मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

शिव कौन है..??

जाबालि उपनिषद सामवेद से संबंधित एक लघु उपनिषद है। इस उपनिषद में महर्षि जाबालि और ऋषि पैप्पलाद के बीच संवाद के माध्यम से शिव के बारे में बताया गया है।


ऋषि पैप्पलाद ने जाबालि से पूछा शिव कौन है तो जाबालि कहते है-

सहोवाच जाबालिः- 

"पशुपतिं सवज्ञं जगदुदयस्थितिभङ्गहेतुं सर्वेश्वरं महादेवं ज्ञात्वा मृत्युमुत्तीर्यते॥

 जाबालि कहते है - शिव समस्त पशुओं (जीवों) के स्वामी है, वो सर्वज्ञ, जगत की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश का  कारण है, सर्वेश्वर 'महादेव' को जानकर ही मनुष्य मृत्यु को पार कर सकता हूं। 

शिव केवल देवता नहीं, बल्कि ब्रह्मांड का आधार है।




शिव कौन है - शिव पशुपति है..

"​अहंकारमयाः जीवाः पशवः परिकीर्तिताः।

तेषां पतित्वाद्देवेशः पशुपतिरित्युच्यते॥"

अहंकार से युक्त जितने भी जीव हैं, वे 'पशु' कहलाते हैं। उन सभी जीवों के स्वामी (पति) होने के कारण महादेव को 'पशुपति' कहा जाता है।



​★शिव कौन है- शिव  'भस्मधारी' है।

अग्निरेवेति भस्म। वायुरिति भस्म। जलमिति भस्म। स्थलमिति भस्म। व्योमेति भस्म। सर्वं ह वा इदं भस्म॥

अग्नि भस्म है, वायु भस्म है, जल भस्म है, पृथ्वी भस्म है और आकाश भस्म है।संपूर्ण दृश्यमान जगत भस्म का ही विस्तार है।

 

◆प्रलय के पश्चात जो शेष बचता है,वही शिव है..


शिव ही शिव है..

शिव के सिवा कुछ और नही है..

शिव ही शिव है..

शिव..शिव..शिव..

यात्रा..

यात्रा जरूरी है..
क्योंकि यात्रा सिर्फ जीवन नही,बल्कि जिंदगी बदल देती है..।
इसलिए जब भी मौका मिले यात्रा पर निकल जाए..।
पता नही कौन सी यात्रा आपके जिंदगी को बदल दे..।

मेरी तो जिंदगी बदली है..
अब मैं वो नही हूँ..जो पहले था..।
मगर मुझे पता नही उस यात्रा में ऐसा क्या चीज था जिसने मेरे जिंदगी को बदल दिया..।
13 दिसंबर 2025 को मैं मुम्बई से गुजरात के व्यारा के लिए YOG परीक्षा के लिए 3 दिन के लिए गया..व्यारा में सर्किट हाउस में ठहराव था,हम कुल 8 लोग थे,मगर सर्किट हाउस में 5 लोग ही ठहरे थे,हम और 2 व्यक्ति एक कमरे में ठहरे थे..शायद उस पार्थ(सर्) के पास सोने से मेरे अंदर बदलाव आया..
या फिर तपोवन आश्रम में गुरु जी(शंकरभाई पटेल) का ऊर्जा का प्रभाव था
या फिर उस मंदिर का(उनाई माता) या फिर वो ग्रुप ही ऊर्जावान था जिसके ऊर्जा से में भी ऊर्जावान हो गया..।
या फिर व्यारा से आते वक्त उस वृद्ध का vip लेकर सीढ़ी से उतरने में मदद किया, और उनका स्पर्श मेरे अंदर बदलाव लाया..।
या फिर बप्पा को स्वप्न में देखकर ऊर्जावान होना..।
या फिर 16 तारिक को एक स्ट्रेंजर का मेसैज आना और वर्षा की तरह मेरे जिंदगी के गंदगियों को धो देना..।






जिंदगी में जबतक कृपा नही होती तबतक कुछ नही होता..
कृपा हमेशा बरसती रहती है..
हमें सिर्फ बाहर निकलकर उस कृपा का रसपान करना होता है..।।

घर से बाहर निकलिए..
यात्रा कीजिये..
यात्रा घर से बाहर का और बाहर से घर का..
यात्रा इड़ा से पिंगला का..
यात्रा मूलाधार से सहस्त्रार का और सहस्त्रार से मूलाधार का..
यात्रा अ , उ , म से ॐ का..
यात्रा स्वयं से शिव का 
और शिव से स्वयं का..।।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

हादसा..

कभी-कभी जिंदगी की बागडोर हमारे हाथों में नही,बल्कि किसी ओर के हाथ मे होता है..।खासकर के हम मनुष्यों का जीवन तो दूसरे के ही हाथों में है..।
जरा सोचिए..
हम जन्म लेते,और माँ-बाप हमारा ख्याल नही रखते..
तो क्या होता..??
मगर हम इन सब चीजों का इतना आदि हो गए है कि हमारा ध्यान इधर जाता ही नही है..।

एक सचा वाकया बताता हूँ..
एक चौराहे 🚦🛣️ पे एक तरफ से बाइक आ रही थी,दूसरी तरफ से कार..
मगर बाइक वाले ने पूरा ब्रेक लिया मगर तब भी उसकी बाइक नही रुकी.
मगर कार वाले ने कार रोक ली..और बाइक वाला बच गया और सीधे आगे निकल गया..।


ये दृश्य भले ही सामान्य हो..मगर इस दृश्य में बहुत कुछ छुपा हुआ है..
● कार वाला बेहतर इंसान हो,इसलिए उसने ब्रेक लगा लिया..
● बाइक वाले ने या फिर उसके चाहने वालों ने कुछ अच्छे कर्म किए होंगे, जो वो इस दुर्घटना से बच गया..।

कभी-कभी हमारे हाथ मे कुछ नही होता..मगर कोई तो है जिसके हाथ मे सबकुछ होता है..।
इसे समझना आसान नही है..
हमारे जीवन मे अक्सरहाँ कई हादसे होते है..
मगर हम उस पर गौर नही करते..जबकि ये हादसे ऐसे होते है जो हमारी जिंदगी को बदलने वाले होते है..मगर हम उसे सामान्य हादसा मान कर दरकिनार कर देते है..।

हमसब के जीवन मे अक्सरहाँ कई हादसे होते है..।
आपको कोई हादसा याद है,या फिर आप भी हादसा को दरकिनार करने वालों में से है..
कोई नही, हममें से अधिकांश लोगों का जन्म भी एक हादसा ही है..
किसी के लिए कोई घटना हादसा होता है,तो किसी के लिए वही घटना अवसर होता है..
आखिर क्यों..??
इसके पीछे क्या काम करता है..??
क्या हमारा कर्म..
या हमारे कर्मों पे दूसरों का भी प्रभाव पड़ता है..।
ये इतना सूक्ष्म स्तर पर होता है कि हम इसे महसूस नही कर पाते..।

आगे से महससू कीजियेगा..




शिव कौन है..??कैवल्योउपनिषद के अनुसार

कैवल्यो उपनिषद के अनुसार शिव..


इस उपनिषद में ब्रह्माजी शिव के स्वरूप के बारे में ऋषि आश्वलायन को बताते हुए कहते है -




शिव ध्यान स्वरूप है(सगुण और निर्गुण का संगम)


अचिन्त्यमव्यक्तमनन्तरूपं शिवं प्रशान्तममृतं ब्रह्मयोनिम्।

तमादिमध्यान्तविहीनमेकं विभुं चिदानन्दमरूपमद्भुतम् ॥

उमासहायं परमेश्वरं प्रभुं त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तम्।

ध्यात्वा मुनिर्गच्छति भूतयोनिं समस्तसाक्षिं तमसः परस्तात्।।


शिव अचिन्त्य, अव्यक्त, अनन्त रूपों वाले, कल्याणकारी, परम शान्त, अमृतस्वरूप और ब्रह्म का कारण हैं। वे आदि, मध्य और अन्त से रहित हैं, वे अद्वितीय, सर्वव्यापी, चेतन-आनन्दस्वरूप और निराकार हैं। माता उमा के साथ, परमेश्वर, प्रभु, तीन नेत्रों वाले, नीलकण्ठ और अत्यन्त शान्त स्वरूप का ध्यान करके मुनि समस्त भूतों के कारण, सबके साक्षी और अज्ञान से परे उस परम तत्व को प्राप्त कर लेते हैं।


​◆ शिव सर्वव्यापत है-

स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट्।

स एव विष्णुः स प्राणः स कालोऽग्निः स चन्द्रमाः ॥


वो ही ब्रह्मा हैं, वो ही शिव हैं, वो ही इन्द्र हैं, वो ही अविनाशी परम स्वराट् (स्वयं प्रकाशमान) हैं। वही विष्णु हैं, वही प्राण हैं, वही काल, अग्नि और चन्द्रमा भी हैं।


​◆ शिव काल से परे है और शिव ही सत्य है..

स एव सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यं सनातनम्।

ज्ञात्वा तं मृत्युमत्येति नान्यः पन्था विमुक्तये ॥


जो कुछ भी पहले बीत चुका है और जो भविष्य में होने वाला है, वह सब कुछ वह सनातन शिव ही है। उन्हें जानकर ही मनुष्य मृत्यु को पार कर सकता है,मोक्ष का इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है।


​◆शिव अद्वैत है (आत्मा और शिव एक ही है)


मय्येव सकलं जातं मयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।

मयि सर्वं लयं याति तद्ब्रह्माद्वयमस्म्यहम् ॥


मुझसे ही सब कुछ उत्पन्न हुआ है, मुझमें ही सब प्रतिष्ठित है और मुझमें ही सब विलीन हो जाता है,वो अद्वैत ब्रह्म (शिव) मैं ही हूँ


​कैवल्योपनिषद् के अनुसार शिव 'समस्तसाक्षिम्' (सबके साक्षी) हैं। वे 'माया' और 'तम' (अज्ञान) से परे हैं..

शिव ही शिव है..

शिव के सिवा,

कुछ और नही है..

शिव ही शिव है..

रविवार, 1 फ़रवरी 2026

मन चंगा तो कठौती में गंगा..

कुछ लोग ऐसे होते है,जो अपने कर्मों के द्वारा हमारे जीवन मे रच-बस जाते है,भले ही हम उनके नाम और काम से अनजान हो..मगर उनकी महानता हमारे जीवन का मार्ग प्रसस्त करता रहता है..।



उन्ही महान विभूतियों में से एक "संत रविदास/रैदास" जी है,इनका नाम रविदास इसलिए पड़ा क्योंकि इनका जन्म रविवार को हुआ..इनका जन्म बनारस के पास मंडूर गाँव मे हुआ,इनके माता का नाम घुरबिनिया और पिता का नाम रघु था..।

इनका जन्म चमार जाती में हुआ..मगर ये अपने कर्मो से ब्राह्मण बन गए..।
 "चमड़े,मांस और रक्त से
  जन का बना आकार
 आंख पसार के देख लो
 सारा जगत चमार।"

हम सब जन्म से शुद्र ही होते है..मगर हम अपने कर्मो,उपलब्धियों और अनुभूतियों से ब्राह्मण बनते है..।।

इन्होंने समाज को तब जगाने का कार्य किया जब समाज रूढ़ियों में जकड़ा हुआ था..
इन्होंने अपने गुरुभाई कबीर के साथ मिलकर समाज को जगाया और उद्वेलित किया..
 " मन चंगा त कठौती में गंगा"..
आज भी ये दोहे..समाज को जगाने का कार्य कर रही है..।।

रविदास जी ऐसे समाज की कल्पना करते थे जंहा कोई दुख न हो, न ही जाति-भेद हो,और न ही किसी के साथ अन्याय हो..।
 "बेगमपुरा सहर को नाऊँ,
  दुख अंदोह नहीं तिहि ठाऊँ।।"

रविदास भारत के चमकते सितारों में से है,जिनके चमक को उनकी शिष्या "मीराबाई" उनके चमक को और चहुँ दिशा में फैलाती है..
  " गुरु मिलिया रैदास जी"।

रैदास जी की बोली बुद्ध की बोली है,मगर इनके बोली मे भक्ति और प्रेम है..
जबकि बुद्ध की बोली में तार्किकता और विरोध था..जिस कारण बुद्ध का विरोध किया गया..।
अम्बेडकर जी ने बुद्ध को पढ़कर नही बल्कि रविदास जी को पढ़कर और समझकर बौद्ध धर्म अपनाया..।

भले ही भारत की बहुत बड़ी आबादी रविदास जी से अनभिज्ञ हो..
मगर शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा,जिनके ऊपर रविदास जी के दोहे,और गीत का असर न हो..।
  प्रभु जी तुम चंदन हम पानी,
जाकी अंग-अंग बास समानी॥
प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा,
जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती,
जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी तुम मोती हम धागा,
जैसे सोनहुँ मिलत सुहागा॥
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा,
ऐसी भक्ति करै रैदासा॥



"शिव" कौन है..??

जब भी हम शिव का नाम लेते है तो हमारे सामने एक मुस्कुराता हुआ ध्यानमग्न चेहरा आता है..जिसके जटा में गंगा विराजमान है,और मस्तक पे चंद्रमा है,और नीले गले मे सर्प और रुद्राक्ष की माला लिपटी हुई है..।
मानो उन्हें कोई फर्क ही नही पड़ता..जबकि पूरा ब्रह्माण्ड उन्ही से व्यापत है..।
उनकी मौन मुस्कान आपसे सबकुछ वैसे ही छीन लेगा,जैसे त्रिनेत्र खुलने पर वो सबकुछ छीन लेते है..।।




क्या यही शिव का स्वरूप है..??
शायद बिल्कुल नही..
हमसब ने अपने-अपने अनुभव के अनुसार,उनके स्वरूप को गढ़ते चले गए..
शिव इतने वृहत और इतने सूक्ष्म है कि हम उन्हें देख नही सकते..हम सिर्फ उनमें एकाकार हो सकते है..।
शायद कुछ अभागे लोग उनसे एकाकार नही हो पाए होंगे, और उनकी अनुभूति उन छवियों में देख लिया होगा और जिस स्वरूप को हम आज देख रहे है..
शायद ढेर सारे लोगों की अनुभूतियों से "शिव" का ये स्वरूप बना होगा..
जिस स्वरूप को हम आज देख और पूज रहें है..।।
मगर शिव इन सबसे परे है..।
तो फिर शिव है कौन..??
शिव की चर्चा वेदों,उपनिषदों और पुराणों में मिलती है..
हमारे 108 उपनिषदों में से 14 उपनिषद शिव को समर्पित है...
इन उपनिषदो के द्वारा हमें " शिव कौन है" इसकी जानकारी हमें मिलती है..।

कैवल्य उपनिषद के अनुसार -
  " स ब्रह्मा स शिवः स हरिः
    स इन्द्रः सोsक्षरः प्रमहः स्वराट।।"
 शिव ही ब्रह्मा और विष्णु है,वही परम अक्षर और स्वयंप्रकाश सक्ता है..।

अथर्वशिखा उपनिषद के अनुसार-

"ॐकार एव भगवान् रुद्रः

तस्माद् ॐकारं नित्यं जपेत्॥"

ॐ ही रुद्र है,और रुद्र ही शिव है,और सृष्टि का मूल ध्वनि स्पंदन भी ॐ है..।

शिव ही मूल नाद और कंपन है..।


अथर्वशीर्ष (रुद्र) उपनिषद के अनुसार -

"साक्षी चेताः केवलो निर्गुणश्च

सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा॥"

शिव वो चेतना है जो सबकुछ देखती और करती है,लेकिन वो स्वयं किसी क्रिया में नही बंधती है..

★जो देख रहा है,वही शिव है..।


कालाग्निरुद्र उपनिषद के अनुसार -

"रुद्रः कालानां कालः।"

शिव समय से परे है..।

जो समय से परे है वही शिव है..।


श्वेताश्वतर उपनिषद के अनुसार -

"एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थे।"

शिव एक है,इनके सिवा दूसरा कोई नही है।

बृहज्जाबाल उपनिषद के अनुसार -

"ज्ञानमेव मोक्षसाधनम्।"

ज्ञान ही मोक्ष(शिव) का साधन है..।


जाबाल उपनिषद के अनुसार -

"आत्मैव शिवो ज्ञेयः।"

आत्मा या स्वयं को जानना ही शिव है

★स्वयं को जानना ही, शिव को जानना है।


महानारायण उपनिषद के अनुसार -

"नारायणो रुद्रः।"

नारायण ही रुद्र है..।


पंचब्रह्म उपनिषद के अनुसार -

"सद्योजातं प्रापदामी वामदेवं सदाशिवं।"

मैं सृष्टि के आरम्भकर्ता,करुणामय रक्षक और शाश्वत कल्याणकारी शिव से मोक्ष की कामाना करता हूँ..।

★ सृष्टि की हर क्रिया ही शिव है।


रुद्रहृदय उपनिषद के अनुसार -

"हृदयकमले मध्ये सदा शिवः प्रतिष्ठित:।"

शिव हृदयकमल के मध्य में विराजमान है..।

★ जो भीतर है,वही शिव है..।


दक्षिणामूर्ति उपनिषद के अनुसार -

"मौनव्याख्या प्रकटित परब्रह्मतत्त्वम्।"

जो मौन के द्वारा परमब्रह्म का बोध कराये वही शिव है।

मौन ही शिव है।


स्कन्द उपनिषद के अनुसार -

"शिवज्ञानात् परं नास्ति मोक्षसाधनमुक्तमं।"

शिव को जानने से बड़ा कोई मोक्ष का साधन नही है..।

★शिव ही मोक्ष है..


◆सर्वसार उपनिषद के अनुसार -

"सर्वशास्त्रसारं तत्त्वं शिव एव न संशयः।"

सभी शास्त्रों का सार तत्व शिव ही है..।

सबका सार शिव ही है..।


योगशिखा उपनिषद के अनुसार -

"योगेन चित्तशुद्धिः शिवसाक्षात्कारः।"

योग से चित्त की शुद्धि होती है और शिव का साक्षात्कार होता है।

★ योग का परमलक्ष्य शिव ही है..।


शिव को शास्त्रों और वेदों के अध्धयन से नही जान सकते क्योंकि इनकी एक सीमा है,और शिव हरेक सीमाओं से परे है..

तो फिर शिव को कैसे जान सकते है..??

शिव को जानने के लिए शिव होना होगा..।

ये उतना ही सरल है..

जितना फूलों का खिलना,चिड़ियों का चहचहाना..

हवाओं का बहना, बादल का बरसना..

ऋतुओं का बदलना,तारो का चमकना..

और हमारा आपका मुस्कुराना..।

ये जितना सरल है,उतना ही सरल शिव को जानना है..।

मगर..ये उतना ही कठिन है..

जितना दिन और रात का होना..

तारों का चमकना,बादल का बरसना,

फूलों का खिलना और हमारा आपका मुस्कुराना..।


शिव कौन है..??

ये सवाल ही गलत है..शिव कौन नही हैं..

या फिर शिव क्या नही हैं..ये सवाल होना चाहिए..।

यंहा शिव के सिवा कुछ और नही है..

सिर्फ शिव ही शिव हैं..

शिव के सिवा कुछ और नही है..

मैं भी शिव हूँ..

तू भी शिव है..

शिव ही शिव है..

शिव के सिवा कुछ और नही है..।

शिव ही शिव है..।।





शनिवार, 31 जनवरी 2026

किताब : अजपा जप एवं चिदाकाश धारणा


यह पुस्तक सत्यानंद सरस्वती द्वारा लिखा गया है..जिसमे वो अजपा जप और चिदाकाश धारणा के बारे में बताते है..।
इस पुस्तक के कुछ प्रमुख अंश नीचे है..


अजपा जप

साँस 'सो' की ध्वनि के साथ अंदर एवं 'हं' ध्वनि के साथ बाहर आती है, तो इसे 'अजपा गायत्री' कहते हैं।

​जब नामोच्चारण मुख से हो तो - "जप"

​जब नामोच्चारण हृदय से हो तो - "अजपा"


अजपा के द्वारा समाधि का प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है

​अजपा क्रियायोग का एक अंग है।

​(तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान क्रियायोग है - पतंजलि)


​•अजपा की साधना के लिए गुरु की आवश्यकता नहीं होता..

​"स्वाध्याय" क्या है..? अपने कार्यों के प्रति निरंतर जागरूकता ही स्वाध्याय है।

•​अजपा करते समय आज्ञा चक्र या अनाहत चक्र या शरीर के अन्य केंद्रों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए..।


●​अजपा करते वक़्त 3 महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देना चाहिए..

​1. गहरी श्वसन क्रिया 2.विश्रांति 3.पूर्ण जागरूकता पर


​"श्वसन प्रक्रिया में मंत्रों का योग ही 'अजपा' है।"


अजपा में इच्छित रूप से लंबी और गहरी श्वास लेना से

आयु बढ़ती है..😊


दाहिनी — पिंगला — सूर्य नाड़ी

​बांई — इड़ा — चंद्र नाड़ी

​इन दोनों का क्रमिक प्रवाह चेतना से अलग रखती है।

​●जब सुषुम्ना का प्रवाह हो तो ध्यान करना चाहिए।

●श्वास-प्रश्वास की दर प्रति मिनट 15 बार होना चाहिए।


​● अजपा करने की प्रक्रिया:

सुखद आसन में बैठकर शरीर को शिथिल रखें और गहरी साँस ले..

भीतर लेने वाली साँस के साथ "सो" और बाहर आने वाली साँस के साथ "हं" का योग करना चाहिए और इस दौरान कोई मानसिक विराम नहीं लेना चाहिए..।और कुछ समय के बाद शून्य में प्रवेश एवं भ्रूमध्य में चेतना को ले जाकर आज्ञा चक्र या अनाहत चक्र पर मन को एकाग्र करना चाहिए..और कुछ समय बाद फिर अनाहत का जाप करना चाहिए।

अजपा का अभ्यास बैठकर या लेटकर भी किया जा सकता है।


महत्वपूर्ण शब्द:

पूरक — सांस लेना

रेचक — श्वास छोड़ना

​कुंभक — सांस रोकना


●ध्यान के 4 सोपान हैं-

​•विश्रांतिकरण,जागरूकता,एक हो जाना और स्वयं को भूल जाना..।

◆​ध्यान की प्रक्रिया में एकाग्रता नहीं वरन जागरूकता का विशेष महत्त्व है।

अजपा अभ्यास में प्रमुख बातें-

​लययुक्त श्वसन, कल्पना, पूर्ण अविरल सजगता, पूर्ण शिथिलीकरण तथा समस्त शरीर के प्रति चैतन्यता।



चिदाकाश धारणा

चिदाकाश :- चित् + आकाश (चेतना का आकाश)

चित - मन, बुद्धि, अहंकार (अंत:करण)

चित् :- चेतना का पर्यायवाची।


स्मृतियों में 3 प्रकार के आकाश का वर्णन:

प्राकृतिक (सामान्य) आकाश

चित्ताकाश (मन का आकाश)

चिदाकाश (बुद्धि का आकाश)

प्रथम दो की अपेक्षा यह सूक्ष्म होता है,इसका संबंध शुद्ध चेतना से है।


योग उपनिषद में 5 प्रकार के आकाश की चर्चा:

आकाश :- प्राकृतिक आकाश, जिसे देख सकते हैं।

पराकाश :- अंदर एवं बाहर के अंधकार का संकेत करता है।

महाकाश :- अंदर एवं बाहर अनुभवगम्य अग्नि की सी चमक का प्रतिनिधित्व करता है।

तत्वाकाश :- अंदर की आत्मा की अनुभूति का दिग्दर्शन कराता है।

सूर्याकाश :- शुद्ध चेतना को प्रदर्शित करता है जो हजार सूर्यों की भांति तेजोमय है।

धारणा :- मानसिक शक्तियों को किसी विशेष क्षेत्र या वस्तु विशेष पर केंद्रित करना ही "धारणा" है।

​●ध्यान के लिए दो आसन सर्वोत्तम है-

पद्मासन और सिद्धासन (स्वस्तिकासन)


​●चेतना क्या है?

हमारे अंदर की ज्ञान शक्ति है,जिसे स्वयं का और दूसरे का ज्ञान रहता है।सूक्ष्म रूप से चेतना सर्वव्याप्त है।चेतना का स्वरूप इंद्रियों के माध्यम से प्रकट होता है।चेतना अस्तित्व का एक बुनियादी तत्व है। वह अपने स्वरूप को किसी भी माध्यम से किसी भी रूप में प्रकट कर सकती है।

रूप या माध्यम की सीमा चेतना की सीमा नहीं है, सिर्फ चेतना की अभिव्यक्ति ही सीमा है।


​● समाधि' का अर्थ..?

चित्त का समाहित हो जाना और इंद्रियों के अनुभव से ऊपर उठ जाना ही समाधि है।


कष्ट का मूल कारण है..?? आसक्ति(कर्म के प्रति, विचार के प्रति, आशा और मान्यताओं के प्रति)।

​अजपा अभ्यास कितनी बार करना चाहिए..??

3 बार करना चाहिए

​सुबह 4-6 के बीच: बैठकर

​शाम में आराम कुर्सी या आरामदायक पोस्चर में बैठकर और

​सोते वक्त सोते हुए।


अजपा जप से क्या लाभ होता है..??

अजपा हरेक रोगों की रामबाण दवा हैरोग के कई कारणों में एक कारण 'अतृप्त इच्छा' है, जिसका इलाज किसी के पास नहीं है, इसे अजपा से दूर कर सकते हैं।

​"मनुष्य दवाइयों से नहीं, बल्कि प्राणशक्ति के प्रवाह से ठीक होता है। अजपा के द्वारा प्राणशक्ति अविरल और सभी अंगों में प्रवाहित होती है।"

अजपा जप द्वारा मानसिक क्लेश का निवारण:

सभी व्याधियों (problems) का दो ही कारण है: राग और द्वेष

इसके कारण ही मानसिक क्लेश उत्पन्न होते हैं।

​इसे नियंत्रित करना न ही संभव है और न ही आसान।

​मगर अजपा के द्वारा मानसिक क्लेशों को दूर किया जा सकता है।


अजपा जप आधुनिक समय मे सबके लिए सहज है..इसके लिए न ही गुरु की आवश्यकता है और न ही किसी कर्मकांड की..मगर अजपा के द्वारा हम अपने जीवन के हरेक समस्याओं से छुटकारा पा सकते है..।

ये जितना सरल है,उतना ही प्रभावी है..इसीलिए अजपा को अपने जीवन मे अपनाकर अपने जीवन को सरल और सहज बनाये..।।

शिव कौन है..??