रविवार, 1 फ़रवरी 2026

मन चंगा तो कठौती में गंगा..

कुछ लोग ऐसे होते है,जो अपने कर्मों के द्वारा हमारे जीवन मे रच-बस जाते है,भले ही हम उनके नाम और काम से अनजान हो..मगर उनकी महानता हमारे जीवन का मार्ग प्रसस्त करता रहता है..।



उन्ही महान विभूतियों में से एक "संत रविदास/रैदास" जी है,इनका नाम रविदास इसलिए पड़ा क्योंकि इनका जन्म रविवार को हुआ..इनका जन्म बनारस के पास मंडूर गाँव मे हुआ,इनके माता का नाम घुरबिनिया और पिता का नाम रघु था..।

इनका जन्म चमार जाती में हुआ..मगर ये अपने कर्मो से ब्राह्मण बन गए..।
 "चमड़े,मांस और रक्त से
  जन का बना आकार
 आंख पसार के देख लो
 सारा जगत चमार।"

हम सब जन्म से शुद्र ही होते है..मगर हम अपने कर्मो,उपलब्धियों और अनुभूतियों से ब्राह्मण बनते है..।।

इन्होंने समाज को तब जगाने का कार्य किया जब समाज रूढ़ियों में जकड़ा हुआ था..
इन्होंने अपने गुरुभाई कबीर के साथ मिलकर समाज को जगाया और उद्वेलित किया..
 " मन चंगा त कठौती में गंगा"..
आज भी ये दोहे..समाज को जगाने का कार्य कर रही है..।।

रविदास जी ऐसे समाज की कल्पना करते थे जंहा कोई दुख न हो, न ही जाति-भेद हो,और न ही किसी के साथ अन्याय हो..।
 "बेगमपुरा सहर को नाऊँ,
  दुख अंदोह नहीं तिहि ठाऊँ।।"

रविदास भारत के चमकते सितारों में से है,जिनके चमक को उनकी शिष्या "मीराबाई" उनके चमक को और चहुँ दिशा में फैलाती है..
  " गुरु मिलिया रैदास जी"।

रैदास जी की बोली बुद्ध की बोली है,मगर इनके बोली मे भक्ति और प्रेम है..
जबकि बुद्ध की बोली में तार्किकता और विरोध था..जिस कारण बुद्ध का विरोध किया गया..।
अम्बेडकर जी ने बुद्ध को पढ़कर नही बल्कि रविदास जी को पढ़कर और समझकर बौद्ध धर्म अपनाया..।

भले ही भारत की बहुत बड़ी आबादी रविदास जी से अनभिज्ञ हो..
मगर शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा,जिनके ऊपर रविदास जी के दोहे,और गीत का असर न हो..।
  प्रभु जी तुम चंदन हम पानी,
जाकी अंग-अंग बास समानी॥
प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा,
जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती,
जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी तुम मोती हम धागा,
जैसे सोनहुँ मिलत सुहागा॥
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा,
ऐसी भक्ति करै रैदासा॥



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें