बहुत दिनों बाद कोई सपना देखा जो याद रहा..अक्सरहाँ हम वही सपने देखते है जो हमारे अंतस मन मे संचित रहता है..।
आज मैंने सुबह- सुबह देखा कि कुछ लोग को निमंत्रण दिया गया था..
मगर कुछ लोग बहुत देर से आ रहे थे तो किसी ने उनलोगों को कहा कि अब कंहा सब खा पी लिये अब कंहा जा रहे हो..वो लोग वापस चले गए..और मैं सड़क पर खड़े होकर उन्हें देख रहा था..।
फिर कुछ देर के बाद देखता हूँ कि पापा सबको खाने के लिए बुला रहे है,जिनलोगों को हमलोग ने निमंत्रण नही दिया था,बल्कि कोई और ने दिया था..पापा उनलोगों को भी बुला लाये..
मुझे ये देखकर गुस्सा आया कि घर मे कुछ खाने को है नही और पापा ने सबको बुला लिया..
सबको बिठाया गया और खाना परोसा गया..
दाल बहुत कम था..
मगर सबको हो गया..।
सबको अच्छे तरह से हो गया..।
और मेरा नींद खुल गया..।।
जब नींद खुला तो मेरे सामने दो सवाल उपजे..।
1. मुझे पापा पे गुस्सा क्यों आया..?
-मैंने सिर्फ एक पहलू देखा,पापा के भावनाओं को समझता तो शायद गुसा नही आता..।
2.मुझे भगवान पर आस्था क्यों नहीं रहा..??
- मैं ये सोचने लगा कि आखिर मुझे भगवान पर विश्वास क्यों नही रहा..?
मैंने ये सपना क्यों देखा..??
शायद एक-दो रोज से भोज का माहौल था शायद इसलिए देखा..।