शनिवार, 3 जनवरी 2026

क्या आप भारत की पहली महिला शिक्षिका को जानते है..

"यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रेतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलः क्रियाः ।।"
                                                      (मनुस्मृति)
"जंहा स्त्रियों का सम्मान और पूजन होता है,वंहा देवता प्रसन्न होकर निवास करते है।जंहा उनका सम्मान नही होता,वंहा किये गए सभी कर्म और यज्ञ निष्फल हो जाते है..।"


मगर ऐसा क्या हुआ कि जिन माता-बहनों का हमारे जीवन में उच्च स्थान था, उनकी स्थिति दयनीय हो गई..??
उनकी दयनीय स्थिति के बारे में आपको पढ़ने को मिल जाएगा मगर उनकी दयनीय स्थिति क्यों हुई..इसके बारे में सब मौन है.. क्यों..??

जो महिलाएं कभी वेद की ऋचाएं लिखा करती थी..अपने पति के साथ युद्धभूमि में जाया करती थी,शंकराचार्य से शाश्त्रार्थ किया करती है..अपना वर स्वयं चुनती थी और पुरुष के साथ कदम से कदम मिला के चलती थी..
अचानक उनकी स्थिति दयनीय कैसे हो गई..??

कभी सोचा है..आखिर ऐसा क्या हुआ..की हमारी महिलाएं घर में ही सिमट के रह गई, उन्हें अपना सारा अधिकार खोना पड़ा..यौवन(puberty) आने से पहले ही शादी कर दिया जाने लगा,पति के मृत्यु के बाद सती होना पड़ा,या फिर अपना बाल मुड़वा कर जिंदगी को नीरस कर लेना पड़ा,शिक्षा को त्यागना पड़ा,घर मे रहकर भी कैद सा अनुभव करते रहना,अपना स्वतंत्रता खोना पड़ा..
आखिर क्यों..??
इस क्यों का जबाब कोई नही देता..क्यों??

1200 ईसवी तक आपको ये देखने को नही मिलेगा..(अपवाद हो सकते है)मगर इसके बाद ऐसा क्या हुआ..की भारतीय महिलाओं की स्थिति दयनीय हो गई..??
क्योंकि 1200 ईसवी के बाद मुस्लिम आक्रांता का भारत पे शासन शुरू हो गया..ये इतने हवसी और हिंसक थे कि शब्द लिखते भी गुस्सा आता है..।
इनके लिए स्त्रियां मांस का लोथड़ा होता था,ये गिद्ध की तरह टूट पड़ते थे, जिस तरह गिद्ध मांस के लोथड़े के साथ व्यवहार करते थे इसी तरह ये मुस्लिम आक्रान्ता भारतीय स्त्रियों के साथ व्यवहार करते थे..।।

तब आप ही बताये..एक भारतीय पुरुष अपने स्त्रियों की रक्षा के लिए क्या करता..क्योंकि हम उनके तरह हिंसक नही थे..वो जंगल से आये जंगली थे,जिन्हें सिर्फ यही आता था..और हम अहिंसा और अतिथि देवों भवः का पाठ करते थे..।जंहा तक हो सका हम लड़े, अगर नही लड़े तो मरे,समझौता किया मगर घुटना नही टेका..।

इतिहास गवाह है..
जंहा भी ये मुस्लिम आक्रांता गए उस क्षेत्र को तहस नहस करके मुस्लिम बहुल देश बना दिया..(आज भी मुस्लिम देश की महिलाएं अपने मूलभूत सुविधाओं से वंचित है) ।
और जंहा ईसाइ गये उस क्षेत्र को पूर्णतया ईसाई बहुल बना दिया..हम भारतीयों ने इन दोनों का सामना किया और अपने सनातन धर्म को बचाया..मगर इसमें हमारी माताओं और बहनों का अहम योगदान है..उन्होंने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया..अपनी पहचान तक भी..।।

मगर आधुनिक भारत में पहली बार एक महिला का उदय हुआ जिसने महिलाओं के बेड़ियों पे प्रहार करके बेड़िया को तोड़ दिया..
वो थी, आधुनिक भारत की पहली महिला शिक्षिका "सावित्रीबाई फुले"

इनका जन्म आज ही के दिन 3जनुअरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में हुआ था..।
1840 में 9वर्ष की आयु में इनका विवाह ज्योतिराव फुले से हो जाता है..।वो अनपढ़ थी मगर ज्योतिबा ने उन्हें पढ़ाया,फिर आगे चलकर सावित्रीबाई ने अहमदनगर और पुणे में शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थान से औपचारिक शिक्षा ली..
और 1 जनुअरी 1848 को पुणे के भिंडवाड़ा में भारत का पहला लड़कियों का स्कूल खोला और वंहा की अध्यापिका बनी..।।

इन्होंने ढेर सारे कुरीतियों पे प्रहार किया..
1860 में नाइयों का हड़ताल करवाया..जिससे विधवा महिलाओं का सिर न मुंडवाया जाए।
बालहत्या प्रतिबंधक गृह- विधवाओं के शोषण के कारण होने वाले अवैध गर्भधारण और समाज के डर से होने वाले भ्रूण हत्या को रोकने के लिए अपने ही घर मे 'बालहत्या प्रतिबंधक गृह' शुरू किया।एक ब्राह्मण विधवा के पुत्र(यशवंत राव)को गोद लेकर डॉक्टर बनाया।
अछूतों के लिए घर मे ही पानी के लिए कुआं खोद दिया..।
(ये अछूत शब्द आया कंहा से..12वी शताब्दी तक ये शब्द अस्तित्व में नही था..)
सत्यशोधक विवाह-बिना पुरोहित के शादी करवाना शुरू किया,जिसमें स्त्री-पुरुष के समानता का वचन दिलवाया जाता था।(आज भी महाराष्ट्र की महिलाएं पर इनका गहरा असर है।)
अकाल में सेवा- 1876 और 1879 के अकाल के दौरान 52 मुफ्त भोजन केंद्र चलाये।
अपनी पति की चिता की मुखाग्नि स्वयं दी,उस समय ये कल्पना से परे था,की कोई महिला चिता को मुखाग्नि दे।

सावित्रीबाई फुले ने मातृसत्तात्मक से पितृसत्तात्मक हो चुके समाज को चुनौती दी..और भारत की महिलाओं के लिए एक रास्ता बनाया जिसपर चलकर आज हमारी माताएं एवं बहनें हरेक क्षेत्र में भारत का झंडा बुलंद कर रही है..।
चाहे आसमां का सीना चीरना हो,या सागर की गहराइयां नापना हो,या पहाड़ की चोटी को नापना हो,या फिर युद्ध के मैदान में दुश्मन को ललकारना हो,या फिर भारत की बागडोर संभालना हो या फिर घर की ही बागडोर संभालना हो..वो हरेक चीज में महारथ है..।।

जरा सोचिए अगर वो न होती तो क्या होता..??
अफसोस हम सोचते ही नही..😊

सावित्रीबाई फुले वो लाइटहाउस है जो अभी भी भारतीय महिला को रास्ता दिखा रही है..वो तबतक दिखाती रहेंगी जबतक हमारी माताओं और बहनों को घर मे न पूजा जाएं..
(यंहा पूजने से तातपर्य उनके आदर करने से है..)
सबके खाने के बाद वो खाती है,
सबके सोने के बाद वो सोती है..
ढेर सारे तकलीफ को छुपाकर,
अकेले में अश्रु बहाती है..।
आखिर वो ऐसा क्यों करती है..??
ये दायित्व हम पुरुषों पर है..
उन्हें इन बंधनों से मुक्त कर 
उन्हें स्वतंत्र करने का..।
अब वो स्वतंत्र हो रही है..
क्योंकि वो शिक्षित हो रही है,
क्योंकि वो आर्थिक रूप से संपन्न हो रही है..
मगर अब भी वो अश्रु क्यों बहाती है..?
शायद वो हमारे कारण ही बहाती है..
उनके अश्रु पोंछने का दायित्व अब हम ज्योतिबा पर है..
तब ही सावित्रीबाई फुले को याद करने के मायने होंगे।।



शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

मैं खुश हूँ..

मैं खुश हूं,
क्योंकि मैं खुश रहना चाहता हूं..।
मैं खुश हूं..
क्योंकि मैं जीवित हूँ..
मैं खुश हूं..
क्योंकि मेरे सारे हितैषी खुश है..
मैं खुश हूं..
क्योंकि मेरे आस-पास मौजूद हरेक कोई खुशी चाहता है..
मैं खुश हूं..
क्योंकि ये प्रकृति खुश है..
मैं खुश हूँ..
क्योंकि खुशी सबको खुशी देती है..
और दुःखी सबको दुःखित करती है..।
मैं खुश हूं..
क्योंकि मैं खुश रहना चाहता हूँ..।

हम सब खास दिखना चाहते है..बनना नही..।

हम सब खास(special) दिखना चाहते है..
मगर सवाल है क्यों..??
इसका सबसे बड़ा कारण है कि हम स्वयं को खास समझते ही नही..।
जब हम स्वयं को खास समझने लगेंगे, तब खास बनने की जरूरत नही पड़ेगा..।।


हम खास बनने के लिए या दिखने के लिए क्या करते है..??
हम आम आदमी अच्छे कपड़े पहनते है,अच्छे दिखने के लिए,साथ ही खूबसूरत दिखने के लिए अपने चेहरे को खराब करते है..।ऊपर से इत्र से नहाते है..जो हमारे त्वचा के छिद्र को नुकसान पहुंचाते हैं..।हम खास दिखने के लिए वो सब करते है,जिससे स्वयं को नुकसान हो..।
ऐसा नही की इससे हम खास नही दिखते है..दिखते है..मगर ये कबतक बरकरार रहता है..??
1दिन,2दिन,1सप्ताह,1 महीना या फिर 1 साल..??
अक्सरहाँ 24 घंटे के बाद ही हम खास से आम बन जाते है,बस उसकी कुछ यादें रह जाते है..और कुछ नही..।।

हम आप चक्रवर्ती सम्राट अशोक को जरूर जानते होंगे..??
क्या आपको पता है..वो इतना कुरूप थे कि उनके पिता बिंदुसार भी उनसे घृणा करता था..
मगर वो स्वयं को खास बनाकर पूरे विश्व के मानसपटल पे छा गये.।
सम्राट अशोक पुराने हो गये..।
वर्तमान समय की ही बात करते है..

हम सब जोमैटो से परिचित है..
उनके फाउंडर कौन है पता है..??
दीपिन्दर गोयल..है।
इन्हें बचपन से ही हकलाने की समस्या है,जिसके कारण वो नर्वस और सचेत रहते थे,हमेशा आत्मविश्वास की कमी बनी रहती थी,जिसकारण सार्वजनिक कार्यक्रमों से हमेशा दूरियां बनाके रखते थे..।
उन्होंने एक पॉडकास्ट में कहा-"मुझे बोलने में बहुत मेहनत करना पड़ता है,जिस कारण ढेर सारा कैलोरी खत्म हो जाता है,क्योंकि मैं हकलाता हूँ..।

आज जोमैटो से सब वाकिफ है,मगर उनकी कमियों से नही..
आपकी कमियां आपके आत्मविश्वास और सफलता के सामने में तुच्छ है..।
खास बनने के लिए कुछ खास करना होता है,न कि अपनी कमियों को छुपाना..।।



● इसी तरह हम oyo से परिचित होंगे..
उनके संस्थापक रितेश अग्रवाल जो कभी सिमकार्ड बेचा करते थे..कॉलेज ड्रॉपआउट थे,ओड़िशा के छोटे से कस्बे से आते थे..
उन्होंने अपने हरेक कमियों को स्वीकार और विश्व की सबसे बड़ी होटल चैन में से एक ओयो को बना दिया..।।



शायद हममें से बहुत लोग कल्पना सरोज को नही जानते होंगे..
वे "कमानी ट्यूब्स" के CEO है..।
इनका जीवन बहुत संघर्षमय था..
सबसे पहले बेटी के रूप में जन्म लेना(हमारी मानसिकता आज भी नही बदली है)।ऊपर से दलित परिवार में जन्म लेना..फिर 12 साल की उम्र में शादी हो जाना..फिर घरेलू हिंसा और गरीबी की मार इतना झेलना की आत्महत्या तक कि कोशिश कर लेना..।
मगर उन्होंने फिर निर्णय लिया खुद के लिए जीने का..
मुम्बई में गारमेंट फैक्टरी में 2₹ रोजाना की मजदूरी पर काम करना शुरू किया और फिर आगे चलकर "कमानी ट्यूब्स"की कमान संभाली..।
और आज वो कई कंपनियों की मालकिन है..।


ऐसे कई लोग है हमारे आसपास जिन्होंने अपने कमियों का रोना नही रोया बल्कि अपने कमियों को दरकिनार करके सफलता के झंडे गाड़े..।।

आखिर खास बनने के बजाय खास बने कैसे..??

सबसे पहले आप जैसे है,वैसे खुद को स्वीकार करें.. जबतक आप स्वयं को नही स्वीकारेंगे तबतक आपको कोई और कैसे स्वीकारेगा..।

अपनी खूबियों को पहचाने और निखारें.. साथ ही अपने कमियों को दूर करें..।

अपना दृष्टिकोण बदले..समस्या को रुकावट नही बल्कि चुनौती माने..।

हम दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करें,जैसा हम उनसे अपेक्षा रखते है..।

सुनने की आदत डालें...

आत्म-अनुशासन और स्वास्थ्य का ख्याल रखें..

दूसरों की मदद कर सकने में सक्षम है तो मदद करें..

विनम्र बने..

और आखरी चीज..किसी चीज या किसी व्यक्ति से अपेक्षा न रखें..क्योंकि अपेक्षाएं हमेशा तकलीफ देती है..।

अगर हम अच्छे बनने के जगह इन आचरणों को आत्मसात करेंगे तो जीवन में कभी खास बनने की जरूरत नही पड़ेगी..बल्कि हम खास हो जाते है..बनते नही..।।

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

बप्पा..


मत मुस्कुराओ आप इस तरह..
नही तो डूब जाऊंगा मैं.
आपकी मुस्कुराहटों में..।
फिर आगे क्या होगा..
ये सोच के दिल घबराता है..।
क्योंकि फिर मैं..
मैं नही रह जाऊंगा..
सिर्फ मैं ही रह जायेगा..।।

मत मुस्कुराओ आप इस तरह..
क्योंकि आपकी मुस्कान..
बिना बोले ही वो सब बोल देते है..
जो मैं खुद से नही बोल पाता..।

जब से आप मेरी जिंदगी में आये हो..
तब से जिंदगी बदलने लगी है बप्पा..

खुद को कैसे बेहतर बनाये..??

हममें से हरेक लोग अपने जिंदगी को बेहतर बनाना चाहते है..
और हम सब वो सब करते है,जिससे जिंदगी बेहतर हो.।
मगर अफसोस सबकुछ पाकर भी जिंदगी बेहतर नही लगती आखिर क्यों..??

दरसल इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में हम जिंदगी को बेहतर नही बना रहे होते, बल्कि अपने धन-दौलत,पद,प्रतिष्ठा और मान-सम्मान को बढ़ाने में लगे होते है..।
ये सब पाकर भी जिंदगी नीरस रहती है..।
क्योंकि ये सब पाने के चक्कर में हम उन चीजों को भूल जाते है,जो वास्तविकता में जिंदगी को बेहतर बनाती है..।।

चलिए आज से अपने जिंदगी में कुछ बदलाव लाकर जिंदगी को बेहतर बनाते है..।

खुद को स्वीकार करें..(आप जैसे है,जिन स्थितियों में है,उसे स्वीकार करें, क्योंकि आपके लिए आपसे बेहतर कोई और नही है..अपने कमजोरियों के बारे में न सोचें,बल्कि अपने ताकत के बारे में सोचे।)

दूसरों को स्वीकार करें.. जबतक हम दूसरों को स्वीकार नही करेंगे,तबतक वो हमें स्वीकार नही करेंगे(विचार,अभिव्यक्ति,दृष्टिकोण इत्यादि)।

आप जिस वातावरण में,जिस समाज में रह रहें है,उसके अनुसार अपनी प्रतिक्रिया दे..।(हम अक्सरहाँ आवेश में आकर वो बोल जाते है,जो हमें नही बोलना चाहिए।)

अपनी सबसे बड़ी आवश्यकताओं और इच्छाओं का पता लगाएं।(ये कैसे पता चलेगा..अपने क्रोध और गुस्सा का कारण पता करें.. पता चल जाएगा।)

हरेक इंसान/वस्तुओं में कमियों के बजाय अच्छाइयां ढूंढे..।

वर्तमान में जीयें.. अफसोस हम या तो अतीत में या फिर भविष्य में ही जीते है..।अगर हम अपने वर्तमान को सजग होकर जियेंगे तो हमारा हरेक क्षण आंनदित होगा..(ये कैसे होगा..??सांसो के प्रति सजग होकर)।

दूसरों के प्रति खुले हृदय से व्यवहार करें..(अपने भावनाओं को छुपाये नही)

प्रत्येक व्यक्ति में असीमित शक्ति का भंडार है,उसका उपयोग कर अपना जिंदगी बेहतरीन करें।(हम अपने मष्तिष्क का 10% भी इस्तेमाल नही करते,और अपनी जिंदगी का 50% ही जीते है।)

अपने शत्रु और कठिन परिस्थितियों को अपना गुरु समझें..क्योंकि इनके प्रति सजग रहकर हम अपने जिंदगी को बेहतर बना सकते है..।

अगर जिंदगी बेहतर बनाने के लिए मुझे इसमें से कोई एक चीज चुनना होगा तो मैं- "खुद को स्वीकार करना चुनूँगा.."।

क्योंकि जिंदगी बेहतरीन होती है,खुद को स्वीकारना से..जबतक हम खुद को  स्वीकार नही कर सकते,तबतक हम दूसरों से सिर्फ छलावा ही करते है,और खुद को पीड़ा देते है..।।
इसलिए खुद को स्वीकार करें.. आप जैसे है,जिन परिस्थितियों में है,उसे स्वीकार करें.. क्योंकि जब तक स्वीकृति नही होगी तब तक जिंदगी में सुधार कंहा से होगी..।।

इसलिए 2026 को बेहतर बनाने के लिए खुद को स्वीकार करें..😊।।

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

गलतियां..

कुछ गलतियां हम अतीत में करते है..
और उसे भूल जाते है..
शायद ये गलतियां..
गलती से गलत हो जाती है..।
और भविष्य में कभी उन गलतियों से मुलाकात होती है..
तो हम मुस्कुराते हुए,
और खुद पर हंसते हुए..
उन गलतियों को सुधारते है..।

कुछ गलतियां गलती से गलत हो जाती है..।


मुझे लगा मेरे पाँव..

मुझे लगा मेरे पाँव जमीं पर है..
मगर जब मैंने अपने आस-पास देखा..
तो यंहा सब शून्य में झूल रहे है..।
चाहे चाँद हो या हो सितारे..
यंहा सब शून्य से ही संचालित हो रहे है..।
मुझे लगा मेरे पाँव जमीं पर है..।


बहुत सोचा,बहुत जाना..
तब पता चला.. 
मेरे पाँव जमीं पर क्यों है..??
क्योंकि मेरा खुद का अस्तित्व ही नही है..
मैं इसलिए हूँ, क्योंकि ये पृथ्वी है..।
जिस रोज मैं का भान हो जाएगा..
मैं भी..
मैं हो जाऊंगा..।
और इस शून्य का हिस्सा हो जाऊंगा..
तब मेरे भी पाँव जमीं पर नही होंगे..।

मुझे लगा मेरे पाँव जमीं पर है..