्सरहाँ सुना होगा..
कल तो संडे है..अपना दिन है..
मगर अफसोस इस दिन को हम अपना नही बना पाते...
आपको कोई ऐसा संडे याद है,जो आपके लिए खाश हो..
शायद अधिकांश का जबाब नही में ही होगा..
क्यों...??
क्योंकि संडे को हम आराम फरमाते है..।
अब स्कूल के बच्चे ही नही बल्कि बड़े भी संडे को देर तक आराम फरमाते है..
अब ये चलन गाँव तक पहुंच गया है..
क्योंकि अब हमारी निर्भरता कृषि पर से कम जो होती जा रही है..।।



क्या आपको पता है...
संडे को छुट्टी देने की शुरुआत कब और क्यों हुई..??

आज से लगभग 175 साल पहले तक संडे को छुट्टी के रूप में मनाने का रिवाज नही था..
सन 1843 में पहली बार ब्रिटेन के गवर्नर ने स्कूल में संडे को छुट्टी देने की घोषणा की...
जिससे बच्चे कुछ नया क्रिएटिव कर सके..
मगर आप ही बताए कितने बच्चे आज क्रिएटिव काम करते है या फिर हम बच्चों को करने देते है..😊

भारत मे संडे की छुट्टी की शुरुआत की मांग, मजदूर नेता मेधाजी लोखंडे ने 1857 में की, और इनकी मांग को अंग्रेजो ने 10 जून 1890 की स्वीकार कर लिया...
और सबके लिए संडे की छुट्टी घोषित कर दिया गया..।।

मगर वास्तविकता तो ये है कि,
 संडे तो गुलामों के लिए होता है..
 राजा के लिए संडे तो कुछ नया करने के लिए एक   सुनहरा  अवसर  होता है..
 निर्णय आपको करना है..
 संडे को गुलामों की तरह जाया करना है,
 या फिर राजा की तरह सदुपयोग...😊

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2024

हम स्वयं ही..

हम स्वयं ही अपना उद्धारक और विनाशक है..
हम आज जिस परिस्थिति में  है,
उसके लिए स्वयं और खुद स्वयं ही जिम्मेवार है..।
मजे की बात ये है कि हम जब चाहै, 
तब अपनी परिस्थितियों को बदल सकते है..
मगर अफसोस हम जिस परिस्थिति में है उसमें रहने के आदि हो जाते है,और उसे ही सत्य मान लेते है..।

मगर वास्तविकता ये है कि..
इस जगत में कुछ भी सत्य नही है..।
सिर्फ और सिर्फ स्वयं के सिवा..।।
शंकराचार्य कहते है:-
" ब्रह्म सत्यह जगत मिथ्या,जीवो ब्रह्मो नापरः"
 ब्रह्म सत्य है,जगत मिथ्या है,और जीव ही ब्रह्म है,और इसके   सिवा कुछ भी नही...







रविवार, 20 अक्टूबर 2024

प्यार की पांति..

कहते है खोजो तो भगवान मिल जाते है..
मगर इक तुम हो..
जो मिलने का नाम ही नही लेते...।
कंहा हो..
कैसे हो..
कुछ भी पता नही..।
मगर जंहा भी हो,
खुश रहो..।।
दुनिया बहुत छोटी है..
कंही न कंही मिल ही जायेंगे..।।





Yoga for digestive system