रविवार, 8 फ़रवरी 2026

हे कृष्ण..

हरेक को जीवन में एक कृष्ण जैसे सारथी की जरूरत है,जो करें तो कुछ नही बस आपके साथ खड़ा रहें और सही गलत का अहसास करवाता रहें, और गलती करने पर डांट लगाए,और हमेशा सही मार्ग पर ले जाये..।।

ढेर सारे कृष्ण और अर्जुन भटक रहें है..
मगर कृष्ण,अर्जुन को नही, पहचान रहें है.
और न ही, अर्जुन, कृष्ण को पहचान रहें है..
बताओ इस समर में इन दोनों का क्या होगा..
बिना इनदोनों के मिलन से..
इस समर में विजयघोष कैसे होगा..??



शायद ही ऐसा कोई दिन हो..जिस रोज हमारी बहन-बेटियों के साथ बुरा बर्ताव न होता हो..इतने कामी,क्रोधी,हवसी,हैवान और दरिंदे घूम रहे है,की मौका पाते ही गिद्ध की तरह नोचने लगते है,या फिर अपने हरकतों से डराते रहते है..इनसे इनकी रक्षा कौन करेगा..??
कृष्णा(द्रौपदी) की रक्षा के लिए प्रभु आये..इनके रक्षा के लिए कौन आएगा..??
ढेर सारे कृष्ण घूम रहे है..
कृष्णा एकबार पुकार के तो देखें..(द्रौपदी ने भी अंतिम समय मे कृष्ण को याद किया था..मगर अब तो कृष्ण को कोई याद ही नही करता..)



कौरवों की भरमार है,चहु ओर..
सब कामी,क्रोधी,लोभी बन कर कृष्णा को नोंचने को तैयार है चहु ओर..
बिना कृष्ण के कृष्णा की रक्षा कौन करेगा..??
हरेक कृष्णा को दरकार है आज..
एक कृष्ण और भीम की..
जो गिद्ध जैसी आंखों से घूर रहे है,
कृष्णा को..।
जो अपने काम,क्रोध को बुझाने के लिए,
रौंद रहे है कृष्णा को..।
हे कृष्ण,हे भीम..
अब तो सुनो इनकी पुकार..
फिर से बहाओ उन पापियों की लहू की धार..।
हे कृष्ण..सुन लो अब कृष्णा की पुकार..।।


इस स्वार्थी हो गई दुनिया को फिर से निःस्वार्थ दोस्ती का मोल सिखाने का वक़्त आ गया है..जब अच्छा वक्त होता है,तो दुश्मन भी मित्र बन जाते है,और जब बुरा वक्त होता है..तो मित्र भी दुश्मन बन जाते है..।।


हे कृष्ण,फिर से आओ इस धरा पर..
और फिर से मित्रता का पाठ पढ़ाओ तुम..
मित्रता को जो कुलुषित कर रहे है..
उन्हें फिर से थपेड़े लगाओ तुम..।
मित्रता क्या होता है..
सबको सरेआम बताओ तुम..
मित्र से मित्रता का बोध कराओ तुम..
हे कृष्ण..फिर से आओ तुम
मित्रता का फिर से सम्मान बढ़ाओ तुम..।
मित्र होने का बोध कराओ तुम..
जो तुम हो,वही मैं हूँ..
इसका बोध फिर से कराओ तुम..।।


शायद ही कोई दिन हो,जिस दिन किसी का दिल न टूटता हो,शायद ही कोई दिन हो जिस दिन किसी का किसी से दिल न लगता हो..क्या हो गया है सबको..??दिल शायद ही किसीका,किसी से मिलता हो..मगर जिस्म हर रोज मिल रहे है..मानो ये जरूरत हो गई है..मगर इन जरूरत में प्रेम कंही खो गया है..।।


हे कृष्ण फिर से आओ इस धरा पर..
और प्रेम की परिभाषा..
फिर से दोहराओ इस धरा पर..।
प्रेम तो दो मन का मिलन है..
इसमें जिस्म आता कंहा से..
मगर आज प्रेम,
इसी जिस्म से तो हो रहा है..
हे कृष्ण फिर से आओ तुम..
प्रेम की पराकाष्ठा जो गिर चुकी है..
उसको फिर से सम्मान दिलाओ तुम..।
प्रेम की अमरत्वता को फिर से बढ़ाओ तुम..।।
हे कृष्ण फिर से आओ तुम..

हमारा एक ही सच्चा साथी है..

दुनिया में आपका एक ही सच्चा साथी है..जो आपका साथ कभी नही छोड़ता और वो है दुःख..।



मगर अफसोस हमसब उससे पीछा छुड़ाना चाहते है..जबकि सत्य ये है कि आप जितना उससे पीछा छुड़ाना चाहेंगे वो आपका उतना ही पीछा करेगा..और एक दिन आप वास्तविक दुःख से सामना किये ही इस दुनिया को छोड़ देंगे..।
दुःख से भागे नही,बल्कि दुःख का सामना करें, और उसको अपना सारथी बनाये..ये दुःख ही ऐसा सारथी है,जो आपको इस भवसागर से पार कराएगा..।


मगर हम क्या करते है..??
दुःख को सारथी नही,बल्कि दुःख का ही सारथी बन जाते है..
और जिंदगी यही से दुःखी हो जाती है..।

हम सब दुःख से छुटकारा पाना चाहते है..
मगर क्या ये संभव है...??
बिल्कुल नही..।
क्योंकि दुःख ही तो मनुष्य और अन्य जीव को संवारता और निखारता है..।

कभी आपने अंकुरण की प्रक्रिया देखी है..??
कभी आपने कीट या पंक्षी को अंडे से निकलते देखा है..??
कभी आपने जानवर के बच्चों को पहली बार खड़े होते देखा है..??
कभी आपने जन्म लेने के बाद बच्चे को रोते हुए देखा है..??

ये सब प्रक्रिया इतना तकलीफदेह है..की हम कल्पना नही कर सकते..
मगर यही प्रक्रिया हमें मजबूत बनाती है..।

जरा खुद को देखिए..और सोचिए..
आज आप जंहा है..और वंहा आप, खुद को एक सुखी इंसान के रुप में देखते है...तो वो इसलिय क्योंकि आपने दुःख को अपना सारथी बनाया.. 

मगर आप जंहा है,और जिंदगी को तकलीफदेह मानते है,तो वो इसलिए क्योंकि आपने दुःख को सारथी नही,बल्कि दुःख का सारथी बन गए है..
आप अभी इस दुःख के केचुल को उतार कर फेंक सकते है..
दुःख को अपना सारथी बना करके..दुःख से भागे नही,उसे जानने की कोशिश करें..की ये दुःख क्यों है..इसका कारण ढूंढे..।।

"दुःख ही दुःख से निकलने का मार्ग है..।।"

अपने आसपास देखें..
और सुखी लोगे को ढूंढें..
आपको वही सुखी मिलेंगे..
जिन्होंने दुःख को स्वीकार किया है..।।

"सुख क्षणभंगुर पानी के बुलबुले के समान है..
और दुःख पानी के समान..।
सुख की उत्पत्ति ही दुःख से होती है..
और दुःख में ही फिर समाहित हो जाती है..।।"



इसलिए दुःखी मत होइए..
जिंदगी में सुखी, दुःख से ही आता है..
उस दुःख को सहस्र स्वीकार करें..
जो आपके हिस्से में है..।
क्योंकि ये दुःख ही आपको अपने जिंदगी के ऊंचाई पे ले जाएगा..।।

दुःख को अपना सारथी बनाये..
और उस पर सवार होइए..
और उन सब दुःख के कारणों को,
रौंद दीजिये..
जो आपके जिंदगी में रोड़ा अटका रहा है..।।



शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

क्रिकेट... ट्राय बॉल..और बचपन की यादें..

आपने बचपन में क्रिकेट खेला है..?
खेला ही होगा..
आपको याद है..
जब आप या आपके दोस्त पहली बॉल पर आउट होते थे,तो क्या बोलते थे..
शायद अक्सरहाँ यही कहता होगा ट्राय बॉल है😊..।

आज रास्ते से गुजर रहा था..
तो कुछ बच्चे गली में क्रिकेट खेल रहे थे..
एक बच्चा बैटिंग कर रहा था..
और वो आउट हो गया..
और आउट होते ही बोला..
ट्राय बॉल है,ट्राय बॉल है..
मगर कुछ बच्चे बोले ट्राय बॉल पहले ही हो गया था..।।

ये वाकया देखकर हंसी आ गई..
और बचपन की यादों में खो गया..।
वो भी क्या दिन थे..
क्रिकेट खेलने के लिए घर से चोरी छुपे निकलना..
और धूप छाव में क्रिकेट खेलना..
और फिर घर जाते ही घरवाले से डांट सुनना..
मगर फिर भी...
अगले दिन,फिर से चोरी छुपे निकलना..
फिर घर जाकर डांट सुनना..।
ये सिलसिला तबतक चलता रहा जब तक वो गलियां, वो घर और वो गाँव न छुटा..।
सबकुछ छूट गया मगर वो ट्राइ बॉल इस तरह जेहन में बस गया कि अभी भी उसकी गूंज सुनकर सारी यादें ताजा हो गई..।




मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

शिव कौन है..??

जाबालि उपनिषद सामवेद से संबंधित एक लघु उपनिषद है। इस उपनिषद में महर्षि जाबालि और ऋषि पैप्पलाद के बीच संवाद के माध्यम से शिव के बारे में बताया गया है।


ऋषि पैप्पलाद ने जाबालि से पूछा शिव कौन है तो जाबालि कहते है-

सहोवाच जाबालिः- 

"पशुपतिं सवज्ञं जगदुदयस्थितिभङ्गहेतुं सर्वेश्वरं महादेवं ज्ञात्वा मृत्युमुत्तीर्यते॥

 जाबालि कहते है - शिव समस्त पशुओं (जीवों) के स्वामी है, वो सर्वज्ञ, जगत की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश का  कारण है, सर्वेश्वर 'महादेव' को जानकर ही मनुष्य मृत्यु को पार कर सकता हूं। 

शिव केवल देवता नहीं, बल्कि ब्रह्मांड का आधार है।




शिव कौन है - शिव पशुपति है..

"​अहंकारमयाः जीवाः पशवः परिकीर्तिताः।

तेषां पतित्वाद्देवेशः पशुपतिरित्युच्यते॥"

अहंकार से युक्त जितने भी जीव हैं, वे 'पशु' कहलाते हैं। उन सभी जीवों के स्वामी (पति) होने के कारण महादेव को 'पशुपति' कहा जाता है।



​★शिव कौन है- शिव  'भस्मधारी' है।

अग्निरेवेति भस्म। वायुरिति भस्म। जलमिति भस्म। स्थलमिति भस्म। व्योमेति भस्म। सर्वं ह वा इदं भस्म॥

अग्नि भस्म है, वायु भस्म है, जल भस्म है, पृथ्वी भस्म है और आकाश भस्म है।संपूर्ण दृश्यमान जगत भस्म का ही विस्तार है।

 

◆प्रलय के पश्चात जो शेष बचता है,वही शिव है..


शिव ही शिव है..

शिव के सिवा कुछ और नही है..

शिव ही शिव है..

शिव..शिव..शिव..

यात्रा..

यात्रा जरूरी है..
क्योंकि यात्रा सिर्फ जीवन नही,बल्कि जिंदगी बदल देती है..।
इसलिए जब भी मौका मिले यात्रा पर निकल जाए..।
पता नही कौन सी यात्रा आपके जिंदगी को बदल दे..।

मेरी तो जिंदगी बदली है..
अब मैं वो नही हूँ..जो पहले था..।
मगर मुझे पता नही उस यात्रा में ऐसा क्या चीज था जिसने मेरे जिंदगी को बदल दिया..।
13 दिसंबर 2025 को मैं मुम्बई से गुजरात के व्यारा के लिए YOG परीक्षा के लिए 3 दिन के लिए गया..व्यारा में सर्किट हाउस में ठहराव था,हम कुल 8 लोग थे,मगर सर्किट हाउस में 5 लोग ही ठहरे थे,हम और 2 व्यक्ति एक कमरे में ठहरे थे..शायद उस पार्थ(सर्) के पास सोने से मेरे अंदर बदलाव आया..
या फिर तपोवन आश्रम में गुरु जी(शंकरभाई पटेल) का ऊर्जा का प्रभाव था
या फिर उस मंदिर का(उनाई माता) या फिर वो ग्रुप ही ऊर्जावान था जिसके ऊर्जा से में भी ऊर्जावान हो गया..।
या फिर व्यारा से आते वक्त उस वृद्ध का vip लेकर सीढ़ी से उतरने में मदद किया, और उनका स्पर्श मेरे अंदर बदलाव लाया..।
या फिर बप्पा को स्वप्न में देखकर ऊर्जावान होना..।
या फिर 16 तारिक को एक स्ट्रेंजर का मेसैज आना और वर्षा की तरह मेरे जिंदगी के गंदगियों को धो देना..।






जिंदगी में जबतक कृपा नही होती तबतक कुछ नही होता..
कृपा हमेशा बरसती रहती है..
हमें सिर्फ बाहर निकलकर उस कृपा का रसपान करना होता है..।।

घर से बाहर निकलिए..
यात्रा कीजिये..
यात्रा घर से बाहर का और बाहर से घर का..
यात्रा इड़ा से पिंगला का..
यात्रा मूलाधार से सहस्त्रार का और सहस्त्रार से मूलाधार का..
यात्रा अ , उ , म से ॐ का..
यात्रा स्वयं से शिव का 
और शिव से स्वयं का..।।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

हादसा..

कभी-कभी जिंदगी की बागडोर हमारे हाथों में नही,बल्कि किसी ओर के हाथ मे होता है..।खासकर के हम मनुष्यों का जीवन तो दूसरे के ही हाथों में है..।
जरा सोचिए..
हम जन्म लेते,और माँ-बाप हमारा ख्याल नही रखते..
तो क्या होता..??
मगर हम इन सब चीजों का इतना आदि हो गए है कि हमारा ध्यान इधर जाता ही नही है..।

एक सचा वाकया बताता हूँ..
एक चौराहे 🚦🛣️ पे एक तरफ से बाइक आ रही थी,दूसरी तरफ से कार..
मगर बाइक वाले ने पूरा ब्रेक लिया मगर तब भी उसकी बाइक नही रुकी.
मगर कार वाले ने कार रोक ली..और बाइक वाला बच गया और सीधे आगे निकल गया..।


ये दृश्य भले ही सामान्य हो..मगर इस दृश्य में बहुत कुछ छुपा हुआ है..
● कार वाला बेहतर इंसान हो,इसलिए उसने ब्रेक लगा लिया..
● बाइक वाले ने या फिर उसके चाहने वालों ने कुछ अच्छे कर्म किए होंगे, जो वो इस दुर्घटना से बच गया..।

कभी-कभी हमारे हाथ मे कुछ नही होता..मगर कोई तो है जिसके हाथ मे सबकुछ होता है..।
इसे समझना आसान नही है..
हमारे जीवन मे अक्सरहाँ कई हादसे होते है..
मगर हम उस पर गौर नही करते..जबकि ये हादसे ऐसे होते है जो हमारी जिंदगी को बदलने वाले होते है..मगर हम उसे सामान्य हादसा मान कर दरकिनार कर देते है..।

हमसब के जीवन मे अक्सरहाँ कई हादसे होते है..।
आपको कोई हादसा याद है,या फिर आप भी हादसा को दरकिनार करने वालों में से है..
कोई नही, हममें से अधिकांश लोगों का जन्म भी एक हादसा ही है..
किसी के लिए कोई घटना हादसा होता है,तो किसी के लिए वही घटना अवसर होता है..
आखिर क्यों..??
इसके पीछे क्या काम करता है..??
क्या हमारा कर्म..
या हमारे कर्मों पे दूसरों का भी प्रभाव पड़ता है..।
ये इतना सूक्ष्म स्तर पर होता है कि हम इसे महसूस नही कर पाते..।

आगे से महससू कीजियेगा..




शिव कौन है..??कैवल्योउपनिषद के अनुसार

कैवल्यो उपनिषद के अनुसार शिव..


इस उपनिषद में ब्रह्माजी शिव के स्वरूप के बारे में ऋषि आश्वलायन को बताते हुए कहते है -




शिव ध्यान स्वरूप है(सगुण और निर्गुण का संगम)


अचिन्त्यमव्यक्तमनन्तरूपं शिवं प्रशान्तममृतं ब्रह्मयोनिम्।

तमादिमध्यान्तविहीनमेकं विभुं चिदानन्दमरूपमद्भुतम् ॥

उमासहायं परमेश्वरं प्रभुं त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तम्।

ध्यात्वा मुनिर्गच्छति भूतयोनिं समस्तसाक्षिं तमसः परस्तात्।।


शिव अचिन्त्य, अव्यक्त, अनन्त रूपों वाले, कल्याणकारी, परम शान्त, अमृतस्वरूप और ब्रह्म का कारण हैं। वे आदि, मध्य और अन्त से रहित हैं, वे अद्वितीय, सर्वव्यापी, चेतन-आनन्दस्वरूप और निराकार हैं। माता उमा के साथ, परमेश्वर, प्रभु, तीन नेत्रों वाले, नीलकण्ठ और अत्यन्त शान्त स्वरूप का ध्यान करके मुनि समस्त भूतों के कारण, सबके साक्षी और अज्ञान से परे उस परम तत्व को प्राप्त कर लेते हैं।


​◆ शिव सर्वव्यापत है-

स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट्।

स एव विष्णुः स प्राणः स कालोऽग्निः स चन्द्रमाः ॥


वो ही ब्रह्मा हैं, वो ही शिव हैं, वो ही इन्द्र हैं, वो ही अविनाशी परम स्वराट् (स्वयं प्रकाशमान) हैं। वही विष्णु हैं, वही प्राण हैं, वही काल, अग्नि और चन्द्रमा भी हैं।


​◆ शिव काल से परे है और शिव ही सत्य है..

स एव सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यं सनातनम्।

ज्ञात्वा तं मृत्युमत्येति नान्यः पन्था विमुक्तये ॥


जो कुछ भी पहले बीत चुका है और जो भविष्य में होने वाला है, वह सब कुछ वह सनातन शिव ही है। उन्हें जानकर ही मनुष्य मृत्यु को पार कर सकता है,मोक्ष का इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है।


​◆शिव अद्वैत है (आत्मा और शिव एक ही है)


मय्येव सकलं जातं मयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।

मयि सर्वं लयं याति तद्ब्रह्माद्वयमस्म्यहम् ॥


मुझसे ही सब कुछ उत्पन्न हुआ है, मुझमें ही सब प्रतिष्ठित है और मुझमें ही सब विलीन हो जाता है,वो अद्वैत ब्रह्म (शिव) मैं ही हूँ


​कैवल्योपनिषद् के अनुसार शिव 'समस्तसाक्षिम्' (सबके साक्षी) हैं। वे 'माया' और 'तम' (अज्ञान) से परे हैं..

शिव ही शिव है..

शिव के सिवा,

कुछ और नही है..

शिव ही शिव है..