जब भी हम शिव का नाम लेते है तो हमारे सामने एक मुस्कुराता हुआ ध्यानमग्न चेहरा आता है..जिसके जटा में गंगा विराजमान है,और मस्तक पे चंद्रमा है,और नीले गले मे सर्प और रुद्राक्ष की माला लिपटी हुई है..।मानो उन्हें कोई फर्क ही नही पड़ता..जबकि पूरा ब्रह्माण्ड उन्ही से व्यापत है..।
उनकी मौन मुस्कान आपसे सबकुछ वैसे ही छीन लेगा,जैसे त्रिनेत्र खुलने पर वो सबकुछ छीन लेते है..।।
क्या यही शिव का स्वरूप है..??
शायद बिल्कुल नही..
हमसब ने अपने-अपने अनुभव के अनुसार,उनके स्वरूप को गढ़ते चले गए..
शिव इतने वृहत और इतने सूक्ष्म है कि हम उन्हें देख नही सकते..हम सिर्फ उनमें एकाकार हो सकते है..।
शायद कुछ अभागे लोग उनसे एकाकार नही हो पाए होंगे, और उनकी अनुभूति उन छवियों में देख लिया होगा और जिस स्वरूप को हम आज देख रहे है..
शायद ढेर सारे लोगों की अनुभूतियों से "शिव" का ये स्वरूप बना होगा..
जिस स्वरूप को हम आज देख और पूज रहें है..।।
मगर शिव इन सबसे परे है..।
तो फिर शिव है कौन..??
शिव की चर्चा वेदों,उपनिषदों और पुराणों में मिलती है..
हमारे 108 उपनिषदों में से 14 उपनिषद शिव को समर्पित है...
इन उपनिषदो के द्वारा हमें " शिव कौन है" इसकी जानकारी हमें मिलती है..।
◆ कैवल्य उपनिषद के अनुसार -
" स ब्रह्मा स शिवः स हरिः
स इन्द्रः सोsक्षरः प्रमहः स्वराट।।"
शिव ही ब्रह्मा और विष्णु है,वही परम अक्षर और स्वयंप्रकाश सक्ता है..।
◆अथर्वशिखा उपनिषद के अनुसार-
"ॐकार एव भगवान् रुद्रः
तस्माद् ॐकारं नित्यं जपेत्॥"
ॐ ही रुद्र है,और रुद्र ही शिव है,और सृष्टि का मूल ध्वनि स्पंदन भी ॐ है..।
★शिव ही मूल नाद और कंपन है..।
◆अथर्वशीर्ष (रुद्र) उपनिषद के अनुसार -
"साक्षी चेताः केवलो निर्गुणश्च
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा॥"
शिव वो चेतना है जो सबकुछ देखती और करती है,लेकिन वो स्वयं किसी क्रिया में नही बंधती है..
★जो देख रहा है,वही शिव है..।
◆कालाग्निरुद्र उपनिषद के अनुसार -
"रुद्रः कालानां कालः।"
शिव समय से परे है..।
★जो समय से परे है वही शिव है..।
◆श्वेताश्वतर उपनिषद के अनुसार -
"एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थे।"
शिव एक है,इनके सिवा दूसरा कोई नही है।
◆बृहज्जाबाल उपनिषद के अनुसार -
"ज्ञानमेव मोक्षसाधनम्।"
ज्ञान ही मोक्ष(शिव) का साधन है..।
◆जाबाल उपनिषद के अनुसार -
"आत्मैव शिवो ज्ञेयः।"
आत्मा या स्वयं को जानना ही शिव है
★स्वयं को जानना ही, शिव को जानना है।
◆महानारायण उपनिषद के अनुसार -
"नारायणो रुद्रः।"
नारायण ही रुद्र है..।
◆पंचब्रह्म उपनिषद के अनुसार -
"सद्योजातं प्रापदामी वामदेवं सदाशिवं।"
मैं सृष्टि के आरम्भकर्ता,करुणामय रक्षक और शाश्वत कल्याणकारी शिव से मोक्ष की कामाना करता हूँ..।
★ सृष्टि की हर क्रिया ही शिव है।
◆ रुद्रहृदय उपनिषद के अनुसार -
"हृदयकमले मध्ये सदा शिवः प्रतिष्ठित:।"
शिव हृदयकमल के मध्य में विराजमान है..।
★ जो भीतर है,वही शिव है..।
◆दक्षिणामूर्ति उपनिषद के अनुसार -
"मौनव्याख्या प्रकटित परब्रह्मतत्त्वम्।"
जो मौन के द्वारा परमब्रह्म का बोध कराये वही शिव है।
★ मौन ही शिव है।
◆स्कन्द उपनिषद के अनुसार -
"शिवज्ञानात् परं नास्ति मोक्षसाधनमुक्तमं।"
शिव को जानने से बड़ा कोई मोक्ष का साधन नही है..।
★शिव ही मोक्ष है..
◆सर्वसार उपनिषद के अनुसार -
"सर्वशास्त्रसारं तत्त्वं शिव एव न संशयः।"
सभी शास्त्रों का सार तत्व शिव ही है..।
★ सबका सार शिव ही है..।
◆योगशिखा उपनिषद के अनुसार -
"योगेन चित्तशुद्धिः शिवसाक्षात्कारः।"
योग से चित्त की शुद्धि होती है और शिव का साक्षात्कार होता है।
★ योग का परमलक्ष्य शिव ही है..।
शिव को शास्त्रों और वेदों के अध्धयन से नही जान सकते क्योंकि इनकी एक सीमा है,और शिव हरेक सीमाओं से परे है..
तो फिर शिव को कैसे जान सकते है..??
शिव को जानने के लिए शिव होना होगा..।
ये उतना ही सरल है..
जितना फूलों का खिलना,चिड़ियों का चहचहाना..
हवाओं का बहना, बादल का बरसना..
ऋतुओं का बदलना,तारो का चमकना..
और हमारा आपका मुस्कुराना..।
ये जितना सरल है,उतना ही सरल शिव को जानना है..।
मगर..ये उतना ही कठिन है..
जितना दिन और रात का होना..
तारों का चमकना,बादल का बरसना,
फूलों का खिलना और हमारा आपका मुस्कुराना..।
शिव कौन है..??
ये सवाल ही गलत है..शिव कौन नही हैं..
या फिर शिव क्या नही हैं..ये सवाल होना चाहिए..।
यंहा शिव के सिवा कुछ और नही है..
सिर्फ शिव ही शिव हैं..
शिव के सिवा कुछ और नही है..
मैं भी शिव हूँ..
तू भी शिव है..
शिव ही शिव है..
शिव के सिवा कुछ और नही है..।
शिव ही शिव है..।।