शुक्रवार, 8 अगस्त 2025

भीड़ में..

भीड़ में अच्छा होना आसान है..
अकेले में अच्छा बने रहना मुश्किल है..।
भीड़ में हर रंग....रंग जाता है,
अकेले में हर रंग दिख जाता है..।
भीड़ में हर शब्द कोलाहल बन जाता है..
अकेले में हर शब्द स्पष्ट हो जाता है..।।
भीड़ में हर पहचान छुप जाती है.
अकेले में स्वयं से साक्षात्कार हो सकता है.।
भीड़ में हम कंही खो सकते है..
अकेले में अपनी पहचान बना सकते है..।
मगर..??
भीड़ में अच्छा होना आसान है..
अकेले में अच्छा बना रहना मुश्किल है..।।


शनिवार, 2 अगस्त 2025

हे भगवान कृपा करो..

मैं सुबह-सुबह रास्ते से जा रहा था..तो एक मंदिर दिखा..
मैंने भगवान से कहा-हे भगवान सदमार्ग पे ले चलो..
भगवान जी ने कहा- पहले कुमार्ग तो छोड़ो..।

क्या भगवान के कृपा के बिना आप कुमार्ग छोड़ सकते है..??
शायद बिल्कुल नही..।
मैंने बहुत प्रयास किया..न जाने कितनों के कसम खाये और तोड़े..अंत में,मैंने प्रयास करना ही छोड़ दिया..।
मगर अंतस मन से भगवान को कहा करता था..
 हे भगवान इस दलदल से निकाले..।
मेरा आवाज उन तक पहुंचा,और मैं इतना बीमार हो गया कि मुझमें खड़े होने का हिम्मत तक नही था..ये सिलसिला 1 सप्ताह से ज्यादा तक रहा..सारा दिन बिछावन पर ही लेटा रहता..।

भगवान के कृपा से आज मैं स्वस्थ हूँ..और उस दलदल से निकल चुका हूं..।
हां कभी-कभी वो दलदल मुझे अपनी तरफ खिंचता है,मैं उधर बढ़ भी जाता हूँ,मगर फिर भगवान उधर से खींच कर सदमार्ग पे ले आते है..।।

"भगवान कृपा करते है,उनपे विश्वास रखें..
 हां हमारी आवाज ही देर से पहुंचती है,
 शायद इसलिए कृपा होने में देर लग जाती है।।"



शोध का विषय ये है कि- किस तरह की आवाज भगवान तक पहुंचता है🤔..??

शुक्रवार, 1 अगस्त 2025

मैं थक गया हूँ..

मैं थक गया हूँ..
जबकि अभी तक सही दिशा में चला नही हूँ..
आधी उम्र यू ही सबके नजर से छिपी हुई गंदगियों में बिताया..
लोगों को लग रहा था कि मैं आगे बढ़ रहा हूँ..
मगर सच तो ये है कि उस गंदगियों का आदी हो गया था,
जब उस गंदगी से निकला तबतक सब कुछ खो चुका था..।।
जिस उम्र में लोग सफलता के ऊंचाइयों पे होते है,
मैं उस उम्र में,
एक सफलता के लिए लालायित हूँ..।।


अब वो कुछ कर नही सकता...
जो मैंने सोचा था..।
मगर ऐसा भी नही है कि,
मैं कुछ कर नही सकता..।
अभी भी बहुत कुछ कर सकता हूँ..
जो मैंने सोचा था..
यंहा तक कि उस से भी ज्यादा कर सकता हूँ..
क्योंकि अभी भी मेरे पास कुछ वक्त और उम्र बचे है..
कुछ करने को,खुद को बदलने को..
और खुद के ही नजर मैं गौरवान्वित महसूस करने को..।।

मंगलवार, 22 जुलाई 2025

स्वयं को खाली करें..

हमसब खुद को बदलना चाहते है,जिंदगी में कुछ नया पाना चाहते है,मगर अफसोस..
हममें से ~90% लोग खुद को नही बदल पाते..
आखिर क्यों..??
क्योंकि पानी से भरे गिलास को फिर से नही भरा जा सकता है..जबतक की गिलास को खाली न किया जाय..।

हमलोगों का भी हाल पानी से भरे गिलास की तरह है,हमसब खुद को बदलना तो चाहते है..मगर अपने अंदर जमी पुरानी आदतों को नही छोड़ पाते..।।
जबतक हम खुद को खाली नही करेंगे तबतक उसके जगह नई आदते नही ले सकता है..।।
ये आसान काम नही है..
क्योंकि हममें उतना ताकत नही है कि, खुद को खाली कर सकें..।


तो ताकत कंहा से लाये..?
इसे कंही से नही लाया जा सकता बल्कि जो ऊर्जा फालतू चीजों में बर्बाद हो रहा है, उसे चिन्हित करके उसे छोड़े और उस ऊर्जा को संचित करें..।।

अब आप खुद को खाली करें..
थोड़ा मनन कीजिये..
और सोचिये आप क्या-क्या छोड़ सकते है..जो आपके रास्ते का बाधक बन रहा है,और बन सकता है..।।
जब ही आप इन आदतों को छोड़ेंगे जिंदगी में नया बदलाव खुद-ब-खुद आ जायेगा..।।
जमा हुआ पानी बदबू देता है..अगर इसमें पानी का स्रोत खोल दिया जाय तो बदबू समाप्त हो जाता है...
इसी तरह गंदी आदतें भी आपको बदबूदार बना देगा..इसी लिए अच्छी आदतों को अपनाए और स्वयं को निखारें..
इसके लिए आपको सबसे पहले स्वयं को खाली करना होगा..।।


रविवार, 6 जुलाई 2025

मन हुआ था..

मन हुआ था, घर जाने को..
मगर फिर अहसास हुआ कि,
घर...घर कंहा है..
पापा के उम्मीदों का सपना तोड़ के आखिर कैसे उनका सामना कर सकूंगा
माँ के अरमानों को बिखेर कर आखिर कैसे सुकून से रह सकूंगा..
समाज की चुभती निगाहों का कैसे सामना कर सकूंगा..।।
सब कुछ भूल गया था मैं..
क्योंकि इतना थक चुका था मैं,
की दो पल घर पर बिताने को जी चाह रहा था..
रेलवे से फ्लाइट तक कि टिकट कटा कर जाने को तैयार था मैं..।।
फिर सारी उम्मीदों पे पानी फिर गया..
जब कोई अपना ने मुझे मेरा औकाद बताया..।।
किस मुँह लेकर घर जाऊँ..।

तबियत

तबियत बड़ी जोड़ की खराब है..
मन करता है घर को जाऊ..
मगर घर के दरवाजे भी बंद है..।

15 दिन होने को है..शरीर मानो जबाब दे रहा है..
आज बहुत मन हुआ घर चला जाऊं..
मगर घर पर जाकर माँ के ऊपर बोझ नही बनना चाहता..।।

माँ का कॉल का इंतजार कई दिनों से कर रहा हूँ..
मगर अब माँ का भी फोन नही आ रहा है..।।
अब शरीर साथ नही दे रहा है..
सोचा थोड़ा दिन घर पे बिताऊँ..

असफलता का बोझ अब सहन नही हो रहा है..
जिंदगी में,आगे का राह कुछ दिख नही रहा है..।
कहने वाले कह रहे है कि कोई नॉकरी कर लो..
किस मुँह से कहु..
इस 21 वी सदी में हम जैसे डिग्रीधारियों के लिए कोई ढंग का जॉब नही..।।

मंगलवार, 24 जून 2025

मैं क्या सोच रहा था..

सच हमेशा वो नही होता..
जो आप देखते है,और सुनते है..
सच इससे अलग भी हो सकता है..।।

अभी-अभी ऑटो से आ रहा था..और ऑटो में ग़दर फ़िल्म का गाना बज रहा था.."हो मैं निकला गड्डी लेकर...
वो गाना सुनके मैं भी गुनगुणाने लगा..
मगर बार-बार आवाज कम और ज्यादा हो रहा था..
जिसकारण मेरे अंदर ड्राइवर के प्रति नाराजगी उभरने लगा..
कुछ ही सेकंड के बाद ड्राइवर ने मुझसे कहा देखिए ना मोबाइल मैं क्या हो गया है..
आवाज खुद-ब-खुद कम हो जा रहा है..।
ये सुनते ही मुझे शर्मिंदगी महसूस हुआ..
मैं क्या सोच रहा था..
जबकि वास्तिवकता बिल्कुल इससे अलग था..।।