रविवार, 9 फ़रवरी 2025

गांधी की पीड़ा

गांधी की पीड़ा कौन सुने..
यंहा सब तो गांधी को सुनाने वाले है..
जो भी बुरा हुआ वो सब गांधी ने किया..
जो भी अच्छा हुआ वो किसी और ने किया..।।


गांधी की पीड़ा कौन सुने..
क्या कोई था उस समय जो अंग्रेज को चुनौती दे रहा था..
क्या कोई था उस समय जो अंग्रेज से आंखों में आंखे डाल के बात कर रहा था..
क्या कोई था उस समय जो जनता के अंदर जागृति जगा सका था..
क्या कोई था उस समय जो अंग्रेज को झुका सकता था.
वो था तो सिर्फ गांधी था..
जिसने पूरा देश को जागृत किया..
देश के इस छोर से लेकर उस छोर तक एक आवाहन पर सबको अंग्रेज का विरोध करना सिखाया..

गांधी की पीड़ा कौन सुने यंहा..
गांधी पे आरोप लगाना आसान है..
क्योंकि गांधी को पढ़ने और समझने वाले बहुत कम है..

गुस्सा करना आसान है,मगर गुस्से को काबू में करना मुश्किल है..
लड़ना आसान है,लड़ाई को सुलझाना मुश्किल है..।।

गांधी की पीड़ा कौन सुने यंहा..
क्योंकि गांधी जिनके लिए लड़ रहे थे वो लोग कौन है..
क्रोधी,कामी,लोभी,स्वार्थी लोग है..
गांधी इन सब पे प्रहार कर रहे थे..
इसलिये ये लोग आज उन्हें गाली दे रहे है..।।

आपको जब भी गांधी को गाली देने का मन करें तो अपने अंदर जरूर झांकियेगा..
कंही आप तो...कामी,क्रोधी,लोभी,स्वार्थी और भ्रष्ट तो नही है..
जरूर कोई न कोई कमी आपमे छुपी होगी..
जब उन कमियों को दूर कर लेंगे तब आपको समझ मे आएगा..
गांधी क्या थे/है...
गांधी की पीड़ा कौन सुने यंहा..।।

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025

अनुभूति..

जिंदगी क्या हो सकती थी..
जिंदगी अब क्या हो गई है..।
ढेर सारे सपने सच कहूं तो कोई सपने थे ही नही..
अगर होते तो, जिंदगी  क्या हो सकती थी..।
आधी उम्र बीत गई है..
इस उम्र में मेरे हमउम्र मुझसे बहुत आगे निकल चुके है..
मैं आज भी वंही का वंही हूँ..।
जिंदगी क्या हो सकती थी..
जिंदगी अब क्या हो गई है..।।

अभी भी मैं,उदास नही हूँ..
क्योंकि आधी उम्र अभी बाकी है..😊
उम्मीद है आनेवाला कल बेहतर होगा..
मगर मालूम नही की क्या करूँगा..
की आनेवाला कल बेहतर होगा..
अपने अंदर हो रहे बदलाव को कुछ सप्ताह से महसूस कर पा रहा हूँ..।
उस ईश्वर की कृपा अब मुझपे बरष रही है..
है प्रभु ..
अब जिंदगी अच्छी हो रही है..।
और आनेवाला कल भी सुनहरा होगा...
आपके मार्गदर्शन से जिंदगी बेहतर से बेहतर होती जाएगी..।।



मंगलवार, 4 फ़रवरी 2025

अनुभूति : जब से तुम आये हो..

कुछ दिनों से जिंदगी बिल्कुल बदली-बदली सी लग रही है..
कुछ दिनों से आंतरिक बदलाव को महसूस कर रहा हूँ..
सच कहूं तो इस बदलाव को महसूस करके मैं भी अचंभित हूँ,
ये बदलाव मेरे जिंदगी में पहले क्यों नही घटित हुआ..।

जब से आप आये हो मेरे जिंदगी में जिंदगी बिल्कुल बदल ही गया है..
आपका मौन मुस्कान हर बार मुझे प्रफुल्लित करता है..।


इस बदलाव की शुरुआत परमहंस योगानंद की आत्मकथा "योगी कथामृत" को समाप्त करते ही शुरू हुआ..
 मैं महसूस कर पा रहा हूँ कि मैं आंतरिक रूप से प्रफुल्लित हूँ..



सोमवार, 3 फ़रवरी 2025

कॉकरोच

डायनासोर पृथ्वी से विलुप्त हो गया,मगर डायनासोर से भी  पहले से पाए जानेवाला एक जीव हमारे आसपास मौजूद है..
आपको पता है वो कौन सा जीव है..??
वो हमारे किचेन का अप्रिय मेहमान "कॉकरोच" है..।।

आपको पता है उसके पास कितना दिल होता है..??
10 दिल वाला और नीले खून वाला यह जीव हरेक कठिन परिस्थितियों का सामना कर जिंदा राहने का माद्दा रखता है..

इसीलिए तो कितने बड़े-बड़े गए और ये छोटे अभी तक इस पृथ्वी पर विद्यमान है..।

कॉकरोच विपरीत परिस्थितियों में लकड़ी और पत्थर खा कर जीवित रहते है,इतना ही नही खतरों से बचने के लिए उल्टे होकर मरने का ढोंग भी करते है..
अपने अंडों को बचाने के लिए ये कोकून में सुरक्षित कर चिपका देते है..जिससे इनका वंश चलता रहे..

सीख:-" संयम और संघर्ष आगे बढ़ते रहने का सूत्र है" ।




गुरुवार, 30 जनवरी 2025

कीचड़,कमल और हम..

एक प्रश्न पूछता हूँ..
-भगवान का सबसे प्रिय पुष्प कौन है..?
-आध्यात्मिक रूप से सबसे ज्यादा महत्व किस फूल का है..?
शायद आपको जबाब मिल गया होगा..
चाहे कोई भी धर्म हो,
हरेक धर्म मे कमल फूल की प्रासंगिकता है...आखिर क्यों..

कमल पवित्रता,सादगी और ओज का प्रतीक है...
चाहे कीचड़ कितना भी क्यों न हो कमल अपने ऊपर कीचड़ के छींटे तक को आने नही देता जबकि उसका जड़ और डंठल कीचड़ में ही रहता है..उसमें जो सुंगध होता है,वो प्रकृति की सुंगंध होती है..उसका ओज हमेशा प्रतिबिंबित होता रहता है,दिन में सूर्य की रोशनी से तो रात में चाँद और तारे की रोशनी से..।


हम मनुष्य भी कमल के समान ही है..
हमारे नाभि से नीचे का हिस्सा जड़ है जो कीचड़ में सना हुआ है..
हमारा रीढ़ कमल के हिस्से के समान है.. और उसपर कमल पुष्प रूपी हमारा मस्तिष्क आसीन है..।
मगर कमल पुष्प रूपी अधिकांश मस्तिष्क खिल नही पाते...आखिर क्यों...??

वर्तमान समय में हमारा पूरा शरीर कीचड़ से लथपथ हो गया है..
मष्तिष्क रूपी पुष्प को खिलने का मौका ही नही मिल रहा है..
क्योंकि हमारे आसपास सिर्फ और सिर्फ कीचड़ ही है..
सुबह से शाम तक हम कीचड़ में ही सने रहते है..
अब तो हम इस कीचड़ के इतने आदि हो गए है कि हमें अहसास तक नही होता कि हम कीचड़ में सने हुए है..।

हम किस तरह के कीचड़ से सने हुए है..
आज हमने दिनचर्या से लेकर खान-पान तक सब को कीचड़ से लथपथ कर दिया है..
आज हम ऐसे-ऐसे चीज खा-पी रहे है जो खाने योग्य नही है,इसका असर हमारे पूरे शरीर पर विपरीत रूप में होता है..
इन्हें खाने-पीने से मष्तिष्क से निचला भाग बहुत ज्यादा ही विकसित हो जाता है जिस कारण अनेक समस्या होती है वंही मष्तिष्क अविकसित होने लगता है,वर्तमान में तो इसका गति और बढ़ गया है इसका प्रमुख कारण स्मार्टफोन का इस्तेमाल करना है..जिससे हमारा मस्तिष्क इतना दूषित हो रहा है..की हमें अब इसके दूषित होने का आभास ही नही हो रहा है क्योंकि हमारे आसपास दूषित मस्तिष्क की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है..।।

क्या इससे छुटकारा पाया जा सकता है..??
जी हां,बिल्कुल..
आपने कमल के फूल को देखा होगा उसपे कभी भी धूल नही जमती..और वो कभी गंदा नही होता..।
क्यों..??
क्योंकि कमल के फूल ने अपने अंदर वो बदलाव लाया है,जिससे वो गंदगी को अपने ऊपर जमने नही देती..
भले ही वो कीचड़ कितना भी उर्वर क्यों न हो कमल का जड़ जरूरत के अनुरूप ही उससे उर्वरक लेता है,उसमें डूब नही जाता..भले ही पानी का कितना स्वच्छ धारा क्यों न बहे वो उसके साथ नही बहता..
इसी तरह हम मनुष्य को भी इस भोगवादी दुनिया में डुबना नही बल्कि उसका जरूरत के रूप में इस्तेमाल कर अपने मस्तिष्क का विकास करना चाहिए..।

ये कैसे संभव होगा..??
उस कमल के फूल की तरह ही एक स्थान पर अडिग रहकर ...
एक आसन लगाए और बैठिये और ध्यान कीजिये..
अगर आप लगातर ध्यान करते रहेंगे तो उस कमल के पुष्प के समान ही आपके अंदर भी पवित्रता,सादगी और ओज आ जायेगा..।।

ध्यान कैसे करें..
बस रीढ़ की हड्डी को सीधे करके आंख बंदकर बैठ जाये..और कुछ नही करना है..
ध्यान में जाना नही होता,ध्यान खुद आता है..मगर पहल,पहले आपको करना होगा..।

ध्यान कितना देर तक करें..
आपकी जितनी उम्र है..उतना मिनेट तो करना ही चाहिए..।।


एक प्रश्न फिर पूछता हूँ..??
क्या कमल की पंखुड़ियां झड़ती है..




मंगलवार, 28 जनवरी 2025

नज़रिया..

एक कहानी सुनाता हूँ..
एक चौराहे पे एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को मार रहा था..
उस झगड़े को देख रहें लोगों में से.. 
एक ने कहा- अच्छा कर रहा है,जो मार रहा है..
दूसरा व्यक्ति ने कहा- आह, कैसे मार रहा है,थोड़ा भी दया नाम की चीज नही है..
तीसरे व्यक्ति ने कहा- इस दोनों का रोज का है..
जरा आप बताइए इस दोनों में से कौन सही है और कौन गलत है..??
शायद आप निर्णय नही कर पाएंगे कि कौन सही है और कौन गलत है..क्योंकि आपको परिस्थितियों का ज्ञात नही है..।।

मगर क्या हम सोशल मीडिया के युग मे ऐसा कर पा रहे है..
शायद नही..
हम बिना असलियत को जाने ही सही और गलत बोलने लगते है..हम यंही तक नही,बल्कि अपने मत पे मतैक्य होने पर लड़ने भी लगते है..।।

"जो चीज हमें सत्य लग रहा है,जरूरी नही की वो दूसरे के लिए सत्य है..क्योंकि काल,परिवेश और परिस्थितियों के अनुसार सत्य भी बदल जाता है।।"

"वास्तविकता ये है कि हम में खुद ही इतनी खामियां है कि हमें दूसरों में सिर्फ खामियां ही दिखती है..
जिसदिन हममें अच्छाइयों का अंकुर फूटना शुरू हो जाएगा..
उस दिन से दूसरों के बुराइयों में भी हमे अच्छाइयां दिखनी शुरू हो जाएगी..।।"

इसलिए दूसरों के विचार से असहमत होने से पहले परिस्थितियों का ज्ञान होना जरूरी है..।।

एक और छोटा सा वास्तविक घटना सुनाता हूँ..
एक घर मे एक बच्चें का जन्म हुआ,ये खबर सुनकर अर्धनारीश्वर लोग बधाइयां मांगने के लिए आये..
उस परिजन और आसपास वाले लोगों ने अर्धनारीश्वर से झगड़ा किया जिसमें एक अर्धनारीश्वर का हाथ टूट गया..वो लोग थाना गए रिपोर्ट लिखवाने थानेदार ने रिपोर्ट नही लिखा..
अगले दिन अर्धनारीश्वर लोगों ने उन पुलिस वालों को मारने के लिए दौड़ाना शुरू किया..

अब आप सोचिए..किसने सही और किसने गलत किया..??

सोमवार, 27 जनवरी 2025

अपेक्षा बोझ नही,दायित्व है..

अपेक्षा हमेशा तकलीफदेह होती है..
हमारी उम्र ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती है..
त्यों-त्यों लोगों की अपेक्षा हमसे बढ़ती जाती है..
और हम अपेक्षाओं के बोझ के तले दबते जाते है..।
हम चाहकर भी इन अपेक्षाओं का उपेक्षा नही कर सकते..
क्योंकि हमसे अपेक्षा हमारे माँ-बाप और हमारे हितैषी रखते है..
जिनके अपेक्षाओं को पूरा करना हमारा कर्तव्य होता है..।

मालूम नही कब ये अपेक्षा एक बोझ सा लगने लगता है..।
शायद ये अपेक्षा तब बोझ लगने लगता है,
जब हम किसी के अपेक्षाओं पे खड़े नही उतड़ते..।



वैसे भी माँ-बाप और चाहने वाले क्यों न अपेक्षा करें..
क्योंकि उन्होंने हमारा लालन-पालन किया है..
अगर वो हमारा लालन-पालन न करते तो हमारा क्या होता..??
अगर वो गर्भ में ही मेरा दमन कर दिया होता तो..??
इसीलिए हमसे अपेक्षा रखना उनका अधिकार है..
आखिर उनके अपेक्षा में कंही-न-कंही हमारा ही भला छुपा होता है..
सच कहूं तो माँ-बाप ही है,जो हमेशा हमारे कल्याण के बारे में सोचते है..।
मगर हम जब सक्षम नही होते तो उनके कल्याण में हमें,उनका स्वार्थ नजर आने लगता है..
वास्तविकता तो ये है कि..हम ही नाकाबिल है, जो अपने कमजोरियों को छुपाने के लिए उनके ऊपर दोषारोपण करते है..।।

आखिर आपसे कोई अपेक्षा क्यों न रखें..??
अगर आप किसी के अपेक्षा पे नही उतरते तो ये आपकी कमी है..अपनी कमियों को दूर करके कम-से-कम अपनों के अपेक्षा पे तो खड़े उतरे..।
दरसल हममें सबसे बड़ी ये कमी है कि हमें अपनी कमियां नजर नही आती..इस वजह से हमसे की गई अपेक्षा को जब हम पूरा नही कर पाते तो अपेक्षा हमें बोझ लगने लगती है..।।

आपसे सब अपेक्षा नही रखते..
जो आपके हितैषी होते है..
वही आपसे अपेक्षा रखते है..।।
जिस रोज लोग आपसे अपेक्षा रखना बंद कर दे तो सोच लीजिये.. 
आप या तो गलत दिशा पे जा रहे है,या फिर आप मृतप्राय हो चुके है..।।

अपेक्षा बोझ नही,दायित्व है..
अगर आप नाकाबिल होते है, तो आपको अपेक्षा हमेशा बोझ लगेगी..
अगर आपसे कोई अपेक्षा रखता है,या रखें हुए है..
तो मुस्कुराइए😊... 
की आप जिंदा है..
और जिंदा व्यक्ति कुछ भी कर सकता है..