रविवार, 8 फ़रवरी 2026

मैं हूँ कंहा..

मैं हूँ कंहा..

मझदार में..या फिर किनारे पे..

मैं हूँ कंहा..??

न पाँव तले ज़मीन है...न सर पे आसमान है..

मैं हूँ कंहा..??

तलाशता हूँ खुद को मैं..इन लहरों के शोर में..

बंधा हूँ किसी अनकही...अनजानी सी डोर से..।

मैं हूँ कंहा..??

शायद मैं ही नदी हूँ..मैं ही सागर हूँ.. 

मैं ही उसका मझदार हूँ और मैं ही उसका किनारा हूँ..।

मैं हूँ कंहा..??

शायद मैं ही अपनी कश्ती का अब इकलौता सहारा हूँ।

मैं हूँ कंहा..

मझदार में या फिर किनारे पे..

मैं हूँ कंहा..।।

आसमाँ की और देखता हूँ..और नजरें फैलाता हूँ..

फिर खुद से पूछता हूँ..

मैं हूँ कंहा..

इस शून्य में..या फिर उस शून्य मैं..

जिस शून्य में,सब समाहित है..।

मैं हूँ कंहा..??




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