शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

सोचा था..

सोचा था तुम्हें अब मैसेज नही करूँगा..
मगर तुम्हारा स्टेटस देखकर..
मैं भूल गया..
की तुम्हें मैसेज नही करना था😊..।।

तुम मेरी जिंदगी में आई..
तपती धूप में,
बिन बादल बरसात की तरह..।
और मैं तुम्हें भूलने की व्यर्थ कोशिस कर रहा हूँ..
सावन की बरसात की तरह..।

तुम्हारा एक मैसेज..
मुझे स्पंदित कर देता है..
तुम्हारा एक कमेंट मुझे..
अनकही सी उलझन में डाल देता है..
कि कोई अजनबी..
इतना अपना सा कैसे लग सकता है.??


बुधवार, 14 जनवरी 2026

समय..

समय..
न यह ठहरता है..
न यह लौटता है..
यह तो बस..
पलकों के झपकने में बीत जाता है..।

जिसे हम 'कल' कहते है..
वह एक याद है..।

जिसे हम 'कल' कहेंगे..
वह एक प्यास है..।

और जो 'अभी' है..
बस वही प्रकाश है..।।



सत्य क्या है..??

सत्य क्या होता है..??
"सत्यं ज्ञानम अनंन्त ब्रह्म:"(तैत्तिरीय उपनिषद)


सत्य..क्या है??
जो तीनों कालों(भूत, वर्तमान और भविष्य) में एक समान रहें..।

ज्ञान क्या है..??
जो स्वयं प्रकाशित हो,और जिससे अन्य चीजों का भान हो..।
(जैसे अंधेरे में दिए के जलने से अन्य चीज का भान)

अनंन्त(infinite)
जिसकी कोई सीमा न हो..जो सर्वव्यापी और कालातीत है..।

"सत्य का ज्ञान अनंन्त है,और जो अनंन्त है वही ब्रह्मा है..।"

हम साधारण मनुष्य एक सीमा तक ही सोचते है,जबकि सत्य उस सीमा के परे होता है..और हम वंहा तक सोचते ही नही है..।

जब सूर्यास्त होता है तो हमें लगता है कि शाम हो गया,जबकि ये सत्य हमारे लिए है,जबकि किसी और क्षेत्र में रह रहे लोगों के लिए सूर्योदय हो रहा होगा..।
सूर्य सत्य है,मगर सूर्योदय और सूर्यास्त पूर्ण सत्य नही है..ये पृथ्वी के घूर्णन के कारण हो रहा है..।जब आप पृथ्वी के गति के साथ अपना तादात्मय बिठा लेंगे तब सत्य का भान होगा..मगर क्या ये आसान है..??

आसान तो नही है..मगर मुश्किल भी नही है..।
इसके लिए पहले अपने अंदर ज्ञान का बीज बोना होगा..और जब वो अंकुरित होगा तब खुद-व-खुद सत्य का भान होगा..।

इसकी प्रक्रिया क्या है..??
बहुत आसान है..
खुद के साथ सबको स्वीकारिये..
स्वीकृति ही प्रकृति के करीब ले जाएगा..।
क्योंकि सबका अपना-अपना सत्य है..भले ही दूसरे का सत्य आपके लिए सत्य न हो..मगर उसके सत्य को नकारे नही..।




वो दूरियां बना रही है..

वो दूरियां बना रही है तो बनाने दो न..
तुम क्यों उसके करीब जा रहें हो..।
जो चीज तुम्हारी कभी थी ही नही..
उसे पाने को व्यर्थ प्रयत्न क्यों करना..।
जो तुम्हारे हिस्से में है..
वो तुम्हारे हिस्से में आकर ही रहेगा..।
जो नही है,
उसे पाने का क्यों व्यर्थ प्रयत्न करना..।
वो गलती से जिंदगी का हिस्सा बन भी गई..
तो तुम्हीं बताओ जिंदगी कैसी होगी..??

वो दूरियां बना रही है तो बनाने दो न..
तुम क्यों उसके करीब जा रहें हो..।


सोमवार, 12 जनवरी 2026

अतीत और भविष्य

कभी-कभी भविष्य की छलांग लगाने के लिए..
अतीत में डुबकियां लगानी होती है..।
मगर डुबकियां लगाना कंहा आसान है..।
जिस तरह समुंद्र से सीपियां निकालने के लिए 
गोताखोर को सांस पर नियंत्रण रखना होता है..
उसी तरह अतीत में गौता लगाने के लिए,
भावनाओं पे नियंत्रण रखना होता है..।।

अतीत में ही छुपी है भविष्य की कुंजी..
अगर अतीत ही बुरा हो,
तो भविष्य कंहा से बेहतर होगा..।

अगर जिसका अतीत ही बुरा हो,
वो फिर क्या करें..??

अपने अतीत में डुबकियां लगाकर.. 
अपने अतीत की गलतियों को ढूंढे..।
और अपने वर्तमान में गलतियों को सुधारें..
भविष्य की छलांग, तो नही लगा सकते..।
मगर वर्तमान में निरंतर दौड़कर..
अपने भविष्य के छलांग से आगे निकल सकते है।।


स्वामी विवेकानंद और जमशेदजी टाटा

स्वामी विवेकानंद जी के सपनों के भारत को अगर किसी ने साकार किया या कर रहा है,तो वो जमशेद जी टाटा और टाटा ट्रस्ट है..।

शायद, स्वामी जी, जमशेद जी टाटा से मिलने के बाद ही कहे होंगे-
"मुझे केवल 100 ऊर्जावान युवा दे दो और मैं इस देश को बदल दूंगा।"
मगर अफसोस भारत को 10 भी ऊर्जावान युवा नही मिल पाया..
अगर मिल जाता तो देश का दशा और दिशा कुछ और होता..।
जब एक टाटा कंपनी भारत के दिलों पे राज करती है,तो उस जैसी 10 कंपनी होती तो विश्व पर राज करती..।

स्वामी विवेकानंद और जमशेद जी की मुलाकात..
स्वामी जी मई 1893 में SS Empress of india नामक जहाज पर सवार होकर "विश्व धर्म सम्मेलन"में भाग लेने जा रहे थे और उसी जहाज पर जमशेद जी टाटा भी सवार थे..।



 ● यह मुलाकात केवल एक संयोग नही था ,बल्कि भारत के वैज्ञानिक पुनर्जागरण की नींव थी..
- विवेकानंद की आध्यात्मिक दृष्टिकोण और टाटा के औद्योगिक दृष्टिकोण का संगम भारत के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ..।

जो आगे चलकर भारत का सर्वश्रेष्ठ शैक्षणिक संस्थान IISc बंगलुरु(1909)बनता है..जंहा C.V.Raman,homi jahangir bhabha,vikram sarabhai , Satish dhavan ,G.N.Ramchandran , C.N.R.Rao..ऐसे - ऐसे व्यक्ति ने यंहा शिक्षण और प्रशिक्षण किया है..।
आज हम जिस इसरो(ISRO) पे गुमान कर रहे है..उसकी उपज भी IISc बंगलुरु के छांव में ही हुआ..।।

स्वामी विवेकानंद से प्रेरित होकर जमशेद जी ने झारखंड में TISCO की नींव रखी..।

टाटा ट्रस्ट आज भी स्वामी जी के भारत के सपने को साकार कर रहा है,टाटा ट्रस्ट ~66% हिस्सा जन कल्याण में खर्च करता है..।

जिस दरिद्रनारायण की सेवा की बात स्वामी विवेकानंद कर रहे थे उसमे टाटा ट्रस्ट आज भी अपना योगदान दे रहा है..।
जमशेदजी टाटा जी को पिछले सदी(100 साल) का विश्व का सबसे बड़ा दानवीर माना जाता है..
 -इन्होंने अपने जीवनकाल में 102 बिलियन डॉलर(आज के वैल्यू के हिसाब से) दान किये,जो बिल गेट्स और वॉरेन बफ़े जैसे दिग्गजों से भी बहुत अधिक है..।।

स्वामी जी को आज भी उस 100 युवाओं का तलाश है,जो भारत का परचम पूरे विश्व में लहराए..
शायद ये वही सदी है,जंहा स्वामी जी के सपने साकार होते हुए नजर आएंगे..।।
स्वामी विवेकानंद यही चाहते थे कि अध्यात्म और विज्ञान का मिलन हो..और आज दुनिया उस और बढ़ रही है..।।




खुद को समेटिये..

हमसब खिलना चाहते है,बिखरना चाहते है,और फैलना चाहते है..मगर इसके बाद क्या..??
इसके बाद का हमें पता नही..अगर पता है भी तो, हम उसे स्वीकारते नही..।
हरेक दशक में हज़ार से ज्यादा सफल लोग होते है..
मगर आनेवाले दशक में उनमें से 10 भी याद नही रह पाते..।।
आखिर क्यों..??

प्रकृति के कुछ नियम है..
खिलने के बाद मुरझाने की प्रक्रिया..मगर हम मुरझाते नहीं बल्कि उसके विपरीत मुरझाने की प्रक्रिया को चुनौती देते है..जो हमें थका देती है,और इस दौड़ से हटा देती है..।हम जिसे मुरझाने की प्रक्रिया समझते है,वो उस समय की सुसुप्ता अवस्था होती है,जंहा एक नया सृजन का निर्माण होने वाला होता है,मगर हम इस प्रक्रिया को चुनौती देकर नई सृजनता के अवसर को खो देते है..।।
आपने कभी गौर किया है..फूल खिलने के बाद मुरझाते है,उसके बाद ही इसमें बीज की उत्पत्ति होती है..।।

जब हम सफल होते है तो हमारी सफलता का शोर चारों और बिखरता है..और हम चाहते है कि ये शोर हमेशा ऐसा ही होता रहे..जो कि संभव नही है,इसके लिए हरेक बार सफल होना होगा तब ही सफलता का शोर बना रहेगा..मगर हम भूल जाते है कि हरेक बार सफल होना संभव नही है,यही से जिंदगी उल्टी दिशा में चलने लगती है,और हम अपनी मंज़िल से भटक जाते है...।

हरेक जीव अधिक से अधिक अपना फैलाव चाहता है,अपने अस्तित्व को सदा बनाये रखने के लिए..ये सोच अच्छी है,मगर जब ये सोच सामुदायिक न बनकर एकाकी बन जाती है,तब से जिंदगी रसातल में चली जाती है..।

हम इन सब प्रक्रिया में इतने मसगुल होते है कि सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया को भूल जाते है..खुद को समेटने की प्रक्रिया..जब तक हम खुद को समेटेंगे नही तबतक फिर से अपना नया विस्तार नही कर पाएंगे..।

जब भी जिंदगी अधर में हो तो सबसे पहले कछुए की भांति खुद को समेटने की कोशिश कीजिये..तबतक खुद को समेटते रह जबतक जिंदगी को नई दिशा न मिल जाये.. हम अक्सरहाँ जब जिंदगी में भटकाव महसूस करते है,तो उसका रास्ता बाहर ढूंढते है,जबकि उस भटकाव से निकलने का रास्ता हमारे अंदर होता है..।।


खुद को जितना समेटियगा आप अपना विस्तार उतना कर पाइयेगा..।।
बिग-बैंग सिद्धांत मालूम है..
एक छोटे से कण में बूम होता है..और 1 सेकंड से कम समय मे हमारा ब्रह्मांड का निर्माण हो जाता है..।।

जितना हो सके खुद को समेटिये.. जरूरत के हिसाब से ही अपना फैलाव कीजिये..कछुए की भांति..।