यही सोच रहा हूँ कि..
क्या सोच रहा हूँ मैं..।
सच कहूं तो..
कुछ तो सोच रहा हूँ मैं...
मगर अफसोस क्या सोच रहा हूँ..
यही सोच-सोच कर..
कुछ तो सोच रहा हूँ मैं..।
क्या सोच रहा हूँ..
अब मत ये पूछना..
क्योंकि..
यही सवाल तो मैं खुद से..
वर्षों से पूछता आ रहा हूँ की..
क्या सोच रहा हूँ मैं..??
क्या सोच रहा हूँ मैं..??
या फिर क्या खोज रहा हूँ मैं..??
जैसे कस्तूरी मृग भटकता है..
वैसे ही शायद भटक रहा हूँ मैं..।
बस मालूम नही क्यों भटक रहा हूँ मैं..
शायद यही सोच-सोच कर..
कुछ तो सोच रहा हूँ मैं..।।
शायद उस "मैं" के बारे में ही सोच रहा हूँ मैं..
जिस 'मैं" का भान नही है..मुझको..।
जिस मैं से ये ब्रह्मांड है..
वो "मैं",
मैं कैसे हो सकता हूँ..??
शायद यही सोच-सोचकर
कुछ तो सोच रहा हूँ मैं..।।

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