रविवार, 29 मार्च 2026

कहानी: "नी"

हम कब,कंहा किससे और कैसे मिलेंगे..
ये कोई नही जानता..।
ये वाकया ही कुछ ऐसा है..।

दरभंगा एक ऐसा जगह है,जंहा एक तरफ किला की लंबी दिवार खड़ा होकर अपना इतिहास बताता है..तो वंही लंबी-चौड़ी सड़के अपना भविष्य बताता है..।मुझे मालूम नही था,की एकदिन मुझे दरभंगा से अलग होना होगा..
मगर हो गया,सिर्फ दरभंगा से ही नही,बल्कि उसके यादो से भी..।

अब जब दरभंगा आता-जाता हूँ,तो दरभंगा नीरस दिखता है,मानों जो पेड़ हमने लगाया था,वो सूख गया हो..ऐसा ही प्रतीत होता है..
जिन गलियों में,मैं रहा करता था,उस गली में जाने से डर लगता है,क्योंकि मैं वंहा से चुपचाप भाग आया था..।।
मगर मुझे क्या मालूम कि,जिससे भागा था,उससे मुलाकात कुछ इस तरह से होगा..।।

रात हो गई थी,और मैं दरभंगा स्टेशन पर सिमरिया जाने वाले ट्रैन का इंतजार कर रहा था,ट्रैन स्टेशन पर आई और मैं एक बोगी में चढ़ा,सीट ढूंढ ही रहा था कि एक फैमिली दिखी जिसे देखकर मेरे खुशी का ठिकाना नही रहा..।
मैंने उन अंकल-ऑन्टी को प्रणाम किया..और एक छोटा सा प्यारा सा बच्चा था,मैंने पूछा ये कौन है..उन्होंने कहा ये इसकी बेटी है..
मैंने पूछा गोद मे उठा लू..
उन्होंने इशारा दिया..
और मैं हर्षित होकर उसे गोद मे उठाया..
और उसे सीने से लगाया..।



सीने से लगाते ही मैं इतना भावुक हो गया कि मैं रोने लगा..(क्योंकि ऐसा लगा जैसे मैं, उसे गले लगा रहा हूँ..जिसे लगाने की तमन्ना थी,उसके शरीर से भी उसकी खुश्बू आ रही थी जिसके खुशबू में,मैं डूबना चाहता था..)
और खुद को नियंत्रित करके मुस्कुराते हुए पूछा..
इसका नाम क्या है..
थोड़ी देर के लिए सब सुन हो गए..
मानो मैंने क्या पूछ लिया..।
फिर उस बच्ची के माँ ने मेरे तरफ देखते हुई कहा..
इसका नाम "नी" है..
उसके माँ-बाप इस नाम से शायद खुश नही थे..।
मैंने कहा अच्छा है..छोटा नाम है..
लोग के जुबां पे जल्दी आ जायेगा..।।

मैंने देखा कि माहौल थोड़ा शांत हो गया है,जोकि कुछ देर पहले तक ठीक था,मगर मेरा नाम पूछते ही माहौल बिल्कुल बदल गया है..
मुझे अहसास हुआ कि यंहा रहना सही नही है..।
मैं ने मुस्कुराते हुए कहा-
ठीक है मैं चलता हूँ, 
पीछे खाली जगह है..।।

मैं आकर खिड़की वाले सीट पर लेट गया,और खिड़की से अंधेरे को निघारता रहा..अचानक मेरी नजर दूसरी तरफ गई तो देखा वो खड़ी है..मालूम नही कब से वो खड़ी थी..।
मैंने उससे पूछा बाथरूम जाना है...
चलु मैं..
वो चुपचाप मेरे तरफ देख रही थी..।
मानो वो बिना बोले बहुत कुछ बोल रही थी..
और मैं उसके मौन को समझते हुए भी,
नासमझी का बहाना बना रहा था..।
मैं अपने सीट से खड़ा हो गया..
और कहा चलो..
वो आगे बढ़ी..बाथरूम तक आई..
उसे देखकर ऐसा लग रहा था..
जैसे दुनिया की सारी ताकत खुद में समेटकर..
वो मुझे गला लगाना चाह रही हो..।
मगर वो मेरे इशारे का इंतजार कर रही थी..।
एकबार में उसे ईशारा तो करू..
मगर मैंने उसे सहमति नही दी..
उसकी आँखें मुझसे ये कह रही थी की..
मानो सब गलती मेरी ही थी..।

वो अपने आँखों से कह रही थी..
"पहली दफा तुमसे प्यार न हुआ तो क्या हुआ..
 दूसरी दफ़ा तुम पहल तो करते..
 शायद तुम्हें मुझसे प्यार था ही नही..
 अगर प्यार होता..
 तो तुम मुझे पाने के लिए वो सब करते..
 जिससे मैं,तुम्हारे करीब आ सकू..
 शायद तुम्हें मुझसे प्यार था ही नहीं..
 सिर्फ आकर्षण था..।।

मैं स्तब्ध खड़ा रहा..
मेरे पास उसके सवालों का कोई जबाब नही था..।
मैं अपने सीट पे आ गया..
और वो अपने सीट पर चली गई..।

न जाने कब हम अपने गंतव्य पर पहुंचे,
पता ही नही चला..
गंगा मैं स्नान किया..स्नान करते वक़्त ऐसा महसूस हो रहा था..
जैसे मैं कोई पाप धो रहा हूँ..।
स्नान करके हम बाहर निकले..
मेरा नजर उन परिवार वालों से फिर मिला..
मगर इस बार ऐसा लगा..
जैसे हम दोनों एक-दूसरे को जानते ही नही..।।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कहानी: "नी"