रविवार, 6 सितंबर 2026

लियोनल मेसी..

खुद से पूछें क्या आज मैं कल से थोड़ा बेहतर हूं? जवाब अगर हां है, तो आप सही राह पर हैं..

​"जिंदगी हो या खेल, इंसान कभी पूरी तरह मुकम्मल नहीं होता। हर दिन आप कुछ नया सीखते हैं, कुछ नया खोजते हैं।"


 

मैंने फुटबॉल खेलना शुरू किया क्योंकि मुझे उससे मोहब्बत है। उस वक्त मुझे नहीं पता था कि एक दिन दुनिया मुझे देखेगी, मेरे नाम की मिसाल दी जाएगी या मैं विश्व कप जीतूंगा। मैं बस गेंद के पीछे भागता था। मेरे लिए फुटबॉल कोई नौकरी या शोहरत नहीं थी, वह मेरा शौक था, मेरी खुशी थी...। 

मैं बहुत छोटा था, शायद तीन-चार साल का, जब गेंद मेरे लिए दुनिया बन गई। मैं हर वक्त किसी ऐसे इंसान को तलाशता था, जिसके साथ फुटबॉल खेल सकूं। मुझे जीत-हार की ज्यादा फिक्र नहीं थी,मुझे बस खेलना था। घंटों तक गेंद को किक मारना, उसे अपने पैरों के करीब रखना और उसके साथ दौड़ना... यही मेरी दुनिया थी।

लोग कहते थे मैं बाकी बच्चों से अलग हूं। लोग मुझे देखने आते थे। बचपन में इसका एहसास नहीं था। मुझे कहां मालूम था कि मेरे अंदर ऐसा कुछ है, जो मुझे दूसरों से अलग बनाता है..? यह समझ धीरे-धीरे आई...।

​हर मुकाबला हमें कुछ न कुछ जरूर सिखाता है

हार हमें रोकने के लिए नहीं बल्कि, हमें खुद को समझने और निखारने का मौका देने के लिए आती है...।हर हार के बाद निराश होना स्वाभाविक है, लेकिन उसी मायूसी से बाहर निकलकर आगे बढ़ना ही असली हिम्मत है। जिंदगी में हर मुकाबला कुछ न कुछ जरूर सिखाता है..।

​आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है मैं जिस तरह पैदा हुआ, वह मेरे लिए ऊपर वाले का तोहफा था। मैंने यह हुनर खुद नहीं बनाया था..यह मिला थालेकिन सिर्फ हुनर मिलना काफी नहीं होता। असली इम्तिहान यह है कि आप उस तोहफे का क्या करते हैं..।

मैंने हमेशा कोशिश की कि जो मिला है, उसका पूरा फायदा उठाऊं..। हर दिन खुद को थोड़ा बेहतर बनाने की कोशिश करता हूँ..।

क्योंकि जिंदगी हो या खेल, इंसान कभी पूरी तरह मुकम्मल नहीं होता..हर दिन आप कुछ नया सीखते हैं। हर दिन अपने अंदर कुछ नया खोजते हैं..। मेरे खेल में भी कई चीजें ऐसी हुईं, जिन्हें मैंने पहले से तय नहीं किया था। कई बार मैदान पर बस एक पल आता है और शरीर खुद फैसला कर लेता है। सामने डिफेंडर होते हैं, रास्ता बंद होता है, लेकिन मैं आगे बढ़ता हूं। एक कदम, फिर दूसरा... और अचानक रास्ता निकलता है। शायद यही मेरा खेल है, गेंद को अपने पैरों के करीब रखना और उस पल पर भरोसा करना।

भरोसे के सहारे मैंने अपना सफर जारी रखा है। मैंने बहुत छोटी उम्र में घर छोड़ा। मैं अर्जेंटीना के रोसारियो से बार्सिलोना आया। यह आसान नहीं था। मैं एक बच्चा था। पीछे मेरा घर था, मेरा शहर था, मेरे अपने लोग थे। सामने एक नई जगह थी, नई जिंदगी थी और बहुत सारी अनजान चीजें... लेकिन खुद पर भरोसा था।

मुझे हुनर मिला, तो मैंने उसे तराशने की कोशिश की। मुझे मौके मिले, तो मैंने उन्हें गंवाने नहीं दिया। मुश्किलें आईं, उन्हें अपनी राह का हिस्सा माना। 

आप भी किसी सपने के पीछे भाग रहे हैं, तो खुद से एक सवाल पूछें कि...क्या मैं कल से थोड़ा बेहतर हूं..? अगर जवाब हां है, तो आप सही रास्ते पर हैं.. कामयाबी एक दिन में नहीं मिलती.. ये छोटे-छोटे कदमों से मिलती है।

ये लियोनल मेसी के कई इंटरव्यू का सार है(स्रोत- दैनिक भास्कर)..इन्होंने हाल ही में 31 अगस्त को सोशल मीडिया के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मैच से संन्यास की घोषणा की..



वो असाधारण थे,क्योंकि वो साधारण थे..चाहे खेल का मैदान हो या फिर खेल के मैदान के बाहर उनका बर्ताव हमेशा सौम्य और शांत रहता..वो कभी किसी को अहसाह नही होने देते की वो इस युग के सबसे बेहतरीन खिलाड़ियों में से एक है..बल्कि वो ये अहसास करवाते है कि वो हममें से एक है..।यही खासियत उन्हें औरों से अलग बनाता है..।



शनिवार, 5 सितंबर 2026

शिक्षक कौन है..

शिक्षक संस्कृत की 'शिक्ष' धातु से बना है जिसका अर्थ होता है,सीखना।
जब 'शिक्ष' धातु में 'क'(प्रत्यय) जुड़ जाता है तब शिक्षक बन जाता है,जिसका अर्थ होता है जो हमें सिखाता है..या किसी चीज का बोध कराता है..वो है शिक्षक..।

हमारे जीवन में कई शिक्षक आते है..और सबका हमारे जीवन मे अमूल्य योगदान होता है..।
चलिये आज उन शिक्षकों को जानते है..
जिन्हें हम शिक्षक के रूप में देखते ही नहीं..।


माता-पिता - ये हमारे पहले शिक्षक होते है..जो जिंदगी का नींव रखते है..
 यही हमारे अंदर संस्कार का बीज बोते है..।
दादा-दादी/नाना-नानी - ये हमारे दूसरे शिक्षक होते है,जो हमारे अंदर किस्से कहानियों के माध्यम से हमारे अंदर नैतिकता का बीजारोपण करते है..
मगर अफसोस आज आनेवाली पीढ़ी इनके शिक्षा से वंचित होते जा रहे है..।

बड़े भाई-बहन - ये हमारे तीसरे शिक्षक होते है,जो हमें बाहरी दुनिया से अवगत कराते है,क्या सही है,क्या गलत है ये अवगत कराते रहते है..मगर न जाने बड़े होने के बाद क्या हो जाता है..इनके बीच में खाईयां बढ़ जाती है..।

शिक्षक - इनका हमारे जीवन में अहम योगदान है..अगर ये न होते तो हम इंसान नही हो पाते..ये वो कलाकार होते है जो मूर्त को अमूर्त बनाते है..।

मित्र - ये वो शिक्षक है..जिनके पास पूरे ब्रह्मांड का ज्ञान है,इनके पास हरेक समस्या का समाधान है..अगर आपके पास इस तरह के एक भी शिक्षक नहीं है तो आपका जीवन नीरस और व्यर्थ है,..।

पति/पत्नी - ये वो शिक्षक है..जो आपको फर्श से अर्श पर ले जा सकती/ता है,या फिर अर्श से फर्श पे ला देगी/गा..ये वो शिक्षक है..जो कोई नहीं कर सकता वो,ये हमारे जिंदगी के साथ कर देते है..।ये आपके व्यक्तित्व को विस्तारित या फिर संकुचित कर देते है..।

पुस्तक :- एक अच्छी पुस्तक आपके जिंदगी में आमूलचूल परिवर्तन ला सकता है,कई ऐसे पुस्तक है जो अभी..।

मेंटर/कोच :- ये जिंदगी को सही दिशा देते है..ये हमारे खामियां को दूर करते है..कभी-कभी ये उत्प्रेरक का काम करते है..और जिंदगी को नई ऊंचाइयों पे ले जाने का काम करते है..।

गुरु - इनका स्थान सबसे ऊपर है..क्योंकि ये हमें हमसे ज्यादा जानते है..ये हमारे अंदर छुपे हुए उन पहलुओं से अवगत कराते है..जिससे हम ताउम्र अनभिज्ञ रहते है..।जब हम हताश और निराश होते है तब ये ही जिंदगी में प्रकाश बिखेरते है..।मगर गुरु को ढूंढना बहुत मुश्किल है..अपने आप को जबतक योग्य नहीं बनायेगें तबतक गुरु की कृपा नहीं हो पायेगा..।

वैसे शिक्षक कोई भी हो सकता है..क्योंकि शिक्षक का तात्पर्य ही है..जो हमें सिखाये, वही शिक्षक है..।


शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

दादी माँ और कृष्ण जन्माष्टमी..

कुछ लोग जिंदगी से तो चले जाते है..
मगर वो कई यादें छोड़ जाते है..।

ये पहली जन्माष्टमी होगा जो बिना दादी माँ के मनाऊंगा..
जब से होश संभाला हूँ..तबसे किसी-न-किसी तरह दादी माँ के साथ कृष्णजन्माष्टमी को मनाया ही है..।।


कुछ यादें जो कृष्णजन्माष्टमी से जुड़ी है..
मैं,दादी माँ,अमरूद का पेड़ और कृष्णजन्माष्टमी..
का एक अलग ही संबंध था..
आज न अमरूद का पेड़ है,और न ही दादी माँ रही..मगर जेहन में दोनों ही है..।


कंहा से शुरू करू.. वंही से शुरू करता हूँ जंहा से,मैं पेड़ पे चढ़ने के काबिल हो गया था..।
मेरे बड़े चाचा के आंगन में दो अमरूद के पेड़ थे..एक बहुत बड़ा था इतना बड़ा की पक्के अमरूद गिर के इतने नीचे गिरे रहते थे कि आप ये नही पता कर पाएंगे कि अभी पेड़ से कौन सा गिरा है..।

अमरूद इतने होते थे कि दादी माँ ने बेचना शुरू कर दिया 1₹ के चार अमरूद..पहले मेरी बड़ी बहन पेड़ पे चढ़ के तोड़ा करती थी..उसके कुछ सालों बाद मैंने चढ़ना शुरू किया..मैंने अपने दीदी को ही पेड़ पे चढ़ते हुए देख के चढ़ना सीखा है..।
सावन से ही अमरूद बिकना शुरू हो जाता था..घर के बगल में स्कूल था तो कई स्कूल के बच्चे भी अमरूद लेने आते थे..।जितना अमरूद बिकता उसका सारा पैसा दादी माँ के पास जमा होता था..हां उसमें से कभी-कभी 1-2₹ मिल जाया करता था कुछ खाने के लिए..हमलोग भी इतना ईमानदार थे कि दादी माँ के अनुपस्थिति में भी अमरूद बेचने पर वो पैसा दादी माँ को ही बाद में दिया करते थे..।

सावन खत्म होते ही भादो आता और भादो आते ही कृष्ण जन्माष्टमी आता, कृष्ण जन्माष्टमी से एक दिन पहले सारा पैसा गिना जाता और उसके बाद उन पैसों को सारे सदस्यों में बांटा जाता था..दरसल ये बंटवारा कार्य के हिसाब से नही बल्कि उम्र के हिसाब से होता था..किसी वर्ष 25₹ तो किसी वर्ष 30₹ भी मिलता था,जितना अमरूद बिकता था उसी हिसाब से, हमसबको कुछ न कुछ मिलता..।
और जो पैसा बच जाता, उस पैसा का दादी माँ घर के लिए कोई-न-कोई सामना ले लेती थी..कभी-कभी छठ का सूप भी इस पैसा से खरीदा जाता था..।
मगर हमलोगों को जितना पैसा मिलता वो मेला घूमने के लिए काफी था..।
ये सिलसिला तबतक चलता रहा जबतक में पढ़ने के लिए दरभंगा न आ गया..क्योंकि उसके बाद कोई अमरूद तोड़ने वाला था ही नही..।
मगर दादी माँ तब भी हरेक कृष्ण जन्माष्टमी को हमें कुछ न कुछ पैसा देती ही थी..क्योंकि बाबा को पेंशन जो मिलता था..30-40₹ दादी माँ दे ही देती थी..।
फिर जब मैने दरभंगा छोड़ दिया तो दादी माँ हरेक कृष्णजन्माष्टमी को फोन जरूर करती और खोज खबर लेती यंहा के माहौल के बारे में पूछती..।

मगर इस साल उनका कॉल नही आएगा..
क्योंकि वो पिछले साल ही छोड़ के चली गई..।

लोग चले तो जाते है..
मगर कई यादें छोड़ जाते है..
कुछ लोग उन यादों के सहारे उन्हें जिंदा रखते है..
तो कुछ लोग उन यादों को भूल कर उन्हें भूल जाते है..।


अपने बच्चों को कृष्ण के चरित्र से अवगत कराए..

अपने बच्चों को सिर्फ राधा कृष्ण के रूप में न सजाए..
बल्कि उन्हें राधा कृष्ण के चरित्र से भी अवगत कराएं..
वैसे पहले आप स्वयं अवगत हो जाये..।
क्योंकि आप स्वयं उनके चरित्र से अवगत नहीं है..
क्योंकि अगर आप उनके चरित्र से अवगत होते..
तो शायद आप कभी नही चाहते कि..
आपके बच्चों के ऊपर कृष्ण और राधा की परछाइयां भी पड़े..।




चलिये कुछ सवाल का जबाब दीजिए..

क्या आप चाहते कि बच्चे को जन्म देते ही उसे आपसे अलग कर दिया जाय..(कारगाह में जन्म के बाद माँ से अलग होना)

क्या आपके पास इतनी हिम्मत है कि जिस बच्चे को आपने बचपन से पाला-पोसा उसे ~11 साल के उम्र में मौत के मुँह में भेजे..।
(कंस के बुलावे पे वृंदावन छोड़कर मथुरा जाना..)

क्या आप चाहते कि आपके संतान को सबकुछ छोड़ करके एक जगह से दूसरे जगह जाना पड़े..(जरासंध के बार-बार आक्रमण करने के कारण मथुरा छोड़कर द्वारिका जाना)

क्या आप चाहते कि आपके संतान को उस चीज के लिए दोषी ठहराया जाय जो गलती उसने किया ही नही है..।(युद्ध समाप्ति के बाद गांधारी द्वारा युद्ध का दोषी ठहराना)

जरा सोचिए..
क्या आप अब भी चाहते है के आपके बच्चों के जिंदगी में इस तरह की कठिनाई आये..एक माँ होने के नाते आप कभी नही चाहेंगे..
मगर कृष्ण को श्रीकृष्ण इन्हीं कठिनाइयों ने बनाया..
उन्होंने हरेक चुनौतियों को स्वीकार किया और उनका सामना किया..
उन्होंने किसी के ऊपर दोसरोपन नही किया..न ही चुनौतियों से भागने का कोशिस किया..इसिलिय वो कृष्ण से श्रीकृष्ण बन पाए..।।

अपने बच्चों को कृष्ण के व्यक्तित्व से अवगत कराएं..
उन्हें चुनौतियों से सामना करना सिखाया..
न कि उसे गोल-मटोल गोपाल बनाकर उत्सव मनाए..।
इस जन्माष्टमी अपने बच्चों में कृष्ण के व्यक्तित्व का बीज बोए..
जो उन्हें आने वाले परिस्थितियों से सामना करने में मदद करें..।

मंगलवार, 1 सितंबर 2026

जिंदगी एक दौड़ है..

मैं जिंदगी के रेस में बहुत पीछे रह गया..
इसका मुझे मलाल नहीं..
कि मैं पीछे रह गया..
क्योंकि मुझे पता है..
जिंदगी में एक मोड़ तो आएगी..
जो मुझे फिर से बहुत आगे ले जाएगी..।

जिंदगी एक रेस नहीं..
जिंदगी एक दौड़ है..
रेस तो वक़्त-वे-वक़्त खत्म हो जाती है..
मगर दौड़ कभी खत्म नही होती..।



हौंसला रखिये..
चेहरे पे मुस्कान रखिये..
और खुद पे विश्वास रखिये..
तब देखिए..
भले ही आज आप रेंग रहे है,चल रहें है,या फिर दौड़ रहे है..
यही निरंतरता..
आपका एक दिन अपना दौड़ लाएगा..।

विश्वास रखिये..
क्योंकि आप जानते है..
अपने काबिलियत को पहचानते है..
गिर के फिर से उठ खड़ा होना जानते है..।।


रविवार, 30 अगस्त 2026

सबकुछ बदल रहा है..

लोग बदलते है..
जनाब लोग ही नही..
सबकुछ बदलता है..
जिससे आपको लगाव होता है..
उसके बदलाव का अहसास होता है..
जिससे लगाव नही होता है..
उसके बदलाव का अहसास नहीं होता है..।।

आपने खुद को सीमित ही इतना कर लिया है कि..
आपको सिर्फ कुछ लोगों का बदलने का अहसास होता है..
खुद को इतना विस्तारित करें..कि
हर क्षण ब्रह्मांड में हो रहे बदलाव का अहसास कर सकें...।
छोड़िए हटाइये खुद को इतना विस्तारित मत कीजिये..
खुद को इतना संकुचित कीजिये कि
अपने हृदय गति और सांसों में हो रहे बदलाव का अहसास हो सके..।

ये कैसे होगा..?
ये कैसे होगा नहीं,ये हर क्षण हो रहा है..
बस अपने आपको स्थिर करके देखना है..।।
खुद के अंदर सांसों के सहारे गोता लगाइए..
और सांसों के सहारे बाहर आइए..
तबतक गोता लगाते रहिये जबतक वो मिल न जाये...
जिसकी आपको तलाश है..।




शनिवार, 29 अगस्त 2026

इच्छाएं

मेरी कोई इच्छाएं नहीं है..
सारी इच्छायें जैसे मर चुकी है..
या फिर ये सब चीज तुच्छ लगने लगी है..
जब अपने अतीत में झांकता हुए बहुत पीछे जाता हूँ..
तब अहसास होता है कि मेरी कोई इच्छायें क्यों नही है..।
मैंने अपने अतीत में वो सब चीज का उपभोग किया है..
जो विश्व की 0.10% लोग ही उपभोग कर पाते है..
बड़ी मुश्किल से छुटकारा पाया..
मगर अभी भी एक चीज से छुटकारा नही पा रहा हूँ..
शायद इस जन्म उससे भी छुटकारा पा लूंगा..
और उस उच्चतम स्तर को छू पाऊंगा..
या फिर उसमें विलीन हो पाऊंगा..।
फिलहाल तो कोई आसार नही दिख रहें..
मगर बदलाव शुरू हो चुके है..😊

लियोनल मेसी..