रविवार, 13 सितंबर 2026

हमें लगता है..

हमें लगता है..
हम अच्छे है..।
ये अच्छा लगना ही..
सबसे बुरा है..।
जब-जब आपको..
अच्छे होने का भान हो..
तो समझ लीजिए..
आपमें अभी भी..
ढेर सारी कमियां है..।।

दूसरों में कमियां देखना..
आसान है..
और खुद की कमियां..
दूर करना दूभर है..।
जबतक आपमें..
कमियां रहेगी..
तबतक आपको, 
दूसरों में कमियां दिखती रहेगी..।




शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

जरा सोचिएगा..आपके हाथ मे कौन सा कलम है..

•भारत आज विश्व की 5वी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में से एक है..
•क्रय शक्ति(purchasing power) के अनुसार तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है..
•GDP ग्रोथ के अनुसार सबसे तेज ग्रोथ करनेवालों देशों में सबसे ऊपर है..।
•जनसंख्या में विश्व मे पहले पायदान पर है..।
•सैन्य शक्ति में विश्व मे चौथा स्थान है..।
•मैन्युफैक्चरिंग में विश्व मे पांचवा स्थान है..(~विश्व का 3%)
•वैश्विक निर्यात में (गुड्स और सर्विस) WTO के अनुसार ~12-14वाँ स्थान..
•वैश्विक आयात में(गुड्स और सर्विस) WTO के अनुसार ~8-10वॉ स्थान..
नवीनकरणीय ऊर्जा में विश्व मे 3रा स्थान..

ये सब सुनकर पढ़कर गौरवान्वित महसूस करते है हम..।
मगर क्या आपको पता है..??
आप जिस पेन से लिखते है..
या लिख रहे है..क्या वो "मेड इन इंडिया" है..?


हमारा इस और कभी ध्यान ही नही जाता..
मेरा भी नही जाता..
मगर अचानक लिखते वक्त मेरा ध्यान पेन के ढक्कन पर गया जिसपर जापान लिखा था..।
शायद इस पेन ने इसलिए लिखने की दुःसाहस की,क्योंकि ये महंगी थी..।
मगर बाजार में जितने भी लोकप्रिय पेन है,जिसका आप नाम जानते है..
वो अपने देश का नाम नहीं लिखते..
शायद इसलिए की कंही हमें तकलीफ न हो..
कि विश्व के 5वी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश आज भी दूसरे देशों का बनाये हुए पेन का इस्तेमाल करता है..।।

क्या आपको पता है..??
भारत मे राइटिंग इंस्ट्रूमेंट का बाजार ~4500-5500 करोड़ का है (600-700 मिलियन $) जोकि संगठित मार्केट का वैल्यू है,अगर असंगठित(बिना ब्रांड) को जोड़ेंगे तो ये वैल्यू इससे भी बड़ा है..।।

आपको जानकर हैरानी होगी कि.. ~40-45% हिस्सेदारी प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से विदेशी कंपनियों का है..।

आपको ये जानकर और हैरानी होगी..कि ~25% पूरे मार्केट में हिस्सेदारी रखने वाला cello भारतीय कंपनी नहीं है..है न थोड़ा अजीब क्या cello भारतीय कंपनी नही है..?? हां अब नही है..2015 में फ्रांस की कंपनी(societe BIC) ने इसका अधिग्रहण कर लिया..।

चलिये एक और झटका देता हूँ..
जब भी एक स्लिम पतली पेन का नाम लिया जाएगा तो सबसे पहले Reynolds का नाम आएगा..
क्या आपको पता है..??
ये पेन कंहा की है..?
ये पेन अमेरिकन है..।
एक और नाम है..
जिसका नाम अक्सरहाँ हम गौरवान्वित होकर लेते है..
"Parker" ये भी अमेरिकन पेन ही है..
दोनो पेन "newell Brands(USA)" के द्वारा ही बनाया जाता है।।

भारत मे 100₹ से ऊपर बिकने वाली 90% कलम भारतीय नही है..उसपर विदेशी कंपनी का एकाधिकार है..।

आपका इनमें से फेवरेट पेन कौन सा है..??
Reynolds, Pilot,Cello, Schneider, Uni-ball, Parker, Montblanc, Lamy,  Cross, sheaffer..



क्या इनमें से कोई फेवरेट पेन है आपका..??
अगर हां..
तो आप देशभक्त नही है..😊क्योंकि ये सभी पेन विदेशी है..।।

तो फिर सवाल उठता है कि मेड इन इंडिया पेन कौन सा है..??
तो है कुछ लोकप्रिय कलम जो 100% मेड इन इंडिया है..
Linc , Flair, GM pens(Rorito)..
आपका इनमें से कौन सा फेवरेट है..??

अगली बार जब लिखियेगा तो सोचिएगा..
क्या आपके हाथ मे जो पेन है,क्या को इंडियन है..।।






मेरी बागडोर अब तुम्हीं संभालो

मेरी बागडोर अब तुम्हीं संभालो..
पहले भी मेरी बागडोर तुम्हारे ही हाथ में था..
मगर मैं नासमझ,समझ न पाया..
तुम्हारे इस रहस्य को जान न पाया..
यू ही जस्तज़ु करता रहा..
मगर क्या हासिल हुआ..।
आज वो देखा जिसे देख के सब समझ गया..
मेरी बागडोर पहले भी तुम्हारे हाथ मे था..
अब भी तुम्हारे ही हाथ मे है..
मगर मेरी ना समझी के कारण..
आपने बागडोर ढीला छोड़ दिया..
और में यू ही..भटकता रहा,और भटक रहा हूँ..
अब मेरी बागडोर कस के पकड़ो..
जिस तरह अर्जुन का बागडोर संभाले थे..
अब मेरा भी बागडोर संभालो..।
इतना सामर्थ्य दो..
की पूर्ण समर्पण कर पाऊं..
आप में और खुद का भेद मिटा पाऊं..।
मेरी बागडोर अब तुम्हीं संभालो..।


रविवार, 6 सितंबर 2026

काबिल बनने का मन करता है..

यार काबिल बनने का मन करता है..
इतना काबिल कि..
आईने में खुद को देख के..
गौरवान्वित महसूस कर सकूँ..।


लियोनल मेसी..

खुद से पूछें क्या आज मैं कल से थोड़ा बेहतर हूं? जवाब अगर हां है, तो आप सही राह पर हैं..

​"जिंदगी हो या खेल, इंसान कभी पूरी तरह मुकम्मल नहीं होता। हर दिन आप कुछ नया सीखते हैं, कुछ नया खोजते हैं।"


 

मैंने फुटबॉल खेलना शुरू किया क्योंकि मुझे उससे मोहब्बत है। उस वक्त मुझे नहीं पता था कि एक दिन दुनिया मुझे देखेगी, मेरे नाम की मिसाल दी जाएगी या मैं विश्व कप जीतूंगा। मैं बस गेंद के पीछे भागता था। मेरे लिए फुटबॉल कोई नौकरी या शोहरत नहीं थी, वह मेरा शौक था, मेरी खुशी थी...। 

मैं बहुत छोटा था, शायद तीन-चार साल का, जब गेंद मेरे लिए दुनिया बन गई। मैं हर वक्त किसी ऐसे इंसान को तलाशता था, जिसके साथ फुटबॉल खेल सकूं। मुझे जीत-हार की ज्यादा फिक्र नहीं थी,मुझे बस खेलना था। घंटों तक गेंद को किक मारना, उसे अपने पैरों के करीब रखना और उसके साथ दौड़ना... यही मेरी दुनिया थी।

लोग कहते थे मैं बाकी बच्चों से अलग हूं। लोग मुझे देखने आते थे। बचपन में इसका एहसास नहीं था। मुझे कहां मालूम था कि मेरे अंदर ऐसा कुछ है, जो मुझे दूसरों से अलग बनाता है..? यह समझ धीरे-धीरे आई...।

​हर मुकाबला हमें कुछ न कुछ जरूर सिखाता है

हार हमें रोकने के लिए नहीं बल्कि, हमें खुद को समझने और निखारने का मौका देने के लिए आती है...।हर हार के बाद निराश होना स्वाभाविक है, लेकिन उसी मायूसी से बाहर निकलकर आगे बढ़ना ही असली हिम्मत है। जिंदगी में हर मुकाबला कुछ न कुछ जरूर सिखाता है..।

​आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है मैं जिस तरह पैदा हुआ, वह मेरे लिए ऊपर वाले का तोहफा था। मैंने यह हुनर खुद नहीं बनाया था..यह मिला थालेकिन सिर्फ हुनर मिलना काफी नहीं होता। असली इम्तिहान यह है कि आप उस तोहफे का क्या करते हैं..।

मैंने हमेशा कोशिश की कि जो मिला है, उसका पूरा फायदा उठाऊं..। हर दिन खुद को थोड़ा बेहतर बनाने की कोशिश करता हूँ..।

क्योंकि जिंदगी हो या खेल, इंसान कभी पूरी तरह मुकम्मल नहीं होता..हर दिन आप कुछ नया सीखते हैं। हर दिन अपने अंदर कुछ नया खोजते हैं..। मेरे खेल में भी कई चीजें ऐसी हुईं, जिन्हें मैंने पहले से तय नहीं किया था। कई बार मैदान पर बस एक पल आता है और शरीर खुद फैसला कर लेता है। सामने डिफेंडर होते हैं, रास्ता बंद होता है, लेकिन मैं आगे बढ़ता हूं। एक कदम, फिर दूसरा... और अचानक रास्ता निकलता है। शायद यही मेरा खेल है, गेंद को अपने पैरों के करीब रखना और उस पल पर भरोसा करना।

भरोसे के सहारे मैंने अपना सफर जारी रखा है। मैंने बहुत छोटी उम्र में घर छोड़ा। मैं अर्जेंटीना के रोसारियो से बार्सिलोना आया। यह आसान नहीं था। मैं एक बच्चा था। पीछे मेरा घर था, मेरा शहर था, मेरे अपने लोग थे। सामने एक नई जगह थी, नई जिंदगी थी और बहुत सारी अनजान चीजें... लेकिन खुद पर भरोसा था।

मुझे हुनर मिला, तो मैंने उसे तराशने की कोशिश की। मुझे मौके मिले, तो मैंने उन्हें गंवाने नहीं दिया। मुश्किलें आईं, उन्हें अपनी राह का हिस्सा माना। 

आप भी किसी सपने के पीछे भाग रहे हैं, तो खुद से एक सवाल पूछें कि...क्या मैं कल से थोड़ा बेहतर हूं..? अगर जवाब हां है, तो आप सही रास्ते पर हैं.. कामयाबी एक दिन में नहीं मिलती.. ये छोटे-छोटे कदमों से मिलती है।

ये लियोनल मेसी के कई इंटरव्यू का सार है(स्रोत- दैनिक भास्कर)..इन्होंने हाल ही में 31 अगस्त को सोशल मीडिया के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मैच से संन्यास की घोषणा की..



वो असाधारण थे,क्योंकि वो साधारण थे..चाहे खेल का मैदान हो या फिर खेल के मैदान के बाहर उनका बर्ताव हमेशा सौम्य और शांत रहता..वो कभी किसी को अहसाह नही होने देते की वो इस युग के सबसे बेहतरीन खिलाड़ियों में से एक है..बल्कि वो ये अहसास करवाते है कि वो हममें से एक है..।यही खासियत उन्हें औरों से अलग बनाता है..।



शनिवार, 5 सितंबर 2026

शिक्षक कौन है..

शिक्षक संस्कृत की 'शिक्ष' धातु से बना है जिसका अर्थ होता है,सीखना।
जब 'शिक्ष' धातु में 'क'(प्रत्यय) जुड़ जाता है तब शिक्षक बन जाता है,जिसका अर्थ होता है जो हमें सिखाता है..या किसी चीज का बोध कराता है..वो है शिक्षक..।

हमारे जीवन में कई शिक्षक आते है..और सबका हमारे जीवन मे अमूल्य योगदान होता है..।
चलिये आज उन शिक्षकों को जानते है..
जिन्हें हम शिक्षक के रूप में देखते ही नहीं..।


माता-पिता - ये हमारे पहले शिक्षक होते है..जो जिंदगी का नींव रखते है..
 यही हमारे अंदर संस्कार का बीज बोते है..।
दादा-दादी/नाना-नानी - ये हमारे दूसरे शिक्षक होते है,जो हमारे अंदर किस्से कहानियों के माध्यम से हमारे अंदर नैतिकता का बीजारोपण करते है..
मगर अफसोस आज आनेवाली पीढ़ी इनके शिक्षा से वंचित होते जा रहे है..।

बड़े भाई-बहन - ये हमारे तीसरे शिक्षक होते है,जो हमें बाहरी दुनिया से अवगत कराते है,क्या सही है,क्या गलत है ये अवगत कराते रहते है..मगर न जाने बड़े होने के बाद क्या हो जाता है..इनके बीच में खाईयां बढ़ जाती है..।

शिक्षक - इनका हमारे जीवन में अहम योगदान है..अगर ये न होते तो हम इंसान नही हो पाते..ये वो कलाकार होते है जो मूर्त को अमूर्त बनाते है..।

मित्र - ये वो शिक्षक है..जिनके पास पूरे ब्रह्मांड का ज्ञान है,इनके पास हरेक समस्या का समाधान है..अगर आपके पास इस तरह के एक भी शिक्षक नहीं है तो आपका जीवन नीरस और व्यर्थ है,..।

पति/पत्नी - ये वो शिक्षक है..जो आपको फर्श से अर्श पर ले जा सकती/ता है,या फिर अर्श से फर्श पे ला देगी/गा..ये वो शिक्षक है..जो कोई नहीं कर सकता वो,ये हमारे जिंदगी के साथ कर देते है..।ये आपके व्यक्तित्व को विस्तारित या फिर संकुचित कर देते है..।

पुस्तक :- एक अच्छी पुस्तक आपके जिंदगी में आमूलचूल परिवर्तन ला सकता है,कई ऐसे पुस्तक है जो अभी..।

मेंटर/कोच :- ये जिंदगी को सही दिशा देते है..ये हमारे खामियां को दूर करते है..कभी-कभी ये उत्प्रेरक का काम करते है..और जिंदगी को नई ऊंचाइयों पे ले जाने का काम करते है..।

गुरु - इनका स्थान सबसे ऊपर है..क्योंकि ये हमें हमसे ज्यादा जानते है..ये हमारे अंदर छुपे हुए उन पहलुओं से अवगत कराते है..जिससे हम ताउम्र अनभिज्ञ रहते है..।जब हम हताश और निराश होते है तब ये ही जिंदगी में प्रकाश बिखेरते है..।मगर गुरु को ढूंढना बहुत मुश्किल है..अपने आप को जबतक योग्य नहीं बनायेगें तबतक गुरु की कृपा नहीं हो पायेगा..।

वैसे शिक्षक कोई भी हो सकता है..क्योंकि शिक्षक का तात्पर्य ही है..जो हमें सिखाये, वही शिक्षक है..।


शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

दादी माँ और कृष्ण जन्माष्टमी..

कुछ लोग जिंदगी से तो चले जाते है..
मगर वो कई यादें छोड़ जाते है..।

ये पहली जन्माष्टमी होगा जो बिना दादी माँ के मनाऊंगा..
जब से होश संभाला हूँ..तबसे किसी-न-किसी तरह दादी माँ के साथ कृष्णजन्माष्टमी को मनाया ही है..।।


कुछ यादें जो कृष्णजन्माष्टमी से जुड़ी है..
मैं,दादी माँ,अमरूद का पेड़ और कृष्णजन्माष्टमी..
का एक अलग ही संबंध था..
आज न अमरूद का पेड़ है,और न ही दादी माँ रही..मगर जेहन में दोनों ही है..।


कंहा से शुरू करू.. वंही से शुरू करता हूँ जंहा से,मैं पेड़ पे चढ़ने के काबिल हो गया था..।
मेरे बड़े चाचा के आंगन में दो अमरूद के पेड़ थे..एक बहुत बड़ा था इतना बड़ा की पक्के अमरूद गिर के इतने नीचे गिरे रहते थे कि आप ये नही पता कर पाएंगे कि अभी पेड़ से कौन सा गिरा है..।

अमरूद इतने होते थे कि दादी माँ ने बेचना शुरू कर दिया 1₹ के चार अमरूद..पहले मेरी बड़ी बहन पेड़ पे चढ़ के तोड़ा करती थी..उसके कुछ सालों बाद मैंने चढ़ना शुरू किया..मैंने अपने दीदी को ही पेड़ पे चढ़ते हुए देख के चढ़ना सीखा है..।
सावन से ही अमरूद बिकना शुरू हो जाता था..घर के बगल में स्कूल था तो कई स्कूल के बच्चे भी अमरूद लेने आते थे..।जितना अमरूद बिकता उसका सारा पैसा दादी माँ के पास जमा होता था..हां उसमें से कभी-कभी 1-2₹ मिल जाया करता था कुछ खाने के लिए..हमलोग भी इतना ईमानदार थे कि दादी माँ के अनुपस्थिति में भी अमरूद बेचने पर वो पैसा दादी माँ को ही बाद में दिया करते थे..।

सावन खत्म होते ही भादो आता और भादो आते ही कृष्ण जन्माष्टमी आता, कृष्ण जन्माष्टमी से एक दिन पहले सारा पैसा गिना जाता और उसके बाद उन पैसों को सारे सदस्यों में बांटा जाता था..दरसल ये बंटवारा कार्य के हिसाब से नही बल्कि उम्र के हिसाब से होता था..किसी वर्ष 25₹ तो किसी वर्ष 30₹ भी मिलता था,जितना अमरूद बिकता था उसी हिसाब से, हमसबको कुछ न कुछ मिलता..।
और जो पैसा बच जाता, उस पैसा का दादी माँ घर के लिए कोई-न-कोई सामना ले लेती थी..कभी-कभी छठ का सूप भी इस पैसा से खरीदा जाता था..।
मगर हमलोगों को जितना पैसा मिलता वो मेला घूमने के लिए काफी था..।
ये सिलसिला तबतक चलता रहा जबतक में पढ़ने के लिए दरभंगा न आ गया..क्योंकि उसके बाद कोई अमरूद तोड़ने वाला था ही नही..।
मगर दादी माँ तब भी हरेक कृष्ण जन्माष्टमी को हमें कुछ न कुछ पैसा देती ही थी..क्योंकि बाबा को पेंशन जो मिलता था..30-40₹ दादी माँ दे ही देती थी..।
फिर जब मैने दरभंगा छोड़ दिया तो दादी माँ हरेक कृष्णजन्माष्टमी को फोन जरूर करती और खोज खबर लेती यंहा के माहौल के बारे में पूछती..।

मगर इस साल उनका कॉल नही आएगा..
क्योंकि वो पिछले साल ही छोड़ के चली गई..।

लोग चले तो जाते है..
मगर कई यादें छोड़ जाते है..
कुछ लोग उन यादों के सहारे उन्हें जिंदा रखते है..
तो कुछ लोग उन यादों को भूल कर उन्हें भूल जाते है..।


हमें लगता है..