शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

खालीपन..

हमें दूसरों की जरूरत पड़ती है..
अपने खालीपन को भरने के लिए..।
हमारी सारी उम्र गुजर जाती है..
अपने खालीपन को भरने के पीछे..
मगर ये खालीपन कभी भरता ही नही..
क्योंकि हमें अपने खालीपन का पता ही नही चलता..।



ये खालीपन क्यों है..??
इस क्यों को कोई क्यों नही जानता..।
क्योंकि इस खालीपन को,जानने के लिए..
खाली होना पड़ता है..
और यंहा खाली कौन होना चाहता है..??

कबीर दास जी कहते है-

कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढै बन माहि।

ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखत नाहि॥

हमारा हाल भी तो उस मृग की ही तरह है..हम अपने खालीपन को भरने के लिए क्या-क्या नही करते,सोशल मीडिया/मूवी/वेबसेरीज़ न जाने और क्या-क्या करते है, अपने खालीपन को भरने के लिए..जबकि ये हमारे खालीपन को और बढ़ाता है..।और ज्यों-ज्यों खालीपन बढ़ता जाता है,हम बैचैन और विक्षिप्त होते जाते है..।

तो हम क्या करें..??

कबीरदास जी कहते है..-

जिन ढूँढा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।

मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ॥

हमें अपने खालीपन को भरने के लिए अपने अंदर ही डुबकियां लगाना होगा,मगर ये कठिन है..क्योंकि जब हम अपने अंदर डुबकियां लगाते है,तो हमें अपने ही बुराइयों का सामना करना होता है,जो बहुत कठिन है..विरला ही कोई-कोई होता है,जो अपनी बुराइयों को स्वीकार कर उसे परास्त कर अपने अंदर डुबकियां लगा पाता है..और अपने खालीपन को दूर कर पाते है..।।

अपने आप को स्वीकार करें..
अपने अच्छाइयों को अपने बुराइयों को,अपने कमियों को..जब तक आप स्वयं को स्वीकार नही करेंगे तबतक आप अपने खालीपन को नही भर पाएंगे..।
अपने आप को स्वीकार करें...
कैसे..??
अपने अंदर डुबकियां लगाकर..
डुबकी कैसे लगाए..??
आंख बंद करके स्वयं को स्वयं में मिलाएं..।
स्वयं को स्वयं में कैसे मिलाए..??
सांसों के साथ स्वयं को तल्लीन करके..हरेक आनेजाने वाली सांस को देखें.. जब सिर्फ सांस रह जाये और कुछ नहीं..तब ये खालीपन मिटेगा नही बल्कि इस खालीपन में ही सब कुछ समा जाएगा..।।

ये जो खालीपन प्रतीत होता है..वो खालीपन,उस खालीपन का ही प्रतिबिंब है,जिसमें सबकुछ समाहित है..और वो ही हमें अपनी और आकर्षित करता रहता है..।।





समाज और हम

हम अक्सर कहते हैं कि "मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है," लेकिन क्या हमने कभी रुककर यह सोचा है कि इस 'समाज' का हमारे अंतर्मन पर क्या प्रभाव पड़ता है..??


समाज केवल व्यक्तियों का समूह नहीं है बल्कि यह साझा मान्यताओं, अपेक्षाओं और कभी-कभी थोपे गए आदर्शों और मूल्यों का एक ताना-बाना भी है..।

समाज हमें सुरक्षा देता है, पहचान देता है, लेकिन अक्सर हमारी मौलिकता (Originality) की कीमत पर..। 

बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि 'लोग क्या कहेंगे'। यह एक वाक्य कई बार हमारी रचनात्मकता और हमारे साहसी निर्णयों का गला घोंट देता है। 



क्या हम वही बन रहे हैं जो हम वास्तव में हैं..या हम बनना चाहते है, या हम वही बन रहे हैं जो समाज हमसे उम्मीद करता है..?

आज डिजिटल युग में हम एकदूसरे से जुड़े तो हुए हैं, लेकिन संवाद खो गया है। आज हम भीड़ में भी अकेले हैं...क्यों..??

सहानुभूति (Empathy) की जगह अब जजमेंट (Judgment) ने ले ली है। एक स्वस्थ समाज वही है जहाँ व्यक्ति को उसकी खामियों के साथ स्वीकार किया जाए, न कि उसे एक सांचे में ढालने की कोशिश की जाए।

वर्तमान में समाज की अच्छी खामियां गुम होती जा रही है..अक्सरहाँ मैं अपने बुजुर्गों से सुना करता था- समाज किस दिन के लिए है..।मगर वर्तमान में आज ये समाज टूट रहा है..भले ही समाज मे कई खामियां क्यों न हो..मगर ये समाज ही होता है...जो हरेक परिस्थितियों में हमारे साथ होता है..।

मगर वर्तमान में आज, ये समाज टूट कर बिखर रहा है..

शहरों में ये ढांचा टूट ही गया है...आपने कई हृदयविदारक घटना अखबारों और न्यूज़ में देखा होगा..जब घर से लाश की बदबू आने लगती है,तब बगल वाले को पता चलता है..हमारे सामने कौन रहता है..हमें सालों तक पता नही चलता..ये हाल है शहरी समाज का..।

गाँव में अभी भी समाज जिंदा है..मगर ये भी अब अवसान की और जा रहा है..क्योंकि समाज अपना दायित्व का निर्वहन नही कर रहा है...।।

आइए हम थोड़ा सामाजिक बने..अपना हाथ आगे बढ़ा कर मानसिक,शारीरिक और आर्थिक योगदान देकर..।



आज हम आप जैसे भी है..इसमें इस समाज का अहम योगदान है..और हम, ऐसा कहने वाले आखरी पीढ़ी है..😊

भीड़..

मैं इस भीड़ में कंही पिछड़ गया..
खुद को देखा तो बहुत पीछे पाया..
मगर ये क्या..
पीछे तो हूँ मैं..
लेकिन मैं भीड़ से ऊपर हूँ..
मेरे पीछे भी भीड़ है,मेरे आगे भी भीड़ है..
मगर मैं इस भीड़ में रहकर भी..
इस भीड़ से परे हूँ..।



न ही मुझे आगे की भीड़ प्रभावित करती है,
न ही पीछे की..
मगर इस भीड़ की..
कोलाहल और चकाचौध हम तक कभी-कभी पहुंच ही जाती है..
और मुझे प्रभावित कर जाती है..।

मैं जंहा हूँ वंहा से आगे जाना आसान है..
बस एक प्रणोदन की जरूरत है..
और मैं बहुत आगे चला जाऊंगा..
जंहा हम जैसे कई है..
मगर इनमें कोई भेद नही है..।

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

बुरे परिस्थितियों में ही अच्छे समय का बीजारोपण होता है...।

हमसब अक्सरहाँ कभी-न-कभी बुरी परिस्थितियों से गुजरते है..
और अक्सरहाँ हम उन परिस्थितियों को कोसते है..।
मगर हम कभी उन परिस्थितियों पे गौर नही करते..।

कभी-कभी हम जिन परिस्थितियों को बुरा कहते है,वही परिस्थितियां हमारे जिंदगी के लिए सबसे अहम साबित होता है..।।

इतिहास भरा पड़ा हुआ है..उन बुरी परिस्थितियों से जिसने इतिहास का रुख ही मोड़ दिया..।

चलिए उनमें से कुछ व्यक्तियों से रु-ब-रु होते है,जो बुरे परिस्थितियों के कारण ही महान बन पाए..।

एक व्यक्ति प्रथम श्रेणी(first class) का वैध टिकट लेकर ट्रैन में सफर करता है,मगर उसके अश्वेत होने के कारण उसे ट्रैन से फेंक दिया जाता है..और वो व्यक्ति सारी रात कड़ाके के ठंड में उस स्टेशन के वेटिंग रूम में ठिठुर कर गुजारता है,और निर्णय लेता है कि इस अन्याय और नस्लभेद के खिलाफ आवाज उठाऊंगा...।



इन्ही के पदचिन्हों पे चलकर "मार्टिन लूथर किंग जूनियर" ने अमेरिका में 'सिविल राइट मूवमेंट' चलाया..
वो कहते है.. 
"ईसा मसीह ने हमें लक्ष्य दिया और....उन्होंने हमें तरीका दिया।"

इसी तरह दक्षिण अफ्रीका के "नेल्सन मंडेला" ने उन्हें अपना आदर्श मानकर दक्षिण अफ्रीका को बिना किसी गृहयुद्ध के दक्षिण अफ्रीका को लोकतांत्रिक देश बनाया..।
(◆नेल्सन मंडेला ने 27 साल जेल में बिताया..इनके लिए इनसे बुरा और क्या हो सकता है,मगर परिणाम सामने है,आज उन्हें पूरा विश्व जानता है..।


"अक्सरहाँ जब हम सबसे बुरे दौड़ से गुजर रहे होते है,उसी समय अच्छे समय का बीजारोपण भी हो रहा होता है..इसीलिए बुरा समय जब भी आये,तो घबराए नही,मुस्कुराए😊.."

अब हममें से अधिकांश लोग जान गए होंगे कि हम किसकी बात कर रहे है..
वो व्यक्ति कोई और नही बल्कि "महात्मा गांधी" थे जिसे 7 जून 1893 को पीटरमैरिट्सबर्ग स्टेशन पे ट्रैन से उस ठिठुरती हुई ठंड में फेंका गया..वो रात ऐतिहासिक रात थी..जिसने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी बना दिया..।
जरा सोचियेगा..अगर ये घटना उनके साथ नही होता तो क्या होता..??


चलिए अब उस सख्स से रु-ब-रु होते है,जिन्हें स्कूल से इसलिय निकाल दिया गया कि वो मंद बुद्धि के थे..।
शिक्षक ने उनकी माँ को एक पत्र लिखा कि आपका बच्चा addled( अव्यवस्थित दिमाग) है और वह कुछ सीख नही सकता..।
उनकी माँ ने उस पत्र को पढ़ा और उनसे कहा- स्कूल ने लिखा है कि "आपका बेटा बहुत प्रतिभाशाली है,और हमारे पास उसे पढ़ाने लायक अच्छे शिक्षक नही है,इसिलिय आप इसे खुद पढ़ाये...।"
पता है वो बच्चा कौन था..??
दुनिया उसे "थौक आविष्कारक" के रूप में जानता है..वो और कोई नही बल्कि "थॉमस अल्वा एडिसन" थे...।

उन्होंने वो किया जो आज हमें सामान्य लगता है..
उन्होंने पहली बार बिजली का बल्ब बनाया..इससे पहले दुनिया मोमबत्तियां और गैस की रोशनी पर निर्भर थी।
•उन्होंने पहली बार आवाज रिकॉर्ड कर सुनने वाला पहला उपकरण बनाया,जिससे संगीत उद्योग की शुरुआत हुई..
•आज हम सिनेमा हॉल में फ़िल्म का लुत्फ उठा रहे है तो उन्ही के कारण..उन्होंने "मोशन पिक्चर कैमरा" का आविष्कार किया जिससे फ़िल्म उद्योग का जन्म हुआ..।
•आज हम आप मोबाइल चला रहे है,मगर जरा सोचिए अगर बैटरी रिचार्जजेबल न होता तो क्या होता..।

वो कहते थे-
"मैं असफल नही होता हूँ,बल्कि एक नया तरीका खोज लेता हूँ,जो काम नही करता.."

वो हमेशा कठिन परिश्रम के पक्ष में रहे है,इस बारे में कहते है..-
"प्रतिभा 1% प्रेरणा और 99% कड़ी मेहनत ही सफलता का राज है।"
(Genius is 1% inspiration and 99% perspiration)

जरा सोचियेगा अगर उन्हें स्कूल से नही निकाला गया होता तो क्या होता..??

ये तो वो लोग है जिन्होंने अपने बुरे परिस्थितियों से देश और दुनिया को दिशा दी..
मगर हममें से हरेक घर में,हरेक समाज में कोई न कोई व्यक्ति होता ही है..जो बुरे परिस्थितियों से गुजरकर वो कार्य करते है,जो हमारे लिए आदर्श हो जाते है..।।

याद रखें..आप जब भी बुरे-से-बुरे परिस्थितियों से गुजर रहे हो,तो समझ लीजिए ,आपके अंदर अच्छे समय का बीजारोपण हो रहा है..

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

मैं अक्सरहाँ लिखता हूँ..

मैं अक्सरहाँ लिखता हूँ..
कभी कुछ,कभी कुछ..और कभी कुछ..
मगर कभी-कभी..
कुछ ऐसा लिखता हूँ..
जिसे लिखने के बाद नही..
बल्कि उसे बाद में पढ़ने के बाद..
अहसास होता है..
ये मैंने लिखा है..
और अपने लेखनी पर हल्का गुमान होता है..।।

और कभी-कभी..
मेरी लेखनी मेरा आइना बनकर मुझे झकझोर देता है..।
और मेरे वास्तविकता से मेरा आत्मसाक्षात्कार करा देता है..।
और कभी-कभी मेरी ही लेखनी मुझे तीर की तरह चुभता है..
और मुझे घायल करके क्षणभर के लिए अचेत कर देता है..।

मैं अक्सरहाँ लिखता हूँ..
कभी कुछ,कभी कुछ..
और कभी कुछ..।




आंनद की अनुभूति..मगर क्यों..??

कभी-कभी आनंद की अनुभूति होती है..
जैसे पूरा रोम-रोम हर्षित हो चुका है..।
शरीर का पूरा कोशिका जागृत हो चुका हो..
ऐसा महसूस होता है..।
मगर ये क्यों होता है..??

इसका कारण मालूम नही..
जब थोड़ा सोचा तो कुछ जबाब मिला..
पहला "अंतस मन" जिससे अभी तक मे अनभिज्ञ हूँ,मगर वो नही..
शायद मेरे कुछ संस्कार(कार्य) के कारण वो मुस्कुराता हो,और इस कारण पूरे शरीर में रोमांच पैदा होता हो..।

हम सब कंही-न-कंही एक दूसरे से जुड़े हुए है..
कुछ लोगों से खास जुड़ाव होता है..
शायद उन खास लोगों में से कोई खास लोग हर्षित होकर जिक्र या याद कर रहें हो..तो वो तरंगें हम तक पहुंचती है,और इस स्थूल शरीर को रोमांचित कर देता है..।।

कभी-कभी इसका विपरीत भी होता है..
आप उदास होते है,
मगर क्यों होते है..?
इसका लाख कारण ढूंढने पर भी नही पता चलता है..
शायद यही कारण होता हो..।।

इसीलिए मुस्कुराइए और अच्छे कार्य कीजिये..
जिससे आपके अंदर विद्यमान सूक्ष्म शरीर आपको हमेशा आंनदित रखें..।

कभी खुद से पूछिए..

कभी खुद से पूछिए,
आप कर क्या रहें है..?
आप जो कर रहें है..
क्या वो सही कर रहे है..?
कभी खुद से पूछिए..
आप कर क्या रहें है..?


घंटों यू ही जाया कर रहें है..
क्यों कर रहें है..?
उस क्यों को ढूंढिये..
और खुद से पूछिए..
आप जो कर रहें है..
क्या वो सही कर रहे है..?

सुबह से शाम..
शाम से रात..
और रात से सुबह..
कब हो जाता है..
ये पता नही चलता..।
ये क्यों नही पता चलता..?
उस क्यों को ढूंढिये..
और खुद से पूछिए..
आप कर क्या रहें है..?

साल दर साल यू ही बीत गए..
और हम वंही के वंही रह गए..
बीज अंकुरित होकर पेड़ बन गए..
पेड़ से गिरा बीज भी अंकुरित होकर पेड़ बन गये..।
और हम वंही के वंही रह गए..
क्यों रह गए..?
उस क्यों को ढूंढिये..।
और खुद से पूछिए..
आप जो कर रहें है..
क्या वो सही कर रहे है..?

सबको भान है अपने कर्तव्य का..
मगर कितने निभाते है अपने कर्तव्य को..?
आखिर क्यों लोग हो जाते है..
कर्तव्यमूढ़..??
उस क्यों को ढूंढकर..
अपने कर्तव्य का पालन कीजिये..।
या फिर यू ही..
घंटों,दिन,साल..जाया कीजिये..।

कभी खुद से पूछिए,
आप कर क्या रहें है..?
आप जो कर रहें है..
क्या वो सही कर रहे है..?
कभी खुद से पूछिए..
आप कर क्या रहें है..??




खालीपन..