बुधवार, 19 अगस्त 2026

मुझे लगा मेरी अहमियत कुछ तो होगा..
उनके जिंदगी में..
मगर में गलत था..।
उनके लिए शायद में नहीं..
कुछ और अहमियत रखता है..।

रविवार, 16 अगस्त 2026

थोड़ा कठिन है..

अगर आप चाहते है कि लोग आपको पसंद करें..

तो पहले आप,

लोगों को पसंद करना शुरू कीजिए..

अपने शर्तों पे नहीं..

बल्कि वो जैसे है..

वैसे ही,

पसंद करना शुरू कीजिए..।।


थोड़ा कठिन है..

थोड़ा नही बहुत कठिन है..।

मगर जब आप किसी को उसके ही शर्तों पे पसंद करना शुरू करते है..

तो,वो भी..

आपके शर्तों का ख्याल रखना शुरू कर देते है..😊।



कुछ नियम बनाये थे मैंने अपने लिए..

मैं अपने ही बनाये हुए नियम को..
तोड़ता हूँ अपने लिए..।
जब नियम को तोड़ कर तार-तार कर देता हूँ..
तब ख्याल आता है कि..
ये नियम बनाया था 
मैंने अपने लिए..।




अक्सरहाँ इन बातों को दरकिनार कर आगे बढ़ जाता हूँ..
मगर कभी तो रुकना होगा..
और इन बातों का ख्याल करना होगा..।

जो नियम बनाये थे मैंने..
अपने भले के लिए..
तो भला कबतक,
नियम को दरकिनार कर आगे बढ़ता रहूंगा..।
कभी तो रुकूँगा..
और अपने बनाये नियम पे चलूंगा..
शायद वो वक़्त अब आ गया है..
अपने बनाये नियम को दृढ़ता से अनुसरण करने का..।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

आखिर कबतक..

तुम ढूंढते हो उसे..
जिसे तुम्हारी कद्र ही नहीं..
तुम भटकते हो..
उसके लिए..
जिसे तुम्हारी फिक्र ही नही..।
आखिर कबतक सबकुछ खबर होते हुए भी..
बेखबर बने रहोगे..।



हम क्यों किसी के बारे में सोचते है..

हम क्यों किसी के बारे में सोचते है..??
सच कहूं तो आप निकम्मे और निठल्ले हो😊..
इसिलिय आप किसी के बारे में सोचते है..
खुद को इतना समय क्यों देते है..
कि आप किसी के बारे में सोचे..।
अपने जिंदगी को उद्देश्यपरक बनाये..
और पूरा समय उसमें लगाए..
तब देखिए आप कैसे किसी के बारे में सोचते है..
जबतक उद्देश्यहीन जिंदगी जीते रहेंगे..
तबतक हम यू ही..
किसी और के बारे में सोचते रहेंगे..।
खुद को व्यस्त रखें..
अपने उद्देश्य की पूर्ति में..
अगर कोई उद्देश्य नही है..
तो अभी बनाये..
अन्यथा जिंदगी यू ही..
दूसरों के बारे में सोचते-सोचते खत्म हो जाएगा..।



गुरुवार, 13 अगस्त 2026

मन भटक रहा है..

मन भटक रहा है..
क्यों..??
ये सवाल नया नही,
सदियों पुराना है..
मन भटक रहा है..।
आखिर भटकेगा क्यों नहीं..
क्योंकि उसे खुला छोड़ जो रखा है..।



क्या करें, कैसे करें..
कैसे इसे नियंत्रित करें..??
इसे नियंत्रण करना आसान कंहा है..
ये तो बिना लगाम के घोड़े के समान स्वछंद है..
इसके लगाम को जितना जकड़ने की कोशिश करेंगे..
ये उतना ही उलझन बढ़ाता जाएगा..।

फिर आखिर क्या करें,कैसे करें..??
कुछ नहीं..
बस अपने उद्देश्य को ढूंढिए..
और उसके पूर्ति के लिए लग जाइये..
और अपने मन को भी वंही लगाइए..।
क्योंकि हमारा मन भी तो..
किसी उद्देश्य के लिए ही भटक रहा है..
उसे सार्थक उद्देश्य की पूर्ति में लगाइए..।
न कि बेवजह के उद्देश्य में उसे उलझाइये..
जबतक बेवजह के उद्देश्य में उसे उलझाइयेगा
तबतक वो यू ही भटकता रहेगा..
खुद से ही सार्थक उद्देश्य को तलाशता रहेगा..।।

मन भटक रहा है..
मगर वास्तविकता तो कुछ और है..
हम ही भटक रहे है..
मन तो अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए भटक रहा है..।
हम क्यों भटक रहे है..?
जिस रोज हम अपने उद्देश्य की पूर्ति में लग जाएंगे..
उस रोज मन भी तादात्म्य बिठाकर उद्देश्य पूर्ति में लग जायेगा..।
जिस रोज उद्देश्य निर्रथक लगने लगेगा..
फिर से मन भटकने लगेगा..।

मन भटक रहा है..।

कुछ लिखने का मन करता है..

कुछ लिखने को मन करता है..
मगर लिखने से ड़र लगता है..।
कंही मेरी लेखनी..
किसी को सुई की तरह न चुभ जाये..
या फिर किसी को समझ ही न आये..
दोनों में खतरा है..
भला ये खतरा कौन मोल उठाये..।


कुछ लिखने का मन करता है..
मगर लिखने से डर लगता है..
क्योंकि आजकल कौन पढ़ता है..
और किसको इतनी समझ है..कि
किसी की लेखनी को समझ पाए..
हम वही समझ पाते है..
जो पढ़ पाते है..
मगर उस लेखनी के उस पार झांक नही पाते..।

कुछ लिखने को मन करता है..
मगर लिखने से ड़र लगता है..
क्योंकि शब्दों के मायाजाल में कोई फंसकर..
यू ही गुमराह न हो जाये..
क्योंकि सही राह चलना बड़ा दुष्कर है..
गलत राह पर तो हम चल ही रहें है..।

कुछ लिखने को मन करता है..
मगर लिखने से ड़र लगता है..
क्योंकि..
मेरी लेखनी किसी को समझ आएगा कि नही..
या फिर मैं कुछ ऐसा लिख भी पाऊंगा की नही..
जो सार्थक हो,सामर्थ्य हो,समृद्ध हो..
शायद यही सब सोचकर लिखने से डर लगता है..।

कुछ लिखने को मन करता है..
मगर लिखने से ड़र लगता है..