सोमवार, 28 फ़रवरी 2022

सफलता असफलता और लक्ष्य



सफलता
हमारे लिए कई रास्ते खोलता है,
और 
असफलता कई रास्तों को रोके रखता है।
इसीलिए उन सभी रास्तों को खोलने के लिए सफल होना बहुत जरूरी है।।
असफलता आपको गलत मार्ग पे चलने को प्रस्तत करने लगती है,
जबकि सफलता आपकों अनेकों को गलत मार्ग पे चलने से रोकने के लिए प्रस्तत करेगी।
परिस्थितियां किसी का अनुकूल नही हुआ है,
सभी को जूझना पड़ा है।
किसी ने सफल होके अपना नाम अमर करवा लिया,
तो किसी ने परिस्थितियों का बहाना बना कर भीड़ में कंही खो जाने का निर्णय लिया।
निर्णय आपको करना है।।
भीड़ में कंही खोना है या फिर भीड़ के लिए कुछ करना है।।
आप भीड़ के लिए तब ही कुछ कर सकते है,जब आप भीड़ से आगे निकलोगे.. और आगे निकलने के लिए सफल होना जरूरी है।


और सफल होने के लिए एक बेहतरीन लक्ष्य का होना जरूरी है,क्योंकि बिना लक्ष्य के सफलता को पा ही नही सकते क्योंकि बिना पतवार के नाव कंहा जाएगी उसे खुद भी नही पता..।।
और हममें से अनेकों लोगों को लक्ष्य के बारे में पता ही नही है..
इसिलिय वो अपने क्षमता का दोहन कर ही नही पाते।
जबकि सफल होने की पहली सीढ़ी अपने लक्ष्यों का चयन करना ही है..।। 


हम चले जा रहे है,
सिर्फ चले जा रहे है,
कंहा जाना है पता नही,
मगर हम चले जा रहे है।
कब-तक चलते रहोगे,
इस जीवननुमा चक्र में,
कभी तो रुकोगे,
फिर भी रुक के चलन ही पड़ेगा,
इस जीवननुमा चक्र में,
जबतक की लक्ष्य को हासिल न कर लो।
इसीलिए जितना जल्दी हो 
अपने लक्ष्य का तो चयन करो,
क्योंकि जिंदगी न रुकने वाला चक्र है,
ये चलता रहेगा 
तब तक जबतक लक्ष्य को न पा लो..।।
लक्ष्य का चयन करना भी दूभर है,
क्योंकि गलत लक्ष्य तुम्हें फिर से 
इसी चक्र में चक्कर लगवायेगा।
हम चले जा रहे है,
सिर्फ चले जा रहे है,
कंहा जाना है पता नही,
मगर हम चले जा रहे है।।


रविवार, 6 फ़रवरी 2022

लता मंगेशकर शून्य से शिखर की यात्रा

 भविष्य के गर्भ में क्या है..??

   ये किसी को नही पता ..।


28 सेप्टेम्बर 1929 को जब एक लड़की मध्यप्रदेश के इंदौर में पैदा हुई होगी तब किसी को अहसास तक नही हुआ होगा की ,ये लड़की सिर्फ परिवार की ही नही बल्कि पूरे भारत की विरासत हो जाएगी।।

"इस सृष्टि मैं आपका कुछ भी नही है,आपका नाम तक भी नही,यंहा सब कुछ खुद से अर्जित करना होता है,नही तो सब कुछ एक दिन छिन जाता है।बचता वही है जो आपने अर्जित किया है"।


हेमा को क्या पता था कि, एक दिन मेरा नाम भी मुझसे छिन जायेगा। पिता की अपनी ड्रामा कंपनी में लतिका का किरदार निभाने के बाद पिता ने लता नाम रख दिया।।

जिंदगी में कभी-कभी वो नही होता जो आप चाहते है,इसका ये मतलब नही की जिंदगी खत्म सी हो गई..।।

5 साल की उम्र तक लता पिता के सामने गाती तक नही थी,मगर एकदिन पिता ने गाते सुन लिया उसके बाद पिता ने खुद से गाना सिखाना शुरू किया।

शिक्षित आपको सिर्फ डिग्रियां नही,बल्कि परवरिश और परिस्थितियां भी बनाता है।

लता जी सिर्फ 2 दिन ही स्कूल जा पाई, मगर कई विश्वविद्यालय उन्हें डॉक्टरेट की उपाधियां देकर गौरवान्वित महसूस करती है।अपने जीवनकाल में उन्होंने 36 भाषाओं में 50,000 से ज्यादा गाना गाई। जिस कारण उन्हें 75 से ज्यादा अवार्ड दिया गया जिसमें 1989 में दादा साहब फाल्के अवार्ड2001 में भारत रत्न3बार बेस्ट प्लेबैक सिंगर का नेशनल अवार्ड शामिल है।

उन्होंने संगीत की सारी शिक्षा पिता से ही सीखा,और कई भाषाओं का ज्ञान भी घर पर ही अर्जित किया। वो पहली बार 16 दिसंबर 1941 को स्टूडियो में रेडियो प्रोग्राम के लिए गाई.. उसके बाद अनवरत 7दशक तक गाने का सिलसिला चलता रहा।

परिस्थितियां हमेशा आपके अनुकूल हो ये जरूरी नही,बल्कि जरूरी ये है कि आप परिस्थितियों का सामना किस तरह से करते है..??

लता जी सिर्फ 13 साल की थी तब पिता की मृत्यु(24अप्रैल 1942)हो गई। और बड़ी होने के नाते बहन-भाई और माँ की जिम्मेदारी इनके ऊपर आ गई।


आप जो चाहे.... वो पाओ जिंदगी में... ये जरूरी नही,कभी-कभी परिस्थितियां तय करती है कि क्या करना है,और क्या होना है।

लता जी पैसों की किल्लत के कारण मराठी और हिंदी फिल्मों में छोटे-छोटे किरदार करने लगी।पहली बार स्टेज पर गाने के लिए उन्हें 25₹ मिले। और उन्हें अहसास हुआ कि में किरदार निभाने के लिए नही बनी हूँ।

13 साल की उम्र में उन्होंने पहली बार 1942 में मराठी फिल्म "पहिली मंगलागौर" के लिए गाया। उन्हें गाते हुए जब संगीतकार गुलाम हैदर ने सुना तो उन्होंने उस समय के सबसे सफल फ़िल्म निर्माता शशधर मुखर्जी से मिलवाया। मगर मुखर्जी ने ये कह कर गवाने से इनकार कर दिया कि "आवाज बहुत पतली है नही चलेगी"। मगर गुलाम हैदर ने लता जी को पहला मौका दिया उसके बाद तो इनके पास काम का कमी न रहा।। आगे चलकर सशधर मुखर्जी को भी अपने गलती का अहसास हुआ और उन्होंने 'अनारकली' और जिद्दी फ़िल्म में लता जी से गवाया।।

असफलता जिंदगी का हिस्सा है,और निरंतर सीखते रहने से असफलता को सफलता में बदला जा सकता है।

लता जी को गुलाम हैदर ने हिंदी-उर्दू सीखने के लिए प्रेरित किया तो,अनिल विश्वास ने ये सिखाया की गाते वक़्त कैसे सांस लेना है और कैसे छोड़ना है। अपने आवाज को निखारने के लिए वो निरंतर कुछ-न-कुछ सीखती रही।

जो अपने वसूल से समझौता कर लेते है,उनका वजूद नही रहता।।

लता जी ने कभी द्विअर्थी वाले गाने नही गाये,और न ही उसका हिस्सा बना। इस वजह से कई बार राइटर से झगड़ा हो जाता मगर अंत मे राइटर को शब्द बदलना पड़ता या फिर वो काम करने से इनकार कर देती।।

सजा तो सब दे सकता है,मगर सजा देने में सक्षम होने के बाबजूद क्षमा करना महानता है।।

32 साल की उम्र में स्वर-कोकिला बन गई थी,मगर इसी समय किसी ने धीमा जहर दे दिया।जिसके कारण महीनों बीमार रही।जब स्वस्थ हुई तो किसी ने अफवाह उड़ा दी कि अब वो नही गाएंगी।। मगर उन्होंने  "कंही दीप जले, कंही दिल जले" गाकर फ़िल्म फेयर अवार्ड जीत लिया।। उनलोगों को भी तबतक पता चल गया जिसने धीमा जहर दिया था,मगर उन्होंने किसी को नाम नही बताया।।

परिवार एक माला है, अगर टूट गया तो फिर व्यक्ति का अस्तित्व नही रह जाता।।

लता जी ने ये सोचकर शादी नही किया कि अगर मैं शादी कर लुंगी तो फिर मेरे परिवार का ख्याल कौन रखेगा,क्योंकि शादी के बाद तो मैं दूसरे घर चली जाऊंगी।उसके बाद मैं कैसे अपने माँ-बहन का ख्याल रख पाऊंगा..।।



उन्होंने "सा रे गा मा प ध नी सा" को सिर्फ गाया ही नही बल्कि उसे अपने जिंदगी में उतारा भी।

सा-सादगी  ।। रे - रेश्मी ।।  गा-गायकी  ।।  मा-माधुर्य ।। 

-परंपरा ।। ध-धवलता ।। नी-निर्मलता


लता जी आज हमारे बीच नही रही,मगर उन्होंने जो अर्जित किया उसे आनेवाली पीढ़ी के लिए छोड़ गई।

जिंदगी जीने का यही तो सलीका होता है कि आप आनेवाली पीढ़ियों के लिए कुछ ऐसा छोड़कर जाए जो उन्हें अपनी जिंदगी को और बेहतरीन बनाने में मदद करे।। 





शनिवार, 29 जनवरी 2022

#पलायन

पलायन अनवरत चलने वाला एक चक्र है,
हम जंहा से चलते है,फिर वंही पहुंच जाते है..

और ये चक्र तब-तक चलता रहता है,जब तक हम उस असीम शान्ति को नही पा लेते.. जिसे हम पीछे छोड़ आये है।

लोग गाँव से शहरों की और पलायान करते है,और शहर से दूसरे शहर को पलायन करते है,



इससे भी नही होता है तो शहर से उन देशों के शहर में पलायन करते है , जो पूर्ण विकसित है, और विकसित के सारे मानदंड पूर्ण कर चुके है,इससे ज्यादा और विकास नही हो सकता अगर होता तो फिर लोग वंहा पलायन करते..।

आखिर लोग पलायन क्यों करते है..??

एक बेहतर और सुखमय जिंदगी के लिए..
और जब इसे पा लेते है तो फिर, वंही आने को बेचैन होते है,जंहा से पलायन शुरू किया था..

आखिर क्यों...??
उस असीम शांति के लिए जिसे छोड़कर पलायन किये थे।
यही जिंदगी है..।।

बुधवार, 26 जनवरी 2022

गणतंत्र दिवस और इसके मायने....

 हम गणतंत्र दिवस क्यों मनाते है..??



लगभग 70% भारतीय को ये मालूम नही की,आखिर हम गणतंत्र दिवस क्यों मनाते है..??

क्या इसलिये की इस दिन संविधान लागू हुआ..।

90% आबादी को सही से ये मालूम नही होगा कि आखिर गणतंत्र के क्या मायने है..??

आप को ये जानकर आश्चर्य होगा कि वर्तमान में अभी भी कुछ ऐसे देश है जो गणतंत्र नही है जैसे-ब्रिटेन,कनाडा,ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, जापान,मलेशिया,स्वीडन,सऊदी अरब इत्यादि..

मगर हम गुलामी की बेड़ियों को तोड़कर सिर्फ स्वतंत्र ही नही बल्कि गणतंत्र भी हुए.. और उस लक्ष्य को पाने के लिए अग्रसर है जिसका स्वपन हमारे संविधान निर्माता ने सोचा था।

चलिए पहले हम जान लेते है कि आखिर हम गणतंत्रता दिवस क्यों मनाते है..

जब हम आजादी की लड़ाई गांधी जी के नेतृत्व में लड़ रहे थे तब कुछ अग्रणी नेताओ ने अंग्रेज से डोमिनियन स्टेट की मांग की इसका मतलब ये होता है कि सब कुछ तो हम भारतीय खुद ही तय करेंगे मगर राष्ट्र के प्रमुख ब्रिटेन के महाराज(जॉर्ज पंचम) ही होंगे..।।

मगर इसका विरोध सुभाष चंद्र बोस और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किया और उन नेताओं को समझाया आखिर ऐसी आजादी के क्या मायने रह जाएंगे..तब पर भी तो हम गुलाम ही कहलायेंगे.. इसके विरोध में 31दिसंबर 1929 को लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज की मांग किया गया..।। और पूरे देश मे 26 जनुअरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस और तिरंगा लहराया गया।।

इस दिन को संजोने के लिए हमारे संविधान निर्माताओं ने 26 जेनुअरी 1950 को संविधान लागू किया, जबकि हमारा संविधान 26 नवंबर 1949 को ही बनकर तैयार हो गया,और इस दिन को हम संविधान दिवस के रूप में मनाते है। जबकि हमे अंग्रेज से आजादी 15 अगस्त 1947 को ही मिल गया मगर उस समय हमें डोमिनियन स्टेट का ही दर्जा मिला,और हमारे देश में विधि-व्यवस्था भारत शासन अधिनियम 1935 के तहत शुरू हुआ और 25 जनुअरी 1950 तक गवर्नर जनरल का पद बना रहा,जब हमारा संविधान लागू हुआ तब हमें निर्वाचित(अप्रत्यक्ष) राष्ट्रपति मिले और हम गणतंत्र हो गए।।

हमारे संविधान निर्माताओं ने 60 देशों के संविधान का अध्ययन किया।इसे पूर्ण रूप देने में 2 साल 11 महीने 18 दिन लगे। और इसके निर्माण में उस समय 64लाख रुपये खर्च हुआ था।


हम वर्तमान में किस स्तर तक गणतंत्र हुए है,और हमारे लिए गणतंत्र के क्या मायने है..??

अगर औपचारिक रूप से देखा जाय तो हां हम गणतंत्र है क्योंकि हमारे यंहा राष्ट्रप्रमुख का प्रत्यक्ष रूप से चुनाव होता है।हमारे यंहा कोई खास वर्ग नही है,संविधान में सबों के लिए एक समान न्याय और समानता की बात किया गया। भारत मे जितने भी सार्वजनिक कार्यलय है वंहा पे सबों का एक समान वितरण की व्यवस्था किया गया है।।

मगर देखा जाय तो क्या हम उस लक्ष्य तक पहुंच पाए है..??

हमारे संविधान की प्रस्तावना सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक न्याय की बात करता है..
आर्थिक स्थिति आप देख रहे है देश के 1% लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का 50% से ज्यादा है।
राजनीतिक स्थिति भी आप देख सकते है भारत की जितनी भी राजनीतिक पार्टी है उसमें परिवारवाद किस हद तक हावी है कुछेक को छोड़कर।।

हमारे संविधान की प्रस्तावना विचार,अभिव्यक्ति, विश्वास,धर्म और उपासना की स्वतंत्रता की बात करता है।
हम इन लक्ष्यों को पाने में कुछ हद तक सफल हुए है,मगर हमें अपने देश को और प्रगतिशील बनाना है जिससे हमें किसीके विचार और अभिव्यक्ति से डर न लगे।।
हमारे संविधान की प्रस्तावना प्रतिष्ठा और अवसर की समानता की बात करता है.. हमें सबों के लिए समान अवसर प्राप्त करवाने के दिशा में अभी और काम करना है
चाहे वो राजनीति में भागदारी की बात हो,या फिर न्यायिक प्रकिया की बात हो या फिर गुणवक्ता पूर्ण शिक्षा के साथ महिलाओं की हरेक क्षेत्र में भागीदारी की बात ही क्यों न है,हमे अभी बहुत कुछ करना है।

हमारे संविधान निर्माता का अंतिम जो लक्ष्य था राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने के लिए बंधुत्वता बनाए रखना।
इसे हमें कभी कमजोर नही होने देने है,
अगर ये कमजोर हो गया,
तो हमारा राष्ट्र बिखर जाएगा,
और बिना राष्ट्र के लोगों की कोई गरिमा नही होती।

गणतंत्रता दिवस की ढेर सारी शुभकामना..😊


रविवार, 23 जनवरी 2022

सुभाषचंद्र बोस से नेताजी बनने तक कि यात्रा

 शाश्वत नियम याद रखें -: यदि आप कुछ पाना चाहते हैं, तो आपको कुछ देना होगा।

सुभाषचंद्र बोस ने नेताजी बनने तक के सफर में अपना सर्वस्व त्याग दिया.. इसिलए तो वो आज भी जिंदा है,उसी तेवर में जिस तेवर मैं उन्होंने कहा था- तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा..

सुभाषचंद्र  बोस का जन्म 23 जनुअरी 1897 के कटक(ओडिशा)में हुआ।
भारत सरकार ने उनके 125वी जन्मशती को पराक्रम दिवस  के रूप में मनाने का निर्णय लिया है,जो उनके छवि और योगदान को देखते हुए सही है। उन्होंने आजादी के लड़ाई में वही पराक्रम दिखाया,जिसे देखकर देश के हर नागरिक को अनुभव हो गया था कि अब आजादी मिल जाएगा।
क्योंकि उन्होंने पहली बार भारत में अप्रैल 1944 में मणिपुर में झंडा फहराया।
मगर दुर्भाग्य ये रहा कि जापान पर परमाणु बम गिरने के बाद जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया,जिस कारण नेताजी रूस से मदद लेने के लिए 18 अगस्त 1945 को बमवर्षक विमान से मंचूरिया के लिए रवाना हुए कहा जाता है कि ये प्लैन क्रैश हो गया और उनकी मृत्यु हो गई..।।
मगर किसी को विश्वास नही है..।।

आज हमारे अन्दर बस एक ही इच्छा होनी चाहिए – मरने की इच्छा ताकि भारत जी सकेएक शहीद की मौत मरने की इच्छा ताकि स्वतंत्रता का मार्ग शहीदों के खून से प्रशस्त हो सके।
सुभाषचंद्र बोस ने अपनी प्राथमिक शिक्षा कटक के यूरोपियन स्कूल से ही किया और 10वी में 2रा स्थान प्राप्त किया। और आगे की पढ़ाई के लिए कोलकाता चले आये और उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज में नामांकन कराया ।।
1916 में जब वो दर्शनशास्त्र से B.A कर रहे थे तब कॉलेज के अध्यापकों और छात्रों के बीच झगड़ा हो गया क्योंकि अंग्रेज प्रोफेसर Mister O भारतीय छात्र से घृणा करते थे और बेवजह मारते थे। सुभाष ने छात्रों का नेतृत्व संभाला और प्रिंसीपल से शिकायत की तब भी कुछ नही बदला तो ये लोग उस मास्टर को भी मारे । ये बात प्रिंसीपल तक पहुंचा और एक कमिटी का गठन किया गया जिसमें कहा गया कि सुभाष Mister O से माफी मांगे मगर सुभाषचंद्र ने मना कर दिया जिस कारण उन्हें कॉलेज से 1 साल के लिए निलंबित कर दिया ।
इन दिनों वो देशबंधु चितरंजन दास को पढ़ना और सुनना शुरू किया। उन्ही से उन्हें समाजसेवा का प्रेरणा मिला। इन दिनों कोलकाता में कॉलरा(हैजा) फैला हुआ था, लाश इधर-उधर बिखरे पड़े थे।चारों बगल उदासी और असहाय लोग को देखते हुए वो द्रवित हो उठे ।उन्होंने उस समय 2.5 हजार से ज्यादा लोगों का अंतिम संस्कार किया।
इसी समय उन्हें सेना में भर्ती होने का शौक चढ़ा और वो 49वीं बंगाल रेजीमेण्ट में भर्ती के लिये उन्होंने परीक्षा दी किन्तु आँखें खराब होने के कारण उन्हें सेना के लिये अयोग्य घोषित कर दिया गया। उन्होंने बहुत कोशिश की मगर फिर उन्होंने अपना पूरा ध्यान B.A पे दिया और प्रेसीडेंसी कॉलेज में दूसरा स्थान प्राप्त किया।
पिताजी की इच्छा थी कि वो ICS(इंडियन सिविल सर्विस) करें, वो राजी हो गए मगर उनके पास सिर्फ 1 वर्ष ही था और उन्होंने ये चुनौती स्वीकार किया और ICS में 4th स्थान प्राप्त किया
मगर सुभाष चंद्र बोस स्वामी विवेकानंद और अरविंदो से बहुत प्रभावित थे ।और उन्होंने अपने भाई शरतचंद्र बोस को चिठी लिखी की ICS की नॉकरी कर देश की सेवा कैसे कर सकता हूँ..??
पिता के विरोध के बावजूद उन्होंने ने ICS की नॉकरी छोड़ दी और ये खबर पूरे भारत मे आग की तरह फैल गई।

कोलकाता आकर वो चितरंजन दास के साथ काम करने लगे उसी समय गांधी जी द्वारा शुरू किया गया असहयोग आंदोलन का नेतृत्व कोलकाता में चितरंजन दास कर रहे थे सुभाष चंद्र बढ-चढ़कर भाग लिया। 1922 में चितरंजन दास ने कांग्रेस के अंतर्गत  स्वराज पार्टी का गठन किया और इस पार्टी ने कोलकाता में  महापालिका का चुनाव लड़ा और जीता । चितरंजन दास महापौर बने और सुभाष चंद्र  महापालिका के प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बने। इन्होंने
 गलियों और सड़कों का नाम स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर रखना शुरू किया। साथ ही जिन परिवार से लोग आजादी के लड़ाई में शहीद हुए है, उस परिवार के सदस्यों को महापालिका में नॉकरी देना शुरू किया ।
युवाओं के बीच इनकी ख्याति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी।
1928 में गांधीजी से सुभाषचंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू के बीच मतभेद हो गया। गांधी डोमिनियन स्टेट के समर्थक थे जबकि ये दोनों पूर्ण स्वराज के बाद में गांधीजी ने इनदोनों की बात मान ली।
26 जेनुअरी 1930 को लाहौर अधिवेशन में पहली बार झंडा फहराया गया और पूर्ण स्वराज की मांग किया गया
26 जनुअरी 1931 को सुभाषचंद्र बोस ने कोलकाता में झंडा फहराया और एक रैली का नेतृत्व किया जिस कारण उन्हें जेल भेज दिया गया। 
इसी बीच भगत सिंह को फांसी दे दिया गया । जिस कारण सुभाषचंद्र बोस गांधी जी से नाराज हो गए क्योंकि उन्हें लगता था कि गांधी जी अगर कड़ा रुख अपनाते तो फांसी रुक सकता था।
वो अपने पूरे जीवनकाल में 11 बार जेल गए । 

विदेश-प्रवास


1932 में जेल में ही तबियत खराब हो गया जिस कारण वो इलाज कराने के लिए यूरोप गए। 1933-36 तक वो यूरोप में रहे मगर उस दौरान भी वो अपने कार्य मे लगे रहे।
वंहा वो इटली के नेता मुसोलिनी से मिले और उसने आस्वासन दिया कि इटली भारत की आजादी में अपना सहयोग देगा।
साथ ही  आयरलैंड के नेता डी अल्वेरा भी इनके अच्छे मित्र हो गए। 
उसी समय वो विट्ठल भाई पटेल से मिले और दोनों ने मंत्रणा की जिसमें गांधीजी के नीतियों का विरोध किया गया।जिसे पटेल-बोस विश्लेषण के नाम से ख्याति मिला।
इसी दौरान विट्ठल भाई पटेल की तबियत खराब हो गई सुभाषचंद्र ने जम की सेवा की मगर वो नही बचे।
 विट्ठल भाई पटेल ने अपनी वसीयत में पूरा सम्पति सुभाषचंद्र बोस के नाम कर दी थी, मगर सरदार पटेल ने नही माना उन्होंने मुकदमा चलाया और जितने के बाद पूरी सम्पति गांधीजी के हरिजन सेवा कार्य मे दे दिया।
 
1934 में इन्हें अपने पिता की मृत्यु की खबर मिली और वो कोलकाता आये। अंग्रेज को जब पता चला तब फिर कुछ दिन जेल में रखकर यूरोप भेज दिया।

1934 में जब वो आस्ट्रिया में थे तो एक इंग्लिश टाइपिस्ट "ऐमली शेंकल" जिसे इन्होंने अपने पुस्तक लिखने के लिये रखा था,इनसे शादी कर ली। इनसे एक पुत्री हुई जिसका नाम इन्होंने अनिता रखा।


 कांग्रेस के 51वे अधिवेशन के लिए गांधीजी ने सुभाषचंद्र बोस को कांग्रेस का अध्य्क्ष चुना।


इन्होंने अपना अध्यक्षीय भाषण बड़ी जोरदार दिया था,ऐसा भाषण अभी तक किसी ने नही दिया था।
इन्होंने इस दौरान योजना आयोग का गठन किया जिसका अध्यक्ष नेहरू को बनाया।
इन्होंने बेंगलुरु में महान वैज्ञानिक विश्वेश्वरय्या की अध्यक्षता में विज्ञान परिषद की स्थापना की

1939 में बोस फिर से कांग्रेस अध्यक्ष के लिए चुनाव लड़े और जीत भी गए। जबकि गांधीजी नही चाहते थे, क्योंकि गांधीजी को सुभाष की कार्यशैली पसंद नही था, जिस कारण इन्होंने पट्टाभि सितारमैय्या को अपने तरफ से खड़ा कियारवींद्रनाथ टैगोर ,प्रफुलचंद्र राय और मेघानाद साहा जैसे वैज्ञानिक ने गांधी जी को चिट्ठी लिखकर कहा कि सुभाष को ही कांग्रेस का अध्यक्ष रहने दिया जाय। मगर गांधीजी नही माने और वर्षों बाद कांग्रेस में चुनाव हुआ। मगर सुभाषचंद्र 203 मत से जीत गए।
गांधीजी ने पट्टाभि सितारमैय्या को अपनी हार बताकर कांग्रेस कार्यकारणी से कहा कि अगर आपको  सुभाष की कार्यशैली पसन्द नही है तो आप हट सकते है 14 में से 12 सदस्य ने त्यागपत्र दे दिया। नेहरू तटस्थ बने रहे सिर्फ शरतचंद्र बोस ही इनके साथ खड़े रहे।।
सहयोग न मिलने के कारण उन्होंने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया।
3 मई 1939 को इन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना किया , जिस कारण इन्हें कांग्रेस से निकाल दिया गया।
इसी समय द्वितीय विश्वयुद्ध की खबर भारत तक पहुंची बोस ने कांग्रेस से आवाहन किया कि अभी सही समय है अंग्रेज से लड़ने का अगर कांग्रेस मदद नही करेगा तो फारवर्ड ब्लॉक अकेले ही अंग्रेजो का ईंट से ईंट बजा देगा।
1940 में कोलकाता स्थित होलमेट स्तंभ जो कि गुलामी का प्रतीक था उसे रातों-रात फॉरवर्ड ब्लॉक के युवा ब्रिगेड ने ध्वस्त कर दिया।अंग्रेज को खबर लगते ही उसने फॉरवर्ड ब्लॉक के सभी बड़े नेताओं के साथ बोस को भी जेल में डाल दिया।
सुभाषचंद्र जेल में निष्क्रिय नही रहना चाहते थे वो अंग्रेज के खिलाफ आमरण अनसन शुरू कर दिया , तबियत बिगड़ने के हालात में उन्हें घर पर ही नजरबंद कर दिया गया।


भला कबतक उन्हें नजरबंद करके रखते..
अपने भतीजे शिशिर के मदद से 16 जनुअरी 1941 को पठान मोहमद जियाउद्दीन के वेश में घर से निकल गए। कार से गोमोह रेलवे स्टेशन पहुंचकर वंहा से फ्रंटियर मेल पकड़कर पेशावर पहुंचे।वंहा मियां अकबर खान के मदद से भगतराम तलवार के साथ काबुल पहुंचे।वंहा भारतीय व्यापारी उत्तमचंद मल्होत्रा के यंहा दो महीने रहे। इस दौरान वे जर्मनी, इटली और रसियन दूतावास से संपर्क किया । इटली दूतावास के मदद से वो ऑरलैंडो मेजेंटो नामक इटालियन बनकर मास्को होते हुए बर्लिन पहुंचे।

जर्मनी प्रवास
जर्मनी पहुंचकर वो अनेक नेताओ से मिले,इनमें से जर्मनी के एक मंत्री एडम फॉण ट्रॉप इनके अच्छे दोस्त हो गए। इसी दौरान 29 मई 1942 को एडोल्फ हिटलर से मुलाकात हुई


मगर हिटलर ने भारत की मदद करने से ये कहकर इनकार कर दिया कि जर्मनी यंहा से बहुत दूर है,आप जापान से मदद ले क्योंकि वो भी हमारे ही अलायन्स में है।
हिटलर ने अपनी आत्मकथा माइन कैम्फ में भारत और भारत के लोगो की बुराई की थी इसका विरोध सुभाषचंद्र बोस ने किया,हिटलर ने आस्वासन दिया कि अगले संस्करण में उसे हटा दिया जाएगा।
जर्मनी में ही नेताजी ने भारतीय स्वंतंत्रता संगठन और आजाद हिंद रेडियो की स्थापना की।इसी दौरान वो नेताजी के नाम से भी प्रसिद्धि मिली।
जर्मनी से वो पनडुब्बी मैं बैठकर इंडोनेशिया पहुंचे वंहा से वो सिंगापुर होते हुए जापान पहुंचे।

पूर्वी एशिया की यात्रा


शनिवार, 15 जनवरी 2022

"आत्महत्या" इसके लिए जिम्मेदार कौन..

 आत्महत्या जो कि एक लेटिन शब्द है,मगर इसका सर्वाधिक भुक्तभोगी भारत है..।।

क्या आपको पता है दुनिया में सर्वाधिक आत्महत्या कंहा होती है..?? 

हां भारत में..।। उस भारत में जिस भारत मे आत्महत्या को हेय दृष्टि से देखा जाता है,और कानूनन जुर्म है..।।

आत्महत्या को कभी भी एक सभ्य समाज स्वीकार नही कर सकता।। प्राचीन-काल से ही आत्महत्या करने वाले को हेय दृष्टि से देखा जाता है।

-प्राचीन एथेंस शहर में आत्महत्या करने वालों को शहर के बाहर दफनाया जाता था।

-1670 में फ्रांस शासक लुई-14वॉ के समय मे आत्महत्या करने वालों के शवों को सड़क पर घसीटा जाता था, और बाद में कचड़े के ढेर पर फेंक दिया जाता था।

- ईसाई धर्म मे जो इस तरह का प्रयास करता था उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता था,और जो मर जाते थे उसे कंही और दफनाया जाता था।

-इस्लाम धर्म आत्महत्या की इजाजत नही देता।।

-वंही सनातन धर्म मे इस तरह का विचार आना भी हमें पाप का भागीदार बना देता है।।

WHO(विश्व स्वास्थ्य संगठन) के अनुसार चीन,रशिया,अमेरिका, जापान,दक्षिण कोरिया से भी ज्यादा आत्महत्या भारत मे होती है।

विश्व मे 1 लाख लोगों पर 11.6 लोग आत्महत्या करते है,वंही भारत मे 1 लाख पर 11.3 लोग(NCRB के अनुसार) आत्महत्या करते है।


2020 में भारत में रोजाना 458 लोगों ने आत्महत्या की है,यानि एक साल में 1,53,502 लोगों ने.. ये आंकड़े NCRB(नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) के है अगर आप लसेंट के आंकड़े देखेंगे तो और ज्यादा भयावह है।।


भारत में सर्वाधिक आत्महत्या के मामले महाराष्ट्र, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश और पक्छिम बंगाल के है।।



WHO के अनुसार भारत मे महिलाओं का आत्महत्या दर 1लाख पर 16.4(इनमें से 70% यौन-शोषण,दहेज-उत्पीड़न,पारिवारिक-शोषण के कारण) है जबकि पुरुषों का 1 लाख पर 25.8 है।

सबसे ज्यादा भयावह और अफसोस जनक ये है कि हमारे 1 छात्र हरेक 55 मिनट में आत्महत्या कर रहे है। 

जिनके ऊपर देश का भविष्य है, जिनके ऊपर भारत के संजोने की जिम्मेदारी है,जिनके ऊपर समाज के साथ परिवार को सुदृढ़ करने की जिम्मेदारी है।वो आखिर क्यों इस तरह से अपने प्राण को त्याग रहे है..??

इसके लिए जिम्मेदार कौन है..??

हमारा समाज,हमारा परिवार या हमारी शिक्षा व्यवस्था..??ये तीनों ही जिम्मेदार है।

मगर सर्वाधिक जिम्मेदार हमारा शिक्षण-व्यवस्था है,हमारी शिक्षा-व्यवस्था किस और जा रही है,जो हम अपने छात्र को दबाब सहने की क्षमता विकसित नही कर पा रहे है80% लोग जो आत्महत्या करते है वो शिक्षित है और उनका उम्र 14-35 के बीच मे ही।।

 नैतिक शिक्षा के नाम पर हम अपने छात्र को क्या सीखा रहे है,जिंदगी एक रेस है,अगर पिछड़ गए तो कंही के नही रहे। क्या एक रेस हारने के बाद दूसरे रेस में हम भाग नही  सकते,अगर उसमे भी अगर हम हार गए तो एक और प्रयास करेंगे,अगर उसमें भी हार गए तो क्या हुआ आने वाली पीढ़ी को तो सीख दे सकते है..।।

दरसल हमारा समाज, हमारा परिवार, हमारा शिक्षण-व्यवस्था हमें हारना नही सिखाता..।। आखिर क्यों..??

जीतने के लिए हारना जरूरी नही है,मगर अपने जीत को और बेहतरीन बनाने के लिए हार का अनुभव जरूरी है।। हां हार को स्वीकार कर उसे आत्मसात कर लेना अभिशाप है.. हार एक बेड़ियां की तरह है,उसे तोड़ना जरूरी है,अगर नही तोड़े तो उसे स्वीकार करते देर नही लगेगा।।

जो इस बेड़ियां को भी नही स्वीकार कर पाते वो आत्महत्या को गले लगा लेते है..।। और हमारा समाज,परिवार और शिक्षण-व्यवस्था उस मासूम को ही दोषारोपित कर देता है..।।

आखिर क्यों..??इसके लिए जिम्मेदार कौन है..?

इसके लिए एक नही कई जिम्मेदार है-

परिवार,समाज,शिक्षण-व्यवस्था,

मीडिया/सोशल मीडिया-ये तो महिमा-मंडन करती है,आज से 10 साल पहले 14 साल के बच्चों को ये तक मालूम नही होता था कि आत्महत्या होता क्या है,मगर आज वो इन मीडिया/सोशल मीडिया के कारण आत्महत्या कर रहे है।

पूंजीवाद-वर्तमान समय मे इसका भी अहम योगदान है, लोगों के अंदर कुंठा का भाव उत्पन्न करवाने में। वर्तमान समय में सबकुछ का बाजारीकरण हो गया है,सबकुछ को हासिल करना मुमकिन नही है,मगर बाजारबाद सबकुछ को हासिल करने के लिए हमें प्रेरित करता है,और जिसे हम हासिल नही कर पाते उसके लिए कुंठा उत्पन्न होती है।और ये कुंठा दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है,और हम अवसाद में घिर जाते है,और इस ओर कदम उठाने के लिए अग्रसर हो जाते है।।

आत्महत्या जैसे जघन्य अपराध से कैसे सामना किया जा सकता है..??





शनिवार, 1 जनवरी 2022

नव वर्ष

 नव-वर्ष सिर्फ दीवाल पर टंगी हुई कैलेंडर का बदलना भर नही है,बल्कि ये तो जिंदगी को बदलने का एक अवसर है नव-वर्ष..।।

अपनी कमियों को बीते हुए वर्ष में छोड़ते हुए,नए वर्ष में उन कमियों पर विजय पाने का एक अवसर है नव-वर्ष।।

अपनी सारे असफलताओं को पीछे छोड़ते हुए, उन असफलताओं पर विजय पाने का एक अवसर है नव-वर्ष।।

अपने अधूरे सपने को फिर से पूर्ण करने का अवसर है नव-वर्ष।।

अपने गिले-शिकवे को भुला कर, खुशियां मनाने का अवसर है नव-वर्ष।।

पीछे छूट गए रिश्तों को, साथ लेकर चलने का अवसर है नव-वर्ष।।

अपने चेहरे से नक़ाब उतारने का अवसर है नव-वर्ष,

खुद को फिर से मूल्यांकन करने का अवसर है नव-वर्ष।।

अपनी मुस्कुराहटों से दुनिया को खुशनुमा बनाने का अवसर है नव-वर्ष।।

नव-वर्ष सिर्फ एक वर्ष नही,बल्कि ये तो जिंदगी को नये सिरे से जीने का अवसर है नव-वर्ष..।।

आखिर क्यों नही, इस नव-वर्ष का स्वागत करें..।।




Yoga for digestive system