रविवार, 23 नवंबर 2025

कभी पूछा है खुद से..

कभी पूछा है खुद से..
की आखिर तुम कर क्या रहे हो..
कभी पूछा है खुद से..
की आखिर तुम जा किधर रहे हो..
कभी पूछा है खुद से..
की आखिर तुम चाहते क्या हो..
कभी पूछा है खुद से..
आखिर तुम्हारी मंजिल कंहा है...
कभी पूछा है खुद से...

क्यों पूछते डर लगता है..??
कंही सच्चाई से सामना न हो जाये..
क्या करना है,पता नही है,
किधर जाना है,पता नही है,
क्या चाहते है,पता नही है,
मंजिल कंहा है,पता नही है..।
इसीलिए पूछते डर लगता है..।

आखिर इस डर से भला कबतक भागोगे..
कभी तो सामना करना पड़ेगा..
हिम्मत जुटाओ और अपने सवालों का सामना करो..
क्योंकि सवाल में ही हल छुपा हुआ है..।
आखिर कब तक भागते रहोगे,
आखिर कब तक टालते रहोगे..।

जो हो तुम उसे स्वीकार कर..
स्वयं के वास्तविकता को अंगीकार कर..
फिर से खुद को तराशकर..
नव-निर्मित मानव तैयार कर..
अपने असफलताओं के बेड़ियों को तोड़कर..
सफलता के नए सोपान रचकर..
अपने आप को स्वीकार कर..
इस जीवन का उद्धार कर..।।

शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

ये उम्मीद ही तो है..

जब किसी को तुमसे उम्मीद न हो..
तो तब तुम खुद से उम्मीद रखो,
कोई रखें या न रखें तुम जरूर खुद से उम्मीद रखों..
ये उम्मीद ही तो है...
जो जीने का हौंसला देता है,
ये उम्मीद ही तो है..
जो असंभव को संभव बनाता है..
ये उम्मीद ही तो है..
जो नर को नारायण बनाता है..
ये उम्मीद ही तो है,
जो दानव को देवता बनाता है..
ये उम्मीद ही तो है..
जो नही है,उस से भी साक्षात्कार कराता है..
ये उम्मीद ही तो है..
जो कल का सूरज दिखाता है..
ये उम्मीद ही तो है..

बिना उम्मीद के यंहा, कंहा कुछ है..
उम्मीद की ज्योत तबतक जलाये रखो..
जबतक सांस और धड़कन चल रही है..
क्या पता कब उम्मीद की किरण आये..
और जिंदगी की दिशा बदल दे..।
ये उम्मीद ही तो है.


गुरुवार, 20 नवंबर 2025

मैं हारा नही हूँ..

मैं हारा नही हूँ, ना ही थका हूँ,
मैं तो सिर्फ राह से भटक गया हूँ,
मुझे अब भी उम्मीद है..
कभी तो खुद को सही राह पर लाऊंगा..
और अपनी मंजिल को पा जाऊंगा..
मैं हारा नही हूँ, ना ही थका हूँ...।



शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

चिल्ड्रेन्स डे....

क्या आपको पता है..चिल्ड्रेन्स डे क्यों मनाते है..??
आपको पता ही होगा..।

इस बाल दिवस पर हम ग्वाल-बाल से क्या सीख सकते है..??

1. वर्तमान में जिये...
   पता है आपको.. बच्चों का खुशियों का राज क्या है..??
वो हमेशा वर्तमान में जीते है,खेलते वक़्त खेल पर ध्यान,खाते वक़्त खाने पर ध्यान,सोते वक्त सोने पर ध्यान..।
इसलिए खुश रहना है तो इन बच्चों की तरह वर्तमान में जिये..।
मगर इस आधुनिक युग मे हम उनकी भी दिनचर्या खराब कर रहें है..।

2.बच्चों की तरह हँसिये..
 आपको याद है,आपने आखरी बार दिल खोलकर कब हँसा था..अगर नही हंसे थे तो बच्चों के साथ समय बिताइए दिल खोलकर हंसने का मौका मिलेगा..।
इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में हम हँसना भी भूल गए है..।

3.बच्चों की तरह दौड़िये..
आपको याद है..आप आखरी बार कब दौड़े थे..
अगर स्वस्थ रहना है,तो बच्चों की तरह दौड़िये..।

4.बच्चों की तरह खाइये..
बच्चें तब ही खाते है,जब उन्हें भूख लगता है और उतना ही खाता है,जितने की भूख रहती है..
और हम आप क्या करते है..पता ही है,पसंद की चीज मिले तो भूख न होने पर भी खा लेते है..इसीलिए तो सीने की जगह पेट आगे निकल जाता है..😊

5.धूप में समय बिताइए..
 आपको अपना बचपन याद है,कितनी दफा माँ-बाप से बात सुनने को मिला होगा धूप में नही खेलना है..।और आज हम अपने बच्चों को भी कह रहे है,धूप में नही खेलना है..
खुद विटामिन-D लेने के लिए बीच पे जाते है..😊

अगर स्वस्थ रहना है,तो इन प्यारे बच्चों के साथ समय बिताइए..
आप मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से स्वस्थ रहेंगे..।।


इस भागदौड़ भरी जिंदगी में,
इन बच्चों को भी प्यार चाहिए..
इस सोशल मीडिया के दौड़ में, 
इन्हें भी लाइक और सब्सक्राइब चाहिए..।

हम जितना ख्याल अपने गेजेट का रखता है
उतने ही ख्याल की उम्मीद ये हमसे रखते है..।
ध्यान रखिएगा इनका..
कंही गलती से गलती न हो जाये इनके परवरिश में,
नही तो अनफॉलो करने लगेंगे ये.. 
क्योंकि सोशल मीडिया के युग के बच्चे है ये..।

इस भागदौड़ भरी जिंदगी में,
इन बच्चों को भी प्यार चाहिए..
इस सोशल मीडिया के दौड़ में, 
इन्हें भी लाइक और सब्सक्राइब चाहिए..।


गुरुवार, 13 नवंबर 2025

अच्छे हो...

किसी ने पूछा अच्छे हो...??
तो सोचा..क्या जबाब दू..
क्योंकि ऑप्शन(विकल्प) ही क्या है..
अच्छे होने के सिवा..🙂



अगर कहु बुरा हूं...।
तो लंबी कहानी सुननी पड़ेगी..
मगर आज किसके पास समय है..कहानी सुनने की..
क्योंकि जो लोग 30सेकेंड का शार्ट/रील पूरा नही देख पाते,
वो कंहा से हमारी कहानी सुन पाएंगे..।

इसीलिए कोई पूछे..
अच्छे हो..
तो जबाब देना..
हां बिल्कुल अच्छा हूँ..।
क्योंकि इसके बाद वो कुछ नही पूछेंगे..।
अगर तुम मुस्कुराते हुए जबाब दिए..
तो वो स्वयं से पूछेंगे,ये मुस्कुरा क्यों रहा है..।
अगर हँस के जबाब दिए..
तो सोचो...वो क्या सोचेंगे..।
ये इतना खुश क्यों है..।।

सच कहूं तो आपको किसी की परवाह नही है..
सिर्फ कुछ लोगों को छोड़कर..।
पता है क्यों..??
क्योंकि आपको..
खुद की ही परवाह नही है..।

अगर किसी ने पूछा...
अच्छे हो..
तो मुस्कुरा के जबाब देना..
हां बिल्कुल अच्छा हूँ..
क्योंकि ऑप्शन ही क्या है..।।

बुधवार, 12 नवंबर 2025

लोग कहते है..

लोग कहते है कि मैं अच्छा हूँ..
मैं जब खुद से पूछता हूँ..
क्या मैं सच मे अच्छा हूँ..??
तो अंदर से एक जबाब आता है..
हां तुम अच्छे हो..
मगर अपने लिए नही,दूसरों के लिए..।

क्या सच में, मैं अच्छा हूँ..??
शायद नहीं..
दूसरों के नजर में अच्छा होना आसान है,
खुद के नजर में बुरा होना,सबसे बुरा है..।

दूसरों का क्या है..
जब तक स्वार्थ सधता रहेगा तबतक अच्छे बने रहेंगे,
जब तक मन,कर्म,वचन से ठेस न पहुँचाओ तबतक अच्छे बने रहोगे..।

मगर खुद के बारे में भी तो सोचो...
स्वयं को नुकसान पहुंचा कर कबतक खुद के नजरों में बुरा बने रहोगे..

इतिहास उसी का गुणगान करता है,
जो स्वयं के बारे में सोचता है,जो स्वयं के नजरों में अच्छे है..
चाहे वो राम हो,कृष्ण हो,या बुद्ध हो,या फिर वर्तमान में ही कोई सफल व्यक्तित्व हो..।

सफलता का एक ही ध्येय है..
खुद के प्रति स्वार्थी बने..।।
कड़वा है,मगर कटु सत्य है..।।

इसीलिये तो सफल लोगों की तादाद कम है,
नहीं...नही...खुशनुमा लोगों की तादाद कम है..।।






अनुभूति..उस प्रकाश पुंज की...

पिछले कुछ दिनों से में अक्सरहाँ स्वामी अड़गड़ानंद जी का "यथार्थ गीता" सुन रहा हूँ...सुनने में अच्छा लग रहा है,क्योंकि जिन्होंने आवाज दी ही उनके आवाज में मानो एक जादुई माधुर्यता हो..इसलिय सुनते वक़्त बोर नही होता,बल्कि कभी-कभी तो ये लोरियां की तरह लगता है,न जाने कब सुनते-सुनते आंख लग जाता है,पता ही नही चलता..।।

आज दोपहर में सोया हुआ था..तो मेरे साथ भी वही हुआ जो अर्जुन के साथ हुआ था-
 "द्रष्टांकरालानि च ते मुखानि दृष्टवेव कालानलसन्निभानि।
  दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ।।11.25

मगर मैं अर्जुन कहा,मुझमें उतनी शक्ति कंहा,की मैं उनके तेज का सामना कर सकता..।
कैसे वर्णन करू मैं..उस छवि की..शायद में दिग्भ्रमित हो गया हूँ..
उनका स्वरूप अतिसूक्ष्म से विकराल हो रहा था,या फिर विकराल से अतिसूक्ष्म हो रहा था,कुछ समझ में नही आया..उनके उस स्वरूप में इतना तेज और प्रकाश था कि मैं कुछ कह नही सकता,मैंने सूर्य को कई बार ही नही,बल्कि रोज ही देखता हूँ,मगर सूर्य को मैं भरी दोपहरी में भी देख सकता हूँ,और उनके तेज का कुछ सेकेंड तक सामना कर सकता हूँ।
मगर उस दिव्य स्वरूप में इतना तेज,और प्रकाश था कि मैं बिल्कुल ही डर गया,और मेरी आँखें खुल गई..शायद सेकंड के दसवें हिस्से तक ही मैं उन्हें देख पाया हूंगा..।मैं इतना भयभीत हो गया कि मैं डर गया,और मेरी आँखें खुल गई..।।
आखिर क्यों..??
उस दिव्य प्रकाश को मैंने देखा..जबकि मैं उनके प्रकाश से डर गया..।
मगर मैं अभी खुश भी हूँ, क्योंकि मैं उतना बुरा भी नही हूँ, मुझमें अभी भी संभावना बची हुई है..।।
उनका शायद संदेश है,खुद को और मजबूत करने के लिए जिससे मैं उनसे अच्छी तरह से रूबरू हो सकू...।।

हे परमपिता परमेश्वर आपको बारंबार प्रणाम..


Yoga for digestive system