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मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

खुद के बारे में सोचो..

खुद के बारे में सोचो..
आखिर तुम कर क्या रहे हो..??
क्या यही सोच के तुम बड़े हुए हो..??
खुद के बारे में सोचो..
तुम कर क्या रहे हो..??
क्या अपने सोच से..
तुमने समझौता कर लिया है..
अगर,हां..??
तब ठीक है..
तुम जैसे जी रहे हो..
वैसे जियो..।

अगर,नही...
तो धिक्कार है,तुमपे..
तुम अबतक आखिर कर क्या रहे हो..??
सिर्फ सोचने से क्या होता है..
वो पैर जो जकड़ चुके है..
उसे हिलाओ,डुलाओ..
और अपने सोच को साकार करने के लिए..
उस और कदम बढ़ाओ..।।



न तुम आलसी हो..
न ही तुम कायर हो..
न ही तुम निर्लज्ज हो..
न ही तुम नकारा हो..।
तुम में वो सबकुछ है..
जिससे तुम अपने सपने को 
साकार कर सकते हो..
तो फिर आखिर क्यों..??
अपना जिंदगी बर्बाद कर रहे हो..??
खुद के बारे में सोचो..
आखिर तुम कर क्या रहे हो..??

अगर तुम ठान लो..

अगर तुम ठान लो कि जीना है..
तो तुम्हें, जीने से कौन रोक सकता है..।
क्योंकि..
मैंने सूखे हुए पेड़ो से कलगी देते हुए देखा है..
मैंने मुरझाए हुए चेहरे पे मुस्कान देखा है..।
मैंने असंभव को संभव होते हुए देखा है..।।

आखिर कब तक ये सब सिर्फ मैं देखता रहूंगा..
इनसब से हौंसला लेकर..
अपने सपनों को साकार करूँगा..।।

अगर तुम ठान लो कि जीना है..
तो तुम्हें, जीने से कौन रोक सकता है..।



तुम कर सकते हो..

अगर अपना सपना साकार करना हो..
तो अपने प्रति क्रूर होइये..
सिर्फ अपने प्रति ही नही बल्कि..
अपनों के प्रति भी क्रूर होइये..।।




आप जबतक अपने प्रति क्रूर नही होंगे..तो आपके सपने, सपने ही रह जाएंगे।समय हाथ से निकल जायेगा और आप सिर्फ हाथ मलते रह जाएंगे..।
खुद को देखिए आईने..
क्या खुद पे गुस्सा नही आता,
क्या खुद से घिन्न नही आता..।
क्या थे आप और क्या हो गए है आप..।।

तोड़ दीजिए उस बेड़ियों को..
जो अब ढाल बन चुका है..
नोच दीजिए उस केचुल को,
जो आपका पहचान लील रहा है..।
माना कि ये संभव नही है..
मगर असंभव आखिर क्या है..।

खुद से पूछिए..
आखिर क्यों जन्मा आपके माता-पिता ने..??
क्या अपेक्षा किया आपके चाहने वालों ने..??
और क्या कर रहे है आप..??
खुद से पूछिए..।

शायद ये जबाब देने की हिम्मत न हो आपमें..
मगर जो भी हो..
आप कायर तो नही है..।

एक बार फिर क्यों नही प्रयास करते हो..
अपने उस छवि को क्यों नही साकार करते हो..
जिस छवि से अपेक्षा थी सबोको...
उस छवि को क्यों नही साकार करते हो..
एक बार फिर क्यों नही प्रयास करते हो..।

आखिर क्या नही होता है..
प्रयास करने से..
लोगों ने हिमालय के साथ चंद्रमा को भी फतह किया..
तुम आखिर क्यों नही..
अपने सपनों को फतह कर सकते हो..??

खुद को देखो एकबार आइने में..
और फिर से उस छवि को स्वीकार कर..
अपने सपने को साकार कर..।।
तुम कर सकते हो..।।
सच मे तुम कर सकते हो..।।

व्हाट्सएप और यात्रा..

क्या आपको पता है..
वर्तमान समय मे अपनों से जुड़ने का सबसे बड़ा साधन क्या है..??
चाहे मैसेज भेजना हो,कॉल करना हो या फिर वीडियो कॉल करना हो..या फिर अपने चाहने वालों को थोड़ा जलाना ही क्यों न हो..तो हम क्या करते है..व्हाट्सएप करते है..

क्या आपको पता है वर्तमान समय मे व्हाट्सएप इस्तेमाल करने वालों की संख्या कितना है..330 करोड़ ।
प्रत्येक दिन 100 अरब मेसैज व्हाट्सएप के द्वारा हम एक दूसरे को भेजते है..।




क्या आपको पता है..व्हाट्सएप का निर्माण कैसे हुआ..??
अक्सरहाँ जब हमें रिजेक्शन मिलता है तो हम हताश और निराश होते है..मगर कुछ लोग कीर्तिमान रचते है..।

उन्ही में से एक है ब्रायन एक्टन जिन्होंने स्टेनफोर्ड से सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की और एप्पल कंपनी में पहला जॉब किया फिर कई कंपनी में काम किया अंत मे याहू! कंपनी के साथ 2007 तक जुड़े रहे..।फिर अपने मित्र "जैन कूम" के साथ 1 वर्ष के लिए साउथ अमेरिका की यात्रा पर निकल गए..।
जब अपना यात्रा पूरा कर वापस आ रहे थे तो दोनों ने फेसबुक और ट्विटर के पास नॉकरी के लिए अप्लाई किया..मगर दोंनो कंपनी ने इन्हें रिजेक्ट कर दिया..।
"ऐक्टन" ने मई 2009 में एक ट्वीट किया- ट्विटर के हेडक्वार्टर से रिजेक्शन मिला,ठीक ही है..इतना दूर जाना-आना भी मुश्किल होता।

फिर उन्होंने अगस्त 2009 में एक ट्वीट किया - फेसबुक ने मुझे अस्वीकार कर दिया,यह शानदार लोगों के साथ जुड़ने का अद्भुत अवसर था।देखते है आगे क्या होता है..।।

पता है इसके आगे क्या हुआ..??
इसी वर्ष सिलिकॉन वैली,कैलिफोर्निया में व्हाट्सएप को संस्थापित करते है..।
इसके बाद क्या हुआ हम सब जानते है...।

2014 में फेसबुक ने 19.3 बिलियन $ में खरीद लिया..यह तकनीकी इतिहास के सबसे बड़े अधिग्रहणों में से एक था..।।

यात्रा जरूरी है..
यात्रा सिर्फ जिंदगी नही,
बल्कि दुनिया बदल देती है..।
दुनिया मे बड़े बदलाव यात्रा से ही हुई है..

रविवार, 12 अप्रैल 2026

अलविदा 'स्वर-साम्राज्ञी': आशा भोसले

आज संगीत की दुनिया का एक ऐसा सूरज अस्त हो गया है, जिसने अपनी किरणों से सात दशकों तक भारतीय सिनेमा और संगीत को आलोकित किया। आशा भोसले, जिन्हें दुनिया प्यार से 'आशा ताई' कहती थी, अब हमारे बीच नहीं रहीं। लेकिन क्या वाकई एक कलाकार मरता है? शायद नहीं।



 उनकी आवाज़ की खनक, उनकी हरकतों में छुपी शरारत और उनके सुरों की गहराई अब हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी है।

आशा जी का जीवन एक प्रेरणादायक कहानी है। एक ऐसे दौर में जब उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर की आवाज़ का जादू पूरी दुनिया पर छाया हुआ था, अपनी अलग जगह बनाना लगभग नामुमकिन था। लेकिन आशा जी ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने 'सेकंड लीड' और उन गानों को अपनाया जिन्हें उस दौर में चुनौतीपूर्ण माना जाता था। उन्होंने साबित किया कि "प्रतिभा को किसी की परछाई दबा नहीं सकती।"

हम अक्सरहाँ आशा ताई को मुस्कुराते ही देखे है..मगर एक दौर ऐसा था जब ये अपने जिंदगी से तंग आकर जिंदगी से मुँह मोड़ने की सोच रही थी..।

1949 में 16 साल की उम्र में लता मंगेशकर के सचिव गणपत राव भोंसले से भाग कर शादी कर लेती है..जिस कारण इनकी बहन और माँ इनसे रिश्ता तोड़ लेती है..।जिस कारण इनको आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा..साथ ही जिसके लिए परिवार छोड़ा वो इनके साथ हिंसा करने लगा जिस कारण 1960 में तलाक ले लिया..।

जब इन्होंने अपने पति से तलाक ले लिया तब फिर से परिवार वालों से संबंध अच्छा हो गया..।

•1956 में R.D.बर्मन से मुलाकात होती है और दोस्ती गहरी हो जाती है..इन दोनों ने मिलकर कई सुपरहिट सदाबहार गाने दिए है..।

R.D.बर्मन आशा भोंसले से शादी करना चाहते थे,मगर R.D वर्मन के परिवार वाले नही चाहते थे क्योंकि आशा भोंसले उनसे उम्र में 6 साल बड़े थे..जब RD बर्मन के पिता की मृत्यु हो गई और माँ की तबियत अस्वस्थ रहने लगी,तब उन्होंने 1980 में आशा भोंसले से शादी कर लिया..।।

●1943 में 10 वर्ष की उम्र में पहला गाना मराठी में गाया।

●1948 में फ़िल्म चुनरियां के लिए हिंदी में पहली बार गाया।

●उन्होंने 20 भाषा मे 12हज़ार से ज्यादा गाना गाई..।

●2011 में इनका नाम गिनीज बुक वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज है..।

●2010 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया..।

●1997 में ग्रेमी अवार्ड में नॉमिनेट होने वाली पहली भारतीय गायिका बनी थी..।।

आज वो हमारे बीच में नही है..मगर उनके गाने आज भी हमारे बीच मे हो..वो अपने सदाबहार गानों के कारण हमेशा जिंदा रहेंगी..।।

"संगीत की दुनिया मे कोई दूसरी 'लता' तो बन सकती है,लेकिन 'आशा' बनना नामुमकिन है।-लता मंगेश्कर


शनिवार, 28 मार्च 2026

चार्ली चैपलिन..लंदन के सड़कों से उठकर विश्व के मानसपटल तक..

"मुस्कुराओ, भले ही तुम्हारा दिल टूट रहा हो... अगर तुम मुस्कुराओगे, तो देखोगे कि जीवन अभी भी जीने योग्य है।"

आज एक किताब पढ़ रहा था..और उसमें चार्ली चैपलिन का जिक्र आया..और तब से उन्हें और जानने की इच्छा हुई..इससे पहले भी कई दफा उनके बारे में पढ़ा,सुना और उनकी कई मूवीयाँ देखी है..मगर उन्हें जितने बार पढ़ो हरेक बार कुछ नया जानने को मिलता है,नया सीखने को मिलता है..।
आज की जेनरेशन उनके बारे में जानती तो होगी..मगर उन्हें नही जानते होंगे..जिन्होंने उन्हें चार्ली चैपलिन बनाया..।
चलिये उनके बारे में कुछ नया जानते है..।



क्या आपको पता है..वो पहली बार स्टेज पर परफॉरमेंस कितने साल के उम्र में किये..??
5 साल की उम्र में..हां 5 साल की उम्र में..
हो सकता है इसमें से कइयों को ये ताज्जुब न लगे..मगर इसके पीछे की कहानी आपको थोड़ा हैरान कर देगा..शायद नही करेगा..।

● चार्ली की माँ, हन्ना चैपलिन, लंदन के एक थिएटर में गा रही थीं। अचानक गाते समय उनकी आवाज़ फटने लगी और वे सुर खो बैठीं। दर्शकों ने शोर मचाना और उन पर चीजें फेंकना शुरू कर दिया।थिएटर के मैनेजर ने स्थिति संभालने के लिए नन्हे चार्ली को स्टेज पर भेज दिया, क्योंकि उन्होंने चार्ली को अपनी माँ की नकल करते हुए देखा था।

जब चार्ली स्टेज पर आए और गाना शुरू किया साथ ही माँ की आवाज का नकल करना शुरू किया,तो लोगों ने कुछ सिक्के उछालने लगे..वो गाना,गाना बंद करके सिक्के उठाना शुरू कर दिए..इस मासूमियत को देख करके सारा हॉल हंसी से भर गया..।और यंही से चार्ली चैपलिन का उदय हुआ..।

"आइना मेरा सबसे अच्छा दोस्त है, क्योंकि जब मैं रोता हूँ, तो वह कभी नहीं हंसता।"

मगर इसी रात इनकी माँ की आवाज सदा के लिए चला गया..पिता शराबी थे,शराब पीने के कारण ही इनकी मृत्यु हो गई,उस समय चार्ली चैपलिन 12 साल के थे..माँ काम न मिलने के कारण और गरीबी के कारण मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गई जिस कारण उन्हें कई बार पागलखाना जाना पड़ा..।और इन्हें वर्क हाउस(गरीबों के लिए बना सरकारी जगह) में रहना पड़ा और मजदूरी करना पड़ा,वंहा की जिंदगी जेल जैसी थी।

चार्ली चैपलिन अपने माँ से बहुत प्यार करते थे वो अपने आत्मकथा में लिखते है- "वे और उनके भाई अपनी माँ को सड़कों पर बदहवास हालत में देखते थे,और हम चाहकर भी कुछ नही कर पाते थे..।"

चार्ली अक्सर कहते थे- 

"जीने के लिए हंसी ज़रूरी है, खासकर तब जब आपके पास रोने के सौ कारण हों।"

​•जब चार्ली लगभग 9 साल के थे, उनकी माँ की बीमारी के कारण घर चलाना मुश्किल था। तब उनके पिता के संपर्कों के जरिए उन्हें 'द एइट लंकाशायर लैड्स' नाम के एक डांसिंग ग्रुप में काम मिला। यहाँ उन्होंने 'क्लॉग डांसिंग' (लकड़ी के जूतों के साथ डांस) सीखी। यह उनकी प्रोफेशनल ट्रेनिंग की शुरुआत थी।

चार्ली को असली पहचान तब मिली जब 14 साल की उम्र में उन्हें एक मशहूर नाटक 'शर्लक होम्स' में 'बिली' (एक न्यूज़बॉय) का रोल मिला।दिलचस्प बात ये है कि उस समय चार्ली को पढ़ने तक नही आता था,अपने भाई सिडनी के मदद से डायलॉग रटे थे..।

19 साल की उम्र तक चार्ली एक मँझे हुए कलाकार बन चुके थे। उन्हें प्रतिष्ठित 'फ्रेड कार्नो' की कॉमेडी कंपनी में जगह मिली,​यहाँ उन्होंने 'बिना बोले अभिनय' (Pantomime) और 'स्लैपस्टिक कॉमेडी' की बारीकियां सीखीं।​इसी कंपनी के साथ वे अमेरिका के दौरे पर गए, जहाँ हॉलीवुड की नज़र उन पर पड़ी

•अमेरिका के दौरे के दौरान, 'कीस्टोन स्टूडियो' के मालिक मैक सेनेट ने चार्ली का टैलेंट देखा और उन्हें फिल्मों के लिए साइन कर लिया।​शुरुआत में चार्ली कैमरा के सामने थोड़ा झिझक रहे थे, लेकिन जल्द ही उन्होंने अपनी जगह बना ली।​अपनी दूसरी ही फिल्म 'किड ऑटोस एट वेनिस' (1914) में उन्होंने पहली बार वह ड्रेस पहनी जो आगे चलकर "द ट्रैम्प" (The Tramp) के रूप में अमर हो गई


26 साल की उम्र में, उन्होंने उस समय का सबसे बड़ा कॉन्ट्रैक्ट साइन किया, जिसके लिए उन्हें $670,000 (सालाना) मिला,जो उस ज़माने में एक अविश्वसनीय रकम था।

उस समय के बड़े फिल्म स्टूडियो कलाकारों को बहुत कम पैसा देते थे और फिल्मों की कहानी में बहुत दखल देते थे। चैपलिन अपनी कला के साथ समझौता नहीं करना चाहते थे। 1919 में, चैपलिन ने उस समय के तीन अन्य बड़े दिग्गजों (मैरी पिकफोर्ड, डगलस फेयरबैंक्स और डी.डब्ल्यू. ग्रिफिथ) के साथ मिलकर अपनी खुद की कंपनी 'United Artists' बनाई।अब वे खुद अपनी फिल्मों के मालिक थे। वे अपनी फिल्मों के लेखक, निर्देशक, अभिनेता और यहाँ तक कि संगीतकार भी खुद ही थे। इससे उन्हें वह स्वतंत्रता मिली जिससे उन्होंने 'द गोल्ड रश' और 'सिटी लाइट्स' जैसी कालजयी फिल्में बनाईं

द ग्रेट डिक्टेटर' (1940) यह फिल्म चैपलिन के साहस का सबसे बड़ा उदाहरण हैयह फिल्म एडोल्फ हिटलर और नाज़ीवाद का मज़ाक उड़ाती थीजिस समय यह फिल्म बन रही थी, हिटलर का खौफ पूरी दुनिया में था।
(हिटलर और चैपलिन का जन्म एक ही साल और एक ही महीने (अप्रैल 1889) में हुआ था। दोनों की मूँछें भी एक जैसी थीं। चैपलिन ने इसी समानता का फायदा उठाकर हिटलर (फिल्म में हेंकल) का किरदार निभाया।)

"मेरा दर्द किसी के लिए हंसी का कारण हो सकता है, लेकिन मेरी हंसी कभी किसी के दर्द का कारण नहीं होनी चाहिए।"


क्या आपको पता है..चार्ली चैपलिन गांधी से मिले थे..??
जब गांधीजी दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन गए तो चार्ली चैपलिन उनसे मिलने की इच्छा जताया,शुरुआत में तो उन्होंने मना कर दिया क्योंकि गांधीजी चार्ली चैपलिन को नही जानते थे,फिर उन्हें बताया गया की वो दुनिया के मशहूर कलाकार और गरीब मजदूर के हितैषी है,तब गांधीजी उनसे मिलने के लिए राजी हुए..।
जब चैपलिन गांधीजी से मिले तो उन्होंने पूछा-आप मशीनों का विरोध क्यों करते हैं? मशीनें तो इंसान का काम आसान बनाती हैं और उसे गुलामी से मुक्त कर सकती हैं
गांधीजी ने जबाब दिया - "मैं मशीनों के खिलाफ नहीं हूँ, लेकिन मैं उस व्यवस्था के खिलाफ हूँ जो मशीनों का उपयोग करोड़ों लोगों को बेरोजगार करने के लिए करती है। भारत जैसे देश में, जहाँ आबादी इतनी ज्यादा है, वहां इंसान को काम की जरूरत है, मशीन की नहीं।"

गांधीजी के बातों से ही प्रेरित होकर उन्होंने "मॉडर्न टाइम्स" मूवी बनाया जिसमे दिखाया गया कि कैसे मशीन इंसान पर हावी होकर उनके भावनाओ को खत्म कर देता है।

"हमें मशीनों से ज्यादा इंसानियत की जरूरत है। चालाकी से ज्यादा दया और शालीनता की जरूरत है। बिना इन गुणों के, जीवन हिंसक हो जाएगा और सब कुछ खो जाएगा।"

चैपलिन के अंतिम दिन स्विट्जरलैंड में बीते। उन्हें अपने राजनीतिक विचारों के कारण अमेरिका छोड़ना पड़ा थालेकिन 1972 में, यानी करीब 20 साल बाद, वे दोबारा अमेरिका गए जब उन्हें 'मानद ऑस्कर' (Honorary Oscar) से नवाजा गया। उस समय उन्हें सिनेमा के इतिहास का सबसे लंबा (12 मिनट का) 'स्टैंडिंग ओवेशन' मिला था

चार्ली चैपलिन की मृत्यु 25 दिसंबर, 1977 को क्रिसमस के दिन 88 वर्ष की आयु में नींद में मुस्कुराते हुए हो गया..।

"इंसान की कीमत उसके कपड़ों या बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और दूसरों के प्रति उसकी संवेदना से तय होती है।"




शुक्रवार, 13 मार्च 2026

Yoga for Nervous system

4 Practices Physically Rewire Your Nervous System (Proven by Science)

Yoga is hacking your command center. From boosting brain blood flow in Headstand to humming yourself into an anti-anxiety state, the effects are real, measurable, and scientifically proven. We're breaking down how Neuroplasticity works.

​◆Beyond Relaxation—Neuro-hacking Your Own Brain

​We often think of yoga as just stretching or a way to relax. But for scientists, the real magic happens at the level of your Nervous System—the command center that governs every thought, movement, and sensation.

​Today’s briefing takes you past the surface and into the fascinating world of Neuroplasticity, demonstrating how specific yogic practices physically "rewire" your brain and train your system to switch from high-alert survival mode to deep, optimal recovery.

​●Ready to see how you can upgrade your own internal circuitry? Here is the definitive scientific guide, complete with intricate anatomical breakdowns of four key practices.

​◆Practice 1: Sirsasana (The Headstand)—The Cognitive Power Surge

 The 'King of Asanas,' a full, steady inversion.


The Scientific Breakdown:

​Think of Sirsasana as a full, cerebral power surge. When you invert, gravity works in your favor. Research published in the Journal of Clinical and Diagnostic Research confirmed that controlled inversions significantly improve blood circulation directly to the brain’s deep regulatory glands—the Hypothalamus and Pineal glands.

The Anatomical Effect:

​This posture provides a "flushing" effect, enhancing the delivery of critical nutrients: glucose and oxygen to your neurons. Not only does this detoxify brain tissue, but it is also directly linked to sharper cognitive function and improved sensory processing.


Practice 2: Balasana (Child’s Pose)The Amygdala's Off-Switch

A deeply restorative posture, often used for grounding.


The Scientific Breakdown:

​When you rest your forehead—specifically your prefrontal cortex—against the floor, you signal to your brain that it is safe to downregulate. Studies in restorative yoga have focused on Heart Rate Variability (HRV). Restorative poses like this significantly increase HRV, which is a key marker of a healthy, resilient nervous system.

The Anatomical Effect:

​Balasana dampens the activity of the Amygdala—the brain’s fear center. This effectively disarms the "fight-or-flight" response. A higher HRV, cultivated here, proves you are building a system that handles stress with greater adaptability


Practice 3: Brahmari Pranayama (Humming Bee Breath)Direct Vagus Nerve Vagal Tone

​A simple pranayama involving closed ears and humming on the exhale.


The Scientific Breakdown:

​This is "neuro-hacking" at its most efficient. Scientific studies prove that the low-frequency vibrations generated during the 'hum' directly stimulate the Vagus Nerve at the back of the throat. The Vagus nerve is the "superhighway" of your Parasympathetic Nervous System (PNS)—your built-in deep recovery system.

The Anatomical Effect:

​This stimulation triggers an immediate release of Acetylcholine. This neurotransmitter sends a direct "SLOW DOWN" message to your heart and prompts your lungs to breathe more deeply. It is a scientifically verified technique for reducing acute anxiety in real-time.


Practice 4: Yoga Nidra (Guided Relaxation)—Accessing Deep Neural Repair

The practice of guided meditation/relaxation done in a systematic sequence, usually in Savasana.


The Scientific Breakdown:

​Often called "yogic sleep," Yoga Nidra is the practice of maintaining awareness while in a state of profound physical relaxation. Scientists have used fMRI scans to study practitioners. They found that Yoga Nidra allows the brain to enter specific wave states—Alpha and Delta waves—that are usually only accessible during the deepest phases of non-REM sleep, but here, you remain conscious.

The Anatomical Effect:

​This state facilitates a form of "biological sleep" for the entire nervous system. It provides an optimal environment for deep neural repair, memory consolidation, and a reset of your autonomic function.


​◆ Rewire Your Brain🧠, Reset Your Life

​The data is clear. Yoga is not mystical stretching; it is an accessible, evidence-based method for neuro-hacking your own physiology. By practicing inversions, restorative grounding, vagal tone stimulation, and deep neural repair, you are taking active command of your own internal circuitry.

The results are less anxiety, faster recovery, sharper thinking, and a resilient mind that can handle anything.



सोमवार, 9 मार्च 2026

इस T-20 विश्वकप से आपने क्या सीखा..??

धैर्य,साहस,होंसला,कठिन परिश्रम, दृढ़ निश्चय, दृढ़ संकल्प, दृढ़ विश्वास और दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो आप कुछ भी कर सकते है..।
ये सभी गुण एक-दूसरे के पूरक है..।।
आपमें इनमें से कौन सा गुण है..??
तबतक आप अपने अंदर आंख बंदकर थोड़ी देर झांकिए..।
मैं आगे बढ़ता हूँ..😊।

इस T-20 विश्वकप से बहुत कुछ सीखने को है..खिलाड़ी से, टीम से, टीम मैनेजमेंट से, देश से और दर्शकों से..।।



चलिए पहले देश से शुरुआत करते है..

इस विश्व कप में सर्वाधिक चर्चा बांग्लादेश का रहा,क्योंकि वो अंतिम क्षण में ये कहकर खेलने से मना कर दिया कि भारत मे खेलना हमारे खिलाड़ियों के लिए सुरक्षित नही है..।।
बांग्लादेश से क्या सीख सकते है..??
यही की दूसरे के बहकावे में कभी नही आये..।।
 
दूसरा देश जो सर्वाधिक चर्चा में रहा वो जिम्बाबे था..
क्यों..??
क्योंकि उन्होंने वो किया जिसकी अपेक्षा किसी को नही था,उन्होंने ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका को हराया..।
अगर आत्मविश्वास हो तो आप कुछ भी कर सकते है..मगर इस आत्मविश्वास को लगातार बनाये रखना बड़ा दुष्कर है,ये पानी के बुलबुले के समान है..इसलिए लगातार सही दिशा में  मेहनत करते रहने की जरूरत है..जिससे आत्मविश्वास लगातार बना रहे..

तीसरा देश जो चर्चा में नही है,मगर इस टूर्नामेंट में एक मैच की वजह से सालों चर्चा में रहेंगे..
वो देश अफगानिस्तान है,जिसने साउथ अफ्रीका को हराते-हराते दूसरे सुपर ओवर में उनसे हार गया..।
हम अफगानिस्तान से यही सीख सकते है कि,अंतिम समय तक धैर्य बनाये रखना होता है,ज्यों धैर्य टूटा की आप टूट जाएंगे..।

दर्शकों से क्या सीखें..
हमारे प्रधानमंत्री ने 'स्वछता अभियान' शुरू किये, जिसका बहुत प्रभाव पड़ा,मगर स्वछता अबतक हमारे अंदर नही उतरा है..।।
अगर आप थोड़ा सजग है,तो आपको पैदल चलने वाले और BMW से चलने वाले भी गंदगी फैलाते नजर आ जायेंगें..।

इस टूर्नामेंट में सर्वाधिक प्रभावित नेपाल के दर्शकों ने किया ,स्टेडियम खाली करने से पहले वो स्टेडियम का कचरा साफ कर रहें थे..वो हम भारतीयों की तरह रील और फ़ोटो खिंचा कर सोशल मीडिया पर डालने के लिए नही,बल्कि स्वछता उनके जिंदगी का हिस्सा है..।।
हम उनसे यही सीख सकते है कि स्वछता को जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बनाये।।

टीम मैनेजमेंट से क्या सीखें..??
जिस तरह कुछ टीम मैनेजमेंट ने अपने खिलाड़ियों पे अंतिम समय तक विश्वास किया उसी तरह हमें भी खुद पे और अपने सहभागी पर विश्वास करना चाहिए...।
हो सकता है,कोई किसी कारणवश असफल हो रहा हो,उसके कारण को हल करने में उसका मदद करें और उसे एक और मौका दे..वो जरूर सफल होगा..।

खिलाड़ियों से क्या सीखें..
इस टूर्नामेंट में एक नही कई खिलाड़ी है,जिसने अपनी पहचान बनाई है,और अपना जगह लोगों के जुबां पे बनाया है..।
चलिए उन खिलाड़ियों से शुरुआत करते है जिसने अपनी जगह लोगों के जुबां पे बनाई है..।

जैकब बैथल..भूल गए क्या..ये वही खिलाड़ी है,जिसने भारत की झोली से जीत छीन ही ली थी,मगर अंतिम समय मे धैर्य का साथ छूटने के कारण जीत भारत की झोली में ही रह गई..।

ब्लेसिंग मुजरबानी - शायद T-20 वर्ल्ड कप शुरू होने से पहले पूरा जिम्बाबे भी इन्हें नही जानता होगा,मगर इन्होंने ऐसा बॉलिंग किया जिससे ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका को मात देने में अहम योगदान दिया..।इनका संघर्ष हमें बताता है कि संघर्ष अगर निरंतर हो,तो संघर्ष अपना रंग दिखाता ही है..।

उस्मान तारिक- ये पाकिस्तान से है, जो अपने बॉलिंग स्टाइल के कारण चर्चा में रहें..मगर क्या फायदा अगर पारस पत्थर किसी कसाई को दे दिया जाएं तो..इनके साथ भी वही हुआ,संभावना तो बहुत थी मगर वो माहौल ही इन्हें नही मिला, और ना ही दिया गया..।।

और कई खिलाड़ी है जिसके नाम जुबां पे है,ब्रायन बेनेट,फिन एलेन, मिचेल सैंटनर इत्यादि..।

अब बात करते है उन खिलाड़ियों को जिसने दिल मे जगह बनाई..
अगर आज वो न होते तो शायद हम T-20 के विजेता नही होता..
वो खिलाड़ी है..
◆"संजू सैमसन"- 
धैर्य रख,
विश्वास रख,
तुम्हारा भी समय आएगा,
बस निरंतर प्रयास कर.
और हर परिस्थिति में खुद पर विश्वास रख..।।

ये पंक्तियां उनपे सटीक बैठती है..।
उनसे बहुत कुछ सीखने को है..।

ईशान किशन - इनसे यही सीखने को मिलता है कि अगर आप गलती करते है,और उसे सुधार करके आगे बढ़ते है,तो लोग आपको नजरअंदाज नही बल्कि आपको सर आंखों पे बिठाएंगे..।

बुमराह - हमारे जिंदगी में भी एक इंसान ऐसा होना चाहिए,जिसपे हरेक परिस्थिति में विश्वास कर सकते है..।।

और कई खिलाड़ी है,जिससे आप बहुत कुछ सीख सकते है..।

आपको किस खिलाड़ी ने,किस टीम ने और किस देश ने सर्वाधिक प्रभावित किया..??

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

बुरे परिस्थितियों में ही अच्छे समय का बीजारोपण होता है...।

हमसब अक्सरहाँ कभी-न-कभी बुरी परिस्थितियों से गुजरते है..
और अक्सरहाँ हम उन परिस्थितियों को कोसते है..।
मगर हम कभी उन परिस्थितियों पे गौर नही करते..।

कभी-कभी हम जिन परिस्थितियों को बुरा कहते है,वही परिस्थितियां हमारे जिंदगी के लिए सबसे अहम साबित होता है..।।

इतिहास भरा पड़ा हुआ है..उन बुरी परिस्थितियों से जिसने इतिहास का रुख ही मोड़ दिया..।

चलिए उनमें से कुछ व्यक्तियों से रु-ब-रु होते है,जो बुरे परिस्थितियों के कारण ही महान बन पाए..।

एक व्यक्ति प्रथम श्रेणी(first class) का वैध टिकट लेकर ट्रैन में सफर करता है,मगर उसके अश्वेत होने के कारण उसे ट्रैन से फेंक दिया जाता है..और वो व्यक्ति सारी रात कड़ाके के ठंड में उस स्टेशन के वेटिंग रूम में ठिठुर कर गुजारता है,और निर्णय लेता है कि इस अन्याय और नस्लभेद के खिलाफ आवाज उठाऊंगा...।




इन्ही के पदचिन्हों पे चलकर "मार्टिन लूथर किंग जूनियर" ने अमेरिका में 'सिविल राइट मूवमेंट' चलाया..
वो कहते है.. 
"ईसा मसीह ने हमें लक्ष्य दिया और....उन्होंने हमें तरीका दिया।"

इसी तरह दक्षिण अफ्रीका के "नेल्सन मंडेला" ने उन्हें अपना आदर्श मानकर दक्षिण अफ्रीका को बिना किसी गृहयुद्ध के दक्षिण अफ्रीका को लोकतांत्रिक देश बनाया..।
(◆नेल्सन मंडेला ने 27 साल जेल में बिताया..इनके लिए इनसे बुरा और क्या हो सकता है,मगर परिणाम सामने है,आज उन्हें पूरा विश्व जानता है..।


"अक्सरहाँ जब हम सबसे बुरे दौड़ से गुजर रहे होते है,उसी समय अच्छे समय का बीजारोपण भी हो रहा होता है..इसीलिए बुरा समय जब भी आये,तो घबराए नही,मुस्कुराए😊.."

अब हममें से अधिकांश लोग जान गए होंगे कि हम किसकी बात कर रहे है..
वो व्यक्ति कोई और नही बल्कि "महात्मा गांधी" थे जिसे 7 जून 1893 को पीटरमैरिट्सबर्ग स्टेशन पे ट्रैन से उस ठिठुरती हुई ठंड में फेंका गया..वो रात ऐतिहासिक रात थी..जिसने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी बना दिया..।
जरा सोचियेगा..अगर ये घटना उनके साथ नही होता तो क्या होता..??


चलिए अब उस सख्स से रु-ब-रु होते है,जिन्हें स्कूल से इसलिय निकाल दिया गया कि वो मंद बुद्धि के थे..।
शिक्षक ने उनकी माँ को एक पत्र लिखा कि आपका बच्चा addled( अव्यवस्थित दिमाग) है और वह कुछ सीख नही सकता..।
उनकी माँ ने उस पत्र को पढ़ा और उनसे कहा- स्कूल ने लिखा है कि "आपका बेटा बहुत प्रतिभाशाली है,और हमारे पास उसे पढ़ाने लायक अच्छे शिक्षक नही है,इसिलिय आप इसे खुद पढ़ाये...।"
पता है वो बच्चा कौन था..??
दुनिया उसे "थौक आविष्कारक" के रूप में जानता है..वो और कोई नही बल्कि "थॉमस अल्वा एडिसन" थे...।

उन्होंने वो किया जो आज हमें सामान्य लगता है..
उन्होंने पहली बार बिजली का बल्ब बनाया..इससे पहले दुनिया मोमबत्तियां और गैस की रोशनी पर निर्भर थी।
•उन्होंने पहली बार आवाज रिकॉर्ड कर सुनने वाला पहला उपकरण बनाया,जिससे संगीत उद्योग की शुरुआत हुई..
•आज हम सिनेमा हॉल में फ़िल्म का लुत्फ उठा रहे है तो उन्ही के कारण..उन्होंने "मोशन पिक्चर कैमरा" का आविष्कार किया जिससे फ़िल्म उद्योग का जन्म हुआ..।
•आज हम आप मोबाइल चला रहे है,मगर जरा सोचिए अगर बैटरी रिचार्जजेबल न होता तो क्या होता..।

वो कहते थे-
"मैं असफल नही होता हूँ,बल्कि एक नया तरीका खोज लेता हूँ,जो काम नही करता.."

वो हमेशा कठिन परिश्रम के पक्ष में रहे है,इस बारे में कहते है..-
"प्रतिभा 1% प्रेरणा और 99% कड़ी मेहनत ही सफलता का राज है।"
(Genius is 1% inspiration and 99% perspiration)

जरा सोचियेगा अगर उन्हें स्कूल से नही निकाला गया होता तो क्या होता..??

ये तो वो लोग है जिन्होंने अपने बुरे परिस्थितियों से देश और दुनिया को दिशा दी..
मगर हममें से हरेक घर में,हरेक समाज में कोई न कोई व्यक्ति होता ही है..जो बुरे परिस्थितियों से गुजरकर वो कार्य करते है,जो हमारे लिए आदर्श हो जाते है..।।

याद रखें..आप जब भी बुरे-से-बुरे परिस्थितियों से गुजर रहे हो,तो समझ लीजिए ,आपके अंदर अच्छे समय का बीजारोपण हो रहा है..

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

सबको अपनी कहानी..

सबको अपनी कहानी खुद लिखनी होती है.
मुझे भी अपनी कहानी खुद लिखनी है..।
भले ही वक़्त अभी साथ न दे..
भले ही अभी कलम साथ न दे..
या फिर भले ही किस्मत अभी साथ ना दे..।
कहानी तो मन-मस्तिष्क में रच चुकी है..
बस उसे धरातल पल कलम और कागज से उकेरना है..।
सबको अपनी कहानी खुद लिखनी होती है.
मुझे भी अपनी कहानी खुद लिखनी है..।


चाहे बार-बार जिंदगी में रुकावट क्यों न आये..
किसी-न-किसी बार रुकावट को पार कर ही जाऊंगा..।
पार करने को मनुष्य से अब रह ही, क्या गया है..
चाहे हिमालय की चोटी हो,या हो समुन्द्र की गहराई..
या फिर पृथ्वी से दूर चंद्र और मंगल ही क्यों न हो..
अब कोई अछूता न रहा है...।
बस जरूरत है एक दृढनिश्चय इच्छा शक्ति की..
और कठिन परिश्रम की..।
कहानी खुद-खुद बन जाएगी..
और वक़्त,कलम,कागज एकसाथ आकर.. 
नई कहानियां बुन देंगी..।
सबको अपनी कहानी खुद लिखनी होती है.
मुझे भी अपनी कहानी खुद लिखनी है..।



बुधवार, 3 दिसंबर 2025

मैं क्या से क्या हो गया..

मैं क्या से क्या हो गया..
जब खुद को देखता हूँ,
तो खुद को ही, हीन समझता हूं,
मैं क्या से क्या हो गया..
कंहा मेरे सपने थे..
कंहा मेरे ख्वाब थे..
न अब सपने है,और न ही ख्वाब है..
बस एक हांड-मांस का शरीर है..।
कभी दूसरों के जिंदगी में रंग भरने का सोचा करता था..
आज खुद ही, बदरंग जिंदगी जी रहा हूँ..।

मैं क्या से क्या हो गया..
शायद मैं हुआ नही,होने दिया..
सब कुछ गवाने के बाद ..
अब दूसरों की जिंदगी को गवा रहा हूँ..
आखिर क्यों..??
अपनी बदरंग जिंदगी की छावं,
दूसरों के जिंदगी पे डाल रहा हूं..
आखिर क्यों..??
मैं क्या से क्या हो गया..
अभी भी वक़्त है..
मुस्कुरा के कहने का..
मैं क्या से क्या हो गया..।
अभी भी वक़्त है,
रंगीन से बदरंग हुए जिंदगी में रंग भरने का..
अभी भी वक़्त है,
अपनी बदरंग जिंदगी की छावं को,
रंगीन छावं में तब्दील करने का..
अभी भी वक़्त है..
सीना तानकर,
मुस्कुराते हुए कहने का..
मैं क्या से क्या हो गया😊...।।




गुरुवार, 22 दिसंबर 2022

रामानुजन.. क्या आप इन्हें जानते है..??

 रामानुजन.. क्या आप इन्हें जानते है..??

जरा सोचिए... अगर हां, तो कितना जानते है..?? और क्या जानते है..। 

अगर नही,तो क्यों नही जानते ...??



रामानुजन एक आम इंसान नही थे या है..?? क्योंकि ऐसे लोग हमेशा जीवंत रहते है,आप भले भूल जाये मगर इतिहास आपको भूलने नही देगा..। 

रामानुजन ने खुद को ही खास नही बनाया,बल्कि अंग्रेज के बेड़ियों से जकड़े हुए भारत को, कृष्ण की तरह भारत का एक विराट छवि का आभास अंग्रेजों को कराया..।।

मैं उस रामानुजन की बात कर रहा हूँ, जिनके जन्म दिवस पर भारत सरकार गणित दिवस मनाती है..।। मगर अफसोस भारत की 50% से ज्यादा आबादी को ये नही पता कि हम गणित दिवस क्यों मनाते है..??

जबकि आज हमारे पास जानने के अनेक माध्यम है..।मगर हमें जानने की इच्छा ही नही है.. आखिर क्यों..??

ये क्यों का जबाब जरूर अपने अंदर सोचिएगा.. क्योंकि क्यों आपको सोचने वाला इंसान बनायेगा।।

चलिए हम उस रामानुजन को जानते है,जो आज भी गणितज्ञों के लिए पहेली बना हुआ है..।।

रामानुजन का जन्म मद्रास के इरोड़ में एक तमिल गरीब ब्राह्मण परिवार में 22 दिसंबर 1887 को हुआ। इनके पिता के श्री निवास साड़ी के दुकान में क्लर्क का काम करते थे। और माँ गृहणि थी और भक्ति भजन करती थी।

1892 में नजदीक के स्कूल में नामांकन हुआ मगर 5वी तक पढ़ाई में कोई रुचि नही था,बल्कि इनके ऊपर नजर रखा जाता था कि ये स्कूल से भाग न जाये।

जब ये माध्यमिक स्कूल में गए तब इनकी मैथ में रुचि बहुत बढ़ गई।रुचि इतनी बढ़ने लगी कि इन्हें स्कॉलरशिप भी मिलना शुरू हुआ।

मगर 11थ मैं इनकी रुचि मैथ में ज्यादा होने के कारण ये फैल हो गए और इनसे स्कॉलशिप भी छिन गया ।

इसी बीच इनकी शादी 1909 में जानकी से हो गया..।जिसने हमेशा इनका साथ दिया।

1910 में ये रामास्वामी अय्यर से मिलें जो "इंडियन मैथमैटिसियन सोसाइटी" के संस्थापक थे। इन्होंने अपना थ्योरम इन्हें दिखाया,जो इनसे बहुत प्रभावित हुए ।।

1912 में रेवेन्यू डिपार्टमेंट में क्लर्क की नॉकरी 20₹ प्रतिमाह पे किया। यही से उन्होंने G.H.Hardi(उस समय के महान गणितज्ञ) को अपना थ्योरम पत्र के माध्यम से भेजना शुरू किया।

1913 में G.H.Hardi ने रामानुजन को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी लाने के लिए J.E.Littlewood को भारत भेजा..।। 

इस समय समुन्द्र यात्रा भारतियों के लिए अच्छा नही माना जाता था,लोग जब विरोध करने लगे तो इन्होंने कहा कि मैं अपने कुल माता नामगिरी से पूछुंगा। उन्हें अपनी कुलदेवी से हां में जबाब मिला।और वो कैम्ब्रिज के लिए निकल गए। जब ये आ रहे थे तब पत्नी ने इनसे कहा कि मैं भी चलूंगी तो इन्होंने मना कर दिया,क्योंकि वंहा में कंहा और कैसे रहूंगा इसका कोई ठिकाना नही है।

रामानुजन शाकाहारी थे जिस कारण ब्रिटेन में अच्छा खाना मिल नही पाता था,जिस कारण इनकी तबियत गिरने लगी,ज्यों-ज्यों शरीर कमजोर हो रहा था, त्यों-त्यों ये मैथ की ऊंचाइयों पे पहुंच रहे थे।

-6 दिसम्बर 1917 में ये "लंदन मैथेमेटिक्स सोसाइटी" के सदस्य चुने गए।

-1918 में "रॉयल सोसायटी" के लिए इनका चयन हुआ, ये दूसरे भारतीय और उस समय में सबसे युवा चयनित थे।

- इन्हें ट्रिनिटी कॉलेज ने फेलोशिप के लिए चयन किया,जो प्रथम भारतीय थे



इन्होंने ने मैथ के क्षेत्र में बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया है,उस समय के महान गणितज्ञों में से एक G.H.Hardi भी अपने आपको इनसे छोटा समझते थे।

-इन्होंने "divergent series" के ऊपर 120 थ्योरम दिए,साथ ही "partion of whole number", "Fermat Theorem", "Cubic equation & quadratic equation" और Hypo geometric series पर बहुत ही कार्य किया..।।

-इन्होंने अपने जीवन काल मे 3000 से ज्यादा थ्योरम दिए।

-इन्होंने "MOC Theta Function" दिया जिसने 2002 में 'ब्लैक होल' को समझने में मदद किया। और साथ ही कैंसर सेल को समझने में भी मदद हो रहा है।

- 1914 से ही तबियत खराब रहने के कारण 1919 में भारत वापस आ गए । जंहा 26 अप्रैल 1920 में 32 साल के उम्र में क्षय रोग के कारण इनका मृत्यु हो गया।और एक महान सख्सियत की मृत्यु समय से पहले हो गया और इस ब्रह्मांड में कही खो गया।

- एक बार Hardi ने रामानुजन से पूछा कि तुम थ्योरम कैसे हल कर लेते हो..। रामानुजन ने कहा में अपने कुलदेवी 'नामगिरी' को याद करता हूँ और वो उसका जबाब मिल जाता है।

-जब रामानुजन अस्पताल में थे तब उनसे मिलने Hardi अपने मित्र के साथ कार मिलने आये। रामानुजन ने उस गाड़ी की नंबर के चार विशेषता बतलाया। जिसे हार्डी को 3 विशेषता सुलझाने में 6 साल लग गए,और चौथी विशेषता के बारे में Hardi ने अपने वसीयत में लिखा कि रामानुजन ने लिखा है तो सही ही होगा। जिसे हार्डी के मरने के 22 साल बाद सुलझाया गया।।

रामानुजन इस दुनिया के थे ही नही,या फिर समय से पहले इनका प्रादुर्भाव हो गया.. या फिर कुछ और..???

अगर आप रामानुजन को और जानना चाहते है तो उनके ऊपर बनी फ़िल्म - "The man who knew infinity" जरूर देखें। https://youtu.be/8WwLPep9xNg


आप जरा सोचिएगा की आप रामानुजन को क्यों नही जानते..??

इसके लिए सिर्फ आप ही नही,बल्कि हमारा समाज ,हमारा सरकार भी दोषी है..।। अगर हां तो कैसे..?? जरूर बताइएगा..।।

रविवार, 6 फ़रवरी 2022

लता मंगेशकर शून्य से शिखर की यात्रा

 भविष्य के गर्भ में क्या है..??

   ये किसी को नही पता ..।


28 सेप्टेम्बर 1929 को जब एक लड़की मध्यप्रदेश के इंदौर में पैदा हुई होगी तब किसी को अहसास तक नही हुआ होगा की ,ये लड़की सिर्फ परिवार की ही नही बल्कि पूरे भारत की विरासत हो जाएगी।।

"इस सृष्टि मैं आपका कुछ भी नही है,आपका नाम तक भी नही,यंहा सब कुछ खुद से अर्जित करना होता है,नही तो सब कुछ एक दिन छिन जाता है।बचता वही है जो आपने अर्जित किया है"।


हेमा को क्या पता था कि, एक दिन मेरा नाम भी मुझसे छिन जायेगा। पिता की अपनी ड्रामा कंपनी में लतिका का किरदार निभाने के बाद पिता ने लता नाम रख दिया।।

जिंदगी में कभी-कभी वो नही होता जो आप चाहते है,इसका ये मतलब नही की जिंदगी खत्म सी हो गई..।।

5 साल की उम्र तक लता पिता के सामने गाती तक नही थी,मगर एकदिन पिता ने गाते सुन लिया उसके बाद पिता ने खुद से गाना सिखाना शुरू किया।

शिक्षित आपको सिर्फ डिग्रियां नही,बल्कि परवरिश और परिस्थितियां भी बनाता है।

लता जी सिर्फ 2 दिन ही स्कूल जा पाई, मगर कई विश्वविद्यालय उन्हें डॉक्टरेट की उपाधियां देकर गौरवान्वित महसूस करती है।अपने जीवनकाल में उन्होंने 36 भाषाओं में 50,000 से ज्यादा गाना गाई। जिस कारण उन्हें 75 से ज्यादा अवार्ड दिया गया जिसमें 1989 में दादा साहब फाल्के अवार्ड2001 में भारत रत्न3बार बेस्ट प्लेबैक सिंगर का नेशनल अवार्ड शामिल है।

उन्होंने संगीत की सारी शिक्षा पिता से ही सीखा,और कई भाषाओं का ज्ञान भी घर पर ही अर्जित किया। वो पहली बार 16 दिसंबर 1941 को स्टूडियो में रेडियो प्रोग्राम के लिए गाई.. उसके बाद अनवरत 7दशक तक गाने का सिलसिला चलता रहा।

परिस्थितियां हमेशा आपके अनुकूल हो ये जरूरी नही,बल्कि जरूरी ये है कि आप परिस्थितियों का सामना किस तरह से करते है..??

लता जी सिर्फ 13 साल की थी तब पिता की मृत्यु(24अप्रैल 1942)हो गई। और बड़ी होने के नाते बहन-भाई और माँ की जिम्मेदारी इनके ऊपर आ गई।


आप जो चाहे.... वो पाओ जिंदगी में... ये जरूरी नही,कभी-कभी परिस्थितियां तय करती है कि क्या करना है,और क्या होना है।

लता जी पैसों की किल्लत के कारण मराठी और हिंदी फिल्मों में छोटे-छोटे किरदार करने लगी।पहली बार स्टेज पर गाने के लिए उन्हें 25₹ मिले। और उन्हें अहसास हुआ कि में किरदार निभाने के लिए नही बनी हूँ।

13 साल की उम्र में उन्होंने पहली बार 1942 में मराठी फिल्म "पहिली मंगलागौर" के लिए गाया। उन्हें गाते हुए जब संगीतकार गुलाम हैदर ने सुना तो उन्होंने उस समय के सबसे सफल फ़िल्म निर्माता शशधर मुखर्जी से मिलवाया। मगर मुखर्जी ने ये कह कर गवाने से इनकार कर दिया कि "आवाज बहुत पतली है नही चलेगी"। मगर गुलाम हैदर ने लता जी को पहला मौका दिया उसके बाद तो इनके पास काम का कमी न रहा।। आगे चलकर सशधर मुखर्जी को भी अपने गलती का अहसास हुआ और उन्होंने 'अनारकली' और जिद्दी फ़िल्म में लता जी से गवाया।।

असफलता जिंदगी का हिस्सा है,और निरंतर सीखते रहने से असफलता को सफलता में बदला जा सकता है।

लता जी को गुलाम हैदर ने हिंदी-उर्दू सीखने के लिए प्रेरित किया तो,अनिल विश्वास ने ये सिखाया की गाते वक़्त कैसे सांस लेना है और कैसे छोड़ना है। अपने आवाज को निखारने के लिए वो निरंतर कुछ-न-कुछ सीखती रही।

जो अपने वसूल से समझौता कर लेते है,उनका वजूद नही रहता।।

लता जी ने कभी द्विअर्थी वाले गाने नही गाये,और न ही उसका हिस्सा बना। इस वजह से कई बार राइटर से झगड़ा हो जाता मगर अंत मे राइटर को शब्द बदलना पड़ता या फिर वो काम करने से इनकार कर देती।।

सजा तो सब दे सकता है,मगर सजा देने में सक्षम होने के बाबजूद क्षमा करना महानता है।।

32 साल की उम्र में स्वर-कोकिला बन गई थी,मगर इसी समय किसी ने धीमा जहर दे दिया।जिसके कारण महीनों बीमार रही।जब स्वस्थ हुई तो किसी ने अफवाह उड़ा दी कि अब वो नही गाएंगी।। मगर उन्होंने  "कंही दीप जले, कंही दिल जले" गाकर फ़िल्म फेयर अवार्ड जीत लिया।। उनलोगों को भी तबतक पता चल गया जिसने धीमा जहर दिया था,मगर उन्होंने किसी को नाम नही बताया।।

परिवार एक माला है, अगर टूट गया तो फिर व्यक्ति का अस्तित्व नही रह जाता।।

लता जी ने ये सोचकर शादी नही किया कि अगर मैं शादी कर लुंगी तो फिर मेरे परिवार का ख्याल कौन रखेगा,क्योंकि शादी के बाद तो मैं दूसरे घर चली जाऊंगी।उसके बाद मैं कैसे अपने माँ-बहन का ख्याल रख पाऊंगा..।।



उन्होंने "सा रे गा मा प ध नी सा" को सिर्फ गाया ही नही बल्कि उसे अपने जिंदगी में उतारा भी।

सा-सादगी  ।। रे - रेश्मी ।।  गा-गायकी  ।।  मा-माधुर्य ।। 

-परंपरा ।। ध-धवलता ।। नी-निर्मलता


लता जी आज हमारे बीच नही रही,मगर उन्होंने जो अर्जित किया उसे आनेवाली पीढ़ी के लिए छोड़ गई।

जिंदगी जीने का यही तो सलीका होता है कि आप आनेवाली पीढ़ियों के लिए कुछ ऐसा छोड़कर जाए जो उन्हें अपनी जिंदगी को और बेहतरीन बनाने में मदद करे।। 





रविवार, 23 जनवरी 2022

सुभाषचंद्र बोस से नेताजी बनने तक कि यात्रा

 शाश्वत नियम याद रखें -: यदि आप कुछ पाना चाहते हैं, तो आपको कुछ देना होगा।

सुभाषचंद्र बोस ने नेताजी बनने तक के सफर में अपना सर्वस्व त्याग दिया.. इसिलए तो वो आज भी जिंदा है,उसी तेवर में जिस तेवर मैं उन्होंने कहा था- तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा..

सुभाषचंद्र  बोस का जन्म 23 जनुअरी 1897 के कटक(ओडिशा)में हुआ।
भारत सरकार ने उनके 125वी जन्मशती को पराक्रम दिवस  के रूप में मनाने का निर्णय लिया है,जो उनके छवि और योगदान को देखते हुए सही है। उन्होंने आजादी के लड़ाई में वही पराक्रम दिखाया,जिसे देखकर देश के हर नागरिक को अनुभव हो गया था कि अब आजादी मिल जाएगा।
क्योंकि उन्होंने पहली बार भारत में अप्रैल 1944 में मणिपुर में झंडा फहराया।
मगर दुर्भाग्य ये रहा कि जापान पर परमाणु बम गिरने के बाद जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया,जिस कारण नेताजी रूस से मदद लेने के लिए 18 अगस्त 1945 को बमवर्षक विमान से मंचूरिया के लिए रवाना हुए कहा जाता है कि ये प्लैन क्रैश हो गया और उनकी मृत्यु हो गई..।।
मगर किसी को विश्वास नही है..।।

आज हमारे अन्दर बस एक ही इच्छा होनी चाहिए – मरने की इच्छा ताकि भारत जी सकेएक शहीद की मौत मरने की इच्छा ताकि स्वतंत्रता का मार्ग शहीदों के खून से प्रशस्त हो सके।
सुभाषचंद्र बोस ने अपनी प्राथमिक शिक्षा कटक के यूरोपियन स्कूल से ही किया और 10वी में 2रा स्थान प्राप्त किया। और आगे की पढ़ाई के लिए कोलकाता चले आये और उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज में नामांकन कराया ।।
1916 में जब वो दर्शनशास्त्र से B.A कर रहे थे तब कॉलेज के अध्यापकों और छात्रों के बीच झगड़ा हो गया क्योंकि अंग्रेज प्रोफेसर Mister O भारतीय छात्र से घृणा करते थे और बेवजह मारते थे। सुभाष ने छात्रों का नेतृत्व संभाला और प्रिंसीपल से शिकायत की तब भी कुछ नही बदला तो ये लोग उस मास्टर को भी मारे । ये बात प्रिंसीपल तक पहुंचा और एक कमिटी का गठन किया गया जिसमें कहा गया कि सुभाष Mister O से माफी मांगे मगर सुभाषचंद्र ने मना कर दिया जिस कारण उन्हें कॉलेज से 1 साल के लिए निलंबित कर दिया ।
इन दिनों वो देशबंधु चितरंजन दास को पढ़ना और सुनना शुरू किया। उन्ही से उन्हें समाजसेवा का प्रेरणा मिला। इन दिनों कोलकाता में कॉलरा(हैजा) फैला हुआ था, लाश इधर-उधर बिखरे पड़े थे।चारों बगल उदासी और असहाय लोग को देखते हुए वो द्रवित हो उठे ।उन्होंने उस समय 2.5 हजार से ज्यादा लोगों का अंतिम संस्कार किया।
इसी समय उन्हें सेना में भर्ती होने का शौक चढ़ा और वो 49वीं बंगाल रेजीमेण्ट में भर्ती के लिये उन्होंने परीक्षा दी किन्तु आँखें खराब होने के कारण उन्हें सेना के लिये अयोग्य घोषित कर दिया गया। उन्होंने बहुत कोशिश की मगर फिर उन्होंने अपना पूरा ध्यान B.A पे दिया और प्रेसीडेंसी कॉलेज में दूसरा स्थान प्राप्त किया।
पिताजी की इच्छा थी कि वो ICS(इंडियन सिविल सर्विस) करें, वो राजी हो गए मगर उनके पास सिर्फ 1 वर्ष ही था और उन्होंने ये चुनौती स्वीकार किया और ICS में 4th स्थान प्राप्त किया
मगर सुभाष चंद्र बोस स्वामी विवेकानंद और अरविंदो से बहुत प्रभावित थे ।और उन्होंने अपने भाई शरतचंद्र बोस को चिठी लिखी की ICS की नॉकरी कर देश की सेवा कैसे कर सकता हूँ..??
पिता के विरोध के बावजूद उन्होंने ने ICS की नॉकरी छोड़ दी और ये खबर पूरे भारत मे आग की तरह फैल गई।

कोलकाता आकर वो चितरंजन दास के साथ काम करने लगे उसी समय गांधी जी द्वारा शुरू किया गया असहयोग आंदोलन का नेतृत्व कोलकाता में चितरंजन दास कर रहे थे सुभाष चंद्र बढ-चढ़कर भाग लिया। 1922 में चितरंजन दास ने कांग्रेस के अंतर्गत  स्वराज पार्टी का गठन किया और इस पार्टी ने कोलकाता में  महापालिका का चुनाव लड़ा और जीता । चितरंजन दास महापौर बने और सुभाष चंद्र  महापालिका के प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बने। इन्होंने
 गलियों और सड़कों का नाम स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर रखना शुरू किया। साथ ही जिन परिवार से लोग आजादी के लड़ाई में शहीद हुए है, उस परिवार के सदस्यों को महापालिका में नॉकरी देना शुरू किया ।
युवाओं के बीच इनकी ख्याति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी।
1928 में गांधीजी से सुभाषचंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू के बीच मतभेद हो गया। गांधी डोमिनियन स्टेट के समर्थक थे जबकि ये दोनों पूर्ण स्वराज के बाद में गांधीजी ने इनदोनों की बात मान ली।
26 जेनुअरी 1930 को लाहौर अधिवेशन में पहली बार झंडा फहराया गया और पूर्ण स्वराज की मांग किया गया
26 जनुअरी 1931 को सुभाषचंद्र बोस ने कोलकाता में झंडा फहराया और एक रैली का नेतृत्व किया जिस कारण उन्हें जेल भेज दिया गया। 
इसी बीच भगत सिंह को फांसी दे दिया गया । जिस कारण सुभाषचंद्र बोस गांधी जी से नाराज हो गए क्योंकि उन्हें लगता था कि गांधी जी अगर कड़ा रुख अपनाते तो फांसी रुक सकता था।
वो अपने पूरे जीवनकाल में 11 बार जेल गए । 

विदेश-प्रवास


1932 में जेल में ही तबियत खराब हो गया जिस कारण वो इलाज कराने के लिए यूरोप गए। 1933-36 तक वो यूरोप में रहे मगर उस दौरान भी वो अपने कार्य मे लगे रहे।
वंहा वो इटली के नेता मुसोलिनी से मिले और उसने आस्वासन दिया कि इटली भारत की आजादी में अपना सहयोग देगा।
साथ ही  आयरलैंड के नेता डी अल्वेरा भी इनके अच्छे मित्र हो गए। 
उसी समय वो विट्ठल भाई पटेल से मिले और दोनों ने मंत्रणा की जिसमें गांधीजी के नीतियों का विरोध किया गया।जिसे पटेल-बोस विश्लेषण के नाम से ख्याति मिला।
इसी दौरान विट्ठल भाई पटेल की तबियत खराब हो गई सुभाषचंद्र ने जम की सेवा की मगर वो नही बचे।
 विट्ठल भाई पटेल ने अपनी वसीयत में पूरा सम्पति सुभाषचंद्र बोस के नाम कर दी थी, मगर सरदार पटेल ने नही माना उन्होंने मुकदमा चलाया और जितने के बाद पूरी सम्पति गांधीजी के हरिजन सेवा कार्य मे दे दिया।
 
1934 में इन्हें अपने पिता की मृत्यु की खबर मिली और वो कोलकाता आये। अंग्रेज को जब पता चला तब फिर कुछ दिन जेल में रखकर यूरोप भेज दिया।

1934 में जब वो आस्ट्रिया में थे तो एक इंग्लिश टाइपिस्ट "ऐमली शेंकल" जिसे इन्होंने अपने पुस्तक लिखने के लिये रखा था,इनसे शादी कर ली। इनसे एक पुत्री हुई जिसका नाम इन्होंने अनिता रखा।


 कांग्रेस के 51वे अधिवेशन के लिए गांधीजी ने सुभाषचंद्र बोस को कांग्रेस का अध्य्क्ष चुना।


इन्होंने अपना अध्यक्षीय भाषण बड़ी जोरदार दिया था,ऐसा भाषण अभी तक किसी ने नही दिया था।
इन्होंने इस दौरान योजना आयोग का गठन किया जिसका अध्यक्ष नेहरू को बनाया।
इन्होंने बेंगलुरु में महान वैज्ञानिक विश्वेश्वरय्या की अध्यक्षता में विज्ञान परिषद की स्थापना की

1939 में बोस फिर से कांग्रेस अध्यक्ष के लिए चुनाव लड़े और जीत भी गए। जबकि गांधीजी नही चाहते थे, क्योंकि गांधीजी को सुभाष की कार्यशैली पसंद नही था, जिस कारण इन्होंने पट्टाभि सितारमैय्या को अपने तरफ से खड़ा कियारवींद्रनाथ टैगोर ,प्रफुलचंद्र राय और मेघानाद साहा जैसे वैज्ञानिक ने गांधी जी को चिट्ठी लिखकर कहा कि सुभाष को ही कांग्रेस का अध्यक्ष रहने दिया जाय। मगर गांधीजी नही माने और वर्षों बाद कांग्रेस में चुनाव हुआ। मगर सुभाषचंद्र 203 मत से जीत गए।
गांधीजी ने पट्टाभि सितारमैय्या को अपनी हार बताकर कांग्रेस कार्यकारणी से कहा कि अगर आपको  सुभाष की कार्यशैली पसन्द नही है तो आप हट सकते है 14 में से 12 सदस्य ने त्यागपत्र दे दिया। नेहरू तटस्थ बने रहे सिर्फ शरतचंद्र बोस ही इनके साथ खड़े रहे।।
सहयोग न मिलने के कारण उन्होंने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया।
3 मई 1939 को इन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना किया , जिस कारण इन्हें कांग्रेस से निकाल दिया गया।
इसी समय द्वितीय विश्वयुद्ध की खबर भारत तक पहुंची बोस ने कांग्रेस से आवाहन किया कि अभी सही समय है अंग्रेज से लड़ने का अगर कांग्रेस मदद नही करेगा तो फारवर्ड ब्लॉक अकेले ही अंग्रेजो का ईंट से ईंट बजा देगा।
1940 में कोलकाता स्थित होलमेट स्तंभ जो कि गुलामी का प्रतीक था उसे रातों-रात फॉरवर्ड ब्लॉक के युवा ब्रिगेड ने ध्वस्त कर दिया।अंग्रेज को खबर लगते ही उसने फॉरवर्ड ब्लॉक के सभी बड़े नेताओं के साथ बोस को भी जेल में डाल दिया।
सुभाषचंद्र जेल में निष्क्रिय नही रहना चाहते थे वो अंग्रेज के खिलाफ आमरण अनसन शुरू कर दिया , तबियत बिगड़ने के हालात में उन्हें घर पर ही नजरबंद कर दिया गया।


भला कबतक उन्हें नजरबंद करके रखते..
अपने भतीजे शिशिर के मदद से 16 जनुअरी 1941 को पठान मोहमद जियाउद्दीन के वेश में घर से निकल गए। कार से गोमोह रेलवे स्टेशन पहुंचकर वंहा से फ्रंटियर मेल पकड़कर पेशावर पहुंचे।वंहा मियां अकबर खान के मदद से भगतराम तलवार के साथ काबुल पहुंचे।वंहा भारतीय व्यापारी उत्तमचंद मल्होत्रा के यंहा दो महीने रहे। इस दौरान वे जर्मनी, इटली और रसियन दूतावास से संपर्क किया । इटली दूतावास के मदद से वो ऑरलैंडो मेजेंटो नामक इटालियन बनकर मास्को होते हुए बर्लिन पहुंचे।

जर्मनी प्रवास
जर्मनी पहुंचकर वो अनेक नेताओ से मिले,इनमें से जर्मनी के एक मंत्री एडम फॉण ट्रॉप इनके अच्छे दोस्त हो गए। इसी दौरान 29 मई 1942 को एडोल्फ हिटलर से मुलाकात हुई


मगर हिटलर ने भारत की मदद करने से ये कहकर इनकार कर दिया कि जर्मनी यंहा से बहुत दूर है,आप जापान से मदद ले क्योंकि वो भी हमारे ही अलायन्स में है।
हिटलर ने अपनी आत्मकथा माइन कैम्फ में भारत और भारत के लोगो की बुराई की थी इसका विरोध सुभाषचंद्र बोस ने किया,हिटलर ने आस्वासन दिया कि अगले संस्करण में उसे हटा दिया जाएगा।
जर्मनी में ही नेताजी ने भारतीय स्वंतंत्रता संगठन और आजाद हिंद रेडियो की स्थापना की।इसी दौरान वो नेताजी के नाम से भी प्रसिद्धि मिली।
जर्मनी से वो पनडुब्बी मैं बैठकर इंडोनेशिया पहुंचे वंहा से वो सिंगापुर होते हुए जापान पहुंचे।

पूर्वी एशिया की यात्रा