रविवार, 11 अक्टूबर 2026

हम नवरात्रि क्यों मनाते है...??

हम नवरात्रि क्यों मनाते है..??
शायद अधिकांश लोग को मालूम ही न हो..
क्या आपको मालूम है..??
जरा सोचिए..🤔
क्या आप जो सोच रहे है..उससे आप संतुष्ट है..।



चलिए मैं बताता हूँ..
इसके दो पौराणिक दृष्टांत मिलते है...

पहला ​महिषासुर से 9 दिनों का युद्ध - देवी भागवत और दुर्गा सप्तशती के अनुसार, महिषासुर को वरदान था कि कोई देव, दानव या पुरुष उसका वध नहीं कर सकता। जब उसका अत्याचार बढ़ा, तो त्रिदेवों और देवताओं के तेज से माँ आद्यशक्ति प्रकट हुईं और माँ दुर्गा और महिषासुर की सेना के बीच लगातार 9 दिनों और 9 रातों तक भीषण युद्ध चला। दसवें दिन माँ ने महिषासुर का संहार किया, जिसे अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में मनाया गया..।
(मूलतः ये घटना चैत्र मास में हुआ था,इसलिय चैत्र नवरात्रा मनाया जाता है,वैसे आश्विन मास के नवरात्रा को 'अकाल बोधन' कहा जाता है)

​दूसरा दृष्टांत ये है कि जब राम और रावण में युद्ध हो रहा था तब अश्विन अमावस्या के दिन रावण सबको परास्त करते जा रहा था उस रोज उसके सामने कोई टिक नहीं पा रहा था..संध्या के समय जब सब अपने युद्ध शिविर में आये तो श्रीराम को उदास देखकर जामवंत जी ने पूछा आप उदास क्यों है..??श्रीराम ने कहा में रावण को तो हरा सकता हूँ मगर देवी को कैसे हरा सकता हूँ..आज मैंने युद्ध मे अनुभव किया कि देवी स्वयं रावण को गोद मे लेकर लड़ रही है..भला मैं कैसे देवी से लड़ सकता हूँ..।
इसपर जामवंत जी श्रीराम से कहते है.. 
आप भी शक्ति की आराधना कीजिये..

​आराधना का दृढ़ आराधना से दो उत्तर, तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर। 

रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सका त्रस्त,तो तुम हो शुद्ध, करोगे उसे निश्चय ही ध्वस्त;

जब तक न सिद्धि हो, देखो न रूप यह विषम,कपिदल-बल से खींचो न शक्ति का यह प्रक्रम।

" राम की शक्ति पूजा" 

जामवंत की बातों से सहमत होकर श्रीराम ने कहा में कल से ही शक्ति की आराधना करता हूं..और वो पहला दिन ही नवरात्रा का पहला दिन था..श्रीराम ने समुंद्र तट पर बालू से माँ आद्यशक्ति की प्रतिमा प्रतिष्ठित किया और हनुमान जी से कहा..हे हनुमान मेरे लिए 108 नीलकमल फूल सरोवर से लेते आओ..उन्होंने 9 दिनों तक कठिन उपवास,मौन और ब्रह्मचर्य धारण करके साधना शुरू की..प्रतिपदा से नवमी तक श्रीराम ने माँ के विभिन्न रूपों का आह्वान करते हुए मंत्रों से साधना किया..।वो हरेक मंत्र के साथ देवी को एक-एक नीलकमल समर्पित करते जाते थे..।श्रीराम आठवें दिन तक साधना के उच्च स्तर पर पहुंच गए थे..नवमी के अंतिम प्रहर पर जब पुरश्चरण पूर्ण होनेवाला था तब 108वां कमल अर्पित करने के लिए श्रीराम हाथ आगे बढ़ाते है..मगर थाल खाली होता है..अगर 108 वां कमल फूल नही चढ़ता तो संकल्प और साधना दोनों टूट जाता..और साधना के बीच मे उठना भी शास्त्र-सम्मत नही था..।राम थोड़ा घबड़ाये आखिर ये आखरी फूल गया कंहा..??अचानक उन्हें याद आया..कि बचपन में, माँ कौशल्या उन्हें "राजीव नयन" कहकर पुकारती थी..वो मुस्कुराये और मन ही मन बोले मेरे पास अभी तो दो कमल और है..क्यों न मैं एक देवी माँ को अर्पित कर दू..
 कहती थीं माता मुझे सदा ‘राजीव-नयन’!
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन।
                                                          "राम की शक्ति पूजा"



वो बिना संकोच के अपने तरकश से सबसे तीक्ष्ण बाण निकालते है..और अपने दाहिना आँख माँ को समर्पण के लिए तत्पर हो जाते है..ज्योहीं वो बाण अपने आंख के पास लाते है..त्योंही माँ दिव्य प्रकाश के साथ प्रकट होती है,और श्रीराम का हाथ पकड़ लेती है..और कहती है - 
हे राघव..मैं तुम्हारी निष्काम भक्ति और समर्पण से अत्यंत प्रसन्न हुई..
​होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन।
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।

देवी श्रीराम को अजय होने का वरदान देकर श्रीराम के हृदय में विलीन हो गई..।
और इसके पश्चात दसवें दिन श्रीराम ने रावण पर अंतिम प्रहार किया और रावण का वध किया और अधर्म पर धर्म की विजय स्थापित किया..इसी दिन को हम हरेक साल विजयादशमी मनाते है..।

अब पता चला नवरात्रा क्यों मनाते है...??
आश्विन मास के नवरात्रा को सनातन परंपरा में "अकाल बोधन"(असमय देवी को जाग्रत करना) कहा जाता है,क्योंकि श्रीराम ने आश्विन मास देवी की साधना की थी..तब से ही आश्विन मास में नवरात्रि मनाया जाने लगा..।
देवी की पारंपरिक पूजा चैत्र मास में होता है..।


शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

मैं और समुन्द्र..

अक्सरहाँ जब मुझे नीरसता घेर लेती है..
मैं समुन्द्र की ओर चला जाता हूँ..
समुन्द्र की उठती और गिरती लहरें..
मेरे नीरसता को लील लेती है..
और मैं..
फिर से...
एक नया जीवन ले के लौट आता  हूँ..।





आज भी कुछ ऐसा ही हुआ..
सच कहूं तो कुछ अजीब हुआ..
सोचा कल नवरात्रा है..तो आज समुन्द्र की सैर कर आऊ..साथ ही मंदिर हो आऊ..।
जब समुन्द्र किनारे पहुंचा तो देखा, समुन्द्र तट से बहुत दूर जा चुकी थी..क्योंकि आज अमावस्या जो है..।मैं समुन्द्र की और बढ़ने लगा बिना किसी उद्देश्य के, फिर मैंने अपना जूता खोला और समुन्द्र के पानी मे पाँव रखा और उन्हें नमन किया..।और सोचने लगा कल से जिंदगी की नई शुरुआत करता हूँ..क्योंकि कल से नवरात्रि शुरू होने वाला है..ये सोच ही रहा था कि समुन्द्र ने मुझसे कहा-अपने सारे अवगुणों को मुझमें त्याग दो..लोग बहुत कुछ मुझमें त्यागते है..तुम अपना अवगुण क्यों नहीं त्याग देते..।
आज मैंने उन अवगुणों को समुन्द्र के लहरों में दफन कर दिया जो मेरे जिंदगी को कुंठित और लक्ष्यविहीन बनाये हुए थे..।मैंने सांप की केचुल की तरह अपने अवगुणों को त्याग कर एक नया शरीर लेके लौटा हूँ..।।
और इस नवरात्रा को खास बनाऊंगा..
और जिंदगी को नया आयाम दूंगा..।
आते वक्त समुन्द्र ने मुझसे कहा..कभी-कभी आ जाया करो..
कम से कम सप्ताह में एक दिन तो आ ही जाया करो..।।

पाप क्या है..??

हम हर रोज पाप करते है..
मगर हमें अहसास नही होता..।
हां अगर कोई अहसास करा दे तो..
थोड़ी आह भर के..
फिर से एक नया पाप कर बैठते है..।।
आखिर ये पाप है क्या..?? 
"पाति अस्मात् आत्मानम् इति पापम्"  
अर्थात जिससे मनुष्य को अपनी रक्षा करनी चाहिए..वह पाप है..
मनुष्य को किससे रक्षा करनी चाहिए..??
काम,क्रोध,लोभ,मद(अहंकार),मोह और मात्सर्य(ईर्ष्या) से.. क्योंकि इन अवगुणों के कारण हम स्वयं को नुकसान पहुंचाते हैं..।




सबसे बड़ा पाप दूसरों को नुकसान पहुँचाना नहीं है,बल्कि स्वयं को नुकसान पहुँचाना है..।
और ये पाप हम हर रोज कर रहें है..
मगर हम अनजान है..। 

तो क्या करें..??
कल से नवरात्रा शुरू होने वाली है..इसलिए 
हरेक रात्रि को अपने एक-एक अवगुणों को त्यागते जाए..।
सही मायने में नवरात्रा का यही अर्थ है..।
आनेवाला हरेक रात्रि आपके जीवन के लिए नया हो..
इस नवरात्रि स्वयं को बदल कर..
स्वयं का निर्माण करें..।

धर्म और बाजार..

जिस तरह से धर्म का बाजारीकरण किया जा रहा है,कंही ऐसा न हो कि बाजार धर्म को लील जाए..ये बुद्ध,महावीर,नानक और कबीर की धरती रही है..जंहा इनलोगों ने पूरी जिंदगी खफा दी धर्म के नाम पर पांखड करने वालों का विरोध करते हुए..
मगर आज धर्म के नाम पर जो हो रहा है उसके खिलाफ कोई बोलने वाला नही है..आखिर कौन बोलेगा..क्योंकि कंही न कंही धर्म के बाजारीकरण से सबका लाभ हो रहा है..।
जो धार्मिक है उन्हें लग रहा है लोग बहुत धार्मिक हो रहे है..
जो अधार्मिक है वो भी मुस्कुरा रहें है..।

आप खुद से पूछिए..
क्या आप धार्मिक है..??
अगर हां..?
तो कैसे..??

मैं उनके मैसेज का इंतजार करती रहीं..

मैं उनके मैसेज का इंतजार करती रहीं..
मिनटों तक..
न जाने ये मिनट..
कब घंटो में बदल गए पता ही नहीं चला..
ये घंटें..दिन में बदल गए..
और दिन सप्ताह में..
और सप्ताह महीनों में..।
हां महीनों हो गए..
उनके मैसेज का इंतजार करते हुए..।

हरेक रोज सोचती हूँ..
आज कंही उनका मैसेज न आये..
और कंही वो..
ये ना पूछ ले..
की कैसी हो..??
क्या जबाब दूंगी मैं..।
ये सोच के हर रोज भगवान से प्राथना करती हूं..
उनका कोई मैसेज न आये..।
तो फिर क्यों मैं..
उनके मैसेज का इंतजार करती हूं..??
शायद अपने पापों का पश्चाताप करती हूं..।

हर रोज,हर पहर..
हर शाम,हर रात..
मोबाइल ये सोच के स्क्रोल करती हूं..
कंही कोई आभा ही दिख जाए उनका..
उनके आभा के सहारे ही..
जी लुंगी में..।




रविवार, 4 अक्टूबर 2026

मैंने सपनों से सीखा..

सपना देखना आम बात है,उससे भी आम बात ये है कि सो के उठते ही 99% सपने हम भूल जाते है..मगर कुछ सपने ऐसे होते है जो आपको याद रह जाते है..।
मैंने भी आज दोपहर में एक सपना देखा..सपने के कुछ अंश अभी तक याद है..
पहला दृश्य-
मैं देखता हूँ कि दक्षिण भारतीय शैली का मंदिर है आसपास और छत पे कुछ लड़कियां नाच रही है और हल्की फुल्की बारिश हो रही है..
मैं छत से नीचे झांकता हूँ तो देखता हूँ कि छत के किनारे एक सोई हुई मूर्ति(भगवान) है लगभग 7-8 फ़ीट जो काले पत्थर की है..मेरी नजर उस मूर्ति से मिलते ही, मूर्ति बैठ जात है,और कहता है कि तुम बहुत दिन जियोगे वो कुछ और भी कहते है,मगर मुझे याद नहीं है..मैं ये सोचने लगता हूँ कि मैं इतना दिन जी के क्या करूँगा ये सोचकर में अत्यचारी हो जाता हूँ जिससे मेरी मृत्यु करीब आ जाये,मेरे इस अत्याचार के कारण वो मूर्ति(देवता) प्रगट होते है और मुझे मारते है,तबतक कोई उनसे प्राथना करता है,और मेरे जीवन की भी

ख मांगता है,मुझे मालूम नही,मैं बचता हूँ कि नहीं मगर मेरा शरीर दिव्य स्वरूप का हो जाता है,और मैं उनसे कहता हूं कि मैंने सुना है कि देवता के हाथों से मरने से मोक्ष की प्राप्ति होती है,इसलिए मैंने ऐसा किया..।।

मैंने सीखा- किसी के द्वारा जो भी बोला जाए, उसे अच्छी तरह सुना जाए,अन्यथा उसका परिणाम गलत हो सकता है..।

दूसरा दृश्य-
दूसरे दृश्य में देखता हूँ कि मेरी फैमली किसी झंझट में फंस गई है..और मैं उसे बचाने का प्रयास करता हूँ..और उसमें सफल भी हो जाता हूँ..।
मैंने सीखा- अगर आपके पास धैर्य और साहस हो तो किसी भी परिस्थितियों से निपटा जा सकता है..

तीसरा दृश्य- 
इस दृश्य में देखता हूँ कि कोई फंक्शन हो रहा है और उसमें कई चीजें बन रही है..देखता हूँ कि कोई चीज बन रही है,जिसे तेल में तला जा रहा है,मगर उसके साथ न खाए जाने वाली गंदगी भी साथ मे तली जा रही है..मैं उस रॉ मैटेरियल को टेस्ट करता हूँ तो मुझे शंका होता है,मैं ये जानने की कोशिस करता हूँ कि ये रॉ मटेरियल कंहा से आ रहा है,तो देखता हूँ जंहा से वो समान आ रहे है वंहा कुंच गंदगियां भी है जो साथ मे आ जा रहा है,मैं उन गंदगियों को अलग करने लगता हूँ,और कोशिस करता हूँ कि ये खबर आगे न जाये क्योंकि अगर ये खबर आगे जाएगी तो परिस्थितियां बिगड़ सकती है,वो गंदगियां ऐसी नही है,जिसे खाने से नुकसान हो,मगर उससे घृणा सबको हो सकता है..।इसिलिय मैं किसी को कुछ नही बताता..।
मैंने सीखा- कभी-कभी गलतियों को अनदेखा करने से और उसे सुधारने से बहुत बड़े मुसीबत को टाला जा सकता है..।
इसी दृश्य में देखता हूँ कि एक लंबा पाइप नुमा स्ट्रक्चर है जिसमें लोग ऊपर जाते है,और नीचे जाते है..उस पाइप नुमा सरंचना में देखता हूँ कि कुछ लोग उल्टे लटके हुए है वो इतने ऊंचे लटके हुए है की अगर गिरे तो शायद मृत्यु तक हो सकता है..।
नीचे से कोई आवाज देता है पाँव को फसा कर नीचे आ जाओ..हमलोग भी ऐसे ही आये है,उनलोगों को होंसला मिलता है,और शायद वो लोग नीचे आ जाते है..

मैंने सीखा- जब आपके पास कोई समाधान न हो तो दूसरे के द्वारा बताए हुए समाधान को मानना चाहिए..।

शनिवार, 3 अक्टूबर 2026

दादी माँ और पितृपक्ष का महीना...

पितृपक्ष का महीना मेरे लिए खास है..क्योंकि इस महीने से कई यादें जुड़े हुए है..खासकर दादी माँ से..।
ये महीना खास इसलिय है कि,इस महीने में दही-चूड़ा कुछ ज्यादा ही खाने को मिलता था,वो भी दादी माँ के हाथों से..।
दादी माँ चाहती थी कितना खिला दु इन बच्चों को..
शायद हम जितना खाते थे,उतना उन्हें आनंद आता था..।।


पितृपक्ष शुरू होने से पहले धान का चूड़ा कुटाया जाता था,उस चुड़े की सोंधी खुश्बू अभी भी नाक में आ रहा है..जबतक में गाँव मे था तबतक में ही चूड़ा कुटवाता था,उसके बाद पापा कुटवाया करते थे..मगर इस बार दादीमाँ है ही नही..😢।
उसके बाद तिथ के हिसाब से ब्राह्मण खिलाया जाता था..ब्राह्मण को निमंत्रण देने का कार्य पहले बाबा ही करते थे,जब बाबा अस्वस्थ हो गए तो पापा निमंत्रण दिया करते थे..उसके बाद ब्राह्मण को बीजो(बुलाने) के लिए मैं जाता था..उसके बाद जब ब्राह्मण आते तो उन्हें खिलाने का काम अक्सरहाँ दादी माँ ही करती थी..और दादी माँ साथ ही गाँव-घर की बात करती थी उन ब्राह्मणों से..।जब ब्राह्मण खा कर चले जाते,तब सब बच्चों को दादी माँ बैठा कर खिलाती..उसके बाद घर के अन्य लोग खाते..।

इस पवित्र महीने में जितिया पावन(इसमें माता अपने संतान की दीर्घायु के लिए उपवास करती है) आता है..।
मेरे बाबा एक फकरा कहा करते थे-
 "जितिया पावन बड़ भारी
  धिया-पुता के ठोक सुतेनउ,
  अपने खेनु भयर थारी.."
दरसल जितिया पावन शुरू होने से पहले ब्रह्ममुहूर्त में ही खाना होता है,खासकर जो उपवास करने वाली महिलाएं होती है उन्हें खाना होता है,तो अकेले महिलाएं खाएंगी,तो कैसा लगेगा इसलिए जो बच्चे होते है उन्हें भी सुबह में उठाया जाता है,और चुरा दही खिलाया जाता था..।

जबतक में गाँव मे रहा या फिर इस अवसर पर गाँव पहुंच जाता तो दादी माँ सब बच्चों को उठाकर खिलाती ही थी..जबतक सब उठ न जाये,सबके पत्ते पर चुरा दही पड़ न जाये तबतक दादी माँ खुद नही खाती थी..।
फिर अगले दिन उपवास समाप्ती के बाद पितृ को तेल-खरी चढ़ाने के बाद दादी माँ सब बच्चों को सिर में तेल लगाती थी..उस तेल को लगाने के बाद कुछ अजीब ही अनुभूति होती थी..क्योंकि जैसा महसूस तब तेल लगाने के बाद होता था,वैसा महसूस फिर कभी नही होता था सर् में तेल लगाने के बाद..वो चिपचिपा बाल को में अभी भी महसूस कर पा रहा हूँ..।

मगर जब में मुम्बई चला आया तब भी दादी माँ फोन पर कहा करती की कायल जितिया छैय चुरा-दही खा लेब..।तेल-खोरी कायल चढतैय..
मगर इसबार ये कहने के लिए..
दादी माँ नहीं है...।

मुझे लगता है..
आप मुझसे दूर नहीं गई है..
बस आपका फोन नहीं आता...
जबतक मैं रहूंगा..
तबतक आप रहेंगी..
मेरे यादों में..
मेरे सांसों में..
लव यू दादी माँ..।।