मंगलवार, 23 सितंबर 2025

दुःख..

कुछ चीजें हमारे हाथ मे नही होता है,
और जो चीज, हमारे हाथ मे नही होता है,
उसके लिए अफसोस करना,और खुद को तकलीफ में डालना बेबकूफी नही तो,और क्या है..??

हममें से आधे लोग बेवजह के तकलीफ में है..
और इस तकलीफ से आपको,सिर्फ और सिर्फ आपके सिवा और कोई नही निकाल सकता..।।

क्या आप दुःखी है..??
अगर हां..
तो फिर से सोचिये..
क्या आप सही में दुःखी है..??
अगर फिर से हां..
तो आप..अपने तकलीफ का कारण लिखिए..।।
हां पहले लिख लीजिये तब आगे पढियेगा..
क्या आपने लिख लिया/सोच लिया..


अगर हां...
तो इससे कैसे छुटकारा पाया जा सकता है..
अब ये लिखिए..।।

हममें से आधे लोग इसलिए दुःखी है कि,उनके आस-पास के लोग दुःखी है..।उस आस-पास के लोगों के जिंदगी में बदलाव लाना उतना जल्दी संभव नही है,जितना जल्दी स्वयं के अन्दर बदलाव लाना..।।
इसलिय स्वयं के अंदर बदलाव लाये और दुःख के दलदल से बाहर निकलिये..।।
जिसे आप दुःख/तकलीफ मान बैठे है..वास्तव में,वो जिंदगी का अभिन्न हिस्सा है..बिना उसके जिंदगी में प्रगति संभव नही है..।।

बस अपना थोड़ा नजरिया बदलिए..
और देखिए..
आपके जिंदगी में दुःख, है, ही नही..।

दुःख और सुख दोनों पानी के बुलबुले की तरह क्षणभंगुर है..
बुलबुला पानी से बनता है,और पानी मे ही विलीन हो जाता है..।
मगर हम मनुष्य सबकुछ भूल कर बस उस बुलबुले की छवि में ही खोये रहते है..होना ये चाहिए कि हमें पानी की तरह आगे बढ़ जाना चाहिए..।।

दुःख का सबसे बड़ा कारण जिंदगी में ठहराव का है..
आप जिस उम्र में हो..
आप नित प्रतिदिन कुछ-न-कुछ अलग करते रहे,या फिर अलग तरीके से करते रहे...।।







शनिवार, 20 सितंबर 2025

किताब और जिंदगी

पहले मैं सोचा करता था,औरतें इतनी पूजा क्यों करती है..
फिर मैंने सोचा-
"हिन्दू नारी इतनी असहाय होती है,उसे पति से,पुत्र से,सभी से इतना लांक्षन,अपमान और तिरस्कार मिलता है कि पूजा-पाठ न हो तो पशु बन जाये।पूजा पाठ ने ही हिन्दू नारी का चरित्र अभी तक इतना ऊंचा रखा है..।"

क्या आप बता सकते है की ये पंक्तियां किस पुस्तक से लिया गया है..??
मैं भी कमाल करता हूँ,कंहा से बता पाएंगे आप..कल तक तो मैं भी अनजान था इन पंक्तियों और इस रहस्य से..।।

सालों से इच्छा थी ये पुस्तक पढ़ने की मगर पढ़ने का मौका ही नही मिला..अमेज़न,फ्लिपकार्ट पे सर्च करके कार्ट में कई दफा रखा,मगर कितने पुस्तक खरीदे और पढ़ लिया मगर इसे पढ़ने से बार-बार वंचित ही रह जाता था..।

मगर इस बार जब अपने घर से आ रहा था,तो स्टेशन पर ये बुक दिखी..मैंने बुक इसलिय नही खरीदी की मुझे पढ़नी थी,क्योंकि मैंने इसलिए खरीदा,की मेरे खरीदने से, शायद ये बुकस्टाल शायद एक दिन और चल जाये।(स्टेशन से लगभग बुक स्टॉल गायब हो चुके है,आज से 5 साल पहले तक लगभग हरेक स्टेशन पर आपको बुक स्टॉल मिल जाता,मगर आज दुर्लभ होता जा रहा है)
ये पुस्तक 1949 में प्रकाशित हुई थी,मगर आज भी ये हिंदी साहित्य(उपन्यास)में अपना अग्रणी स्थान रखता है..
इस पुस्तक का नाम "गुनाहों का देवता" है,जिसे धर्मवीर भारती ने लिखा है..।

इन्होंने लेखनी के माध्यम से प्रेम की नई ऊंचाइयां दी है...
इन्होंने इस पुस्तक में उन पहलुओं को भी छुआ है जो हमें वर्तमान में देखने को मिल रहा है..
"लिव-इन-रिलेशन"आज नया नाम है,मगर चंदर और पम्मी के बीच मे 1949 में ही था..और धर्मवीर भारती जी ने बखूबी प्रेम और लिव-इन-रिलेशन के बारे में बताया है..
एक आतिम्क है,तो दूसरा शरीरिक..शारीरिक भूख जब एक समय पर भर जाता है,तो दोनों के बीच में दूरियां बढ़ जाती है,जो लिव-इन-रिलेशन टूटने का सबसे बड़ा कारण है..।।
आत्मिक भूख कभी नही मरती..ये तो एक दूसरे की पूर्ति के लिए जान तक न्यौछावर कर देते है..।।

प्रेम का स्थान वासना से ऊपर है..जब हम प्रेम के माध्यम से वासना की पूर्ति करते है,तो प्रेम खत्म हो जाता है..।

इस पुस्तक के मुख्य पात्र- चंदर,सुधा,बिनती,पम्मी,गेसू इत्यादि है..
सबका अपना-अपना व्यक्तित्व है जो हमें कई सीख देता है..

इस पुस्तक के कुछ प्रमुख अंश-
जीवन मे अलगाव,दूरी,दुख,और पीड़ा आदमी को महान बना सकता है।भावुकता और सुख नही।
•"ये आज फिजा खामोश है क्यों,
    हर जर्रे को आखिर होश है क्यों?
   या तुम ही किसी के हो न सके,
   या कोई तुम्हार हो न सका।"

कभी-कभी एक व्यक्ति के माध्यम से दूसरे व्यक्ति की भावनाओं की अनुभूति होने लगती है।

मैं ईसाई हूँ, पर सभी अनुभवों के बाद मुझे पता लगता है कि हिंदुओं के यंहा प्रेम नही वरन धर्म और सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर विवाह की रीति बहुत वैज्ञानिक और नारी के लिए सबसे ज्यादा लाभदायक है।उसमें नारी का थोड़ा बंधन चाहे क्यों न हो लेकिन दायित्व रहता है,संतोष रहता है,वह अपने घर की रानी रहती है।

मनुष्य का एक स्वभाव होता है।जब वह दूसरों पर दया करता है तो वह चाहता है कि याचक पूरी विनम्र होकर उसे स्वीकारे।अगर याचक दान लेने में कंही भी स्वाभिमान दिखलाता है तो आदमी अपनी दानवृति और दयाभाव भूलकर नृशंसता से उसके स्वाभिमान को कुचलने में व्यस्त हो जाता है

ये पुस्तक हरेक युवा को पढ़नी चाहिए खासकर उन्हें जो प्रेम के दहलीज पर कदम रख रहे है..धर्मवीर भारती ने खुद इसे 23 साल की उम्र में लिख दिया था..मगर इसे पढ़ने और समझने के लिए 25 की उम्र काफी है..।
अगर आप 25 से पहले इसे पढ़ लेते है तो आप अपने प्रेम को नई ऊंचाइयां दे पाएंगे..।
मगर आजकल तो प्रेम...कोपलें फूटने से पहले ही,हो जा रहा है..आज की जेनरेशन 100 सेकंड की वीडियो पूरा नही देख पाता है तो 100-200 पेज की पुस्तक कंहा से पढ़ पाएंगे..।।

मैं कहूंगा आज नही तो कल ये पुस्तक जरूर पढ़ें..
क्योंकि न ही प्रेम की उम्र होती है,और न ही वासना की कोई सीमा..
ये पुस्तक आपको प्रेम और वासना के पराकाष्ठा और अवसान से अवगत कराएगा..।।

गुरुवार, 18 सितंबर 2025

कस्तूरी मृग और मनुष्य

कबीर दास जी कहते है-"कस्तूरी कुंडली बसै,मृग ढूंढे वन माहि"..यानी कस्तूरी(सुगंध/इत्र) मृग के नाभि में ही विद्यमान है,मगर वो उसे जंगल मे ढूंढता रहता है..


हमलोग भी तो यही करते है..ताउम्र भटकते रहते है..
मगर मृग से भी दयनीय स्थिति हममें से अधिकांश लोगों की है...
मृग को पता है कि वो क्या ढूंढ रहा है..
मगर हममें से अधिकांश लोगों को पता ही नही है कि हमें क्या ढूंढना है,ताउम्र भटकते रहते है,बिना उद्देश्य के..
कुछ लोग होते है जो अपने उद्देश्य के लिए भटकते है..
मगर इनमें से कुछ ही लोग होते है,जिन्हें अपने उद्देश्यपूर्ति में सफलता मिलती है..
क्योंकि वो कस्तूरी मृग की तरह भटकते नही..
वो सबसे पहले स्वयं का अवलोकन करते है..(हममें से 95% स्वयं का अवलोकन नही करते,जबकि सफलता में 50%इसी का योगदान है)और अपने कमियों को दूर करते है,और अपने खूबियों पे काम करते है..।।

जिस तरह कस्तूरी मृग दर-दर भटकता है,उसी तरह हम मनुष्य भी दर-दर भटकते है,जबकि लक्ष्यपरक जीवन का उद्देश्य हमारे अंदर ही छिपा हुआ है...
बस स्वयं का अवलोकन करना है..।।


बुधवार, 17 सितंबर 2025

शिकायत करना बंद कीजिए..

हममें से अक्सरहाँ लोग रोज किसी-न-किसी बात को लेकर शिकायत करते रहते है..
कभी परिवार से,कभी समाज से,कभी संसार से और कभी भगवान से..
ये शिकायत है कि कभी खत्म होने का नाम ही नही लेता..

 
क्या शिकायत करना अच्छी बात है..??
हां बिल्कुल, शिकायत करनी अच्छी बात है,मगर एक सीमा तक..मगर हमें सीमा मालूम ही नही है..।
ये सीमा क्या होना चाहिए..??
जब हमारे शिकायत से,दूसरों को अपनी गलती का अहसास हो,ना कि उसे शर्मिंदा,और हमारे प्रति गुस्सा का भाव जागृत हो..।
शिकायत करते वक़्त अपनी वाणी पर संयम रखना बहुत जरूरी है,क्योंकि हममें से अक्सरहाँ लोग शिकायत के आड़ में अपना गुस्सा/भड़ास निकाल रहे होते है..।

शिकायत करने से छुटकारा पाया जा सकता है..??
हां,बिल्कुल..
जब भी आपको किसी की शिकायत करना हो, तो खुद को उसके जगह रख कर देखें..
देखिए आपके अंदर जो किसी के प्रति नकारात्मक भाव था वो सकारात्मक भाव मे परिवर्तित हो जाएगा..।।

आपने कभी गौर किया है,आप शिकायत किस-किस से करते है..??
•अक्सरहाँ शिकायत हम,अपने चाहने वालों से ही करते है..
और जो हमसे कमजोर है,या फिर किसी सेवा प्रदाता(व्यक्ति/संस्था)से करते है..
क्या हमने कभी, खुद से खुद का शिकायत किया है..??
शायद नही,जबकि हम खुद इतनी गलतियां करते है की शिकायत का अंबार लग जाये,मगर हमें शिकायत सुनने की आदत नही है,सिर्फ शिकायत करने की आदत है..।।

जब हमें शिकायत सुनना अच्छा नही लगता,तो फिर दूसरे को कैसे अच्छा लगेगा.. जिस तरह हम दूसरों से अपेक्षा करते है कि वो शिकायत,शिकायत की तरह करें, उसी तरह हमें भी शिकायत,शिकायत की तरह करना चाहिए..।।

सबसे बड़ा सवाल ये है कि- शिकायत क्या होता है..??
हां जरा सोचिए..शिकायत क्या होता है..??
दूसरों को गलतियां से अवगत कराना,ना कि उसे गलतियों का अहसास कराना..
जब हम किसी को गलतियों से अवगत कराते है,तो हम उसके नजर में उठ जाते है,वंही जब हम किसी को गलती का अहसास कराते है, तो उसके नजर में गिर जाते है..

इसीलिए अब जब भी किसी से शिकायत करना हो तो उसे सिर्फ गलतियों से अवगत कराए ना कि अहसास कराए..।।

सोमवार, 15 सितंबर 2025

करुणा का भाव

हम में से सभीको कभी-न-कभी किसी के कारण जाने-अनजाने में तकलीफ पहुंचा होगा..
उसके बाद क्या होता है..??
हम उनके बारे में भला-बुरा कहने और सोचने लगते है..।
आखिर ऐसा क्यों होता है..??
शायद हमारी अज्ञानता के कारण..।
एक तो हमें तकलीफ पहुँचाने वाले अपने अपराध से अनभिज्ञ है..
ऊपर से हम भी,उन्हें अपराधी बना के अपराध कर बैठते है..।
बल्कि होना ये चाहिए कि,उनके प्रति हमारे अंदर करुणा का भाव होना चाहिए..और उनके हित के लिए कामना करना चाहिए..।।


जरा सोचियेगा..
क्या आपने कभी जानबूझकर गलती किया है..??
जब आप जानबुझकर गलती नही कर सकते तब दूसरा कोई कैसे जानबूझकर गलती कर सकता है..।।

जब हमारे अंदर करुणा का भाव जाग्रत होता है,तब हमें अपराध तो दिखता है,मगर अपराधी नही..।।

पैसा,मनुष्य और प्रकृति..

"हम ज्यों ज्यों पैसों का अंबार लगाते जाते है,
त्यों-त्यों प्रकृति से दूरिया बढ़ाते जाते है.."


हम जितना पैसों की तंगी से जूझते है,उतना ही प्रकृति को स्वयं के पास पाते है..
और हम जितना ही आर्थिक रूप से सम्पन्न होते जाते है,हम उतना ही प्रकृति से स्वयं की दूरियां बढ़ाते जाते है..।।

मगर अफसोस हम इन सब से अनभिज्ञ होते है..??

जब हम आर्थिक तंगी से जूझ रहे होते है,तब प्रकृति के करीब होकर भी उसे महसूस नही कर पाते है..
वंही जब हम ज्यों-ज्यों आर्थिक रूप से संपन्न होते जाते है..
त्यों-त्यों हम स्वयं को प्रकृति से दूर करते जाते है..।

एक गरीब इंसान प्रकृति के हरेक चक्र को महसूस और सामना करता है,
एक अमीर इंसान प्रकृति के हरेक चक्र से दूरियां बनाता है,और उसे चुनौती देता है..।।

मगर अफसोस..
जीवन के एक चक्र में, अमीर और गरीब दोनों ऐसे जगह पर पहुंचते है..जब इन दोनों के जिंदगी में अफसोस के सिवा कुछ नही रहता..।।
गरीब ये सोच के अफसोस करता है कि प्रकृति के इतने करीब होकर भी कभी उसे जानने का कोशिस नही किया..
वंही अमीर इंसान सबकुछ न्यौछावर करके प्रकृति की अनुभूति पाना चाहता है..।
मगर दोनों के हाथ, अक्सरहाँ खाली हाथ ही लगता है..।

इसीलिए आप जंहा है जैसे है..
सूर्य के तेज का आनंद लीजिये..
चांद की रोशनी का दीदार कीजिये..
तारों की टिमटिमाहट का दीदार कीजिये..
बारिश की बूंदों का रसास्वादन कीजिये..
प्रकृति के हरेक चक्र के साथ स्वयं का तालमेल बिठाइए..।।

क्या पता जिंदगी के दौर में वो सबकुछ आपको प्राप्त हो..
जिसकी आपकी लालसा हो..
मगर आप प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने में सक्षम ना हो..।।

इसीलिए समय है..
प्रकृति के हरेक रंग में खुद को रंगे..
और ऐसा निरंतर करने से.. 
प्रकृति आपको अपने रंग में रंगने लगेगी..।।



खिड़कियां

आपने आखरी बार खिड़कियों से कब देखा था..और क्या-क्या देखा था..??


पहले घर मे खिड़कियां होता था घर से बाहर देखने के लिए....मगर अब खिड़कियां पे हम परदे टांग देते है,इसलिये की कंही कोई बाहर से न देखें..।।

कभी खिड़कियों से बाहर देखें..आपको वो दिखेगा जो किसी को दिख नही रहा है..वो अनंत आसमां, और स्वयं में अनंत शक्तियों का संचय का आभास होगा..।।

मगर अफसोस अब हमने खिड़कियों से बाहर देखना क्या खिड़कियां खोलना भी बंद कर दिया है..।।

Yoga for digestive system