सोमवार, 10 अगस्त 2026

खुद को देखिए जनाब..

खुद को देखिए जनाब..
आपको हो क्या गया है..??
कल तक आप सबके चहेते थे..
आज आपको हो क्या गया है..?
आपको लगता है..
लोग बदल गए है..
मगर नहीं..
आप ही बदल गए है..।


सूर्य को फर्क नहीं पड़ता कि..
कौन उसके ऊपर कीचड़ उछालता है..
या फिर पानी उछालता है..
वो तो सबपे..
एक समान रोशनी का बौछार करता है..।
आप तो सूर्य से थे..
तो फिर,
आजकल एक आंगन के, 
दीपक क्यों बन गए है..??

खुद को देखिए जनाब..
आपको हो क्या गया है..??
कल तक आप सबके चहेते थे..
आज आपको हो क्या गया है..?

माना कि लोग गलत है..
मगर,वो सही ही कब थे..
बिच्छु काटना,और 
शेर दहाड़ना तो बंद नही करेंगे..
वो कल भी ऐसे थे..
और आज भी ऐसे ही है..
मगर आपको क्या हो गया है..??
आप तो ऐसे नहीं थे..??

किसी को कोई फर्क नही पड़ेगा..
आपके बदलने से..
आपके चाहने वाले थोड़ा हताश और निराश होंगे..
और कुछ दिनों बाद उन्हें आदत हो जाएगी..।
मगर आपका क्या होगा..??
क्या आप कभी..
स्वयं को आईने में देख पाएंगे..?
क्या आप कभी अकेले में..
स्वयं से नजरें मिला पाएंगें..?

खुद को देखिए जनाब..
आपको हो क्या गया है..??
कल तक आप सबके चहेते थे..
आज आपको हो क्या गया है..??

लोग नहीं बदलते..
हम ही बदल जाते है..
और हमें लगता है..
लोग बदल गए है..।



मैं..से मैं तक..

मैं,जो हूँ..
वो मैं होना चाहता हूँ..
वो,मैं..
मैं,कैसे होऊं..।
जबतक मैं,
वो मैं न होऊं..
तबतक बैचैन ही रहूंगा..
वो मैं,मैंकैसे होऊ..
इसका तो पता नही...
मगर उस मैं के अवरोधक को हटा दे..
तो शायद उस मैं तक जाने का पता चल जाये..

शनिवार, 8 अगस्त 2026

नी..

नी..
कंहा से शुरू करू..
तुम्हारी दास्तां..
वंही से शुरू करता हूँ..
तुम्हारी दास्तां..
जंहा पहली दफा देखा था..
तपती सुबह में,पेड़ की छावं में.
गिट्टी के ढेर पे.
मुहर वाले फ्रॉक में,
ब्रश मुँह में लिए.
ब्रश करते हुए देखा था पहली बार..।
हां पहली दफा तुम्हें देख के वो अहसास न हुआ..
मगर न जाने अक्सरहाँ तुम्हें देखते-देखते
वो अहसास कब होने लगा पता न चला..
नी कंहा से शुरु करू तुम्हारी दास्तां


(साभार - "नी" )


हम सोचते क्यों है..

आपने कभी सोचा है कि..
आप सोचते क्यों है.??
जरा सोचिए..🤔
तो क्या सोचा आपने..
चलिये हम बताते है..
कि हम क्यों सोचते है..
क्योंकि हमारे पास करने को कुछ नही है
या फिर हमारे पास करने को कुछ है..।



मगर हास्यपद ये है कि हम आज सोचते ही नही।
है न बड़ी बात..
क्या सच में ऐसा है..??
हरेक अंग का अपना-अपना काम है..
उसी तरह दिमाग का अपना काम है,सोचना..
अगर दिमाग नही सोचेगा..
तो इसका मतलब है कि दिमाग मे कुछ तो खराबी है..।

अब आप सोच रहें होंगे कि मैं क्या बोल रहा हूँ..
अगर ऐसा है..
तो घबराइए नही..
आपका दिमाग सही है..
क्योंकि आप सोच रहें है..😊।

मगर इससे भी बड़ी बात अब मैं,ये कहने जा रहा हूँ कि..
क्या आप वही सोचते है..
जो आपके लिए जरूरी है..?
या फिर आप वो सोचते है..
जो किसी के द्वारा सोचवाया जा रहा है..??
हां, हममें से अधिकांश लोग वो ही सोचते है,जो हमारे लिए जरूरी नही है..
हम सारा दिन व्यर्थ की बातें सोचते है,और उस सोच को सोशल मीडिया में विस्तारित करते है..जिससे किसी और का स्वार्थ सिद्ध होता है..और हमें अंततः वो सब सोच कर कुछ नही मिलता..।

आपने आखरी बार अपने बारे में कब सोचा था..??
और आज आपने क्या-क्या सोचा..??
या फिर आपने सोचा ही नहीं..?
अगर आपने सोचा ही नहीं, तो ये बड़ी समस्या है क्योंकि अब आपके सोच को कोई अप्रत्यक्ष तरीके से नियंत्रित कर रहा है..
और आज उसका सबसे बड़ा माध्यम सोशल मीडिया है..
ये आपको अजीब लग सकता है..
मगर यही वास्तविकता है..।
आप सफल व्यक्ति को देखें..
उनके दिनचर्या को देखें..
क्या वो सोशल मीडिया इस्तेमाल करते है..
अगर हां तो कितना..??
अगर आप भी सफल होना चाहते है तो..
एक सफल व्यक्ति की तरह ही अपने सफलता के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करें..न कि एक एडिक्ट की तरह..।

शायद आपको अभी भी कुछ समझ नहीं आया होगा..
अगर आया भी होगा..
तो आप कुछ नही कर सकते..
क्योंकि आपके पास अपना कोई उद्देश्य ही नही है..
अगर उद्देश्य है..
तो आप अभी से ही अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही..
सोशल मीडिया इस्तेमाल करेंगे..।

क्या आप अभी भी कुछ सोच रहे है..
अगर हां,
तो अच्छी बात है..😊
क्योंकि आप सोच रहें है..
क्योंकि हमारी सोच ही तो हमें औरों से अलग बनाता है..।


शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

माना कि..

माना कि मैं,
असफलता के बोझ से ढका हुआ हूँ..
मगर वो दिन दूर नही..
जब इन्ही असफलताओं के बोझ पर..
सफलता का सिंहासन लगाऊंगा..

क्योंकि जब मैं असफल हो सकता हूँ..
तो सफल भी जरूर होऊंगा..।



मुझे मत ढूंढो..।

मुझे मत ढूंढो..
मैं नही मिलूंगा..
क्योंकि में बहुत सूक्ष्म हूँ..।
और हर जगह विद्यमान हूँ..
तुम मुझे कंहा-कंहा ढूंढोगो..।

मुझे मत ढूंढो..
मैं नही मिलूंगा..
क्योंकि मैं बहुत विशालकाय हूँ..
न मेरा ओर है,
न ही मेरा छोर है..
इस जंहा में..
सिर्फ मैं ही, मैं व्याप्त हूँ..।

मुझे मत ढूंढो..
मैं नही मिलूंगा..
क्योंकि मैं कंही हूँ ही नही..
अगर हूँ,
तो तुम्हारे अहसास में..।
मुझे महसूस करो..
क्योंकि,मैं..
तुममें ही हूँ..
तुमसे ही हूँ..।
मुझे मत ढूंढो..
मैं नही मिलूंगा..।


गुरुवार, 6 अगस्त 2026

जब सारा शहर..

जब सारा शहर हंस रहा था..
तो मैं, मौन था..
जब सारा शहर उदास है..
तो मैं,मुस्कुरा रहा हूँ..।
मैं इसलिए नही मुस्कुरा रहा कि..
ये उदास है..
मैं इसलिय मुस्कुरा रहा हूँ कि..
यही तो सत्य है..
तो फिर इस सत्य से,
मुँह फेर के उदास क्यों होऊ मैं..
इसे स्वीकार कर..
क्यों न मुस्कुराऊँ मैं..।