रविवार, 23 जनवरी 2022

सुभाषचंद्र बोस से नेताजी बनने तक कि यात्रा

 शाश्वत नियम याद रखें -: यदि आप कुछ पाना चाहते हैं, तो आपको कुछ देना होगा।

सुभाषचंद्र बोस ने नेताजी बनने तक के सफर में अपना सर्वस्व त्याग दिया.. इसिलए तो वो आज भी जिंदा है,उसी तेवर में जिस तेवर मैं उन्होंने कहा था- तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा..

सुभाषचंद्र  बोस का जन्म 23 जनुअरी 1897 के कटक(ओडिशा)में हुआ।
भारत सरकार ने उनके 125वी जन्मशती को पराक्रम दिवस  के रूप में मनाने का निर्णय लिया है,जो उनके छवि और योगदान को देखते हुए सही है। उन्होंने आजादी के लड़ाई में वही पराक्रम दिखाया,जिसे देखकर देश के हर नागरिक को अनुभव हो गया था कि अब आजादी मिल जाएगा।
क्योंकि उन्होंने पहली बार भारत में अप्रैल 1944 में मणिपुर में झंडा फहराया।
मगर दुर्भाग्य ये रहा कि जापान पर परमाणु बम गिरने के बाद जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया,जिस कारण नेताजी रूस से मदद लेने के लिए 18 अगस्त 1945 को बमवर्षक विमान से मंचूरिया के लिए रवाना हुए कहा जाता है कि ये प्लैन क्रैश हो गया और उनकी मृत्यु हो गई..।।
मगर किसी को विश्वास नही है..।।

आज हमारे अन्दर बस एक ही इच्छा होनी चाहिए – मरने की इच्छा ताकि भारत जी सकेएक शहीद की मौत मरने की इच्छा ताकि स्वतंत्रता का मार्ग शहीदों के खून से प्रशस्त हो सके।
सुभाषचंद्र बोस ने अपनी प्राथमिक शिक्षा कटक के यूरोपियन स्कूल से ही किया और 10वी में 2रा स्थान प्राप्त किया। और आगे की पढ़ाई के लिए कोलकाता चले आये और उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज में नामांकन कराया ।।
1916 में जब वो दर्शनशास्त्र से B.A कर रहे थे तब कॉलेज के अध्यापकों और छात्रों के बीच झगड़ा हो गया क्योंकि अंग्रेज प्रोफेसर Mister O भारतीय छात्र से घृणा करते थे और बेवजह मारते थे। सुभाष ने छात्रों का नेतृत्व संभाला और प्रिंसीपल से शिकायत की तब भी कुछ नही बदला तो ये लोग उस मास्टर को भी मारे । ये बात प्रिंसीपल तक पहुंचा और एक कमिटी का गठन किया गया जिसमें कहा गया कि सुभाष Mister O से माफी मांगे मगर सुभाषचंद्र ने मना कर दिया जिस कारण उन्हें कॉलेज से 1 साल के लिए निलंबित कर दिया ।
इन दिनों वो देशबंधु चितरंजन दास को पढ़ना और सुनना शुरू किया। उन्ही से उन्हें समाजसेवा का प्रेरणा मिला। इन दिनों कोलकाता में कॉलरा(हैजा) फैला हुआ था, लाश इधर-उधर बिखरे पड़े थे।चारों बगल उदासी और असहाय लोग को देखते हुए वो द्रवित हो उठे ।उन्होंने उस समय 2.5 हजार से ज्यादा लोगों का अंतिम संस्कार किया।
इसी समय उन्हें सेना में भर्ती होने का शौक चढ़ा और वो 49वीं बंगाल रेजीमेण्ट में भर्ती के लिये उन्होंने परीक्षा दी किन्तु आँखें खराब होने के कारण उन्हें सेना के लिये अयोग्य घोषित कर दिया गया। उन्होंने बहुत कोशिश की मगर फिर उन्होंने अपना पूरा ध्यान B.A पे दिया और प्रेसीडेंसी कॉलेज में दूसरा स्थान प्राप्त किया।
पिताजी की इच्छा थी कि वो ICS(इंडियन सिविल सर्विस) करें, वो राजी हो गए मगर उनके पास सिर्फ 1 वर्ष ही था और उन्होंने ये चुनौती स्वीकार किया और ICS में 4th स्थान प्राप्त किया
मगर सुभाष चंद्र बोस स्वामी विवेकानंद और अरविंदो से बहुत प्रभावित थे ।और उन्होंने अपने भाई शरतचंद्र बोस को चिठी लिखी की ICS की नॉकरी कर देश की सेवा कैसे कर सकता हूँ..??
पिता के विरोध के बावजूद उन्होंने ने ICS की नॉकरी छोड़ दी और ये खबर पूरे भारत मे आग की तरह फैल गई।

कोलकाता आकर वो चितरंजन दास के साथ काम करने लगे उसी समय गांधी जी द्वारा शुरू किया गया असहयोग आंदोलन का नेतृत्व कोलकाता में चितरंजन दास कर रहे थे सुभाष चंद्र बढ-चढ़कर भाग लिया। 1922 में चितरंजन दास ने कांग्रेस के अंतर्गत  स्वराज पार्टी का गठन किया और इस पार्टी ने कोलकाता में  महापालिका का चुनाव लड़ा और जीता । चितरंजन दास महापौर बने और सुभाष चंद्र  महापालिका के प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बने। इन्होंने
 गलियों और सड़कों का नाम स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर रखना शुरू किया। साथ ही जिन परिवार से लोग आजादी के लड़ाई में शहीद हुए है, उस परिवार के सदस्यों को महापालिका में नॉकरी देना शुरू किया ।
युवाओं के बीच इनकी ख्याति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी।
1928 में गांधीजी से सुभाषचंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू के बीच मतभेद हो गया। गांधी डोमिनियन स्टेट के समर्थक थे जबकि ये दोनों पूर्ण स्वराज के बाद में गांधीजी ने इनदोनों की बात मान ली।
26 जेनुअरी 1930 को लाहौर अधिवेशन में पहली बार झंडा फहराया गया और पूर्ण स्वराज की मांग किया गया
26 जनुअरी 1931 को सुभाषचंद्र बोस ने कोलकाता में झंडा फहराया और एक रैली का नेतृत्व किया जिस कारण उन्हें जेल भेज दिया गया। 
इसी बीच भगत सिंह को फांसी दे दिया गया । जिस कारण सुभाषचंद्र बोस गांधी जी से नाराज हो गए क्योंकि उन्हें लगता था कि गांधी जी अगर कड़ा रुख अपनाते तो फांसी रुक सकता था।
वो अपने पूरे जीवनकाल में 11 बार जेल गए । 

विदेश-प्रवास


1932 में जेल में ही तबियत खराब हो गया जिस कारण वो इलाज कराने के लिए यूरोप गए। 1933-36 तक वो यूरोप में रहे मगर उस दौरान भी वो अपने कार्य मे लगे रहे।
वंहा वो इटली के नेता मुसोलिनी से मिले और उसने आस्वासन दिया कि इटली भारत की आजादी में अपना सहयोग देगा।
साथ ही  आयरलैंड के नेता डी अल्वेरा भी इनके अच्छे मित्र हो गए। 
उसी समय वो विट्ठल भाई पटेल से मिले और दोनों ने मंत्रणा की जिसमें गांधीजी के नीतियों का विरोध किया गया।जिसे पटेल-बोस विश्लेषण के नाम से ख्याति मिला।
इसी दौरान विट्ठल भाई पटेल की तबियत खराब हो गई सुभाषचंद्र ने जम की सेवा की मगर वो नही बचे।
 विट्ठल भाई पटेल ने अपनी वसीयत में पूरा सम्पति सुभाषचंद्र बोस के नाम कर दी थी, मगर सरदार पटेल ने नही माना उन्होंने मुकदमा चलाया और जितने के बाद पूरी सम्पति गांधीजी के हरिजन सेवा कार्य मे दे दिया।
 
1934 में इन्हें अपने पिता की मृत्यु की खबर मिली और वो कोलकाता आये। अंग्रेज को जब पता चला तब फिर कुछ दिन जेल में रखकर यूरोप भेज दिया।

1934 में जब वो आस्ट्रिया में थे तो एक इंग्लिश टाइपिस्ट "ऐमली शेंकल" जिसे इन्होंने अपने पुस्तक लिखने के लिये रखा था,इनसे शादी कर ली। इनसे एक पुत्री हुई जिसका नाम इन्होंने अनिता रखा।


 कांग्रेस के 51वे अधिवेशन के लिए गांधीजी ने सुभाषचंद्र बोस को कांग्रेस का अध्य्क्ष चुना।


इन्होंने अपना अध्यक्षीय भाषण बड़ी जोरदार दिया था,ऐसा भाषण अभी तक किसी ने नही दिया था।
इन्होंने इस दौरान योजना आयोग का गठन किया जिसका अध्यक्ष नेहरू को बनाया।
इन्होंने बेंगलुरु में महान वैज्ञानिक विश्वेश्वरय्या की अध्यक्षता में विज्ञान परिषद की स्थापना की

1939 में बोस फिर से कांग्रेस अध्यक्ष के लिए चुनाव लड़े और जीत भी गए। जबकि गांधीजी नही चाहते थे, क्योंकि गांधीजी को सुभाष की कार्यशैली पसंद नही था, जिस कारण इन्होंने पट्टाभि सितारमैय्या को अपने तरफ से खड़ा कियारवींद्रनाथ टैगोर ,प्रफुलचंद्र राय और मेघानाद साहा जैसे वैज्ञानिक ने गांधी जी को चिट्ठी लिखकर कहा कि सुभाष को ही कांग्रेस का अध्यक्ष रहने दिया जाय। मगर गांधीजी नही माने और वर्षों बाद कांग्रेस में चुनाव हुआ। मगर सुभाषचंद्र 203 मत से जीत गए।
गांधीजी ने पट्टाभि सितारमैय्या को अपनी हार बताकर कांग्रेस कार्यकारणी से कहा कि अगर आपको  सुभाष की कार्यशैली पसन्द नही है तो आप हट सकते है 14 में से 12 सदस्य ने त्यागपत्र दे दिया। नेहरू तटस्थ बने रहे सिर्फ शरतचंद्र बोस ही इनके साथ खड़े रहे।।
सहयोग न मिलने के कारण उन्होंने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया।
3 मई 1939 को इन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना किया , जिस कारण इन्हें कांग्रेस से निकाल दिया गया।
इसी समय द्वितीय विश्वयुद्ध की खबर भारत तक पहुंची बोस ने कांग्रेस से आवाहन किया कि अभी सही समय है अंग्रेज से लड़ने का अगर कांग्रेस मदद नही करेगा तो फारवर्ड ब्लॉक अकेले ही अंग्रेजो का ईंट से ईंट बजा देगा।
1940 में कोलकाता स्थित होलमेट स्तंभ जो कि गुलामी का प्रतीक था उसे रातों-रात फॉरवर्ड ब्लॉक के युवा ब्रिगेड ने ध्वस्त कर दिया।अंग्रेज को खबर लगते ही उसने फॉरवर्ड ब्लॉक के सभी बड़े नेताओं के साथ बोस को भी जेल में डाल दिया।
सुभाषचंद्र जेल में निष्क्रिय नही रहना चाहते थे वो अंग्रेज के खिलाफ आमरण अनसन शुरू कर दिया , तबियत बिगड़ने के हालात में उन्हें घर पर ही नजरबंद कर दिया गया।


भला कबतक उन्हें नजरबंद करके रखते..
अपने भतीजे शिशिर के मदद से 16 जनुअरी 1941 को पठान मोहमद जियाउद्दीन के वेश में घर से निकल गए। कार से गोमोह रेलवे स्टेशन पहुंचकर वंहा से फ्रंटियर मेल पकड़कर पेशावर पहुंचे।वंहा मियां अकबर खान के मदद से भगतराम तलवार के साथ काबुल पहुंचे।वंहा भारतीय व्यापारी उत्तमचंद मल्होत्रा के यंहा दो महीने रहे। इस दौरान वे जर्मनी, इटली और रसियन दूतावास से संपर्क किया । इटली दूतावास के मदद से वो ऑरलैंडो मेजेंटो नामक इटालियन बनकर मास्को होते हुए बर्लिन पहुंचे।

जर्मनी प्रवास
जर्मनी पहुंचकर वो अनेक नेताओ से मिले,इनमें से जर्मनी के एक मंत्री एडम फॉण ट्रॉप इनके अच्छे दोस्त हो गए। इसी दौरान 29 मई 1942 को एडोल्फ हिटलर से मुलाकात हुई


मगर हिटलर ने भारत की मदद करने से ये कहकर इनकार कर दिया कि जर्मनी यंहा से बहुत दूर है,आप जापान से मदद ले क्योंकि वो भी हमारे ही अलायन्स में है।
हिटलर ने अपनी आत्मकथा माइन कैम्फ में भारत और भारत के लोगो की बुराई की थी इसका विरोध सुभाषचंद्र बोस ने किया,हिटलर ने आस्वासन दिया कि अगले संस्करण में उसे हटा दिया जाएगा।
जर्मनी में ही नेताजी ने भारतीय स्वंतंत्रता संगठन और आजाद हिंद रेडियो की स्थापना की।इसी दौरान वो नेताजी के नाम से भी प्रसिद्धि मिली।
जर्मनी से वो पनडुब्बी मैं बैठकर इंडोनेशिया पहुंचे वंहा से वो सिंगापुर होते हुए जापान पहुंचे।

पूर्वी एशिया की यात्रा


शनिवार, 15 जनवरी 2022

"आत्महत्या" इसके लिए जिम्मेदार कौन..

 आत्महत्या जो कि एक लेटिन शब्द है,मगर इसका सर्वाधिक भुक्तभोगी भारत है..।।

क्या आपको पता है दुनिया में सर्वाधिक आत्महत्या कंहा होती है..?? 

हां भारत में..।। उस भारत में जिस भारत मे आत्महत्या को हेय दृष्टि से देखा जाता है,और कानूनन जुर्म है..।।

आत्महत्या को कभी भी एक सभ्य समाज स्वीकार नही कर सकता।। प्राचीन-काल से ही आत्महत्या करने वाले को हेय दृष्टि से देखा जाता है।

-प्राचीन एथेंस शहर में आत्महत्या करने वालों को शहर के बाहर दफनाया जाता था।

-1670 में फ्रांस शासक लुई-14वॉ के समय मे आत्महत्या करने वालों के शवों को सड़क पर घसीटा जाता था, और बाद में कचड़े के ढेर पर फेंक दिया जाता था।

- ईसाई धर्म मे जो इस तरह का प्रयास करता था उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता था,और जो मर जाते थे उसे कंही और दफनाया जाता था।

-इस्लाम धर्म आत्महत्या की इजाजत नही देता।।

-वंही सनातन धर्म मे इस तरह का विचार आना भी हमें पाप का भागीदार बना देता है।।

WHO(विश्व स्वास्थ्य संगठन) के अनुसार चीन,रशिया,अमेरिका, जापान,दक्षिण कोरिया से भी ज्यादा आत्महत्या भारत मे होती है।

विश्व मे 1 लाख लोगों पर 11.6 लोग आत्महत्या करते है,वंही भारत मे 1 लाख पर 11.3 लोग(NCRB के अनुसार) आत्महत्या करते है।


2020 में भारत में रोजाना 458 लोगों ने आत्महत्या की है,यानि एक साल में 1,53,502 लोगों ने.. ये आंकड़े NCRB(नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) के है अगर आप लसेंट के आंकड़े देखेंगे तो और ज्यादा भयावह है।।


भारत में सर्वाधिक आत्महत्या के मामले महाराष्ट्र, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश और पक्छिम बंगाल के है।।



WHO के अनुसार भारत मे महिलाओं का आत्महत्या दर 1लाख पर 16.4(इनमें से 70% यौन-शोषण,दहेज-उत्पीड़न,पारिवारिक-शोषण के कारण) है जबकि पुरुषों का 1 लाख पर 25.8 है।

सबसे ज्यादा भयावह और अफसोस जनक ये है कि हमारे 1 छात्र हरेक 55 मिनट में आत्महत्या कर रहे है। 

जिनके ऊपर देश का भविष्य है, जिनके ऊपर भारत के संजोने की जिम्मेदारी है,जिनके ऊपर समाज के साथ परिवार को सुदृढ़ करने की जिम्मेदारी है।वो आखिर क्यों इस तरह से अपने प्राण को त्याग रहे है..??

इसके लिए जिम्मेदार कौन है..??

हमारा समाज,हमारा परिवार या हमारी शिक्षा व्यवस्था..??ये तीनों ही जिम्मेदार है।

मगर सर्वाधिक जिम्मेदार हमारा शिक्षण-व्यवस्था है,हमारी शिक्षा-व्यवस्था किस और जा रही है,जो हम अपने छात्र को दबाब सहने की क्षमता विकसित नही कर पा रहे है80% लोग जो आत्महत्या करते है वो शिक्षित है और उनका उम्र 14-35 के बीच मे ही।।

 नैतिक शिक्षा के नाम पर हम अपने छात्र को क्या सीखा रहे है,जिंदगी एक रेस है,अगर पिछड़ गए तो कंही के नही रहे। क्या एक रेस हारने के बाद दूसरे रेस में हम भाग नही  सकते,अगर उसमे भी अगर हम हार गए तो एक और प्रयास करेंगे,अगर उसमें भी हार गए तो क्या हुआ आने वाली पीढ़ी को तो सीख दे सकते है..।।

दरसल हमारा समाज, हमारा परिवार, हमारा शिक्षण-व्यवस्था हमें हारना नही सिखाता..।। आखिर क्यों..??

जीतने के लिए हारना जरूरी नही है,मगर अपने जीत को और बेहतरीन बनाने के लिए हार का अनुभव जरूरी है।। हां हार को स्वीकार कर उसे आत्मसात कर लेना अभिशाप है.. हार एक बेड़ियां की तरह है,उसे तोड़ना जरूरी है,अगर नही तोड़े तो उसे स्वीकार करते देर नही लगेगा।।

जो इस बेड़ियां को भी नही स्वीकार कर पाते वो आत्महत्या को गले लगा लेते है..।। और हमारा समाज,परिवार और शिक्षण-व्यवस्था उस मासूम को ही दोषारोपित कर देता है..।।

आखिर क्यों..??इसके लिए जिम्मेदार कौन है..?

इसके लिए एक नही कई जिम्मेदार है-

परिवार,समाज,शिक्षण-व्यवस्था,

मीडिया/सोशल मीडिया-ये तो महिमा-मंडन करती है,आज से 10 साल पहले 14 साल के बच्चों को ये तक मालूम नही होता था कि आत्महत्या होता क्या है,मगर आज वो इन मीडिया/सोशल मीडिया के कारण आत्महत्या कर रहे है।

पूंजीवाद-वर्तमान समय मे इसका भी अहम योगदान है, लोगों के अंदर कुंठा का भाव उत्पन्न करवाने में। वर्तमान समय में सबकुछ का बाजारीकरण हो गया है,सबकुछ को हासिल करना मुमकिन नही है,मगर बाजारबाद सबकुछ को हासिल करने के लिए हमें प्रेरित करता है,और जिसे हम हासिल नही कर पाते उसके लिए कुंठा उत्पन्न होती है।और ये कुंठा दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती है,और हम अवसाद में घिर जाते है,और इस ओर कदम उठाने के लिए अग्रसर हो जाते है।।

आत्महत्या जैसे जघन्य अपराध से कैसे सामना किया जा सकता है..??





शनिवार, 1 जनवरी 2022

नव वर्ष

 नव-वर्ष सिर्फ दीवाल पर टंगी हुई कैलेंडर का बदलना भर नही है,बल्कि ये तो जिंदगी को बदलने का एक अवसर है नव-वर्ष..।।

अपनी कमियों को बीते हुए वर्ष में छोड़ते हुए,नए वर्ष में उन कमियों पर विजय पाने का एक अवसर है नव-वर्ष।।

अपनी सारे असफलताओं को पीछे छोड़ते हुए, उन असफलताओं पर विजय पाने का एक अवसर है नव-वर्ष।।

अपने अधूरे सपने को फिर से पूर्ण करने का अवसर है नव-वर्ष।।

अपने गिले-शिकवे को भुला कर, खुशियां मनाने का अवसर है नव-वर्ष।।

पीछे छूट गए रिश्तों को, साथ लेकर चलने का अवसर है नव-वर्ष।।

अपने चेहरे से नक़ाब उतारने का अवसर है नव-वर्ष,

खुद को फिर से मूल्यांकन करने का अवसर है नव-वर्ष।।

अपनी मुस्कुराहटों से दुनिया को खुशनुमा बनाने का अवसर है नव-वर्ष।।

नव-वर्ष सिर्फ एक वर्ष नही,बल्कि ये तो जिंदगी को नये सिरे से जीने का अवसर है नव-वर्ष..।।

आखिर क्यों नही, इस नव-वर्ष का स्वागत करें..।।




शुक्रवार, 26 नवंबर 2021

संविधान दिवस

हम भारतीय हरेक साल 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाते है,आखिर क्यों..??

जबकि 70% भारतीय ये तक अच्छी तरह से नही जानते कि, आखिर संविधान है क्या..?? और इसकी महत्वता क्या है..??मगर हम फिर भी संविधान दिवस मना रहे है,क्यों क्योंकि हम संविधान को जान सकें।।

भला हो भारतीय जनता पार्टी का या फिर कहें मोदी जी का जिन्होंने बहुत बड़े वर्ग को संविधान शब्द से अवगत कराया क्योंकि सर्वप्रथम उन्होंने ही संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ॰ भीमराव आंबेडकर के 125वें जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में 26 नवम्बर 2015 को पहली बार संविधान दिवस सम्पूर्ण भारत में मनाया गया  तथा 26 नवम्बर 2015 से प्रत्येक वर्ष सम्पूर्ण भारत में संविधान दिवस मनाया जा रहा है।

संविधान है क्या..??

संविधान एक शब्द नही बल्कि एक दस्तावेज है जिसके माध्यम से कोई भी देश के शासक-प्रशासक अपने देश को चलाते है, एवं नियम कानून बनाते है।ये सिर्फ संविधान का एक हिस्सा भर है।


भारतीय संविधान का निर्माण

-भारतीय संविधान के निर्माण में कोई भी बात शामिल बहुमत से नही बल्कि पूर्णमत से किया गया था। 

-भारत के हरेक क्षेत्र के राजे-रजवाड़े ऐवं बुद्धिजीवियों को संविधान निर्माण में शामिल किया गया क्योंकि भारत की विविधता विशालकाय था/है।

-भारतीय संविधान के निर्माण में 60 देशों के संविधानों का अध्ययन किया गया,और उसे भारत के परिपेक्ष्य के हिसाब से शामिल किया गया।

-भारत के संविधान के निर्माण में 2 वर्ष 11 महीना 18 दिन लगे,और इसके निर्माण कार्य में 64 लाख खर्च हुआ।

-4 नवंबर 1948 को संविधान का अंतिम प्रारूप पेश किया गया और हरेक पहलू पर 5 दिनों तक चर्चा हुई। 

-15 नवंबर 1948 से 17 ऑक्टोबर 1949 तक संविधान पर दूसरी बार चर्चा हुई और 7653 संसोधन प्रताव पारित किया ।

-संविधान के प्रारूप प्रस्ताव को 26 नवंबर 1949 को पारित किया गया,उस समय संसद में 299 सदस्य में से 284 उपस्थित थे।


भारतीय संविधान निर्माण में चुनौतियां

भारतीय संविधान निर्माण में संविधान सभा के समक्ष अनेक चुनौतियां मौजूद था- 

-सर्वप्रथम भारत की विशालता और विविधता।

-सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत का संरक्षण एवं

- भारत में रहने वाले हरेक लोगों का हितों का संरक्षण।

हमारे संविधान निर्माताओं ने इन सब चुनौतियों को स्वीकार कर एक शानदार संविधान का निर्माण किया जो दिन-प्रतिदिन राष्ट्र की प्रगति में अपना योगदान दे रहा है,जबकि हमारे साथ ही आजाद हुए कई देशों का हश्र बुरा हो गया और हो रहा है..।।


भारतीय संविधान नकल मात्र है..??

कुछ लोग कहते है कि भारतीय संविधान नकल मात्र है,ये वो लोग है जिन्हें रति भर सोचने समझने की शक्ति नही है। हां हमने कुछ देशों से अच्छी चीजें ली है जो हमारे अनुकूल थी और कुछ चीजों को हमने ठुकरा दिया जो हमारे अनुकूल नही था।।

पाश्चात्य संविधान विशेषज्ञ ग्रेनविल ऑस्टिन भारतीय संविधान की तीन विशेषता बताते है-

1.सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिये गए।

2.समायोजन और

3.परिवर्तन के साथ चयन की आजादी।


भारतीय संविधान की विशेषता..

-भारतीय संविधान सबसे लंबा लिखित संविधान है। 

- सक्ता की अंतिम शक्ति जनता के हाथ में है ।

-उद्देशिका

-लोकतंत्रात्मक और गणतंत्रात्मक व्यवस्था।

-समाजवाद और पंथनिरपेक्ष।

-मूल अधिकार/नीति-निर्देशक-तत्व/मूल कर्तव्य

-एकात्मक और संघात्मक का मिश्रण।

ये सब खुबिया मिलकर एक बेहतर संविधान बना, जो आज भारत को फिर से अग्रणी राष्ट्र बनाने को बैचैन है। मगर अफसोस हम संविधान शब्द से अवगत ही नही है,जो शब्द से अवगत है वो सविधान के बातों से नही,जो संविधान के बातों से अवगत है वो उन रहस्यों से अवगत नही है, जिसमे एक बेहतर राष्ट्र बनने का रहस्य छुपा हुआ है।।

संविधान ने हमें क्या दिया..??

सोचियेगा... दिमाग नही चल रहा है तो अपने आस-पास के देशों को देखिए.. तब आपको अहसास होगा कि हमें संविधान ने क्या दिया।। हम जितने बेहतर से संविधान को जानेंगे उतना ज्यादा हमें संविधान से मिलेगा..।।


रविवार, 19 सितंबर 2021

कुछ भी हो सकता है..

 अभी एक घटना देखी,जिसे देख कर मैं सोच में पड़ गया।

किसी को भी अंतिम क्षण तक उम्मीद नही छोड़ना चाहिए,क्योंकि कुछ भी हो सकता है..।।
घर के छत पे 2 गिरगिट एक फतिंगा का पीछा कर रहे थे,मैं ये सोच रहा था कि ये फतिंगा कंही और उड़ के भाग क्यों नही जा रहा है,मैं सोच ही रहा था कि तबतक एक गिरगिट ने उसे अपने मुंह मे जकड़ लिया।तब तक दूसरा गिरगिट भी उसके पास आ गया और कुछ क्षण के बाद उसने भी फतिंगा का दूसरा सिरा अपने मुंह मे दबोच लिया।।
अब तो ऐसा लगा की अब काम तमाम है,मगर अगले ही क्षण दोनों गिरगिट की पकड़ कमजोर होते ही वो फतिंगा इतनी तेजी से भागा की में देखते ही रह गया..।।
ये देख कर मेरे मन में ख्याल आया कि प्रयास कभी नही छोड़ना चाहिए,तब तो और जब उम्मीद बिल्कुल ही न बची हो..।।क्योंकि जिंदगी में कुछ भी हो सकता है..।

शनिवार, 5 दिसंबर 2020

अच्छाइयों पे बुराइयों का हावी होना।

 मैं अच्छा नही हूँ...।।

लेकिन बुरा भी नही हूँ..।।

मेरी कुछ खामियां मेरी अच्छाइयों पे हावी हो जाता है,

और मैं अपने ही नजरों में गिर जाता हूँ।

जो कि बिल्कुल ही सही नही है।।


इस समस्याओं से सिर्फ में ही नही बल्कि बहुत बड़ी आबादी जूझ रही है।

इससे छुटकारा पाया जा सकता है,

अगर हम अपनी अच्छाइयों के बारे में जाने और अपनी बुराइयों से तुलना करें तो आप पाएंगे कि आपकी बुराइयों की सूची आपके अच्छाइयों से छोटा है।

मगर ये आपके अच्छाइयों पे हावी हो गया है।

इसे न हावी होने देने का अनेक तरीका है-

1.अपनेआप को बेहतर समझे और अपनेआप से हमेशा कहते रहे कि मैं अच्छा हूँ।(self motivation)

2.अच्छे किताबों से दोस्ती बहुत जरूरी है,क्योंकि किताबों में इतनी शक्ति है की ये सिर्फ आपका ही नही बल्कि कइयों का जिंदगी बदल सकता है।

3.अपने लक्ष्य पे हमेशा नजर टिकाए रहे।

4.आपके द्वारा किसी के साथ किये गए व्यवहार का खुद से मूल्यकान करें।

5.जिंदगी में सबों का आभार प्रकट करना सीखना।


ऐसे ढेर सारे छोटी-छोटी चीज करके हम अपनी बुराइयों को अपने ऊपर हावी नही होने दे सकते है।।


जिंदगी_बहुत_खूबसूरत_है_बशर्ते_हम_देखते_कैसे_है।।


गुरुवार, 27 अगस्त 2020

कांग्रेस_वर्तमान_और_भविष्य

कांग्रेस सिर्फ एक पार्टी ही नही बल्कि पूरे भारत को जोड़ने वाली एक माला है/थी।वर्तमान समय में भी इसकी नींव गाँव-गाँव तक अच्छी तरह से जमी हुई है,मगर इसकी शाखाओं में घुन तो इसके पत्तियां पीली पड़ रही है।

 हम ये नही भूल सकते है कि ये वही पार्टी है, जिसने भारत की आजादी में अहम भूमिका ही नही निभाई बल्कि जात-पात,धर्म-संप्रदाय, भाषा,खान-पान,रहन-सहन में बटे हुए भूखंड को जोड़ने में कामयाब हुआ।कांग्रेस की सबसे बड़ी सफलता यही है।

जिसे आजतक जाने-अनजाने में भुनाया जा रहा है।यंहा तक कि पंडित जवाहरलाल अगर लगातार 3 बार प्रधानमंत्री बने तो कांग्रेस के नाम पे ही।लोग उस समय नेहरू जी को नही बल्कि कांग्रेस को वोट देते थे,वर्तमान में भी कुछ हद तक यही है।।


मगर वर्तमान में कांग्रेस का हश्र दयनीय अवस्था मे है..।।

डर लगता है कि जिस तरह एक विदेशी #A_O_hume  ने 1885 में कांग्रेस के सृजन में अहम भूमिका निभाया, उसी तरह इसके विसर्जन में विदेश में जन्मी सोनिया गांधी का ही अहम योगदान न हो।।

कांग्रेस के कमजोर होने या अस्तित्वविहीन होने से सबसे ज्यादा डर भारतीय लोकतंत्र को है।क्योंकि बिना विपक्ष के लोकतंत्र हो ही नही सकता।।

आज कांग्रेस और कांग्रेस के नेता इतने कमजोर हो गए है कि वो कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र को ही बनाये रखने में सक्षम नही है।किसी भी नेताओं में इतनी शक्ति नही है कि वो खुलकर विरोध कर सके।।

आखिर क्यों..??

क्या कांग्रेस एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है, जंहा सिर्फ चेयरमैन और C.O  का ही सब कुछ चलेगा।।

कुछ दिन पहले 23 नेताओं ने कांग्रेस अध्यक्ष को चिट्ठियां लिखी थी मगर कोई खुलकर के विरोध नही कर सका। क्या कांग्रेस के किसी नेताओं में इतनी हिम्मत नही की वो परिवारवाद का विरोध कर सके।

मगर अफसोस राहुल गांधी के द्वारा पूछे गए सवाल,की आखिर चिट्ठियां क्यों लिखी गई..??

इस सवाल का जबाब देने के बजाय सब नेताओं ने अपना बचाव करना ही उचित समझा।।

 आज स्थिति ये है कि भारत की अधिकांश राजनीतिक पार्टी परिवारवाद में जकड़ी हुई है।जो सिर्फ एक पार्टी के लिए ही नही बल्कि पूरे लोकतांत्रिक देश के लिए खतरा है।

आशा है कि कांग्रेस स्थितयां को भांपते हुए भविष्य में अपने ऊपर लगे हुए परिवारवाद के थप्पे  को मिटाने की कोशिस करेगा।मगर उम्मीद कम ही है।

Yoga for digestive system