शनिवार, 31 जनवरी 2026

हम दुःखी क्यों है..??

अतीत से लेकर वर्तमान तक,हम सभी दुःखो से घिरे हुए है..
आखिर क्यों..??
इस क्यों का जबाब हम अतीत से ही ढूंढते आ रहे है..हमारे ऋषियों-मनीषियों ने दुःख का कारण और निवारण भी बताया है..।



सांख्य दर्शन दुःख का कारण "अविवेक"(पुरुष प्रकृति को एक समझना) को मानता है,और इसके निदान के लिए "विवेक ख्याति"(दोनों के बीच के अंतर को जानकर स्वयं का अनुभव करना) का मंतव्य प्रस्तुत करता है।

● वंही महर्षि पतंजलि दुःख का कारण "पंच-क्लेश"(अविद्या, अस्मिता,राग, द्वेष, और अभिनिवेश(मृत्यु भय)) को मानते है,और इससे निवारण के लिए "अष्टांगिक योग" का मार्ग बताते है।

●वही वेदांत दुःख का कारण "माया" को मानता है,और इसके निदान के लिए "आत्म ज्ञान" पर जोड़ देता है..।

●दूसरी तरफ महात्मा बुद्ध ने दुःख का कारण "तृष्णा(इच्छा)" को माना और इससे उबरने के लिए "अष्टांगिक मार्ग" का राह बताते है..।

●वंही महावीर जी दुःख का मूल कारण "कर्म और बंधन" को मानते है,और इससे छुटकारा पाने के लिए "रत्नत्रय"(सम्यक दर्शन,सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र) का मार्ग बताते है..।।

इसमें से कोई भी दर्शन दुःख से इंकार नही करता,वो दुःख को परम सत्य मानते है,आपका पृथ्वी पर पर्दापण होते ही,दुःख आपका साया बन जायेगा,आप और हम इससे बच नही सकते..मगर हम सब इससे बचने का निर्रथक प्रयास करते रहते है..।
हमारे संतों और ऋषियों ने जो मार्ग बताया है,वो इतना सरल नही है,जो हमसब उस राह पर चल सके..।

तो क्या किया जाय..??
◆सबसे पहले तो हमें, दुःख को वैसे ही स्वीकार करना होगा,जैसे हमने दिन और रात को स्वीकार कर लिया है..।

क्या अब हमें रात भयावह लगती है..??
शायद हममें से अधिकांश का जबाब नही में होगा..।
अब अपने आप को आज से 10000 वर्ष पीछे ले जाये और अपने आसपास के वातावरण का कल्पना कीजिये...न खाने,न पीने और न ही रहने का कोई ठिकाना है..दिन किसी तरह कट जाती है,मगर रात होते ही डर का शाया शुरू हो जाता है..।
हम ये भी नही सोच सकते कि,क्या हम कल का सवेरा देख पाएंगे..??
मगर वर्तमान में हम आने वाले भविष्य के बारे में भी सोच लेते है..😊
इसीलिए तो इन्वेस्टमेंट करते है..।
ये कैसे संभव हुआ..??
उस रात को स्वीकार कर,रात को बेहतर बनाने से..।
इसीलिए हमें दुःख को स्वीकारना होगा,और उसे बेहतर बनाना होगा..तब ही हम दुःख से छुटकारा पा सकते है..।।

दुःख की उत्पत्ति कब होती है,और ये हमें कब प्रभावित करता है..??
दुःख की उत्पत्ति कभी भी हो सकती है..जैसे आंख बंद करते ही अंधेरा हो जाता है,उसी तरह दुःख का स्मरण करते ही दुःख की उत्पत्ति हो जाती है..।
जिस तरह हम दिन में आंख बंद करने के बावजूद उजियाला का अनुभव कर पाते है,उसी तरह हम दुःख को भी महसूस कर पाएंगे कि ये फालतू का दुःख है,या सच्चा का..।।
वर्तमान में हममें से अधिकांश लोग दुःख को स्वयं आमंत्रित कर रहे है,जिस तरह आंख बंद करके अंधेरे को आमंत्रित करते है..।

हम दुःख को कैसे आमंत्रित कर रहे है..??
इसका जबाब आप स्वयं ढूंढिये..😊
वर्तमान में दुःख का सबसे बड़ा कारण "डिजिटल गुलामी" है..ये आपको क्षणभंगुर आभासी सुख देता है..और उसके बाद निरंतर दुःख के दलदल में घसीटते जाता है..और हमें अहसास भी नही होता...।आज इसके कारण अवसाद(depression),चिंता(Anxiety) वैश्विक महामारी का रूप ले चुका है..।

• "खालीपन" हां दुःख का सबसे बड़ा कारण हमारा खालीपन है..
दुःख का अहसास भी तब होता है,जब आप खाली होते है..जबतक आप व्यस्त होते है,तबतक आपको दुःख स्पर्श नही करता..।
जरा सोचिए..आप दुःखी कब होते है 🤔..??
जब हम खाली होते है..और जब हम खाली होते है तो हमारे पास दो चुनाव होता है..दुःख की और ढुलकने का या फिर सुख की और बढ़ने का..जब हम सुख की और बढ़ने में सक्षम नही होते तो दुःख की और यू ही ढुलक जाते..हम दुःख की और न ढुलके इसके लिए हम कई माध्यम को अपनाते है..जैसे सोशल मीडिया यूज़ करना,मूवी देखना या कुछ ऐसी एक्टिविटी जो हमें दुःख से दूर करें..हम कामयाब भी होते है..मगर तबतक ही जबतक हम वो एक्टिविटी कर रहे होते है,और फिर हम वंही पे खुद को पाते है..।
तो फिर क्या करें..??
अपने आप को सार्थक कार्य मे व्यस्त करें..जिसे करने के बाद आपको कुछ आउटपुट मिले..(वो सोशल मीडिया भी हो सकता है,या संगीत,मूवी कुछ भी)
अगर हम ऐसा करते रहें तो धीरे-धीरे ये दुःख भी रात की तरह सहज होने लगेगा..।।
 "दुःख को अस्वीकार नही,स्वीकार करें"
 क्योंकि स्वीकृति ही निवृति है..।।
Don't reject suffering, accept it"
Because acceptance is liberation..


गुरुवार, 29 जनवरी 2026

कैसे हो..

कैसे कहूं कि..
मैं..कैसा हूँ..।
सच कहता हूं..
मैं वैसा तो नही हूँ..
जैसा तेरे पूछने..
से पहले था..।

पहले मायूस था मैं..
थोड़ा उदास भी था मैं..
मगर तेरे पूछते ही..
कैसे हो..??
मैं,
मैं रह ही नही गया..।
मैं,
मैं हो गया..।।






बप्पा..



बप्पा क्या कर दिया आपने..
ड़र लगता है..
कंही आपसे भी ज्यादा..
उससे प्यार न करने लगूं..।

मगर एक बात है..
वो भी आपको पूजती है..
आपको मानती है..
आपसे प्यार करती है..।

बप्पा..
आपसे बेहतर कौन जानता है..
आपने जो किया है..
वो अच्छे के लिए ही किया है..।


बुधवार, 28 जनवरी 2026

कंहा थे..

अब जिधर देखता हूँ..
उधर तुम ही दिखते हो..
न जाने क्या किया तूने..
मेरे सांसों में..
अब सिर्फ तुम बसते हो..।

कंहा थे इससे पहले..??
अब वीरान हो गई जिंदगी को..
फिर से नया जान दे रहे हो..।

जब से तुम आये हो..
तबसे मैं,
मैं रह ही नही गया..
अब बस सिर्फ मैं..
मैं हो जाना चाहता हूं..।

अब जिधर देखता हूँ..
उधर तुम ही दिखते हो..
न जाने क्या किया तूने..
मेरे सांसों में..
अब सिर्फ तुम बसते हो..।



सोमवार, 26 जनवरी 2026

कभी-कभी..

कभी-कभी थकना जरूरी है..
क्योंकि कभी-कभी थकने के बाद अहसास होता है कि,
क्या हम सही दिशा में जा रहे है या नही..।

कभी-कभी मायूस होना जरूरी है..
क्योंकि मायूस होने के बाद ही मायूसी का जड़ का पता चला पाता है..।

कभी-कभी सोचना भी जरूरी है..
क्योंकि सोचने के बाद ही सही निर्णय निकलता है..।।

कभी-कभी भविष्य में झांकना भी जरूरी है..
क्योंकि वर्तमान का सही दिशा का पता चलता है..।।

रविवार, 25 जनवरी 2026

कंहा ढूंढ रहे हो मुझे..

बप्पा..
कंहा ढूंढ रहे हो मुझे..
किस स्वरूप में ढूंढ रहे हो मुझे..
जिस स्वरूप में, तुम देख रहे हो मुझे..
क्या उस स्वरूप में कोई और देख सकता है मुझे..
तो फिर क्यों जंहा-तहाँ ढूंढ रहे हो मुझे..।

मुझे तुम खुद में समाहित करो..
और हरेक सांस से मुझे विस्तारित करो..
इतना विस्तार करों..
जितना तुम मेरा विस्तार देख रहे हो..।।

बप्पा..


कभी हार मत मानो..

कभी हार मत मानों..
क्योंकि जब हम हार मान लेते है..
तो आने वाली पीढियां भी हार मान लेती है..
और वर्तमान पीढ़ी भी..।

भले ही जीत सुनिश्चित न हो..
मगर मैदान में डटे रहों..
क्या पता,
पासा कब पलट जाए..
और जीत हमारे हिस्से में आ जाये..।।

इस तरह जितने वालें तुम सिर्फ अकेले नही होंगे...
इतिहास तुम्हारे जैसे योद्धाओं से भरा पड़ा है..
जिसने अंतिम क्षण तक मैदान में डटने का निर्णय लिया..
उसके ही सर पर जीत का सहरा सजा है..।

इसीलिए,
कभी हार मत मानों..
क्योंकि जब हम हार मान लेते है..
तो आने वाली पीढियां भी हार मान लेती है..
और वर्तमान पीढ़ी भी..।



Yoga for digestive system