कंहा है..
आशियाना मेरा..
जंहा कल था..
वंहा आज कुछ और है..
कंहा है आशियाना मेरा..।
मैं यू ही ढूंढ रहा हूँ..
उस आशियाने को..
जो मेरा कभी, था ही नही..।
क्या मैं उतनी दूरी तय कर..
आशियाना बनाने आया हूँ...??
या फिर उस मुकम्मल..
आशियाने को पाने आया हूँ..
जिसे पाकर..
किसी आशियाने की चाह न रह जाये..।

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