रविवार, 8 फ़रवरी 2026

हमारा एक ही सच्चा साथी है..

दुनिया में आपका एक ही सच्चा साथी है..जो आपका साथ कभी नही छोड़ता और वो है दुःख..।



मगर अफसोस हमसब उससे पीछा छुड़ाना चाहते है..जबकि सत्य ये है कि आप जितना उससे पीछा छुड़ाना चाहेंगे वो आपका उतना ही पीछा करेगा..और एक दिन आप वास्तविक दुःख से सामना किये ही इस दुनिया को छोड़ देंगे..।
दुःख से भागे नही,बल्कि दुःख का सामना करें, और उसको अपना सारथी बनाये..ये दुःख ही ऐसा सारथी है,जो आपको इस भवसागर से पार कराएगा..।


मगर हम क्या करते है..??
दुःख को सारथी नही,बल्कि दुःख का ही सारथी बन जाते है..
और जिंदगी यही से दुःखी हो जाती है..।

हम सब दुःख से छुटकारा पाना चाहते है..
मगर क्या ये संभव है...??
बिल्कुल नही..।
क्योंकि दुःख ही तो मनुष्य और अन्य जीव को संवारता और निखारता है..।

कभी आपने अंकुरण की प्रक्रिया देखी है..??
कभी आपने कीट या पंक्षी को अंडे से निकलते देखा है..??
कभी आपने जानवर के बच्चों को पहली बार खड़े होते देखा है..??
कभी आपने जन्म लेने के बाद बच्चे को रोते हुए देखा है..??

ये सब प्रक्रिया इतना तकलीफदेह है..की हम कल्पना नही कर सकते..
मगर यही प्रक्रिया हमें मजबूत बनाती है..।

जरा खुद को देखिए..और सोचिए..
आज आप जंहा है..और वंहा आप, खुद को एक सुखी इंसान के रुप में देखते है...तो वो इसलिय क्योंकि आपने दुःख को अपना सारथी बनाया.. 

मगर आप जंहा है,और जिंदगी को तकलीफदेह मानते है,तो वो इसलिए क्योंकि आपने दुःख को सारथी नही,बल्कि दुःख का सारथी बन गए है..
आप अभी इस दुःख के केचुल को उतार कर फेंक सकते है..
दुःख को अपना सारथी बना करके..दुःख से भागे नही,उसे जानने की कोशिश करें..की ये दुःख क्यों है..इसका कारण ढूंढे..।।

"दुःख ही दुःख से निकलने का मार्ग है..।।"

अपने आसपास देखें..
और सुखी लोगे को ढूंढें..
आपको वही सुखी मिलेंगे..
जिन्होंने दुःख को स्वीकार किया है..।।

"सुख क्षणभंगुर पानी के बुलबुले के समान है..
और दुःख पानी के समान..।
सुख की उत्पत्ति ही दुःख से होती है..
और दुःख में ही फिर समाहित हो जाती है..।।"



इसलिए दुःखी मत होइए..
जिंदगी में सुखी, दुःख से ही आता है..
उस दुःख को सहस्र स्वीकार करें..
जो आपके हिस्से में है..।
क्योंकि ये दुःख ही आपको अपने जिंदगी के ऊंचाई पे ले जाएगा..।।

दुःख को अपना सारथी बनाये..
और उस पर सवार होइए..
और उन सब दुःख के कारणों को,
रौंद दीजिये..
जो आपके जिंदगी में रोड़ा अटका रहा है..।।



शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

क्रिकेट... ट्राय बॉल..और बचपन की यादें..

आपने बचपन में क्रिकेट खेला है..?
खेला ही होगा..
आपको याद है..
जब आप या आपके दोस्त पहली बॉल पर आउट होते थे,तो क्या बोलते थे..
शायद अक्सरहाँ यही कहता होगा ट्राय बॉल है😊..।

आज रास्ते से गुजर रहा था..
तो कुछ बच्चे गली में क्रिकेट खेल रहे थे..
एक बच्चा बैटिंग कर रहा था..
और वो आउट हो गया..
और आउट होते ही बोला..
ट्राय बॉल है,ट्राय बॉल है..
मगर कुछ बच्चे बोले ट्राय बॉल पहले ही हो गया था..।।

ये वाकया देखकर हंसी आ गई..
और बचपन की यादों में खो गया..।
वो भी क्या दिन थे..
क्रिकेट खेलने के लिए घर से चोरी छुपे निकलना..
और धूप छाव में क्रिकेट खेलना..
और फिर घर जाते ही घरवाले से डांट सुनना..
मगर फिर भी...
अगले दिन,फिर से चोरी छुपे निकलना..
फिर घर जाकर डांट सुनना..।
ये सिलसिला तबतक चलता रहा जब तक वो गलियां, वो घर और वो गाँव न छुटा..।
सबकुछ छूट गया मगर वो ट्राइ बॉल इस तरह जेहन में बस गया कि अभी भी उसकी गूंज सुनकर सारी यादें ताजा हो गई..।




मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

शिव कौन है..??

जाबालि उपनिषद सामवेद से संबंधित एक लघु उपनिषद है। इस उपनिषद में महर्षि जाबालि और ऋषि पैप्पलाद के बीच संवाद के माध्यम से शिव के बारे में बताया गया है।


ऋषि पैप्पलाद ने जाबालि से पूछा शिव कौन है तो जाबालि कहते है-

सहोवाच जाबालिः- 

"पशुपतिं सवज्ञं जगदुदयस्थितिभङ्गहेतुं सर्वेश्वरं महादेवं ज्ञात्वा मृत्युमुत्तीर्यते॥

 जाबालि कहते है - शिव समस्त पशुओं (जीवों) के स्वामी है, वो सर्वज्ञ, जगत की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश का  कारण है, सर्वेश्वर 'महादेव' को जानकर ही मनुष्य मृत्यु को पार कर सकता हूं। 

शिव केवल देवता नहीं, बल्कि ब्रह्मांड का आधार है।




शिव कौन है - शिव पशुपति है..

"​अहंकारमयाः जीवाः पशवः परिकीर्तिताः।

तेषां पतित्वाद्देवेशः पशुपतिरित्युच्यते॥"

अहंकार से युक्त जितने भी जीव हैं, वे 'पशु' कहलाते हैं। उन सभी जीवों के स्वामी (पति) होने के कारण महादेव को 'पशुपति' कहा जाता है।



​★शिव कौन है- शिव  'भस्मधारी' है।

अग्निरेवेति भस्म। वायुरिति भस्म। जलमिति भस्म। स्थलमिति भस्म। व्योमेति भस्म। सर्वं ह वा इदं भस्म॥

अग्नि भस्म है, वायु भस्म है, जल भस्म है, पृथ्वी भस्म है और आकाश भस्म है।संपूर्ण दृश्यमान जगत भस्म का ही विस्तार है।

 

◆प्रलय के पश्चात जो शेष बचता है,वही शिव है..


शिव ही शिव है..

शिव के सिवा कुछ और नही है..

शिव ही शिव है..

शिव..शिव..शिव..

यात्रा..

यात्रा जरूरी है..
क्योंकि यात्रा सिर्फ जीवन नही,बल्कि जिंदगी बदल देती है..।
इसलिए जब भी मौका मिले यात्रा पर निकल जाए..।
पता नही कौन सी यात्रा आपके जिंदगी को बदल दे..।

मेरी तो जिंदगी बदली है..
अब मैं वो नही हूँ..जो पहले था..।
मगर मुझे पता नही उस यात्रा में ऐसा क्या चीज था जिसने मेरे जिंदगी को बदल दिया..।
13 दिसंबर 2025 को मैं मुम्बई से गुजरात के व्यारा के लिए YOG परीक्षा के लिए 3 दिन के लिए गया..व्यारा में सर्किट हाउस में ठहराव था,हम कुल 8 लोग थे,मगर सर्किट हाउस में 5 लोग ही ठहरे थे,हम और 2 व्यक्ति एक कमरे में ठहरे थे..शायद उस पार्थ(सर्) के पास सोने से मेरे अंदर बदलाव आया..
या फिर तपोवन आश्रम में गुरु जी(शंकरभाई पटेल) का ऊर्जा का प्रभाव था
या फिर उस मंदिर का(उनाई माता) या फिर वो ग्रुप ही ऊर्जावान था जिसके ऊर्जा से में भी ऊर्जावान हो गया..।
या फिर व्यारा से आते वक्त उस वृद्ध का vip लेकर सीढ़ी से उतरने में मदद किया, और उनका स्पर्श मेरे अंदर बदलाव लाया..।
या फिर बप्पा को स्वप्न में देखकर ऊर्जावान होना..।
या फिर 16 तारिक को एक स्ट्रेंजर का मेसैज आना और वर्षा की तरह मेरे जिंदगी के गंदगियों को धो देना..।






जिंदगी में जबतक कृपा नही होती तबतक कुछ नही होता..
कृपा हमेशा बरसती रहती है..
हमें सिर्फ बाहर निकलकर उस कृपा का रसपान करना होता है..।।

घर से बाहर निकलिए..
यात्रा कीजिये..
यात्रा घर से बाहर का और बाहर से घर का..
यात्रा इड़ा से पिंगला का..
यात्रा मूलाधार से सहस्त्रार का और सहस्त्रार से मूलाधार का..
यात्रा अ , उ , म से ॐ का..
यात्रा स्वयं से शिव का 
और शिव से स्वयं का..।।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

हादसा..

कभी-कभी जिंदगी की बागडोर हमारे हाथों में नही,बल्कि किसी ओर के हाथ मे होता है..।खासकर के हम मनुष्यों का जीवन तो दूसरे के ही हाथों में है..।
जरा सोचिए..
हम जन्म लेते,और माँ-बाप हमारा ख्याल नही रखते..
तो क्या होता..??
मगर हम इन सब चीजों का इतना आदि हो गए है कि हमारा ध्यान इधर जाता ही नही है..।

एक सचा वाकया बताता हूँ..
एक चौराहे 🚦🛣️ पे एक तरफ से बाइक आ रही थी,दूसरी तरफ से कार..
मगर बाइक वाले ने पूरा ब्रेक लिया मगर तब भी उसकी बाइक नही रुकी.
मगर कार वाले ने कार रोक ली..और बाइक वाला बच गया और सीधे आगे निकल गया..।


ये दृश्य भले ही सामान्य हो..मगर इस दृश्य में बहुत कुछ छुपा हुआ है..
● कार वाला बेहतर इंसान हो,इसलिए उसने ब्रेक लगा लिया..
● बाइक वाले ने या फिर उसके चाहने वालों ने कुछ अच्छे कर्म किए होंगे, जो वो इस दुर्घटना से बच गया..।

कभी-कभी हमारे हाथ मे कुछ नही होता..मगर कोई तो है जिसके हाथ मे सबकुछ होता है..।
इसे समझना आसान नही है..
हमारे जीवन मे अक्सरहाँ कई हादसे होते है..
मगर हम उस पर गौर नही करते..जबकि ये हादसे ऐसे होते है जो हमारी जिंदगी को बदलने वाले होते है..मगर हम उसे सामान्य हादसा मान कर दरकिनार कर देते है..।

हमसब के जीवन मे अक्सरहाँ कई हादसे होते है..।
आपको कोई हादसा याद है,या फिर आप भी हादसा को दरकिनार करने वालों में से है..
कोई नही, हममें से अधिकांश लोगों का जन्म भी एक हादसा ही है..
किसी के लिए कोई घटना हादसा होता है,तो किसी के लिए वही घटना अवसर होता है..
आखिर क्यों..??
इसके पीछे क्या काम करता है..??
क्या हमारा कर्म..
या हमारे कर्मों पे दूसरों का भी प्रभाव पड़ता है..।
ये इतना सूक्ष्म स्तर पर होता है कि हम इसे महसूस नही कर पाते..।

आगे से महससू कीजियेगा..




शिव कौन है..??कैवल्योउपनिषद के अनुसार

कैवल्यो उपनिषद के अनुसार शिव..


इस उपनिषद में ब्रह्माजी शिव के स्वरूप के बारे में ऋषि आश्वलायन को बताते हुए कहते है -




शिव ध्यान स्वरूप है(सगुण और निर्गुण का संगम)


अचिन्त्यमव्यक्तमनन्तरूपं शिवं प्रशान्तममृतं ब्रह्मयोनिम्।

तमादिमध्यान्तविहीनमेकं विभुं चिदानन्दमरूपमद्भुतम् ॥

उमासहायं परमेश्वरं प्रभुं त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तम्।

ध्यात्वा मुनिर्गच्छति भूतयोनिं समस्तसाक्षिं तमसः परस्तात्।।


शिव अचिन्त्य, अव्यक्त, अनन्त रूपों वाले, कल्याणकारी, परम शान्त, अमृतस्वरूप और ब्रह्म का कारण हैं। वे आदि, मध्य और अन्त से रहित हैं, वे अद्वितीय, सर्वव्यापी, चेतन-आनन्दस्वरूप और निराकार हैं। माता उमा के साथ, परमेश्वर, प्रभु, तीन नेत्रों वाले, नीलकण्ठ और अत्यन्त शान्त स्वरूप का ध्यान करके मुनि समस्त भूतों के कारण, सबके साक्षी और अज्ञान से परे उस परम तत्व को प्राप्त कर लेते हैं।


​◆ शिव सर्वव्यापत है-

स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट्।

स एव विष्णुः स प्राणः स कालोऽग्निः स चन्द्रमाः ॥


वो ही ब्रह्मा हैं, वो ही शिव हैं, वो ही इन्द्र हैं, वो ही अविनाशी परम स्वराट् (स्वयं प्रकाशमान) हैं। वही विष्णु हैं, वही प्राण हैं, वही काल, अग्नि और चन्द्रमा भी हैं।


​◆ शिव काल से परे है और शिव ही सत्य है..

स एव सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यं सनातनम्।

ज्ञात्वा तं मृत्युमत्येति नान्यः पन्था विमुक्तये ॥


जो कुछ भी पहले बीत चुका है और जो भविष्य में होने वाला है, वह सब कुछ वह सनातन शिव ही है। उन्हें जानकर ही मनुष्य मृत्यु को पार कर सकता है,मोक्ष का इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है।


​◆शिव अद्वैत है (आत्मा और शिव एक ही है)


मय्येव सकलं जातं मयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।

मयि सर्वं लयं याति तद्ब्रह्माद्वयमस्म्यहम् ॥


मुझसे ही सब कुछ उत्पन्न हुआ है, मुझमें ही सब प्रतिष्ठित है और मुझमें ही सब विलीन हो जाता है,वो अद्वैत ब्रह्म (शिव) मैं ही हूँ


​कैवल्योपनिषद् के अनुसार शिव 'समस्तसाक्षिम्' (सबके साक्षी) हैं। वे 'माया' और 'तम' (अज्ञान) से परे हैं..

शिव ही शिव है..

शिव के सिवा,

कुछ और नही है..

शिव ही शिव है..

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

मन चंगा तो कठौती में गंगा..

कुछ लोग ऐसे होते है,जो अपने कर्मों के द्वारा हमारे जीवन मे रच-बस जाते है,भले ही हम उनके नाम और काम से अनजान हो..मगर उनकी महानता हमारे जीवन का मार्ग प्रसस्त करता रहता है..।



उन्ही महान विभूतियों में से एक "संत रविदास/रैदास" जी है,इनका नाम रविदास इसलिए पड़ा क्योंकि इनका जन्म रविवार को हुआ..इनका जन्म बनारस के पास मंडूर गाँव मे हुआ,इनके माता का नाम घुरबिनिया और पिता का नाम रघु था..।

इनका जन्म चमार जाती में हुआ..मगर ये अपने कर्मो से ब्राह्मण बन गए..।
 "चमड़े,मांस और रक्त से
  जन का बना आकार
 आंख पसार के देख लो
 सारा जगत चमार।"

हम सब जन्म से शुद्र ही होते है..मगर हम अपने कर्मो,उपलब्धियों और अनुभूतियों से ब्राह्मण बनते है..।।

इन्होंने समाज को तब जगाने का कार्य किया जब समाज रूढ़ियों में जकड़ा हुआ था..
इन्होंने अपने गुरुभाई कबीर के साथ मिलकर समाज को जगाया और उद्वेलित किया..
 " मन चंगा त कठौती में गंगा"..
आज भी ये दोहे..समाज को जगाने का कार्य कर रही है..।।

रविदास जी ऐसे समाज की कल्पना करते थे जंहा कोई दुख न हो, न ही जाति-भेद हो,और न ही किसी के साथ अन्याय हो..।
 "बेगमपुरा सहर को नाऊँ,
  दुख अंदोह नहीं तिहि ठाऊँ।।"

रविदास भारत के चमकते सितारों में से है,जिनके चमक को उनकी शिष्या "मीराबाई" उनके चमक को और चहुँ दिशा में फैलाती है..
  " गुरु मिलिया रैदास जी"।

रैदास जी की बोली बुद्ध की बोली है,मगर इनके बोली मे भक्ति और प्रेम है..
जबकि बुद्ध की बोली में तार्किकता और विरोध था..जिस कारण बुद्ध का विरोध किया गया..।
अम्बेडकर जी ने बुद्ध को पढ़कर नही बल्कि रविदास जी को पढ़कर और समझकर बौद्ध धर्म अपनाया..।

भले ही भारत की बहुत बड़ी आबादी रविदास जी से अनभिज्ञ हो..
मगर शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा,जिनके ऊपर रविदास जी के दोहे,और गीत का असर न हो..।
  प्रभु जी तुम चंदन हम पानी,
जाकी अंग-अंग बास समानी॥
प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा,
जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती,
जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी तुम मोती हम धागा,
जैसे सोनहुँ मिलत सुहागा॥
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा,
ऐसी भक्ति करै रैदासा॥



Yoga for digestive system