व्यक्तित्व लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
व्यक्तित्व लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 12 अप्रैल 2026

अलविदा 'स्वर-साम्राज्ञी': आशा भोसले

आज संगीत की दुनिया का एक ऐसा सूरज अस्त हो गया है, जिसने अपनी किरणों से सात दशकों तक भारतीय सिनेमा और संगीत को आलोकित किया। आशा भोसले, जिन्हें दुनिया प्यार से 'आशा ताई' कहती थी, अब हमारे बीच नहीं रहीं। लेकिन क्या वाकई एक कलाकार मरता है? शायद नहीं।



 उनकी आवाज़ की खनक, उनकी हरकतों में छुपी शरारत और उनके सुरों की गहराई अब हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी है।

आशा जी का जीवन एक प्रेरणादायक कहानी है। एक ऐसे दौर में जब उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर की आवाज़ का जादू पूरी दुनिया पर छाया हुआ था, अपनी अलग जगह बनाना लगभग नामुमकिन था। लेकिन आशा जी ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने 'सेकंड लीड' और उन गानों को अपनाया जिन्हें उस दौर में चुनौतीपूर्ण माना जाता था। उन्होंने साबित किया कि "प्रतिभा को किसी की परछाई दबा नहीं सकती।"

हम अक्सरहाँ आशा ताई को मुस्कुराते ही देखे है..मगर एक दौर ऐसा था जब ये अपने जिंदगी से तंग आकर जिंदगी से मुँह मोड़ने की सोच रही थी..।

1949 में 16 साल की उम्र में लता मंगेशकर के सचिव गणपत राव भोंसले से भाग कर शादी कर लेती है..जिस कारण इनकी बहन और माँ इनसे रिश्ता तोड़ लेती है..।जिस कारण इनको आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा..साथ ही जिसके लिए परिवार छोड़ा वो इनके साथ हिंसा करने लगा जिस कारण 1960 में तलाक ले लिया..।

जब इन्होंने अपने पति से तलाक ले लिया तब फिर से परिवार वालों से संबंध अच्छा हो गया..।

•1956 में R.D.बर्मन से मुलाकात होती है और दोस्ती गहरी हो जाती है..इन दोनों ने मिलकर कई सुपरहिट सदाबहार गाने दिए है..।

R.D.बर्मन आशा भोंसले से शादी करना चाहते थे,मगर R.D वर्मन के परिवार वाले नही चाहते थे क्योंकि आशा भोंसले उनसे उम्र में 6 साल बड़े थे..जब RD बर्मन के पिता की मृत्यु हो गई और माँ की तबियत अस्वस्थ रहने लगी,तब उन्होंने 1980 में आशा भोंसले से शादी कर लिया..।।

●1943 में 10 वर्ष की उम्र में पहला गाना मराठी में गाया।

●1948 में फ़िल्म चुनरियां के लिए हिंदी में पहली बार गाया।

●उन्होंने 20 भाषा मे 12हज़ार से ज्यादा गाना गाई..।

●2011 में इनका नाम गिनीज बुक वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज है..।

●2010 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया..।

●1997 में ग्रेमी अवार्ड में नॉमिनेट होने वाली पहली भारतीय गायिका बनी थी..।।

आज वो हमारे बीच में नही है..मगर उनके गाने आज भी हमारे बीच मे हो..वो अपने सदाबहार गानों के कारण हमेशा जिंदा रहेंगी..।।

"संगीत की दुनिया मे कोई दूसरी 'लता' तो बन सकती है,लेकिन 'आशा' बनना नामुमकिन है।-लता मंगेश्कर


शनिवार, 28 मार्च 2026

चार्ली चैपलिन..लंदन के सड़कों से उठकर विश्व के मानसपटल तक..

"मुस्कुराओ, भले ही तुम्हारा दिल टूट रहा हो... अगर तुम मुस्कुराओगे, तो देखोगे कि जीवन अभी भी जीने योग्य है।"

आज एक किताब पढ़ रहा था..और उसमें चार्ली चैपलिन का जिक्र आया..और तब से उन्हें और जानने की इच्छा हुई..इससे पहले भी कई दफा उनके बारे में पढ़ा,सुना और उनकी कई मूवीयाँ देखी है..मगर उन्हें जितने बार पढ़ो हरेक बार कुछ नया जानने को मिलता है,नया सीखने को मिलता है..।
आज की जेनरेशन उनके बारे में जानती तो होगी..मगर उन्हें नही जानते होंगे..जिन्होंने उन्हें चार्ली चैपलिन बनाया..।
चलिये उनके बारे में कुछ नया जानते है..।



क्या आपको पता है..वो पहली बार स्टेज पर परफॉरमेंस कितने साल के उम्र में किये..??
5 साल की उम्र में..हां 5 साल की उम्र में..
हो सकता है इसमें से कइयों को ये ताज्जुब न लगे..मगर इसके पीछे की कहानी आपको थोड़ा हैरान कर देगा..शायद नही करेगा..।

● चार्ली की माँ, हन्ना चैपलिन, लंदन के एक थिएटर में गा रही थीं। अचानक गाते समय उनकी आवाज़ फटने लगी और वे सुर खो बैठीं। दर्शकों ने शोर मचाना और उन पर चीजें फेंकना शुरू कर दिया।थिएटर के मैनेजर ने स्थिति संभालने के लिए नन्हे चार्ली को स्टेज पर भेज दिया, क्योंकि उन्होंने चार्ली को अपनी माँ की नकल करते हुए देखा था।

जब चार्ली स्टेज पर आए और गाना शुरू किया साथ ही माँ की आवाज का नकल करना शुरू किया,तो लोगों ने कुछ सिक्के उछालने लगे..वो गाना,गाना बंद करके सिक्के उठाना शुरू कर दिए..इस मासूमियत को देख करके सारा हॉल हंसी से भर गया..।और यंही से चार्ली चैपलिन का उदय हुआ..।

"आइना मेरा सबसे अच्छा दोस्त है, क्योंकि जब मैं रोता हूँ, तो वह कभी नहीं हंसता।"

मगर इसी रात इनकी माँ की आवाज सदा के लिए चला गया..पिता शराबी थे,शराब पीने के कारण ही इनकी मृत्यु हो गई,उस समय चार्ली चैपलिन 12 साल के थे..माँ काम न मिलने के कारण और गरीबी के कारण मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गई जिस कारण उन्हें कई बार पागलखाना जाना पड़ा..।और इन्हें वर्क हाउस(गरीबों के लिए बना सरकारी जगह) में रहना पड़ा और मजदूरी करना पड़ा,वंहा की जिंदगी जेल जैसी थी।

चार्ली चैपलिन अपने माँ से बहुत प्यार करते थे वो अपने आत्मकथा में लिखते है- "वे और उनके भाई अपनी माँ को सड़कों पर बदहवास हालत में देखते थे,और हम चाहकर भी कुछ नही कर पाते थे..।"

चार्ली अक्सर कहते थे- 

"जीने के लिए हंसी ज़रूरी है, खासकर तब जब आपके पास रोने के सौ कारण हों।"

​•जब चार्ली लगभग 9 साल के थे, उनकी माँ की बीमारी के कारण घर चलाना मुश्किल था। तब उनके पिता के संपर्कों के जरिए उन्हें 'द एइट लंकाशायर लैड्स' नाम के एक डांसिंग ग्रुप में काम मिला। यहाँ उन्होंने 'क्लॉग डांसिंग' (लकड़ी के जूतों के साथ डांस) सीखी। यह उनकी प्रोफेशनल ट्रेनिंग की शुरुआत थी।

चार्ली को असली पहचान तब मिली जब 14 साल की उम्र में उन्हें एक मशहूर नाटक 'शर्लक होम्स' में 'बिली' (एक न्यूज़बॉय) का रोल मिला।दिलचस्प बात ये है कि उस समय चार्ली को पढ़ने तक नही आता था,अपने भाई सिडनी के मदद से डायलॉग रटे थे..।

19 साल की उम्र तक चार्ली एक मँझे हुए कलाकार बन चुके थे। उन्हें प्रतिष्ठित 'फ्रेड कार्नो' की कॉमेडी कंपनी में जगह मिली,​यहाँ उन्होंने 'बिना बोले अभिनय' (Pantomime) और 'स्लैपस्टिक कॉमेडी' की बारीकियां सीखीं।​इसी कंपनी के साथ वे अमेरिका के दौरे पर गए, जहाँ हॉलीवुड की नज़र उन पर पड़ी

•अमेरिका के दौरे के दौरान, 'कीस्टोन स्टूडियो' के मालिक मैक सेनेट ने चार्ली का टैलेंट देखा और उन्हें फिल्मों के लिए साइन कर लिया।​शुरुआत में चार्ली कैमरा के सामने थोड़ा झिझक रहे थे, लेकिन जल्द ही उन्होंने अपनी जगह बना ली।​अपनी दूसरी ही फिल्म 'किड ऑटोस एट वेनिस' (1914) में उन्होंने पहली बार वह ड्रेस पहनी जो आगे चलकर "द ट्रैम्प" (The Tramp) के रूप में अमर हो गई


26 साल की उम्र में, उन्होंने उस समय का सबसे बड़ा कॉन्ट्रैक्ट साइन किया, जिसके लिए उन्हें $670,000 (सालाना) मिला,जो उस ज़माने में एक अविश्वसनीय रकम था।

उस समय के बड़े फिल्म स्टूडियो कलाकारों को बहुत कम पैसा देते थे और फिल्मों की कहानी में बहुत दखल देते थे। चैपलिन अपनी कला के साथ समझौता नहीं करना चाहते थे। 1919 में, चैपलिन ने उस समय के तीन अन्य बड़े दिग्गजों (मैरी पिकफोर्ड, डगलस फेयरबैंक्स और डी.डब्ल्यू. ग्रिफिथ) के साथ मिलकर अपनी खुद की कंपनी 'United Artists' बनाई।अब वे खुद अपनी फिल्मों के मालिक थे। वे अपनी फिल्मों के लेखक, निर्देशक, अभिनेता और यहाँ तक कि संगीतकार भी खुद ही थे। इससे उन्हें वह स्वतंत्रता मिली जिससे उन्होंने 'द गोल्ड रश' और 'सिटी लाइट्स' जैसी कालजयी फिल्में बनाईं

द ग्रेट डिक्टेटर' (1940) यह फिल्म चैपलिन के साहस का सबसे बड़ा उदाहरण हैयह फिल्म एडोल्फ हिटलर और नाज़ीवाद का मज़ाक उड़ाती थीजिस समय यह फिल्म बन रही थी, हिटलर का खौफ पूरी दुनिया में था।
(हिटलर और चैपलिन का जन्म एक ही साल और एक ही महीने (अप्रैल 1889) में हुआ था। दोनों की मूँछें भी एक जैसी थीं। चैपलिन ने इसी समानता का फायदा उठाकर हिटलर (फिल्म में हेंकल) का किरदार निभाया।)

"मेरा दर्द किसी के लिए हंसी का कारण हो सकता है, लेकिन मेरी हंसी कभी किसी के दर्द का कारण नहीं होनी चाहिए।"


क्या आपको पता है..चार्ली चैपलिन गांधी से मिले थे..??
जब गांधीजी दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन गए तो चार्ली चैपलिन उनसे मिलने की इच्छा जताया,शुरुआत में तो उन्होंने मना कर दिया क्योंकि गांधीजी चार्ली चैपलिन को नही जानते थे,फिर उन्हें बताया गया की वो दुनिया के मशहूर कलाकार और गरीब मजदूर के हितैषी है,तब गांधीजी उनसे मिलने के लिए राजी हुए..।
जब चैपलिन गांधीजी से मिले तो उन्होंने पूछा-आप मशीनों का विरोध क्यों करते हैं? मशीनें तो इंसान का काम आसान बनाती हैं और उसे गुलामी से मुक्त कर सकती हैं
गांधीजी ने जबाब दिया - "मैं मशीनों के खिलाफ नहीं हूँ, लेकिन मैं उस व्यवस्था के खिलाफ हूँ जो मशीनों का उपयोग करोड़ों लोगों को बेरोजगार करने के लिए करती है। भारत जैसे देश में, जहाँ आबादी इतनी ज्यादा है, वहां इंसान को काम की जरूरत है, मशीन की नहीं।"

गांधीजी के बातों से ही प्रेरित होकर उन्होंने "मॉडर्न टाइम्स" मूवी बनाया जिसमे दिखाया गया कि कैसे मशीन इंसान पर हावी होकर उनके भावनाओ को खत्म कर देता है।

"हमें मशीनों से ज्यादा इंसानियत की जरूरत है। चालाकी से ज्यादा दया और शालीनता की जरूरत है। बिना इन गुणों के, जीवन हिंसक हो जाएगा और सब कुछ खो जाएगा।"

चैपलिन के अंतिम दिन स्विट्जरलैंड में बीते। उन्हें अपने राजनीतिक विचारों के कारण अमेरिका छोड़ना पड़ा थालेकिन 1972 में, यानी करीब 20 साल बाद, वे दोबारा अमेरिका गए जब उन्हें 'मानद ऑस्कर' (Honorary Oscar) से नवाजा गया। उस समय उन्हें सिनेमा के इतिहास का सबसे लंबा (12 मिनट का) 'स्टैंडिंग ओवेशन' मिला था

चार्ली चैपलिन की मृत्यु 25 दिसंबर, 1977 को क्रिसमस के दिन 88 वर्ष की आयु में नींद में मुस्कुराते हुए हो गया..।

"इंसान की कीमत उसके कपड़ों या बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और दूसरों के प्रति उसकी संवेदना से तय होती है।"




गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

बुरे परिस्थितियों में ही अच्छे समय का बीजारोपण होता है...।

हमसब अक्सरहाँ कभी-न-कभी बुरी परिस्थितियों से गुजरते है..
और अक्सरहाँ हम उन परिस्थितियों को कोसते है..।
मगर हम कभी उन परिस्थितियों पे गौर नही करते..।

कभी-कभी हम जिन परिस्थितियों को बुरा कहते है,वही परिस्थितियां हमारे जिंदगी के लिए सबसे अहम साबित होता है..।।

इतिहास भरा पड़ा हुआ है..उन बुरी परिस्थितियों से जिसने इतिहास का रुख ही मोड़ दिया..।

चलिए उनमें से कुछ व्यक्तियों से रु-ब-रु होते है,जो बुरे परिस्थितियों के कारण ही महान बन पाए..।

एक व्यक्ति प्रथम श्रेणी(first class) का वैध टिकट लेकर ट्रैन में सफर करता है,मगर उसके अश्वेत होने के कारण उसे ट्रैन से फेंक दिया जाता है..और वो व्यक्ति सारी रात कड़ाके के ठंड में उस स्टेशन के वेटिंग रूम में ठिठुर कर गुजारता है,और निर्णय लेता है कि इस अन्याय और नस्लभेद के खिलाफ आवाज उठाऊंगा...।




इन्ही के पदचिन्हों पे चलकर "मार्टिन लूथर किंग जूनियर" ने अमेरिका में 'सिविल राइट मूवमेंट' चलाया..
वो कहते है.. 
"ईसा मसीह ने हमें लक्ष्य दिया और....उन्होंने हमें तरीका दिया।"

इसी तरह दक्षिण अफ्रीका के "नेल्सन मंडेला" ने उन्हें अपना आदर्श मानकर दक्षिण अफ्रीका को बिना किसी गृहयुद्ध के दक्षिण अफ्रीका को लोकतांत्रिक देश बनाया..।
(◆नेल्सन मंडेला ने 27 साल जेल में बिताया..इनके लिए इनसे बुरा और क्या हो सकता है,मगर परिणाम सामने है,आज उन्हें पूरा विश्व जानता है..।


"अक्सरहाँ जब हम सबसे बुरे दौड़ से गुजर रहे होते है,उसी समय अच्छे समय का बीजारोपण भी हो रहा होता है..इसीलिए बुरा समय जब भी आये,तो घबराए नही,मुस्कुराए😊.."

अब हममें से अधिकांश लोग जान गए होंगे कि हम किसकी बात कर रहे है..
वो व्यक्ति कोई और नही बल्कि "महात्मा गांधी" थे जिसे 7 जून 1893 को पीटरमैरिट्सबर्ग स्टेशन पे ट्रैन से उस ठिठुरती हुई ठंड में फेंका गया..वो रात ऐतिहासिक रात थी..जिसने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी बना दिया..।
जरा सोचियेगा..अगर ये घटना उनके साथ नही होता तो क्या होता..??


चलिए अब उस सख्स से रु-ब-रु होते है,जिन्हें स्कूल से इसलिय निकाल दिया गया कि वो मंद बुद्धि के थे..।
शिक्षक ने उनकी माँ को एक पत्र लिखा कि आपका बच्चा addled( अव्यवस्थित दिमाग) है और वह कुछ सीख नही सकता..।
उनकी माँ ने उस पत्र को पढ़ा और उनसे कहा- स्कूल ने लिखा है कि "आपका बेटा बहुत प्रतिभाशाली है,और हमारे पास उसे पढ़ाने लायक अच्छे शिक्षक नही है,इसिलिय आप इसे खुद पढ़ाये...।"
पता है वो बच्चा कौन था..??
दुनिया उसे "थौक आविष्कारक" के रूप में जानता है..वो और कोई नही बल्कि "थॉमस अल्वा एडिसन" थे...।

उन्होंने वो किया जो आज हमें सामान्य लगता है..
उन्होंने पहली बार बिजली का बल्ब बनाया..इससे पहले दुनिया मोमबत्तियां और गैस की रोशनी पर निर्भर थी।
•उन्होंने पहली बार आवाज रिकॉर्ड कर सुनने वाला पहला उपकरण बनाया,जिससे संगीत उद्योग की शुरुआत हुई..
•आज हम सिनेमा हॉल में फ़िल्म का लुत्फ उठा रहे है तो उन्ही के कारण..उन्होंने "मोशन पिक्चर कैमरा" का आविष्कार किया जिससे फ़िल्म उद्योग का जन्म हुआ..।
•आज हम आप मोबाइल चला रहे है,मगर जरा सोचिए अगर बैटरी रिचार्जजेबल न होता तो क्या होता..।

वो कहते थे-
"मैं असफल नही होता हूँ,बल्कि एक नया तरीका खोज लेता हूँ,जो काम नही करता.."

वो हमेशा कठिन परिश्रम के पक्ष में रहे है,इस बारे में कहते है..-
"प्रतिभा 1% प्रेरणा और 99% कड़ी मेहनत ही सफलता का राज है।"
(Genius is 1% inspiration and 99% perspiration)

जरा सोचियेगा अगर उन्हें स्कूल से नही निकाला गया होता तो क्या होता..??

ये तो वो लोग है जिन्होंने अपने बुरे परिस्थितियों से देश और दुनिया को दिशा दी..
मगर हममें से हरेक घर में,हरेक समाज में कोई न कोई व्यक्ति होता ही है..जो बुरे परिस्थितियों से गुजरकर वो कार्य करते है,जो हमारे लिए आदर्श हो जाते है..।।

याद रखें..आप जब भी बुरे-से-बुरे परिस्थितियों से गुजर रहे हो,तो समझ लीजिए ,आपके अंदर अच्छे समय का बीजारोपण हो रहा है..

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

कोई तो होगी..

कोई तो होगी..
जो मेरे अंदर प्यार के वट वृक्ष को देखेगी..
वो मुझे नही,मेरे कैरियर को नही..
सिर्फ मुझे ही देखेगी..
कोई तो होगी..।।

ये दुनिया जालिम है..
अगर वो,
मेरे अंदर..
प्रेम के वट वृक्ष को देख भी लेगी..
तो दुनिया उसे दिग्भ्रमित करेगी..
कैसे रहेगी..??
क्या करेगी..??
क्या भविष्य है इसके साथ..??
क्या करेगी तू इसके साथ..??

मगर शायद..
उसका अंतर्मन कहेगा..
ये वही वट वृक्ष है..
जिसके छावं में..
मैं चैन से,
सो सकूंगी..

कोई तो होगी..।


रविवार, 1 फ़रवरी 2026

मन चंगा तो कठौती में गंगा..

कुछ लोग ऐसे होते है,जो अपने कर्मों के द्वारा हमारे जीवन मे रच-बस जाते है,भले ही हम उनके नाम और काम से अनजान हो..मगर उनकी महानता हमारे जीवन का मार्ग प्रसस्त करता रहता है..।



उन्ही महान विभूतियों में से एक "संत रविदास/रैदास" जी है,इनका नाम रविदास इसलिए पड़ा क्योंकि इनका जन्म रविवार को हुआ..इनका जन्म बनारस के पास मंडूर गाँव मे हुआ,इनके माता का नाम घुरबिनिया और पिता का नाम रघु था..।

इनका जन्म चमार जाती में हुआ..मगर ये अपने कर्मो से ब्राह्मण बन गए..।
 "चमड़े,मांस और रक्त से
  जन का बना आकार
 आंख पसार के देख लो
 सारा जगत चमार।"

हम सब जन्म से शुद्र ही होते है..मगर हम अपने कर्मो,उपलब्धियों और अनुभूतियों से ब्राह्मण बनते है..।।

इन्होंने समाज को तब जगाने का कार्य किया जब समाज रूढ़ियों में जकड़ा हुआ था..
इन्होंने अपने गुरुभाई कबीर के साथ मिलकर समाज को जगाया और उद्वेलित किया..
 " मन चंगा त कठौती में गंगा"..
आज भी ये दोहे..समाज को जगाने का कार्य कर रही है..।।

रविदास जी ऐसे समाज की कल्पना करते थे जंहा कोई दुख न हो, न ही जाति-भेद हो,और न ही किसी के साथ अन्याय हो..।
 "बेगमपुरा सहर को नाऊँ,
  दुख अंदोह नहीं तिहि ठाऊँ।।"

रविदास भारत के चमकते सितारों में से है,जिनके चमक को उनकी शिष्या "मीराबाई" उनके चमक को और चहुँ दिशा में फैलाती है..
  " गुरु मिलिया रैदास जी"।

रैदास जी की बोली बुद्ध की बोली है,मगर इनके बोली मे भक्ति और प्रेम है..
जबकि बुद्ध की बोली में तार्किकता और विरोध था..जिस कारण बुद्ध का विरोध किया गया..।
अम्बेडकर जी ने बुद्ध को पढ़कर नही बल्कि रविदास जी को पढ़कर और समझकर बौद्ध धर्म अपनाया..।

भले ही भारत की बहुत बड़ी आबादी रविदास जी से अनभिज्ञ हो..
मगर शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा,जिनके ऊपर रविदास जी के दोहे,और गीत का असर न हो..।
  प्रभु जी तुम चंदन हम पानी,
जाकी अंग-अंग बास समानी॥
प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा,
जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती,
जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी तुम मोती हम धागा,
जैसे सोनहुँ मिलत सुहागा॥
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा,
ऐसी भक्ति करै रैदासा॥



सोमवार, 12 जनवरी 2026

स्वामी विवेकानंद और जमशेदजी टाटा

स्वामी विवेकानंद जी के सपनों के भारत को अगर किसी ने साकार किया या कर रहा है,तो वो जमशेद जी टाटा और टाटा ट्रस्ट है..।

शायद, स्वामी जी, जमशेद जी टाटा से मिलने के बाद ही कहे होंगे-
"मुझे केवल 100 ऊर्जावान युवा दे दो और मैं इस देश को बदल दूंगा।"
मगर अफसोस भारत को 10 भी ऊर्जावान युवा नही मिल पाया..
अगर मिल जाता तो देश का दशा और दिशा कुछ और होता..।
जब एक टाटा कंपनी भारत के दिलों पे राज करती है,तो उस जैसी 10 कंपनी होती तो विश्व पर राज करती..।

स्वामी विवेकानंद और जमशेद जी की मुलाकात..
स्वामी जी मई 1893 में SS Empress of india नामक जहाज पर सवार होकर "विश्व धर्म सम्मेलन"में भाग लेने जा रहे थे और उसी जहाज पर जमशेद जी टाटा भी सवार थे..।



 ● यह मुलाकात केवल एक संयोग नही था ,बल्कि भारत के वैज्ञानिक पुनर्जागरण की नींव थी..
- विवेकानंद की आध्यात्मिक दृष्टिकोण और टाटा के औद्योगिक दृष्टिकोण का संगम भारत के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ..।

जो आगे चलकर भारत का सर्वश्रेष्ठ शैक्षणिक संस्थान IISc बंगलुरु(1909)बनता है..जंहा C.V.Raman,homi jahangir bhabha,vikram sarabhai , Satish dhavan ,G.N.Ramchandran , C.N.R.Rao..ऐसे - ऐसे व्यक्ति ने यंहा शिक्षण और प्रशिक्षण किया है..।
आज हम जिस इसरो(ISRO) पे गुमान कर रहे है..उसकी उपज भी IISc बंगलुरु के छांव में ही हुआ..।।

स्वामी विवेकानंद से प्रेरित होकर जमशेद जी ने झारखंड में TISCO की नींव रखी..।

टाटा ट्रस्ट आज भी स्वामी जी के भारत के सपने को साकार कर रहा है,टाटा ट्रस्ट ~66% हिस्सा जन कल्याण में खर्च करता है..।

जिस दरिद्रनारायण की सेवा की बात स्वामी विवेकानंद कर रहे थे उसमे टाटा ट्रस्ट आज भी अपना योगदान दे रहा है..।
जमशेदजी टाटा जी को पिछले सदी(100 साल) का विश्व का सबसे बड़ा दानवीर माना जाता है..
 -इन्होंने अपने जीवनकाल में 102 बिलियन डॉलर(आज के वैल्यू के हिसाब से) दान किये,जो बिल गेट्स और वॉरेन बफ़े जैसे दिग्गजों से भी बहुत अधिक है..।।

स्वामी जी को आज भी उस 100 युवाओं का तलाश है,जो भारत का परचम पूरे विश्व में लहराए..
शायद ये वही सदी है,जंहा स्वामी जी के सपने साकार होते हुए नजर आएंगे..।।
स्वामी विवेकानंद यही चाहते थे कि अध्यात्म और विज्ञान का मिलन हो..और आज दुनिया उस और बढ़ रही है..।।




रविवार, 11 जनवरी 2026

स्वामी विवेकानंद और शिकागो धर्मसभा सम्मेलन

अगर स्वामी विवेकानंद 1893 के शिकागो धर्मसभा सम्मेलन में भाग नही लेते तो क्या हम स्वामी विवेकानंद को जान पाते..??
अगर सच कहूं तो शायद स्वामी विवेकानंद को कोई नही जानता..।


हम आप अक्सरहाँ चुनौतियों से दूर भागते है..मगर ये भूल जाते है कि हम जितना चुनौतियों से भागेंगे चुनौतियां उतना ही पीछा करेगा..और भागते-भागते हम इतने कमजोर हो जाएंगे कि वो हमसे आगे निकलकर हमारा रास्ता घेर लेगा और हमें कैद कर लेगा..।

आज के युवा को "युवा दिवस" मनाने की जरूरत नही है,बल्कि अपने यौवन का इस्तेमाल करके स्वामी विवेकानंद के सपनों को साकार करना है..।

हमें खुद से पूछना चाहिए कि हम अपने यौवन का किस दिशा में इस्तेमाल कर रहें है..??

 शिकागो यात्रा के दौरान स्वामी जी के समक्ष निम्नलिखित चुनौतियां था,मगर उन्होंने उस चुनौती को स्वीकार कर शिकागो जाना चुना..
- पहली चुनौती पैसों का था,इनके पास इतना पैसा नही था कि वो अमेरिका जा सके ,किसी तरह खेतड़ी महाराज से चंदा एकत्रित करके अमेरिका पहुंचे..।

मगर इनके पास इतने पैसा नही था कि ये होटलों में रह सके..।
तब इनकी मुलाकात "मैडम केट सैनबोर्न" से होती है,जो स्वामी जी को अपने घर मे रहने के लिए आमंत्रित करती है,और समाज के प्रभावशाली लोगों से परिचित करवाती है..।

-जब वो अमेरिका पहुंचे थे तब गर्मी था मगर कुछ महीनों में ही कड़ाके की ठंड पड़ने लगा,मगर इनके पास भगवा कपड़े के सिवा और कोई कपड़ा नही था..

-सबसे बड़ी मुसीबत तब आई जब इन्हें पता चला कि 'विश्व धर्म संसद' में शामिल होने की रजिस्ट्रेशन की तारीख एक महीने पहले ही समाप्त हो चुका है।बिना किसी निमंत्रण और पहचान पत्र न होने के कारण इन्हें प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार करने से मना कर दिया गया..।
आप सोच सकते है क्या बीता होगा..हमारी बस,ट्रैन,फ्लाइट छूटती है तो हमपे क्या बीतता है..इन्होंने तो अपने देश को छोड़कर चंदा से एकत्रित किये गए पैसा से वंहा पहुंचे थे..जरा इस परिस्थिति में खुद को रखकर देखिए तब अहसास होगा..।।

- भगवे कपड़े और रंग रूप देखकर लोग इनका सड़कों पर मजाक उड़ाते थे..और होटल में कमरा देने से मना तक कर देता था..।

जब इन्हें लगा कि अब 'विश्व धर्म संसद' में भाग नही ले पाऊंगा तब ये शिकागो से बोस्टन चले गए..
बोस्टन में इनका मुलाक़ात हावर्ड यूनिवर्सिटी के"प्रोफेसर जॉन हेनरी राइट" से हुआ प्रोफेसर स्वामी जी से इतने प्रभावित हुए की उन्होंने खुद विश्व धर्म संसद के अध्यक्ष को चिट्ठी लिखकर शिफारिश किया..।
स्वामी जी ने कहा मेरे पास कोई परिचय पत्र नही है..
तो प्रोफेसर ने कहा- आपसे परिचय पत्र मांगना वैसा है,जैसे सूर्य से स्वर्ग में चमकने का अधिकार मांगना..।
प्रोफेसर ने स्वामी जी का सारा खर्चा उठाया और शिकागो का टिकट दिलाया.।

•जब बोस्टन से शिकागो पहुंचे तो रास्ता भटक गए जिस कारण सारी रात रेलवे स्टेशन पर बिताया..सुबह होते ही वो अपनी मंजिल को ढूंढ रहे थे,मगर ढूंढते-ढूंढते इतना थक गए कि एक घर के सामने थक कर बैठ गए..।तब ही घर का दरवाजा खुलता है और एक महिला निकलती है,जिनका नाम '' जॉर्ज W. हेल था..उन्होंने स्वामी जी को घर के अंदर बुलाया और खाना खिलाया और स्वयं विश्व धर्म संसद में ले जाकर उनका नाम दर्ज करवाया..।


जब हमारा उद्देश्य नेक होता है और हमारे पास धैर्य होता है,तब पूरी कायनात भी हमारे लिए काम करती है😊..।


स्वामी जी ने पहली बार पक्षिमी दुनिया को भारतीय दर्शन से परिचय करवाया
●स्वामी विवेकानंद भारतीय आध्यात्मिकता,संस्कृति और योग के पहले ब्रांड अम्बेसडर थे..


आप एक बार फिर से सोचिए..अगर स्वामी विवेकानंद 'विश्व धर्म संसद" में भाग नही लेते तो कोई उन्हें जान पाता..??
● जिंदगी में जब भी चुनौतियां आये उसे सहस्र स्वीकार कीजिये,क्योंकि चुनौतियां ही तो इंसान को इंसान बनाता है..।



मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

विनोद कुमार शुक्ल

कुछ दिन पहले ही तो आपको पढ़ा था,
कुछ दिन पहले ही तो आपको सुना था..।
किसको पता था की, 
आप यू ही छोड़ के चले जाओगे..।
शायद आपका मकसद पूरा हो गया..
हिंदी साहित्य का फिर से पुनरुत्थान जो आपके द्वारा हो गया..।।


आप आने वाले नई पीढ़ियों के लिए प्रकाशस्तंभ थे..
आपका यू ही छोड़ के चले जाना..
न जाने कितने लोगों के लिए असहनीय है..।।

मगर क्या करें..
जाना तो सबको है ही..तो चल दिये..।
वैसे कई हिंदी साहित्य के पुरोधा को पीछे छोड़ दिये है..
अब नई पीढ़ी..
अपने अनुसार अपनी कहानियां लिखें,पढें और सुने..
हम तो पुराना हो चुके थे,
इसलिए भी चल दिये..।

सच कहूं..
तो पहले शरीर साथ नही दे रहा था..
कुछ दिनों से तो, हाथ भी साथ नही दे रहा था..
कलम पकड़ के कागज पे कुछ उकेड़ नही पा रहा था..
अब तुम्हीं बताओ..
बिना कागज और कलम के, 
कैसे जिंदगी बिताऊँ..??
इसीलिए..
कागज की नाव बनाकर
कलम की पतवार बनाकर..
नोकर की कमीज,पहनकर..
दीवार में एक खिड़की थी,को यादकर में बह चला..
उससे मिलने जिससे सबको मिलना है एक दिन..।








गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

राष्ट्र,राष्ट्रपिता और गांधी..

क्या आप अल्बर्ट आइंस्टीन को जानते है..??
शायद जानते ही होंगे..
उन्होंने एकबार एक व्यक्ति के लिए कहा था -
" आने वाली पीढियां शायद ही विश्वास करेगी कि,ऐसा कोई हांड-मांस का व्यक्ति इस धरती पर चला था"।
पता है ये लाइने आइंस्टीन ने किसके बारे में लिखा था..कोई और नही वो "राष्ट्रपिता गांधी" थे..।।


आज सोशल मीडिया पे या फिर आपके घर के ही कोई सदस्य गांधी के बारे में अपमानजनक बातें करते हुए नजर आ जाएंगे..।
पता है क्यों..??
क्योंकि उन्होंने गांधी के बारे में खुद से कुछ पढ़ा ही नही है,अगर कुछ सुना है,या फिर देखा है, तो ऐसे लोगों को जो गांधी से नफरत करते है..क्योंकि जब हम किसी के कद की बराबरी नही कर पाते,तो उसके कद को गिराने लगते है..।

एक बात पता है आपको..गांधीजी को राष्ट्रपिता से सर्वप्रथम किसने संबोधित किया था...??
जरा सोचिए..शायद एक या दो नाम जेहन में आया होगा..अगर उसमें से कोई एक सही नाम हो तो अपना पीठ ठोकिये..।
वो व्यक्ति कोई और नही राष्ट्र का हीरो सुभाषचंद्र बोस थे..।।


आखिर सुभाष चंद्र बोस की क्या मजबूरी रही होगी कि उन्होंने रंगून(म्यांमार) के रेडियो स्टेशन से 1944 में उन्हें राष्ट्रपिता कहकर उनसे स्वतंत्रता की लड़ाई में उनसे आशीर्वाद मांगा..।
जबकि दोनों में वैचारिक मतभेद था एक अहिंसा के तो दूसरे सशत्र विद्रोह के समर्थक थे..।।
बोस की कोई मजबूरी रही होगी या फिर वो गांधी के व्यक्तित्व से अवगत थे..(एक बात और राज की बात बताता हूँ😊 बोस अकेले ऐसे व्यक्ति थे जो गांधी के आश्रम में जूते और चप्पल पहन कर अंदर जा सकते थे,और चाय सिर्फ उनके लिए ही आश्रम में बनती थी)

एक आधुनिक राष्ट्र का निर्माण कैसे होता है..??
दुनिया का कोई भी राष्ट्र का नाम मन मे सोचें..और गूगल पे सर्च करें..
उसकी भाषा,धर्म,नृजातीय समहू,और भौगोलिक अवस्थिति देखें..
आपको हरेक राष्ट्र में एक चीज कॉमन दिखेगी..
उस राष्ट्र की अधिकतम आबादी, कोई एक भाषा,या कोई एक धर्म,या कोई एक नृजातीय समूह की बहुलता अधिकतम दिखेगी,या फिर उसकी भौगोलिक स्थिति बिल्कुल अलग होगी..।

अब अपने भारत को देखें..
•यंहा कितने धर्म है..प्रमुखता से 8 धर्म है..
•यंहा कितने भाषा है..आठवीं अनुसूची में 22 भाषा शामिल है,जबकि उन सूची में शामिल कुछ भाषा से ज्यादा बोलने वाले अन्य भाषी लोग है..
•यंहा कितने नृजातीय समूह है..PVTG में 75 जनजाति शामिल है जबकि आधिकारिक रूप से इनका संख्या 705 है..।।
•भारत को भौगोलिक रूप में 8 भागों में विभाजित किया गया है..।



इतने विविध आधुनिक भारत को एक सूत्र में आखिर सर्वप्रथम किसने बांधने का प्रयास किया..??
आधुनिक भारत(1857 के बाद का समय) को अगर देखें तो उस समय ऐसा कोई व्यक्तित्व नहीं था जो पूरे भारत का नेतृत्व करता हो..
हरेक व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्र में कार्यरत थे..नरमपंथी कोट और टाई लगाकर अंग्रेज को चिट्ठी लिख रहे थे तो गरमपंथी शहरों में पत्र और पत्रिकाओं के माध्यम से या फिर कभी शहर के सड़को पे अंग्रेज का विरोध कर रहे थे..।
जबकि आजादी के समय तक शहरी आबादी 17% के आसपास ही था..क्या सिर्फ शहरी लोगों के सहायता से ही अंग्रेज से आजादी और राष्ट्र का निर्माण किया जा सकता था..।।

आखिर वो शख्स कौन था जिसने भारत की आजादी के लिए भारत के उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम के सुदूर क्षेत्र तक राष्ट्र के भावना को पहुँचाया..वो सख्स कोई और नही बल्कि गांधी जी थे..।

उनसे पहले कोई गाँव की सुध लेने वाला नही था,गांधी पहले सख्स थे जिन्होंने हर सख्स को अहसास कराया कि भारत अंग्रेज से आजादी पाकर एक स्वतंत्र राष्ट्र का निर्माण करेगा..।।
गांधी के आंदोलन में बच्चे,बूढ़े,जवान,महिलाये तक शामिल होते थे..
न धर्म,न जात,न पात सबकों भुलाकर सबका एक ही उद्देश्य उन्होंने बना दिया..अंग्रेजो से भारत की आजादी..।।

गांधी के विचारों से हम असहमत हो सकते है,मगर हम उन्हें नकार नही सकते..।।

ऐसा नही है कि गांधी नही होते तो भारत को आजादी नही मिलता..मगर क्या आजादी का ये स्वरूप होता..??

गांधी खुद में एक विश्वविद्यालय थे..जिसने नेहरू,पटेल,सुभाष से  लेकर भगत सिंह तक को आजादी के लिए तैयार किया,उन्होंने कई पौध तैयार किया जो कुछ बड़े होकर अलग रास्ता अख्तियार करके देश की आजादी के लिए लड़े..।।
आज भी उनके पौध अन्य रूप में कार्यरत है..भले ही वो स्वयं को उनसे नही जोड़ते मगर वो स्वयं जानते है कि उनकी जड़ें आज भी वंही से जुड़ी हुई है..।।

भारत के साथ और उसके बाद कई देश आजाद हुए..आज उनकी स्थिति देखें और भारत की स्थितियों को देखें..आखिर क्यों कई देश बिखर गए जबकि भारत दिन-प्रतिदिन मजबूत हो रहा है..??

क्योंकि अन्य देशों को आजादी सशत्र संघर्ष द्वारा मिला तो कइयों को अमेरिका के दबाब में,जिस कारण उस देश के हरेक नागरिक तक राष्ट्र की महत्वता नही पहुंच पाया,वो एक जुट नही हो पाए..
जबकि भारत के साथ इसके विपरीत हुआ,भारत के आजादी के लड़ाई में पूर्वोत्तर भारत से लेकर दक्षिण सुदूर भारत तक आजादी की गूंज थी..और हरेक जुबां पे गांधी का नाम था..गांधी से सब अवगत थे..क्योंकि गांधी ने सब कुछ देश के लिए न्यौछावर कर दिया था..।।

वो विश्व के इकलौते ऐसे नायक है जो आजादी की लड़ाई का नेतृत्व करने के बाद भी सक्ता से दूर रहें..।।

मगर आज भी कुछ लोगों को..गांधी विलेन दिखते है..
तो मैं उनसे पूछना चाहता हूं..उस समय आपके बाप,दादा,परदादा क्या कर रहें थे..??और आप स्वयं आज क्या कर रहें है,राष्ट्र की प्रगति में आपका क्या योगदान है..??
आप जिसे सुन कर गांधी का विरोध कर रहें है..उनके बाप-दादा उस समय क्या कर रहें थे..??

आप गांधी के विचार से असहमत होइए..इसमें कुछ बुरा नही है..।
मगर हरेक चीज के लिए गांधी को ही कसूरवार मत ठहराईये...।
क्योंकि गांधीजी और उनके अनुयायियों को अब आपके सवालों का जबाब देने का मतलब नही है..क्योंकि आपने खुद कभी इतिहास का किताब ही नही पलटा है..😊।

https://mnkjha.blogspot.com/2024/01/blog-post_30.html


बुधवार, 20 अगस्त 2025

भारत में कंप्यूटर और सूचना क्रांति के जनक...

हम भूल जाते है,या फिर हमारे स्मृति से हटाने का प्रयास किया जाता है,या फिर हटा दिया जाता है..??
और हमें पता भी नही चलता..।।
आज हम सही और गलत का निर्णय खुद से नही करते,बल्कि किसी को सुनकर, देखकर और पढ़कर करते है..।

सबसे बड़ा उदाहरण गांधीजी का ही है..उन्हें वो लोग उलूल जुलूल कहते है,जो उनके बारे में कुछ जानते तक नही...।

मगर आज मैं उनकी बात नही,बल्कि ऐसे स्वप्द्रष्टा व्यकि का बात करूंगा, जो भारत को विश्वपटल पर देखना चाहता थे, और उसके लिए उन्होंने अहम कार्य किया..।
वो व्यक्ति भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री "राजीव गांधी"थे..

आज उनका जन्मदिवस है..मुझे भी मालूम नही था,वैसे भी लोगों को अपना जन्मदिवस याद नही रहता,कितनों को याद रखें..।
मगर कुछ संस्थाओं का दायित्व है कि वो उन्हें जरूर याद करें जिन्होंने देश के लिए कुछ किया है,उनके और उनके कार्यो के बारे में लोगों से अवगत कराना उनका कर्तव्य..।
मैंने आज का अखबार पलटा तो एक कॉर्नर में लिखा था 
आज का दिन-राजीव गांधी का जयंती है..जिसे 'सदभावना दिवस' के रूप में मनाते है।
मैंने फिर बहुत उम्मीद से अखबार पढ़ना शुरू किया कि कंही कोई आर्टिकल उनके बारे में पढ़ने को मिले,मगर अफसोस उनके बारे में कुछ पढ़ने को नही मिला,फिर हमने इंग्लिश अखबार पढ़ना शुरू किया कि कंही इसमें कुछ पढ़ने को मिले मगर ना ही the hindu, indian express और ना ही the times of india में एक भी आर्टिकल पढ़ने को मिला यंहा तक कि एक लाइन तक भी नही था..।।

आखिर हमें राजीव गांधी को क्यों याद करना चाहिए..??
●उन्होंने 61वा संविधान संशोधन करके वोट की आयु 21 से 18 किया..
भारत में कंप्यूटर क्रांति और दूरसंचार क्रांति का शुरुआत किया..आज हम जिस डिजिटल क्रांति की बात करते है उसका नीवं राजीव गांधी ने ही रखा था..।
पंचायती राज्य व्यवस्था का नींव इन्होंने रखा(इनके मृत्यु के उपरांत 73वा और 74वा संविधन संशोधन लागू हुआ)
●दूसरी बार 1986 में "नई शिक्षा नीति" लेकर आये..
 • दूरस्थ शिक्षा की शुरुआत की इसके तहत भारत का सबसे बड़ा विश्विद्यालय "IGNOU" का स्थापना किया गया..
 •"ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड" की शुरुआत..
 •" प्रौढ़ शिक्षा"की शुरुआत..
 •और तो और "नवोदय विद्यालय" की शुरुआत जिसमें 6-12th तक सबकुछ का वहन सरकार करता है,खाना,कपड़ा सबकुछ..
महिलाओं के लिए पहली बार 33% आरक्षण की वकालत..

-आज भारत के GDP में सर्विस सेक्टर का जो महत्वपूर्ण योगदान है उसमें राजीव गांधी का अहम योगदान है..
-आज बंगलुरु भारत का सिलिकॉन सिटी अगर बना है तो उनके दूरसंचार क्रांति के शुरुआत के ही कारण..।
-उनकी मृत्यु भी श्रीलंका में शांति स्थापित करने के कारण हुई

मगर अफसोस हम उन्हें आज भूल गए..भूले नही,बल्कि स्मृति से मिटा दिए गए..।
"उसकी हर कहानी का अलग ही किरदार है,
उसने मोहब्बत भी शान से की और
शहादत का कर्ज भी खूब निभाया।"




रविवार, 27 अप्रैल 2025

वीर कुंवर सिंह...1857 के क्रांति के नायक

अगर आपका उम्र 80 साल है,और आपसे आपका सारा जायदाद(संपत्ति) छीन लिया जाय तो आप क्या करेंगे..??

आज की ज़ेनरशन वो सबकुछ जानती है जो उसके लिए उपयोगी नही है..।।
मगर क्या आज का जेनरेशन "वीर कुंवर सिंह" को जानता है..??
आज हमारे प्रधानमंत्री जी ने अपने "मन की बात"में वीर कुंवर सिंह का चर्चा किया..कुछ ने गूगल पे सर्च किया होगा..शायद नही किया होगा..क्योंकि मन की बात आज की जेनरेशन सुनती कंहा है...😊।।



चलिए कोई नही..
मैं आपको ले चलता हूँ 1857 के उस समर में..
जिस समर में अंग्रेज सभी को एक तरफा धूल चटा रहा था..
मानो भारतीयों की जान की कोई कीमत ही नही है..
गाँव के गाँव और बस्तियों के बस्तियां जला दी गई..जिन्होंने भी क्रांतिकारियों का मदद किया, उसे अंग्रेजो ने खुलेआम चौराहे पे फांसी पे लटकाया या तोप में बांधकर उड़ा दिया..
इससे भी मन नही भरा तो हमारी माताओं और बहनों को स्तनों को काट लिया गया..वो दानव यहीं तक नही रुके उन्होंने जननांगों में मिर्ची के पॉवडर डालकर तड़पने के लिए छोड़ देते थे..।।
ये अंग्रेज इतने असभ्य थे इतने कुकर्मी थे कि जब आप इतिहास पलटोगे तो आपको घिन्न आएगी..
मगर अफसोस हम इतिहास पढ़ते ही नही..
इसीलिए तो हम आज भी मानसिक रूप से गुलाम है..।।

1857 के क्रांति में अंग्रेज ने अपने हरेक विरोधियों को कुचल दिया..मगर एक ऐसा विरोधी था, जिसे अंग्रेज हरा नही पाया..
वो थे..80 साल के "वीर कुंवर सिंह"..
डलहौजी ने नया फरमान लाया जिसका कोई संतान नही है, उसका जमींदारी और क्षेत्र ब्रिटिश सरकार का हो जायेगा..।
मगर वो अपना जमींदारी अपने भाई अमर सिंह को देना  चाहते थे..।

इसी बीच मंगल पांडेय को फांसी पे चढ़ाते ही,सैनिकों में विद्रोह भड़क उठा, और सैनिकों का आक्रोश पटना तक पहुंच गया..दानापुर छावनी के 7वी,8वी और 40वी रेजिमेंट के सिपाही वंहा से हथियार लेकर जगदीशपुर पहुंच गए और कुँवर सिंह से कहें कि आप हमारा नेतृत्व करें..
कुँवर सिंह इन सैनिकों को लेकर आरा के जेल पर चढ़ाई कर दिये और वंहा से सभी कैदियों को रिहा कर दिए..और अपने सैनिकों में शामिल कर लिए..।

इस विद्रोह को दबाने के लिए डगलस आया..जो कुँवर सिंह के हाथों युद्ध मे मारा गया..।
फिर विंसेट आयर आया इसने आरा शहर पे कब्जा तो कर लिया मगर कुँवर सिंह को नही पकड़ पाया..।

कुँवर सिंह अपने सैनिकों को लेकर बलिया,गोरखपुर, मिर्जापुर,बनारस,कानपुर,प्रयागराज,बांदा ,रीवा एवं अन्य क्षेत्र तक गए और अंग्रेज से लड़ने के लिए इनसे सहयोग मांगा..
इनके इस उम्र में इतना हौंसला देखकर सब लोगों ने इन्हें अपना-अपना सहयोग देने का वादा किया..मगर..
इसमे से रीवा के राजा अंग्रेज से मिले थे इन्होंने कुँवर सिंह को कैद करने का सोचा मगर रीवा के सिपाहियों के मदद से वंहा से वो निकल गए..।

जब कुँवर सिंह अवध(सबसे धनाढ्य प्रदेश) पहुंचे तो उनका स्वागत अवध की रानी "बेगम हजरत महल" ने शानदार तरीके से किया..उन्होंने आजमगढ़ की जमींदारी वीर कुंवर सिंह को दे दिया..।
जब अंग्रेज को ये बात पता चला तो वो घबरा गया और आजमगढ़ में ही कुँवर सिंह को घेरने का योजना बनाया..
डनबर ने आजमगढ़ को चारों और से घेर लिया..
और यंहा "अतरौलिया का युद्ध" शुरू हुआ..
जिसमें कुँवर सिंह के हाथों डनबर की मृत्यु हुई..।।

ये खबर हवा की तरह कलकत्ता तक पहुंच गया..
जब ये खबर गवर्नर जेनरल "लार्ड केनिंग" को पता चला तो वो चिंतित हो गया...
उसने कुँवर सिंह के ऊपर 20 हज़ार का इनाम की राशि घोषित किया..(वर्तमान में अगर आकलन करें तो 2 करोड़ से ज्यादा) 
कुँवर सिंह को घेरने के लिए चारो और से सेना आजमगढ़ भेजा गया..
जब कुँवर सिंह को ये बात पता चला तो उन्होंने अपने सैनिकों को दो भागों में बांट लिया..एक को युद्ध मोर्चा पे लड़ने के लिए भेजे और एक के साथ जगदीशपुर के लिए निकल गये..।
अंग्रेज को लगा कि वो जीत रहे है,मगर कुँवर सिंह तो उनके हाथों से निकल रहे थे..।
जब ये बात अंग्रेज को पता चला तो उनके जनरल पागल हाथी की तरह बेकाबू हो गए..आजमगढ़ की जनता पर बेरहम अत्यचार किये..जो भी आया सबको मौत के घाट उतार दिया गया..।
कुँवर सिंह को पकड़ने के लिए ली ग्रांड के नेतृत्व में एक टुकड़ी भेजा गया..।

22 अप्रैल 1858 को गंगा नदी को पार करते वक़्त ली ग्रांड की सेना ने अंधाधुंध गोलियां चलाना शुरू किया..एक गोली कुँवर सिंह के बांह में आकर लग गई..उन्होंने तुरंत तलवार निकाला और उस हाथ को दूसरे हाथ से काटकर गंगा में बहा दिया...जिससे गोली की जहर पूरे शरीर मे ना फैल जाए..।।
ली ग्रांड की सेना ने जब इन्हें चारों और से घेर लिया तो इस अवस्था मे भी वो साहस से लड़ें और ली ग्रांड की सेना को हरा कर जगदीशपुर पहुंचे..।।

खून बहुत बह जाने के कारण इनकी तबियत खराब होने लगी और 26 अप्रैल 1858 को इस महान योद्धा ने अपना शरीर त्याग दिया..
जब इनकी मृत्यु हुई तो इनके किला पे यूनियन जैक का झंडा नही बल्कि जगदीशपुर का झंडा फहरा रहा था..।

1857 के क्रांति के इकलौते नायक जिसे अंग्रेज जीते जी नही हरा पाया...

1857 के क्रांति के इकलौता नायक जिसके ऊपर अंग्रेज को 20 हजार का इनामी राशि रखना पड़ा..

1857 के क्रांति के इकलौता नायक जो सिर्फ अपने क्षेत्र तक ही नही बल्कि पूरे उत्तर भारत से लेकर मध्य भारत तक अंग्रेजो से लड़ा..

1857 के क्रांति के इकलौते नायक जो सिर्फ क्षेत्रीय स्तर पर नही बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर उभरे..।।

अंग्रेज इतिहासकार ने इनके बारे में कहा-
"भाग्य मनाओ की ये बूढा है,अगर जवान होता तो क्या होता"

V. D सावरकर ने अपने किताब "1857 प्रथम स्वंतंत्रता संग्राम" में 7 क्रांतिकारियों की चर्चा की है जिसमे से वीर कुंवर सिंह एक है..।।

अब जरा आप सोचिये..
एक 80 साल का बूढा जिसने अंग्रेज हुकूमत को नाक में दम कर दिया..अंग्रेज उनसे जीते जी नही जीत पाया..हर बार मुँह की खानी पड़ी...।।
मगर आज की युवाओं की दशा क्या है..??
दशा इसलिए है क्योंकि कोई दिशा नही है..।।

आप तो युवा है..
और स्वतंत्र है..
तो फिर ये दशा क्यों है..??
जिस बुराइयों के बेड़ियो से बंधे है..
उन्हें तोड़ दे..।
जिस मोह में फंसे है..
उसे मरोर दे..।
अब नही तो और कब..।
80 साल का बूढा कुँवर सिंह अंग्रेज सामज्र्य को अपने अंगुलियों पे नचाया..
आप तो युवा है...
और स्वतंत्र है..
तो फिर ये दशा क्यों है..??


गुरुवार, 10 अप्रैल 2025

वर्धमान से महावीर की यात्रा..

यात्राएं सिर्फ जीवन का ही नही, बल्कि पूरी दुनिया की दिशा तय करता है..।
दुनिया में जितने भी बदलाव हुए उसकी शुरुआत एक छोटी या बड़ी यात्रा से ही हुई..।।



आज से ~600 ईसा पूर्व एक यात्रा का शुरुआत हुआ था जिसने पूरे विश्व को बदल दिया अपने "अहिंसा"के पैगाम से..वो पैगाम लेकर के आये जैन धर्म के 24वे तीर्थंकर "महावीर" उनका जन्म बिहार के वैशाली(कुण्डलग्राम) में हुआ था..
"कल्पसूत्र"में कहा गया है कि वो माँ के गर्भ में भी शांत और स्थिर रहते थे,ताकि माँ को कोई तकलीफ न हो..।

महावीर अपने उपदेश में सिर्फ अहिंसा पर ही बल नही देते बल्कि दुनिया के प्रति करुणा की दृष्टि रखने पर बल देते है..क्योंकि बिना करुणा के अहिंसा का भाव जागृत नही हो सकता..
आज पूरा विश्व वैमनस्य और हिंसा से भरा हुआ है..
ऐसी परिस्थिति में महावीर का अहिंसा का भाव ही लोगों को इस दलदल से उबार सकता है..।।

वर्धमान से महावीर बनने की यात्रा की शुरुआत बाल्यकाल में ही, हो गया था वो अक्सरहाँ अपने माँ के साथ पूजा करने के लिए बैठते थे..माँ पूजा करके उठ जाती थी और वो बैठे ही रहते थे..ये सिलसिला सिर्फ घर मे ही नही बल्कि जब भी वो अकेले होते तो वो ध्यानमग्न होकर बैठे जाते..।
माता-पिता के अंदर डर पैदा हुआ..कंही पुत्र संन्यासी न हो जाये..ये डर सही निकला जब वो 15 साल के थे तब वो अपने माता-पिता से कहें कि मुझे सन्यास लेना है..
माँ ने रोना-धोना शुरू कर दिया..फिर माता-पिता ने कहा- जब हम शरीर त्याग देंगे तब तुम संन्यास धारण कर लेना..
माता-पिता के शरीर त्यागने के ठीक 13वे दिन 30 साल के उम्र में वो, अपने बड़े भाई नंदिवर्धन से अनुमति लेकर गृहत्याग किये..
और 12 वर्ष की कठिन तपस्या के पश्चात ऋजुपालिका नदी के किनारे और साल वृक्ष के नीचे उन्होंने "कैवल्य" की प्राप्ति की..
इस 12 वर्ष की तपस्चर्या ने उन्हें महावीर बना दिया..।
इन्होंने पहला उपदेश वितुलाचल की पहाड़ी(राजगीर) पर दिए..।
मगर आज तक ना ही महावीर को और, ना ही जैन धर्म के सिद्धांत को अभी तक पूर्णतया समझा गया है..
क्योंकि महावीर को समझने के लिए आपको मनोचिकित्सक बनना होगा..

जैन धर्म के त्रिरत्न-
¡. सम्यक ध्यान
¡¡. सम्यक ज्ञान
¡¡¡. सम्यक चरित्र

जैन धर्म के पांच महाव्रत 
¡. अहिंसा (मन,कर्म, वचन से कष्ट न देना)
¡¡. अचौर्य/अस्तेय(चोरी न करना)
¡¡¡.अमृषा(असत्य)
¡V. अपरिग्रह(जरूरत से ज्यादा न संग्रह)
V. ब्रह्मचर्य (ब्रह्म का आचरण)


जैन धर्म का "स्यादवाद" का सिद्धांत - वर्तमान में हरेक समस्या का समाधान है..
ये सिद्धान्त कहता है कि कोई भी गलत नही है सब सही है... परिस्थिति,काल और परिवेश के अनुसार..।।

आज हरेक समस्या का तो यही जड़ है कि कौन सही है..??स्यादवाद का सिद्धांत हमे समाधान देता है..



आपने 3 अंधे और एक हाथी की कहानी सुना होगा..
1 अंधा जब हाथी का पाँव छूता है तो कहता है कि ये पेड़ की तरह है..
2रा अंधा जब हाथी के पूंछ को छूता है तो कहता है कि ये रस्सी की तरह है..
3रा अंधा जब हाथी के सूढ़ को छूता है तो कहता है कि ये तो सांप की तरह है...
तीनों अंधे सही है अपने-अपने अनुसार,यही है स्यादवाद का सिद्धांत..।।

आज समय आ गया है कि हम फिर से महावीर को समझे..
जैन धर्म के सिद्धांतों को समझे..।।
आज विश्व के हरेक समस्याओं का समाधान "स्यादवाद" और "अनेकान्तवाद" के सिद्धांत में छुपा हुआ है..।।

हम फिर से महावीर की यात्रा को अनुसरण करें..
क्योंकि यात्रा सिर्फ जीवन ही नही, बल्कि विश्व की दिशा और दशा भी बदलती है..








गुरुवार, 23 जनवरी 2025

सुभाष चंद्र बोस..

1905 के "स्वदेशी आंदोलन" के समय एक किशोर बंगाली क्रांतिकारियों का फोटो पेपर से काट कर दीवाल पे चिपकाता है..जिसको देखकर ब्रिटिश सरकार के कर्मचारी, उसके पिता ने घबराकर उसे फाड़कर फेंक दिया..

15 साल की उम्र में अपने माता को पत्र लिखता है-
"क्या हमारे देश की हालत बद-से-बदतर ही होती जाएगी, क्या भारत माता का कोई लाल अपने हितों को छोड़कर अपना पूरा जीवन माँ के प्रति समर्पित नही करेगा..??"

ये पत्र लिखने के बाद कुछ समय के बाद ही वो स्वंतंत्रता सेनानी हो गए... जिनके देशभक्ति को गांधीजी ने सर्वोत्तम बताया..

वो व्यक्ति नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे..


इनके पिता ने बड़े प्यार से इनका नाम सुभाष रखा जिसका मतलब अच्छा बोलने वाला होता है...उनके पिता ने कल्पना नही की होगी कि वह अपने भाषण क्षमता का इस्तेमाल वे लोगो मे क्रांतिकारिता का जोश भरने के लिए करेंगे..

1940 में 11वी बार गिरफ्तार करके बोस को  कलकत्ता के प्रेसिडेंसी जेल में डाल दिया वंहा तबियत अस्वस्थ होने के बाद उन्हें घर मे ही नजरबंद कर दिया गया.. 
17 जनुअरी 1941 को आधी रात को बीसवीं सदी की सबसे बड़ी साहसिक राजनीतिक पलायन किया..जबतक अंग्रेज़ को पता चला तबतक वो काबुल जाने के लिए पेशावर पहुंच गए..फिर वो मास्को गए वंहा से बर्लिन पहुंच गए..

"अगर किसी राष्ट्र के पास सैन्य ताकत नही है,तो वह अपनी आजादी को बचाने की उम्मीद नही रख सकता ।"

जर्मनी से वो फिर जापान पहुँचे और वंहा 'आज़ाद हिंद फौज' के नेता बन गए..इनके फ़ौज में ~50 हजार फ़ौज थे..
 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में सभी नेताओं को जब गिरफ्तार कर लिया गया था,तब आजाद हिंद फौज अपने चरम पर था..वो भारत के पूर्वी क्षेत्र में घुसने में कामयाब रही.

मगर तबतक जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया..कुछ महीनों के बाद बोस रुस के लिए निकले..ताइपे में ईंधन भराने के बाद ज्योहीं प्लैन हवा में उड़ा , आग लग गई..जिसका कोई साक्ष्य नही है..
मगर बोस कंहा गए पता नही चला..
इस घटना पे जॉर्ज ऑरवेल कहते है- दुनिया के लिए ये अच्छा हुआ।

इसके लिए 3 आधिकारिक आयोग बने,आखरी आयोग 2006
में बना जिसमे मान लिया गया कि उनकी मृत्यु 1945  में ही हो गया था..।।
भारत के बाहर उन्हें जो प्रतिष्ठा मिली थी.. 
उनके मृत्यु के बाद भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनका असर बना रहा..

1921 में अपने भाई शरत को पत्र में लिखा था-

"जिंदगी में कोई संघर्ष न हो,
तो उसका आधा मजा चला जाता है ।"


मंगलवार, 21 जनवरी 2025

नास्त्रेदमस

"नास्त्रेदमस" का नाम सुनते ही आपके जेहन में क्या आता है..
एक भविष्यवक्ता, जिसके कई भविष्यवाणी सच हुए है..।

इसके अलावा हममें से शायद ही किसीको पता होगा कि उन्हें ने मानव समुदाय के लिए और क्या किया...।।



हममें से अक्सरहाँ लोगों को "यूरोप के प्लेग त्रासदी"(ब्लैक डैथ) के बारे में जानकारी होगी..
ये त्रासदी ऐसा था कि, यूरोप की आबादी 50% से कम हो गया था..

ये समय 1528 का था जब "नास्त्रेदमस" ने इस त्रासदी में अपने पत्नी और 2 बच्चों को खोया..
इसके बाद वो प्लेग को समझने का प्रयास करने लगे...
औरों लोगों को समझाने का प्रयास किया कि- ये कोई भगवान का कहर नही बल्कि एक बीमारी है...
लोगों में अंधविश्वास इतना था कि, लोग घाव के जगह चूहे को पकड़कर सहलाते थे..उनका विश्वास था कि इससे घाव ठीक हो जाएगा..।।

नास्त्रेदमस ने अपने आस-पास अध्ययन करने पर पाया कि-
प्लेग का सबसे बड़ा कारण अस्वच्छता है..
उन्होंने ही सर्वप्रथम यूरोप के लोगों को पानी उबालना सिखाया और उस पानी का इस्तेमाल करना सिखाया..

उन्होंने प्लेग से मरे रोगी को अच्छी तरह दफ़नानं सिखाया..
उन्होंने पूरे यूरोप को स्वछता का पाठ सिखाया..
कुआँ,नाला,तालाब,नदी को स्वछता के प्रति लोगों को जागरूक करने में सफल रहे..

उनके इस प्रयास के कारण उन्हें यूरोप में प्लेग का डॉक्टर के नाम से लोग पुकारने लगे..
मगर हम उन्हें किस रूप में जानते है..।।

आज हममें से कई लोग यूरोप की स्वछता की बात तो करते है..
मगर इसके पीछे जिसका अहम योगदान था उसके बारे में हम नही जानते...।।

"कोई जरूरी नही की हम सबकुछ जाने ही..
जरूरी ये है कि हम जिसे जाने,उसे अच्छी तरह जाने..."





सोमवार, 13 जनवरी 2025

शास्त्री जी की 59वी पुण्यतिथि..??

हमने 11 जनुअरी को लालबहादुर शास्त्री जी की 59 वी पुण्यतिथि मनाई है,अगर वो राजनीतिक भेंट नही चढ़ते तो शायद हम इसदिन को उनके पुण्यतिथि के रूप में नही मनाते..।

लालबहादुर शास्त्री जी ने ताशकंद समझौता के बाद अंतिम फोन अपनी पत्नी को किया,
पत्नी ने कहा -ये आपने क्या कर दिया..
शास्त्री जी ने कहा जब तुम ऐसा कह रही हो,तो देश क्या कह रहा होगा..
मगर मैं एक खुशखबरी ला रहा हूँ,जिसे सुनकर तुम खुश हो जाओगी..
मगर उनके मृत्यु के साथ ही ये खुशखबरी भी खत्म हो गई..।

ताशकंद में अम्बेसडर T.N कौल थे,(जो इंद्रा गांधी के रिश्तेदार था) और उनके कुक मोहम्मद जॉन(सरकारी कुक) था,जिसने शास्त्री जी को पीने के लिए दूध दिया था।मोहम्मद जॉन रिटायरमेंट के बाद पाकिस्तान चला गया, और भारत से उसे पेंसन मिलता रहा.. ।और T.N कौल को फॉरेन सिकरेट्री बना दिया गया।।



1965 के युद्ध में पाकिस्तान की हार हुई मगर उससे ज्यादा बेइज्जती अमेरिका का हुआ,क्योंकि उसके सेबर जेट,और पेटेन्ट टैंक जो दुनिया की सबसे ज्यादा ताकतवर हथियार माना जाता था,उसे हमारे केनबरा और नेट ने उसके हथियार को ऐसी-तैसी कर दिया था..।।

सरकार के अनुसार शास्त्री जी की मृत्यु heart attack  से हुई थी,मगर उनके परिवार के अनुसार उनकी मृत्यु जहर से हुई..।उनका शरीर नीला हो गया,और फुल गया था,जो जहर के कारण ऐसा होता है।
कांग्रेस के नेता महावीर प्रसाद भार्गव ने संसद में कहा कि रूसी सरकार ने पोस्टमार्टम के लिए कहा था मगर हमने मना कर दिया..उस समय के गृह मंत्री ने कहा कि ऐसा कोई बात नही हुआ था..।
1990 के दशक में L.P singh अपनी किताब लिखते है जो उस समय के गृह सचिव थे,जिन्होंने अपनी किताब में इस बात को लिखा कि रूसी सरकार ने पोस्टमार्टम के लिए कहा,और हमलोगों ने मना कर दिया था।
शास्त्री जी के ताशकंद यात्रा से पहले एक IB अधिकारी ताशकंद गया था और उसने अपने रिपोर्ट में कहा कि यंहा रहने की व्यवस्था अच्छा नही है,जिस कारण उसे वंहा से हटा दिया गया।

शास्त्री जी के डॉक्टर, डॉ चुक की मृत्यु चण्डीगढ़ जाते हुए ट्रक से एक्सीडेंट हो गया जिसमें सिर्फ एक बच्चा बचा(लड़की) बाकी सब मर गया,उस ट्रक का कोई पता नही चला।वंही शास्त्री जी के पर्सनल अटेंडेंट रामनाथ की भी मृत्यु इसी तरह से हुई,क्योंकि इन दोनों ने शास्त्रीजी की मृत्यु के ऊपर आवाज उठाई थी..।

1990 के दशक में सोवियत रसिया टूटनी शुरू हो गई जिससे पुरानी बातें सामने आने लगी,भारत मे रशियन एम्बेसी से एक मैगज़ीन आया करती थी जिसका नाम "सोवियत लैंड" था।1991 में एक आर्टिकल छपती है जिसे लिखने वाला KGB का फॉर्मर अफसर था,जिसने लिखा कि शास्त्री के पूरे कमरे को हमने टेप किया था(हरेक सरकार करती है),जब शास्त्री को सीजर आया तो हमें लगा कि कोई गड़बड़ है,मगर इसकी बात कोई नही कर रहा है,हमने उस समय इसलिये नही बताया कि भारत को लगता कि हम टेप कर रहे है।मगर भारत सरकार ने रसिया से शास्त्री जी के अंतिम समय के टेप नही मांगी..

शास्त्री जी की मृत्यु के पीछे कभी अमेरिका, कभी रसिया तो कभी अंदरूनी हाथ बताया जाता है..।

अमेरिका के साथ शास्त्री जी के संबंध अच्छे थे क्योंकि वो ताशकंद जाने से पहले अमेरिकन राष्ट्रपति से बात करके गए थे,और अमेरिका भी चाह रहा था कि ये संधि हो जाये...हाल ही में ढेर सारे अमेरिकन रिकॉर्ड सामने आए है,मगर शास्त्रीजी से जुड़े हुए एक भी साक्ष्य नही मिले..

जंहा तक रसियन की बात है,उसने भारत सरकार से शास्त्री जी की पोस्टमार्टम करने की अनुमति मांगी ,मगर नही दिया गया, KGB ने हरेक कुक को हिरासत में लेकर उससे पूछताछ की...एक रसियन कुक ने कहा कि मोहम्मद जॉन ही आखरी समय शास्त्री जी को दूध दिया...भारत सरकार ने उसके ऊपर कुछ नही किया..।।
जंहा तक भारत सरकार की बात है तो उस समय के अम्बेसडर TN कौल तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश किया..सच सामने नही आने दिया गया...और TN कौल की प्रोन्नति होती रही...।

वो खुशखबरी क्या थी जो शास्त्री जी अपनी पत्नी को सुनाने वाले थे-
"कुछ इतिहासकार का कहना है कि शास्त्री जी ताशकंद समझौता पे हस्ताक्षर करने के लिए इस लिए राजी हुए की,उन्होंने शर्त रखा कि उन्हें नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से मिलाया जाए, रसिया राजी हो गया और उन्हें साइबेरिया ले जाया गया और वंहा पे वो नेताजी से मुलाकात किया,और उसी रात ताशकंद समझौता पे हस्ताक्षर करने के बाद उनकी मृत्यु हो गई।।
मालूम नही सच क्या है...।।"

शास्त्रीजी की मृत्यु राजनीतिक भेंट चढ़ गई..आज तक सरकार ने कोई भी रिकॉर्ड लोगों के सामने नही लाया.जिससे सच का पता चल सके..
जिसने हमें-"जय जवान,जय किसान" का नारा दिया...वो घटिया राजनीति के भेंट चढ़ गया...।
मगर कभी न कभी सच तो सामने आएगा..।।

अनुज धर ने शास्त्री जी पर ढेर सारे रिसर्च किये जिसपे "द ताशकंद फाइल्स" नामक फ़िल्म(   https://youtu.be/ikblK9gzKxA?si=WbagNxTcDtFo5TSo  ) आई थी,और उन्होंने बुक भी लिखा..







रविवार, 12 जनवरी 2025

स्वामी विवेकानंद: संघर्ष से विवेकानंद की यात्रा..

अगर मैं पुछु..50,100,1000 साल पहले के लोग के नाम बताए..
तो आप किन-किन लोगों के नाम बता पाएंगे..।।



अच्छा जिन लोगों के नाम आपके जेहन में आ रहे है...
आखिर उनका ही नाम क्यों आ रहा है..??

"जिसका संघर्ष जितना बड़ा होता है,
 वो उतने ही लंबे समय तक याद किये जाते है ।"

आपके जेहन मैं जिनका-जिनका नाम आया है उन सबों ने संघर्ष करके ही अपनी छाप छोड़ी है..।
हम जब उस स्तर के संघर्ष नही कर पाते,तो उनके संघर्ष को कम दिखाने के लिए उन्हें देवत्व स्वरूप मानने लगते है, उनके महानता के अनेक मनगढंत कहानियां रचने लगते है..।।

आज उस संघर्षरत संन्यासी का जन्मदिन है,वो हट्टा-कट्टा इंसान थे,जो कम-से-कम 80 साल तो अवश्य जीते,मगर उनकी मृत्यु 39 साल की उम्र में हो गई।
और हमने क्या किया जब तक जिंदा रहे तबतक तो उनकी मदद नही की और हमने उनके मरने के बाद उन्हें महान बना दिया..।।
आज उसी संन्यासी का जन्मदिन है जिनके नाम पर हम
"युवा दिवस"मनाते है,उनका नाम "स्वामी विवेकानंद" था।।

स्वामी विवेकानंद से क्या सीखे...??
उनसे नही उनके संघर्ष से हमें सीखनी चाहिए,जो हमें बताया नही जाता..।।
आखिर वो शिकागो कैसे गए..??
वो वंहा समय से पहले पहुंच गए थे वो समय उन्होंने कैसे गुजारा..।।
जब वो उपनिषद के विचारों को पश्चिम में फैला रहे थे,तो भारतीय ही उनके कार्यो में रोड़ा डाल रहे थे,यंहा तक कि उन्हें दुराचारी और ठगी कह कर बदनाम किया जा रहा था..।।
 "बिहारीदास देसाई"को 20 जून 1894 में लिखित पत्रों में उन्होंने अनेक बातों का जिक्र किया है,जो ज़्यादती भारतीय ही उनके साथ कर रहे थे..
यंहा तक कि भारत के अखबारों में उनके चरित्र पर प्रश्न उठाये गए..तो इनके बारे में जब उन्हें गुरुभाई ने बताया तो उन्होंने आक्रोशित होकर कहा -"ये गुलाम मानसिकता के लोग मेरे बारे में क्या कहेंगे,जब हमें गुलामी की मानसिकता जकड़ लेती है तो हमारे अंदर ईष्या पैदा हो ही जाती है"।

उन्होंने अपने पत्रों में लिखा कि भारतीय लोग मेरे कार्यों के लिए  1 पैसे तक कि मदद नही कर रहें है,और जो पश्चिम में करना चाहते है,उन्हें भी करने से रोक रहे है..।।

अपने मिशन को साकार करने के लिए जितने संसाधन की जरूरत थी,वो उनके जीवनकाल में कभी उपलब्ध नही हुए ।
वे सालों-साल प्रतिदिन भाषण देते, पदयात्रा करते,विदेश जाते और जनसाधारण तक वेदांत और सनातन धर्म की शिक्षा देते..।

स्वामीजी ने बहन निवेदिता के लिखे पत्रों में कहा कि,आजकल मेरी तबियत ठीक नही रहती,शायद देर रात तक रोज भाषण देने के कारण,और एक-एक पाइ का हिसाब रखने के कारण..।

जबतक स्वामी विवेकानंद जिंदा रहे तबतक उन्हें वो सम्मान हमनें नही दिया..यंहा तक कि उन्होंने अपने माँ के घर के लिए अग्रिम पैसा बेचने वालों को दिया था,वो पैसा भी इसने ये सोच के घपला कर लिया कि ये संन्यासी है,तो कोर्ट नही जाएगा...।।
हमने सिर्फ उन्हें यातना ही दिया है..

उन्होंने अंतिम समय मे "रामकृष्ण मिशन" की स्थापना की..
विवेकानंद लिखते है कि इस मिशन के बारे में इतना दुष्प्रचार किया जा रहा था कि हम गुरुभाइयों के लिए चावल तो बन जाता था,मगर नमक के अभाव में सिर्फ चावल ही खाना पड़ता था..।।मगर वो शुकुन के क्षण थे..क्योंकि मैंने अपना कार्य कर चुका था..।।

बंगाल के लेखक "मणिशंकर मुखर्जी"लिखते है कि स्वामी विवेकानंद को अभास था कि अगर हम अपने स्वास्थ्य की परवाह किया तो मैं अपने कार्यो को नही कर पाऊंगा..
जब उनकी मृत्यु हुई तो उनके अनेक पत्र-आलेखों से पता चलता है कि उन्हें 31 प्रकार की बीमारी थी..।।
और ये बीमारी उनके निरंतर अपने लक्ष्य प्राप्ति की और अग्रसर होने के कारण हुआ..।।
आज वो हमारे बीच नही है, मगर उनके द्वारा किया गया संघर्ष आज भी पूरे विश्व को, रामकृष्ण मिशन के रूप में सिंचित कर रहा है..
आज विश्व के लगभग हरेक देश मे रामकृष्ण मिशन की शाखा है,और इनका धेय्य "मानव सेवा ही भगवान की सेवा के रूप मे है"।।

स्वमी विवेकानंद से हम बहुत कुछ सीख सकते है-
मगर वर्तमान में सबसे ज्यादा अगर उनसे सीख सकते है तो उनसे यही सीख सकते है कि- 
"संघर्ष चाहे कितना भी बड़ा क्यों ना हो,
परिस्थितियां भले ही कितना भी, विपरीत क्यों न हो,
अपने लक्ष्य से कभी नही हटना है,
चाहे इसके लिए सरस्व क्यों ना दांव पे लगाना पड़े"

मगर आज के युवा क्या कर रहे है...
थोड़ी सी ही परेशानियां में हताश और निराश ही नही बल्कि मौत को गले लगा लेते है..
जो बिल्कुल गलत है..।।

स्वामी जी को भविष्य की पीढ़ियों से बहुत आस थी..
मगर आज की पीढ़ी को अगर वो कंही से देख रहे होंगे तो बहुत निराश होंगे..
क्योंकि स्वामी जी अपने गुरु भाई से कहा करते थे कि हमें मध्यम वर्ग के युवाओं से सबसे ज्यादा उम्मीद है..क्योंकि ये ही क्रांति के वाहक है,ये ही बदलाव के वाहक है..
मगर आज के मध्यम वर्ग के कुछ युवा तो नेटफ्लिक्स,ऐमज़ॉन प्राइम वीडियो,इत्यादि पे विन्ज़ो वाच करके रात गुजारते है,जिन युवाओं को मैदान में होना चाहिए और शरीर को हष्ट-पुष्ट बनाना चाहिए वो युवा आज स्मार्टफोन पे अपने शरीर को नष्ट कर रहे है..।।
स्वामी विवेकानंद को जिन लोगो से डर था,उनका डर सही था क्योंकि आज भी भारत मे कुछ चंद लोगी का ही वर्चस्व है,जो आज भी बदलाव को पाँव से कुचल रहे है,और अपने अनुसार देश की दशा और दिशा तय कर रहे है..।।

मगर कभी-न-कभी तो विवेकानंद का स्वप्न जरूर पूरा होगा-
         "उठो,जागो और अपने लक्ष्य की प्राप्ति करो।"

https://mnkjha.blogspot.com/2023/01/blog-post_12.html