गुरुवार, 9 जुलाई 2026

हम चले थे जिसे ढूंढने..

हम चले थे जिन्हें ढूंढने..
उनका कोई पता नहीं है..
जो पता है भी,
उस पता पे,
उनका कोई पता नही है..।
हां उस पता पे उनके होने का,
कुछ अहसास तो है..।

हम जिसे खंगाल रहें थे..
वेद,पुराण ग्रंथों में,
उसमें,उनके होने का कोई प्रमाण नही है..
मगर उनका अहसास तो है..।

क्या वो है..??
ये सवालिया निशान ही..तो,
उनके होने का प्रमाण है..।
 
हमारी क्षमता ही सीमित है..
और वो असीमित है..
इसीलिए सिर्फ उनके होने का अहसास है..
जिस रोज हमारी क्षमता विस्तृत हो जाएगी..
उस रोज उनसे मुलाकात हो जाएगी..।।

हम चले थे जिन्हें ढूंढने..
उनका कोई पता नहीं है..
जो पता है भी,
उस पता पे,
उनका कोई पता नही है..।
हां उस पता पे उनके होने का,
कुछ अहसास तो है..।



बुधवार, 8 जुलाई 2026

तुम सागर हो..

तुम सागर हो..
मैं बारिश की बूंद हूँ..
मैं तुझसे ही निकलकर..
तुझमें ही हर बार मिल जाता हूँ..।
तुम सागर हो..
मैं बारिश की बूंद हूँ..।

बिना तेरे मेरा क्या अस्तित्व है..
मगर जब-जब मैं,
संघनित होता हूँ..
अपना अस्तित्व ही भूल जाता हूँ..।
लील जाता हूँ..
कई नदियों,तालाबों और मैदानों को..
और फिर तुममें ही..
समाहित हो जाता हूँ..।
तुम सागर हो..
मैं बारिश की बूंद हूँ..।



मंगलवार, 7 जुलाई 2026

दूरियां..

कभी-कभी दूरियां बनाना भी बेहतर है..
जिससे उन्हें, हमारी कमियां का अहसास हो..।
क्या सच में,
उन्हें हमारी कमियां का अहसास भी होगा..
अगर होगा..
तो वो ढूंढते-ढूंढते जरूर आएंगे..।

चलो एक बार देखते है..
उनसे दूरियां बनाके..
और ये अहसास करके..
क्या उनके भी जिंदगी में..
मेरी कुछ अहमियत है भी,या नही..।

सोमवार, 6 जुलाई 2026

फ़िल्म "सतलुज"..

कहते है फ़िल्म समाज का आइना होता है..
सब फ़िल्म तो नही मगर कुछ फिल्में जरूर होते है,उन्ही में से एक फ़िल्म है "सतलुज''...।

इसे बने 3 साल हो गए थे मगर CBFC ने 121 कट लगाए और फ़िल्म का नाम(पंजाब 95) बदलने को कहा..
मगर मेकर और दिलजीत दोसांझ नही माने..
और इसे 3जुलाई 2026 को Zee_5 OTT पे रिलीज किया और 6 जुलाई को किसी कारणवश हटा दिया गया..।

ये फ़िल्म 90 के दशक के पंजाब के हालात दिखा रहे है,कैसे उस समय के हालात थे,ये फ़िल्म बैंक कर्मचारी और मानवाधिकार कार्यकर्ता "जसवंत सिंह खालरा' जी के ऊपर है..उन्होंने किस तरह सरकार और प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाया और इस मामले को दुनिया के सामने लाया..मगर अफसोस वो दोनों कंही गुम गए..।
ये फ़िल्म उन्हीं के दास्तां को बयां कर रही है..।




ये फ़िल्म प्रशासन और सरकार की वो क्रूरता को दिखाता है जिसे आम आदमी कभी बयां नही कर पाता,क्योंकि जिसके साथ क्रूरता होता है,वो कुछ बयां करने के लिए बचता ही नही..।।

सरकार और प्रशासन ने अपनी क्रूरता को छुपाने के लिए #सतलुज फ़िल्म को OTT से हटा दिया है..।।

लोग बदलते है..पद,प्रतिष्ठा नही..आज की सरकार भी वही कर रही है..जो 90के दशक में कर रही है..।।

पंजाब की भोगौलिक स्थिति ही ऐसी है,जिस कारण उसे सदियों से आक्रांताओं का सामना करना पड़ा है..पंजाब और पंजाब के लोग वो पहरेदार है,जो अपने लहू बहाकर सदियों से भारत की पहरेदारी कर रहे है..
मगर उन्हें मिला क्या..??

जब सारा देश आजादी का जश्न मना रहा था..
तब पंजाब खून से लतपथ लाशों में अपनों को ढूंढ रहा था..।
फिर कभी..।।

शनिवार, 4 जुलाई 2026

तुमसे भी बेहतर..

तुमसे भी बेहतर हैं,
कई इस जंहा में..
तुम्हीं गलतफहमी पाले हुए हो..
मुझसे बेहतर कौन है..
इस जंहा में..?

कोई बेहतर नही है..इस जंहा में
सब में,कुछ-न-कुछ कमियां होता ही है..
इस जंहा में..

कुछ लोग अपने कमियों को दरकिनार कर..
अपने खूबियों को निखार कर..
आगे निकल जाते है..
और..
औरों से बेहतर बन जाते है..।

तुमसे भी बेहतर हैं,
कई इस जंहा में..
तुम्हीं गलतफहमी पाले हुए हो..
मुझसे बेहतर कौन है..
इस जंहा में..।



कंहा है आशियाना मेरा .


कंहा है..
आशियाना मेरा..
जंहा कल था..
वंहा आज कुछ और है..
कंहा है आशियाना मेरा..।

मैं यू ही ढूंढ रहा हूँ..
उस आशियाने को..
जो मेरा कभी, था ही नही..।

क्या मैं उतनी दूरी तय कर..
आशियाना बनाने आया हूँ...??
या फिर उस मुकम्मल..
आशियाने को पाने आया हूँ..
जिसे पाकर..
किसी आशियाने की चाह न रह जाये..।


शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

जिंदगी के दौड़ में..

मैं जिंदगी के दौर में बहुत पीछे रह गया हूँ..
मगर मुझे उम्मीद अभी भी है..।
कोई मोड़ तो आएगा..
जो मुझे सबसे आगे ले जाकर खड़ा कर जाएगा..।

मगर वो मोड़ कब आएगा..
इसका कोई पता नही..
मगर वो मोड़ जरूर आएगा..।

बस मुझे सजग और सतर्क रहना है..
कंही वो मोड़ गलती से छूट न जाये..
नही तो..
मैं जिंदगी के दौड़ में पीछे ही रह जाऊंगा..।।