गुरुवार, 10 अप्रैल 2025

वर्धमान से महावीर की यात्रा..

यात्राएं सिर्फ जीवन का ही नही, बल्कि पूरी दुनिया की दिशा तय करता है..।
दुनिया में जितने भी बदलाव हुए उसकी शुरुआत एक छोटी या बड़ी यात्रा से ही हुई..।।



आज से ~600 ईसा पूर्व एक यात्रा का शुरुआत हुआ था जिसने पूरे विश्व को बदल दिया अपने "अहिंसा"के पैगाम से..वो पैगाम लेकर के आये जैन धर्म के 24वे तीर्थंकर "महावीर" उनका जन्म बिहार के वैशाली(कुण्डलग्राम) में हुआ था..
"कल्पसूत्र"में कहा गया है कि वो माँ के गर्भ में भी शांत और स्थिर रहते थे,ताकि माँ को कोई तकलीफ न हो..।

महावीर अपने उपदेश में सिर्फ अहिंसा पर ही बल नही देते बल्कि दुनिया के प्रति करुणा की दृष्टि रखने पर बल देते है..क्योंकि बिना करुणा के अहिंसा का भाव जागृत नही हो सकता..
आज पूरा विश्व वैमनस्य और हिंसा से भरा हुआ है..
ऐसी परिस्थिति में महावीर का अहिंसा का भाव ही लोगों को इस दलदल से उबार सकता है..।।

वर्धमान से महावीर बनने की यात्रा की शुरुआत बाल्यकाल में ही, हो गया था वो अक्सरहाँ अपने माँ के साथ पूजा करने के लिए बैठते थे..माँ पूजा करके उठ जाती थी और वो बैठे ही रहते थे..ये सिलसिला सिर्फ घर मे ही नही बल्कि जब भी वो अकेले होते तो वो ध्यानमग्न होकर बैठे जाते..।
माता-पिता के अंदर डर पैदा हुआ..कंही पुत्र संन्यासी न हो जाये..ये डर सही निकला जब वो 15 साल के थे तब वो अपने माता-पिता से कहें कि मुझे सन्यास लेना है..
माँ ने रोना-धोना शुरू कर दिया..फिर माता-पिता ने कहा- जब हम शरीर त्याग देंगे तब तुम संन्यास धारण कर लेना..
माता-पिता के शरीर त्यागने के ठीक 13वे दिन 30 साल के उम्र में वो, अपने बड़े भाई नंदिवर्धन से अनुमति लेकर गृहत्याग किये..
और 12 वर्ष की कठिन तपस्या के पश्चात ऋजुपालिका नदी के किनारे और साल वृक्ष के नीचे उन्होंने "कैवल्य" की प्राप्ति की..
इस 12 वर्ष की तपस्चर्या ने उन्हें महावीर बना दिया..।
इन्होंने पहला उपदेश वितुलाचल की पहाड़ी(राजगीर) पर दिए..।
मगर आज तक ना ही महावीर को और, ना ही जैन धर्म के सिद्धांत को अभी तक पूर्णतया समझा गया है..
क्योंकि महावीर को समझने के लिए आपको मनोचिकित्सक बनना होगा..

जैन धर्म के त्रिरत्न-
¡. सम्यक ध्यान
¡¡. सम्यक ज्ञान
¡¡¡. सम्यक चरित्र

जैन धर्म के पांच महाव्रत 
¡. अहिंसा (मन,कर्म, वचन से कष्ट न देना)
¡¡. अचौर्य/अस्तेय(चोरी न करना)
¡¡¡.अमृषा(असत्य)
¡V. अपरिग्रह(जरूरत से ज्यादा न संग्रह)
V. ब्रह्मचर्य (ब्रह्म का आचरण)


जैन धर्म का "स्यादवाद" का सिद्धांत - वर्तमान में हरेक समस्या का समाधान है..
ये सिद्धान्त कहता है कि कोई भी गलत नही है सब सही है... परिस्थिति,काल और परिवेश के अनुसार..।।

आज हरेक समस्या का तो यही जड़ है कि कौन सही है..??स्यादवाद का सिद्धांत हमे समाधान देता है..



आपने 3 अंधे और एक हाथी की कहानी सुना होगा..
1 अंधा जब हाथी का पाँव छूता है तो कहता है कि ये पेड़ की तरह है..
2रा अंधा जब हाथी के पूंछ को छूता है तो कहता है कि ये रस्सी की तरह है..
3रा अंधा जब हाथी के सूढ़ को छूता है तो कहता है कि ये तो सांप की तरह है...
तीनों अंधे सही है अपने-अपने अनुसार,यही है स्यादवाद का सिद्धांत..।।

आज समय आ गया है कि हम फिर से महावीर को समझे..
जैन धर्म के सिद्धांतों को समझे..।।
आज विश्व के हरेक समस्याओं का समाधान "स्यादवाद" और "अनेकान्तवाद" के सिद्धांत में छुपा हुआ है..।।

हम फिर से महावीर की यात्रा को अनुसरण करें..
क्योंकि यात्रा सिर्फ जीवन ही नही, बल्कि विश्व की दिशा और दशा भी बदलती है..








बुधवार, 9 अप्रैल 2025

संस्मरण...

एक उदासी सी छाई हुई है..
क्यों..??
जब मन की गहराइयों में गौता लगाया तो पता चला..
आज शाम तक जिससे मिलें थे..
शायद फिर उनसे कभी मुलाकात न हो..
क्योंकि पिछले एक महीने से अनवरत चलने वाला हमारा एक्यूप्रेशर का क्लास आज समाप्त हो गया..।



निर्मल मन वाली हमारी निर्मला गुरु माँ की मुस्कान और ज्ञान अब दुर्लभ हो जाएगा..।
प्रशांत सर् ,सुनील सर् एवं अन्य सरों का सेवाभाव का लुत्फ अब नही उठा पाऊंगा..।।



हमारे कुछ गुरु भाई(60+)
जो मेरे प्रेरणा के स्रोत बने उनसे शायद फिर कभी मुलाकात न हो पाए..
आज के युवा हताश और निराश है..
जबकि वो लोग इस उम्र में भी जोश और जुनून से लबरेज है..।।
जिसने मुझे एक नया नजरिया दिया(श्रीकांत सर्,बालकृष्ण सर्, वाडेरकर सर् नामदेव सर् )


उन्होंने हमें सिखाया की, सीखने की कोई उम्र नही होता..
फिर से शुरुआत करने का कोई सु-समय नही होता..
जिंदगी में उदास होने का कोई कारण नही होता..
अगर कुछ होता है..
तो वो आलस्य और अकर्मण्यता के सिवा और कुछ नही होता..।।

और कई मुस्कुराते हुए चेहरे मेरे जेहन में है..
खासकर मेरी मातये एवं बहनों की..
उनलोगों के मौजदूगी से मानो फिर से मातृत्व स्नेह का गंगा स्नान किया हो..।।



कहते है दुनिया बहुत छोटी है..
साथ ही गोल है..
फिर कंही-न-कंही
लुढ़कते-ढुलकते मिल ही जायेंगें..
और मिलते ही सारी यादें फिर से ताजा हो जाएगा..।।

"सबको जय भगवान.."




सोमवार, 7 अप्रैल 2025

टिक-टिक की आवाज...

रेलवे ब्रिज पे चढ़ा ही था कि एक अंधे व्यक्ति से टकरा गया..
कैसे टकराया मालूम नही क्योंकि भीड़ बहुत ज्यादा थी..
मैं भी प्लेटफार्म 9 पे जा रहा था और उन्हें भी प्लेटफार्म 9 पे ही जाना था...


उन्होंने मुझसे पूछा प्लेटफार्म 9 पे जाना है..
मैंने कहा हां प्लेटफार्म 9 के लिए इधर से ही जाना है..
उन्होंने मुझसे कहा-क्या आप मुझे छोड़ देंगे..
मुझे कल्याण जाना है।
मैंने कहा हां..
मैं भी इधर से ही जा रहा हूँ..
उन्होंने अपना हाथ मेरे कंधे पे रखा और चलने लगे..
(एक अजीब सी अनुभूति हो रही थी..मानो कोई कोमल हाथ जैसे कमल की पंखुड़िया मेरे कंधे पे हो)
स्लोपिंग वाला रास्ता था तो मैंने उनसे कहा आप अपना स्टिक खोल लीजिये..
उन्होंने कहा खराब हो गया है..
फिर उन्होंने कहा कि मैं ATM कवर,टिश्यू पेपर थैला में रखकर बेचता हूँ.. 
वो थैला उनके हाथ से लटकी हुई थी..।
उनकी बात जब खत्म हुई तो मैंने उनसे पूछा स्टिक कितने में देता है..
उन्होंने कहा 180₹ मैं..क्या आप मेरी मदद करेंगे..
मैंने कुछ नही कहा..
हम तबतक प्लेटफार्म पे पहुंच गए..
उन्होंने कहा ये ट्रैन कर्जत जाएगी..
मैंने उनसे पूछा क्या ये कल्याण होते हुए जाती है..
उन्होंने कहा हां..
तबतक ट्रैन खुल गई..।
फिर उन्होंने कहा मुझे हैंडीकैप्ड वाले डिब्बे के पास ले चले..
सीढ़ी के पास डिब्बा लगता है..
मैं सीढ़ी ढूंढने लगा, जो की सामने था..
उन्होंने कहा हां...हां यही..
टिक-टिक की आवाज आ रही है..
फिर उन्होंने एक चबूतरे की तरफ चेहरे करके पूछा क्या ये जगह खाली है..
चबूतरे पे बैठे हुए लोगों में से एक महिला ने कहा नही..
उन्होंने कहा ठीक है..
मैंने सोचा स्टिक का पैसा दे देता हूँ..
मैं 180₹ ढूंढने लगा..
फिर सोचा 180₹ नही 200₹ दे देता हूँ..।।
मैंने उनके हाथ मे 100-100 के 2 नोट थमाए और कहा 200₹ है..
उन्होंने कहा - धन्यवाद आपका..
मैंने कहा..इसकी कोई जरूरत नही..।
और मैं वंहा से अपनी ट्रैन पकड़ने के लिए आ गया..।
तबतक उनकी भी ट्रेन आ गई..
मैंने पीछे मुड़कर देखा कि, वो चढ़े की नही..
मगर वो अपने हाथों के सहारे ट्रैन में चढ़ गए..।।
और ट्रेन खुल गई..।।

और मैं सोचता ही रह गया...
आखिर वो कैसे हरेक छोटी बातों का ख्याल रखे हुए थे..
और हम आम इंसान हरेक छोटी बातों को दरकिनार करते है..।

ये ट्रैन कर्जत जाएगी..
ट्रैन खुल गई..
सीढ़ी के नीचे हैंडीकैप्ड बोगी..
टिक-टिक की आवाज..
क्या जगह खाली है..
धन्यवाद आपका..।।






रविवार, 6 अप्रैल 2025

प्यार की पांति...कैसे निष्ठुर थे तुम...

कैसे निष्ठुर थे तुम..
मैं या तुम..??
कैसे छोड़ के गए तुम..
चोरी चुपके..।।
हां गलती हुई मुझसे..
मगर अपनी शर्म हया को बचाने के खातिर ही निकला था मैं चुपके चुपके..
तुम तो मुझसे भी ज्यादा निष्ठुर निकली..
तुम इस तरह गायब हुई..
मेरी जिंदगी से जैसे तुम्हारा कोई अस्तित्व था ही नही..।।
कैसे निष्ठुर थे तुम..
मैं या तुम..??

राम से श्रीराम की यात्रा..

क्या राम आज भी प्रासंगिक है..??
अगर हां...तो कंहा..??
सोचिए...
आपके अनुसार राम की प्रासंगिकता कंहा है..??

मेरे अनुसार राम की प्रासंगिकता हमारे जीवन को छोड़करके हरेक जगह है..
हमारे जीवन मे अगर राम की प्रासंगिकता अगर बनी हुई है तो वो राजनीतिक कारणों से ही..
या फिर मंदिर में विराजमान होने के कारण..।
या फिर बाजारवाद के कारण ही राम आज प्रांसगिक बने हुए है..
क्योंकि राम के कारण..
कई राजनीतिक पार्टियों की राजनीति चल रही है..
तो कंही राम के कारण बहुत बड़ा बाजार को बढ़ावा मिल रहा है, जिससे कइयों का पेट और आजीविका चल रहा है..।

अक्सरहाँ लोग रामराज की बात करते है..
मगर राम के चरित्र के बारे में कोई बात नही करते..
क्या बिना राम के चरित्र को अनुसरण किये हुए राम राज्य की कल्पना किया जा सकता है..।

आज हममें से अक्सरहाँ लोग राम के चरित्र के बारे में नही जानते...
उनके राम से श्रीराम बनने की यात्रा को नही जानते..
बिना इस यात्रा को जाने हुए क्या हम राम को जान सकते है..??
चलिए राम से श्रीराम बनने की यात्रा को जानते है..



बुधवार, 2 अप्रैल 2025

शैतान

हमसब के अंदर एक शैतान छुपा होता है..
जो नियम,कानून,परवरिश और समाज के भय से छुपा रहता है..।
कभी-कभी वो हमारे क्रोध के रूप में बाहर आता है,और फिर कुछ समय बाद वो किसी कोने में दुबक जाता है।
मगर कभी-कभी हमारा क्रोध इतना उग्र हो जाता है की हमारे अंदर छुपा शैतान बाहर आ ही जाता है,और कुछ गलत कर जाता है..जिसकी सजा ताउम्र भुगतनी पड़ती है..।

आजकल तो हमारे अंदर छुपे शैतान को तो अक्सरहाँ बाहर हुलकिया मारने का मौका मिलता रहता है..
और ये मौका सोशल मीडिया दे रहा है..
ये शैतान वंहा पे अपना स्वरूप दिखाता रहता है..।।

स्वीकारिये...

हमसब कंही न कंही गलतियां करते है,
कभी गलती से करते है,तो कभी-कभी जानबूझकर..।
और फिर इन गलतियों के कारण कभी सजा भुगतना पड़ता है..
या फिर कई बार इसकी सफाई देना पड़ता है..।।
और अक्सरहाँ इसकी टीस उभरती रहती है..
कभी-कभी तो, ये टीस ताउम्र बनी रहती है..।।
क्या इससे छुटकारा पाया जा सकता है..??
बिल्कुल..
सिर्फ एक काम करना है..
आपको अपनी गलतियां स्वीकारना है..।
क्या हम अपनी गलतियां स्वीकार सकते है..??
ज्योही,हम अपनी गलतियां स्वीकारते है..
सारा टीस और तकलीफ खत्म हो जाती है..
चाहे वो कितनी बड़ी या पुरानी ही क्यों न हो..।।



जब हम अपनी गलतियां स्वीकारते है..
तो हममें गंभीरता आती है..
और इस गंभीरता में सारे दर्द,बोझ और टीस दफन हो जाते है..
और ये फिर कभी उभरकर नही आते है..।।

स्वीकारे... अपनी गलतियों को..
स्वीकारे... अपने कमियों को..
स्वीकारी...अपने नाकामियों को..
स्वीकारे...अपने आप को..
ये स्वीकार ही आपको स्वीकृति देगी..
ये स्वीकार ही आपको नई आकृति देगी..
ये स्वीकार ही आपको स्वयं से साक्षात्कार कराएगी..।।
मत भागिए..
कंहा तक भागियेगा..
भागते-भागते फिर वंही पे आ जाइयेगा..
स्वीकारिये..और सिर्फ स्वीकारिये..


Yoga for digestive system