रविवार, 29 मार्च 2026
कहानी: "नी"
हम भविष्य के बारे में क्यों चिंतित है..
शनिवार, 28 मार्च 2026
चार्ली चैपलिन..लंदन के सड़कों से उठकर विश्व के मानसपटल तक..
"मुस्कुराओ, भले ही तुम्हारा दिल टूट रहा हो... अगर तुम मुस्कुराओगे, तो देखोगे कि जीवन अभी भी जीने योग्य है।"
● चार्ली की माँ, हन्ना चैपलिन, लंदन के एक थिएटर में गा रही थीं। अचानक गाते समय उनकी आवाज़ फटने लगी और वे सुर खो बैठीं। दर्शकों ने शोर मचाना और उन पर चीजें फेंकना शुरू कर दिया।थिएटर के मैनेजर ने स्थिति संभालने के लिए नन्हे चार्ली को स्टेज पर भेज दिया, क्योंकि उन्होंने चार्ली को अपनी माँ की नकल करते हुए देखा था।
जब चार्ली स्टेज पर आए और गाना शुरू किया साथ ही माँ की आवाज का नकल करना शुरू किया,तो लोगों ने कुछ सिक्के उछालने लगे..वो गाना,गाना बंद करके सिक्के उठाना शुरू कर दिए..इस मासूमियत को देख करके सारा हॉल हंसी से भर गया..।और यंही से चार्ली चैपलिन का उदय हुआ..।
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"आइना मेरा सबसे अच्छा दोस्त है, क्योंकि जब मैं रोता हूँ, तो वह कभी नहीं हंसता।" |
मगर इसी रात इनकी माँ की आवाज सदा के लिए चला गया..पिता शराबी थे,शराब पीने के कारण ही इनकी मृत्यु हो गई,उस समय चार्ली चैपलिन 12 साल के थे..माँ काम न मिलने के कारण और गरीबी के कारण मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गई जिस कारण उन्हें कई बार पागलखाना जाना पड़ा..।और इन्हें वर्क हाउस(गरीबों के लिए बना सरकारी जगह) में रहना पड़ा और मजदूरी करना पड़ा,वंहा की जिंदगी जेल जैसी थी।
चार्ली चैपलिन अपने माँ से बहुत प्यार करते थे वो अपने आत्मकथा में लिखते है- "वे और उनके भाई अपनी माँ को सड़कों पर बदहवास हालत में देखते थे,और हम चाहकर भी कुछ नही कर पाते थे..।"
चार्ली अक्सर कहते थे-
"जीने के लिए हंसी ज़रूरी है, खासकर तब जब आपके पास रोने के सौ कारण हों।"
•जब चार्ली लगभग 9 साल के थे, उनकी माँ की बीमारी के कारण घर चलाना मुश्किल था। तब उनके पिता के संपर्कों के जरिए उन्हें 'द एइट लंकाशायर लैड्स' नाम के एक डांसिंग ग्रुप में काम मिला। यहाँ उन्होंने 'क्लॉग डांसिंग' (लकड़ी के जूतों के साथ डांस) सीखी। यह उनकी प्रोफेशनल ट्रेनिंग की शुरुआत थी।
चार्ली को असली पहचान तब मिली जब 14 साल की उम्र में उन्हें एक मशहूर नाटक 'शर्लक होम्स' में 'बिली' (एक न्यूज़बॉय) का रोल मिला।दिलचस्प बात ये है कि उस समय चार्ली को पढ़ने तक नही आता था,अपने भाई सिडनी के मदद से डायलॉग रटे थे..।
•19 साल की उम्र तक चार्ली एक मँझे हुए कलाकार बन चुके थे। उन्हें प्रतिष्ठित 'फ्रेड कार्नो' की कॉमेडी कंपनी में जगह मिली,यहाँ उन्होंने 'बिना बोले अभिनय' (Pantomime) और 'स्लैपस्टिक कॉमेडी' की बारीकियां सीखीं।इसी कंपनी के साथ वे अमेरिका के दौरे पर गए, जहाँ हॉलीवुड की नज़र उन पर पड़ी।
•अमेरिका के दौरे के दौरान, 'कीस्टोन स्टूडियो' के मालिक मैक सेनेट ने चार्ली का टैलेंट देखा और उन्हें फिल्मों के लिए साइन कर लिया।शुरुआत में चार्ली कैमरा के सामने थोड़ा झिझक रहे थे, लेकिन जल्द ही उन्होंने अपनी जगह बना ली।अपनी दूसरी ही फिल्म 'किड ऑटोस एट वेनिस' (1914) में उन्होंने पहली बार वह ड्रेस पहनी जो आगे चलकर "द ट्रैम्प" (The Tramp) के रूप में अमर हो गई।
चार्ली चैपलिन की मृत्यु 25 दिसंबर, 1977 को क्रिसमस के दिन 88 वर्ष की आयु में नींद में मुस्कुराते हुए हो गया..।
"इंसान की कीमत उसके कपड़ों या बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और दूसरों के प्रति उसकी संवेदना से तय होती है।"
शुक्रवार, 27 मार्च 2026
"माँ सिद्धिदात्री" पूर्णता और सिद्धियों की देवी
'सिद्धि' का अर्थ है अलौकिक शक्ति और 'दात्री' का अर्थ है देने वाली। भगवान शिव ने भी इन्हीं की कृपा से आठ सिद्धियाँ प्राप्त की थीं और उनका आधा शरीर देवी का हुआ था, जिससे वे 'अर्धनारीश्वर' कहलाए।
◆ स्वरूप और प्रतीकवाद
- कमल पर विराजमान: माँ सिद्धिदात्री कमल के पुष्प पर आसीन हैं (हालाँकि इनका वाहन सिंह भी है)।
- चतुर्भुज: इनके चार हाथ हैं। दाहिने नीचे वाले हाथ में चक्र और ऊपर वाले में गदा है। बाएं नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले में कमल का पुष्प है।
- पूर्णता: यह स्वरूप दर्शाता है कि साधना अब पूर्ण हो चुकी है और साधक को उसके तप का फल मिलने वाला है।
◆ योग विज्ञान: निर्वाण (Nirvana)
आज साधक की चेतना सहस्रार चक्र (Crown Chakra) में पूर्णतः स्थित होती है।
- अवस्था: यह 'अद्वैत' की अवस्था है जहाँ साधक और शक्ति एक हो जाते हैं।
- प्रभाव: माँ सिद्धिदात्री की कृपा से ब्रह्मांड का सारा ज्ञान और सभी अष्ट सिद्धियाँ (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व) सुलभ हो जाती है
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
अर्थ: जिन्हें सिद्ध, गंधर्व, यक्ष, असुर और देवता भी पूजते हैं, वे सिद्धियाँ देने वाली माँ सिद्धिदात्री हमें भी सफलता प्रदान करें।
गुरुवार, 26 मार्च 2026
प्यार की पांति..
माँ महागौरी: पवित्रता और शांति की देवी
'महा' का अर्थ है अत्यंत और 'गौरी' का अर्थ है श्वेत (सफेद)। कठिन तपस्या के कारण जब इनका शरीर काला पड़ गया था, तब भगवान शिव ने गंगाजल से इन्हें स्नान कराया, जिससे इनका वर्ण पूर्णतः गोरा हो गया। इसी कारण इन्हें 'महागौरी' कहा जाता है।
◆स्वरूप और प्रतीकवाद
- श्वेत वर्ण: माँ का रंग पूर्णतः गोरा है और वे श्वेत वस्त्र ही धारण करती हैं। यह 'परम शुद्धि' (Pure Consciousness) का प्रतीक है।
- चतुर्भुज: इनके चार हाथ हैं। ऊपर वाले दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले में त्रिशूल है। ऊपर वाले बाएं हाथ में डमरू और नीचे वाला हाथ वरमुद्रा में है।
- वाहन: माँ महागौरी का वाहन वृषभ (बैल) है।
◆योग विज्ञान: सोम चक्र (Soma Chakra)
महा अष्टमी पर साधक का मन सोम चक्र (सहस्रार के भीतर का एक सूक्ष्म केंद्र) की ओर बढ़ता है।
- भाव: आज का दिन 'चित्त की शुद्धि' का है। जैसे माँ ने गंगाजल से स्नान कर कांति प्राप्त की, वैसे ही साधक प्राणायाम और ध्यान के जल से अपने अंतर्मन की मलिनता को धोता है।
- प्रभाव: इस दिन साधना करने से संचित पापों का नाश होता है और बुद्धि अत्यंत सात्विक हो जाती है।
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
अर्थ: सफेद बैल पर सवार, श्वेत वस्त्र धारण करने वाली और महादेव को आनंद देने वाली पवित्र माँ महागौरी मेरा कल्याण करें।
बुधवार, 25 मार्च 2026
माँ कालरात्रि: अंधकार का नाश करने वाली शक्ति
'काल' का अर्थ है समय और मृत्यु, और 'रात्रि' का अर्थ है अज्ञान का अंधकार। माँ कालरात्रि वह शक्ति हैं जो समय के चक्र को नियंत्रित करती हैं और अज्ञानता व दुष्टों का विनाश करती हैं।
◆ स्वरूप और प्रतीकवाद
- रंग: इनका शरीर रात के अंधकार की तरह काला है। इनके बिखरे हुए बाल और गले में बिजली की तरह चमकने वाली माला है।
- त्रिनेत्र: माँ के तीन नेत्र ब्रह्मांड की तरह गोल हैं, जिनसे अग्नि की किरणें निकलती हैं।
- चार भुजाएँ: इनके दाहिने हाथ 'अभय' और 'वरद' मुद्रा में हैं, जो भक्तों को सुरक्षा और वरदान देते हैं। बाएं हाथों में 'खड्ग' और 'कांटेदार अस्त्र' हैं।
- वाहन: माँ कालरात्रि गर्दभ (गधा) पर सवार हैं।
- स्थान: सिर का सबसे ऊपरी हिस्सा।
- प्रभाव: माँ कालरात्रि की कृपा से साधक के भीतर का सारा 'भय' समाप्त हो जाता है। यह ब्रह्मांड की शक्तियों से जुड़ने का द्वार है।
- साधकों के लिए: यदि आप मानसिक तनाव या किसी अज्ञात भय से जूझ रहे हैं, तो आज का ध्यान आपको परम शांति और साहस प्रदान करेगा।
• इनका रूप भयानक भले ही हो, लेकिन ये हमेशा शुभ फल देने वाली हैं, इसलिए इनका एक नाम 'शुभंकरी' भी है।
◆ योग विज्ञान: सहस्रार चक्र (Sahasrara Chakra)
महा सप्तमी के दिन साधक का मन सहस्रार चक्र (ब्रह्मरंध्र) के पास पहुँचने की तैयारी में होता है।
●माँ कालरात्रि की वंदना के लिए इस श्लोक का पाठ करें:
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥
मंगलवार, 24 मार्च 2026
नजरिया : प्रकृति को समझिए
"माँ कात्यायनी"
ऋषि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था, इसीलिए इनका नाम 'कात्यायनी' पड़ा। इन्हें महिषासुर का वध करने वाली 'युद्ध की देवी' भी माना जाता है।
◆ स्वरूप और प्रतीकवाद
- चतुर्भुज रूप: माँ की चार भुजाएँ हैं। बाईं ओर के ऊपरी हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में खड्ग है। दाईं ओर के हाथ अभय और वरद मुद्रा में हैं।
- वाहन: माँ कात्यायनी का वाहन सिंह है।
- ऊर्जा: इनका स्वरूप अत्यंत भव्य और चमकीला है, जो बुराई के विनाश और धर्म की स्थापना का प्रतीक है।
◆ योग विज्ञान: आज्ञा चक्र (Ajna Chakra)
एक योग साधक के लिए आज का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि आज चेतना आज्ञा चक्र (तीसरी आँख) में स्थित होती है।
- स्थान: दोनों भौहों के बीच (Eyebrow Center)।
- महत्व: यह चक्र अंतर्ज्ञान (Intuition), एकाग्रता और मानसिक स्पष्टता का केंद्र है। माँ कात्यायनी की कृपा से साधक को आत्म-साक्षात्कार की शक्ति प्राप्त होती है।
माँ कात्यायनी की वंदना के लिए इस श्लोक का पाठ करना चाहिए-
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥
अर्थ: जिनके हाथों में चमकती हुई चंद्रहास तलवार है और जो श्रेष्ठ सिंह पर सवार हैं, वे दानवों का विनाश करने वाली माँ कात्यायनी मेरा कल्याण करें।
सोमवार, 23 मार्च 2026
माँ स्कंदमाता: वात्सल्य और ज्ञान की देवी
भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र 'कार्तिकेय' का एक नाम 'स्कंद' भी है। स्कंद की माता होने के कारण ही देवी के इस स्वरूप को 'स्कंदमाता' कहा जाता है।
◆ स्वरूप और प्रतीकवाद
- चतुर्भुज रूप: माँ की चार भुजाएँ हैं। अपनी ऊपरी दो भुजाओं में वे कमल का पुष्प धारण करती हैं।
- गोद में स्कंद: माँ अपनी एक भुजा से गोद में बाल कार्तिकेय (स्कंद) को पकड़े हुए हैं। यह स्वरूप ममता और वात्सल्य का प्रतीक है।
- वरमुद्रा: इनका एक हाथ वरमुद्रा में रहता है, जो भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करने का संकेत है।
- पद्मासना: चूँकि माँ कमल के आसन पर विराजमान होती हैं, इसलिए इन्हें 'पद्मासना देवी' भी कहा जाता है। इनका वाहन सिंह है।
◆ योग विज्ञान: विशुद्ध चक्र (Vishuddha Chakra)
आज साधक की चेतना विशुद्ध चक्र में स्थित होती है।
- स्थान: कंठ (गले) के मध्य में।
- तत्व: आकाश (Space Element)।
- प्रभाव: यह चक्र संचार, अभिव्यक्ति और रचनात्मकता का केंद्र है। माँ स्कंदमाता की कृपा से साधक की वाणी में माधुर्य आता है और वह सत्य को स्पष्ट रूप से व्यक्त कर पाता है।
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
23 मार्च..क्यों है खास..।
"क्रांति से हमारा तात्पर्य अंततः एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना से है जिसे इस प्रकार के घातक खतरों का सामना न करना पड़े और जिसमें सर्वहारा वर्ग (श्रमिक वर्ग) का प्रभुत्व हो।"
भगत सिंह को जानने के लिए इनकी पुस्तक "why I am an atheist?" पढ़ें..आप सोचने पे विवश हो जाएंगे..।
"हमें फांसी की सजा का स्वागत करना चाहिए, क्योंकि हमारी मौत सोई हुई जनता को जगाने का काम करेगी। एक जीवित क्रांतिकारी से कहीं अधिक शक्तिशाली एक मृत (शहीद) क्रांतिकारी होता है।"
सुखदेव जी ने गांधी जी को 7अक्टूबर 1930 को पत्र लिखा था,तबतक इन्हें फांसी की सजा सुना दिया गया था. उस पत्र के कुछ प्रमुख अंश-
• क्रांतिकारियों को पथभ्रष्ट या हिंसक कहने पर गांधीजी से कहते है-
"आप हमें जनता के सामने अपराधी की तरह पेश करते हैं, लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि हम जो कर रहे हैं, वह देश के गौरव और स्वाभिमान के लिए है..?"
• गांधी इरविन समझौता पर वार्ता के समय सवाल करते है-
"यदि आप सरकार के साथ समझौता कर रहे हैं, तो याद रखें कि केवल कुछ कैदियों की रिहाई से क्रांति समाप्त नहीं होगी। जब तक पूर्ण स्वतंत्रता और शोषण का अंत नहीं होता, तब तक यह आग जलती रहेगी।"
•"हम मौत से नहीं डरते। हम तो चाहते हैं कि हमारी फांसी देश के युवाओं के दिलों में आजादी की मशाल जला दे। क्या आपकी अहिंसा इस बलिदान की शक्ति को समझ पाएगी?"
●सुखदेव इस बात के सख्त खिलाफ थे कि गांधीजी उनकी फांसी रुकवाने के लिए अंग्रेजों से 'दया' की भीख मांगें। उन्होंने गौरव के साथ कहा कि वे शहीद होना चाहते हैं ताकि उनका रक्त देश के काम आए।
◆राजगुरु..
जहाँ भगत सिंह 'विचारक' और सुखदेव 'रणनीतिकार' थे, वहीं राजगुरु दल के सबसे घातक 'निशानेबाज' माने जाते थे।
राजगुरु महाराष्ट्र से थे और छत्रपति शिवाजी महाराज उनके सबसे बड़े आदर्श थे। वे अक्सर कहा करते थे...
"गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहकर सौ साल जीने से बेहतर है कि,स्वतंत्रता की वेदी पर एक दिन शेर की तरह शहीद हो जाना.."
फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद, जब जेल में साथियों के बीच चर्चा होती थी, तब राजगुरु ने मुस्कुराते हुए कहा था..
"फांसी का फंदा मेरे लिए फूलों की माला जैसा है। मुझे गर्व है कि मैं अपने देश के काम आ रहा हूँ और भगत सिंह व सुखदेव जैसे शेरों के साथ शहीद हो रहा हूँ।"
राजगुरु संस्कृत के विद्वान थे। वे अक्सर जेल में कठिन संस्कृत श्लोकों का पाठ करते थे। उनका मानना था कि भारतीय संस्कृति और शास्त्र हमें अन्याय के खिलाफ लड़ना सिखाते हैं..।।
रविवार, 22 मार्च 2026
Yoga for digestive system
पाचन तंत्र हमारे शरीर का इंजन है। योग के आसन और प्राणायाम 'पेरिस्टालिसिस' (Peristalsis - आंतों की गति) को विनियमित करते हैं और पोषक तत्वों के अवशोषण (Absorption) में सुधार करते हैं।
◆ मयूरासन (Peacock Pose) और रक्त का अंतःप्रवाह
- वैज्ञानिक साक्ष्य: यह आसन कोहनी के माध्यम से उदर महाधमनी (Abdominal Aorta) पर अस्थायी दबाव डालता है। जब आसन छोड़ा जाता है, तो पाचन अंगों में ताजे ऑक्सीजन युक्त रक्त की बाढ़ आ जाती है।
- शारीरिक प्रभाव: यह लिवर और अग्न्याशय (Pancreas) को पुनर्जीवित करता है और पुरानी कब्ज को दूर करने में वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है।
◆ पवनमुक्तासन (Wind-Relieving Pose) और आंतों की गतिशीलता
• वैज्ञानिक साक्ष्य: पेट पर पड़ने वाला शारीरिक दबाव बड़ी आंत (Large Intestine) में फंसी गैस को बाहर निकालने में मदद करता है और मल त्याग की प्रक्रिया को सुचारू बनाता है।
• शारीरिक प्रभाव: यह 'इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम' (IBS) के लक्षणों को कम करने और पेट फूलने (Bloating) की समस्या में राहत देता है।
◆ अग्निसार क्रिया और चयापचय (Metabolism)
- वैज्ञानिक साक्ष्य: पेट की मांसपेशियों का तेजी से संकुचन और विस्तार 'पैरासिम्पेथेटिक नर्व' को उत्तेजित करता है। शोध बताते हैं कि यह बेसल मेटाबॉलिक रेट (BMR) को बढ़ाता है।
- शारीरिक प्रभाव: यह सुस्त पाचन को सक्रिय करता है और शरीर की अतिरिक्त चर्बी को कम करने में मदद करता है।
◆ वज्रासन और वेगस नर्व (Vagus Nerve) का सक्रियण
- वैज्ञानिक साक्ष्य: भोजन के बाद वज्रासन में बैठने से पैरों की ओर रक्त का प्रवाह कम होकर पाचन क्षेत्र की ओर बढ़ जाता है। यह वेगस नर्व को संकेत देता है कि पाचन प्रक्रिया शुरू की जाए।
- शारीरिक प्रभाव: यह भोजन के बाद होने वाली भारीपन की भावना को कम करता है और एसिड रिफ्लेक्स (Acid Reflux) को रोकता है।
माँ कुष्मांडा: सृष्टि की आदि-शक्ति
माँ कुष्मांडा: सृष्टि की आदि-शक्ति
'कु' का अर्थ है छोटा, 'ष्म' का अर्थ है ऊर्जा और 'अंडा' का अर्थ है ब्रह्मांड। माना जाता है कि जब चारों ओर अंधेरा था, तब माँ ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी।
◆ स्वरूप और प्रतीकवाद
- अष्टभुजा देवी: माँ की आठ भुजाएँ हैं, इसलिए इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। इनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृत-कलश, चक्र और गदा है।
- अष्टसिद्धि और नवनिधि: इनके आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है।
- वाहन: माँ कुष्मांडा सिंह पर सवार हैं, जो साहस का प्रतीक है।
◆ योग विज्ञान: अनाहत चक्र (Anahata Chakra)
आज साधक का मन अनाहत चक्र (हृदय चक्र) में स्थित होता है।
- स्थान: हृदय के मध्य में।
- तत्व: वायु (Air Element)।
- प्रभाव: इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम, करुणा और क्षमा का भाव जागता है। यह वह केंद्र है जहाँ भौतिक और आध्यात्मिक ऊर्जाएँ मिलती हैं।
◆ वैज्ञानिक पक्ष: जीवनी शक्ति (Vital Energy)
माँ कुष्मांडा का निवास 'सूर्य मंडल' के भीतर माना जाता है। विज्ञान की दृष्टि से देखें तो सूर्य ही इस पृथ्वी पर ऊर्जा का मुख्य स्रोत है। माँ कुष्मांडा इसी जीवनी शक्ति (Pranic Energy) का प्रतिनिधित्व करती हैं जो हमारे स्वास्थ्य और बुद्धि को तेज करती हैं।
"सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥"
"बिहार दिवस": हां हम बिहारी है..
हां हम बिहारी है..
और बिहारी होने पे गुमान है..
क्योंकि मेरे कारण ही..
भारत कभी विश्वगुरु और सोने की चिड़िया था..
और मेरे कारण ही भारत फिर से सोने की चिड़िया और विश्व गुरु बनेगा..
हां हम बिहारी है..।।
मेरे ही गोद में..
जानकी,बुद्ध, महावीर,चंद्रगुप्त, चाणक्य, अशोक, समुंद्रगुप्त,आर्यभट, वराहमिहिर,विद्यापति,वाल्मीकि,गुरु गोविंद,शेर शाह,कुँवर सिंह,डॉ राजेन्द्र प्रसाद, रामधारी सिंह दिनकर, जयप्रकाश,बिस्मिल्लाह खां इत्यादि पले है..
कितना नाम गिनाऊँ..
किस-किस का काम गिनाऊँ..।
इस सबने मिलकर भारत को आयाम दिया..
विश्व में इक पहचान दिया..।।
मगर इस भारत ने..
आजादी के बाद इसको क्या दिया..??
इसके संसाधन का शोषण करके..
हरियाणा,गुजरात,महाराष्ट्र इत्यादि राज्यों में कंपनी और उद्योग का निर्माण किया..।
मजबूरन यंहा के लोगों को..
पेट भरने के लिए..
उस भारत में प्रस्थान किया..
कभी जिनके पूर्वजों ने..
भारत को विश्व का शिरमोर बनाया..।
आज उनके ही संतानों को..
पूरे भारत ने "बिहारी" कह कर सम्मान किया..।।
हां हम बिहारी है..।
भारत का शायद ही कोई कोना ऐसा हो.
जंहा हम बिहारी अपने पसीनों से उस क्षेत्र को न सींचा हो..
हां हम बिहारी है..।
आज भारत जिस संसाधन और जिन-जिन चीजों पे इतरा रहा..
उन सबको बिहारी ने अपने पसीनों से सींचा है..।
हां हम बिहारी है..।।
शनिवार, 21 मार्च 2026
संस्मरण:बचपन,जाति, धर्म
"माँ चंद्रघंटा" निर्भयता, ध्वनि विज्ञान और मणिपूर चक्र का रहस्य
"माँ चंद्रघंटा"निर्भयता, ध्वनि विज्ञान और मणिपूर चक्र का रहस्य
नवरात्रि के तीसरे दिन हम माँ चंद्रघंटा की उपासना करते हैं। इनका स्वरूप जितना सौम्य है, उतना ही वीरता से भरा हुआ है। एक साधक के लिए यह दिन अपनी आंतरिक शक्ति (Inner Strength) को पहचानने का है।
◆ स्वरूप - शांति और युद्ध का अद्भुत संतुलन
माँ चंद्रघंटा का वाहन सिंह है और उनके दस हाथों में अस्त्र-शस्त्र सुशोभित हैं। उनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है। यह दर्शाता है कि एक संतुलित व्यक्तित्व वही है जो शांति (चंद्रमा) और शक्ति (घंटा/नाद) को एक साथ साध सके।
◆ योग और मणिपूर चक्र (The Power House)
आज चेतना मणिपूर चक्र (नाभि केंद्र) पर होती है।
- तत्व: अग्नि।
- महत्व: जैसे अग्नि अशुद्धियों को जला देती है, वैसे ही मणिपूर चक्र का जागरण हमारे डर और संशय को भस्म कर देता है।
- साधकों के लिए: यदि आप जीवन में आत्मविश्वास की कमी महसूस करते हैं, तो माँ चंद्रघंटा का ध्यान आपको 'शेर जैसी निर्भयता' प्रदान करता है।
◆ घंटे की ध्वनि का विज्ञान (Sound Healing)
माँ के गले में स्थित घंटे की ध्वनि का रहस्य यह है कि यह 'नाद ब्रह्म' का प्रतीक है। वैज्ञानिक रूप से, घंटे की तीक्ष्ण ध्वनि मस्तिष्क के दोनों हिस्सों (Left & Right Brain) को संतुलित करती है और एकाग्रता बढ़ाती है।
"पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥"
शुक्रवार, 20 मार्च 2026
वर्ड हैप्पीनेस इंडेक्स..खुशियों का पैमाना
र खुशियां क्या है..??
गुरुवार, 19 मार्च 2026
माँ ब्रह्मचारिणी
चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन माँ ब्रह्मचारिणी को समर्पित है। 'ब्रह्म' का अर्थ है तपस्या और 'चारिणी' का अर्थ है आचरण करने वाली। यह स्वरूप हमें सिखाता है कि बिना कठिन परिश्रम और एकाग्रता के जीवन में किसी भी उच्च लक्ष्य (सिद्धि) को प्राप्त करना असंभव है।
◆ स्वरूप का प्रतीकवाद: नंगे पैर और हाथ में माला
माँ ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यंत सरल और भव्य है..
- नंगे पैर चलना: यह सुख-सुविधाओं के त्याग और जमीन से जुड़े रहने का प्रतीक है।
- दाहिने हाथ में जपमाला: यह निरंतर अभ्यास (Abhyasa) और मंत्र शक्ति का सूचक है।
- बाएं हाथ में कमंडल: यह ज्ञान और वैराग्य के जल को संचित करने का प्रतीक है।
- यह स्वरूप संदेश देता है कि ज्ञान (कमंडल) और क्रिया/अभ्यास (माला) का संतुलन ही सफलता की कुंजी है।
- तत्व: जल (Water Element)
- मनोवैज्ञानिक प्रभाव: यह चक्र हमारी सृजनात्मकता और भावनाओं का केंद्र है। माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा से व्यक्ति अपनी भावनाओं पर नियंत्रण (Self-restraint) पाना सीखता है।
◆योग विज्ञान और 'स्वाधिष्ठान चक्र'
नवरात्रि के दूसरे दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र (Sacral Chakra) में स्थित होता है।
◆ पौराणिक संदर्भ: शिव को पाने का संकल्प
देवी ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए हजारों वर्षों तक कठिन तपस्या की। उन्होंने केवल फल-फूल खाए और अंत में केवल पत्तों (अपर्णा) पर जीवित रहीं। यह कथा हमें 'अनंत धैर्य' की सीख देती है। आज के युग में जहाँ हम तुरंत परिणाम (Instant Gratification) चाहते हैं, माँ ब्रह्मचारिणी हमें धैर्य की शक्ति सिखाती हैं।
◆ वैज्ञानिक दृष्टिकोण: तपस्या और मस्तिष्क (Neuroplasticity)
आज का विज्ञान मानता है कि 'तप' या अनुशासन से हमारे मस्तिष्क की Neuroplasticity बढ़ती है। जब हम किसी कठिन लक्ष्य के लिए अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण पाते हैं, तो हमारे मस्तिष्क का 'प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स' मजबूत होता है, जिससे निर्णय लेने की क्षमता और मानसिक शक्ति बढ़ती है।
माँ ब्रह्मचारिणी का यह दिन हमें याद दिलाता है कि संघर्ष ही प्रगति का आधार है। यदि आपके जीवन में संघर्ष है, तो समझ लीजिए कि आप माँ के बताए 'तप' के मार्ग पर हैं, जिसका अंत 'सिद्धि' (सफलता) में ही होगा।
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
जिनके एक हाथ में अक्षमाला और दूसरे में कमंडल है, ऐसी परम श्रेष्ठ देवी ब्रह्मचारिणी मुझ पर प्रसन्न हों।
आप सभी को नवरात्रि के द्वितीय दिन की मंगलकामनाएं..
संभावनाएं कभी खत्म नही होता
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क्या सोच रहे हो तुम..?? यही सोच रहा हूँ कि.. क्या सोच रहा हूँ मैं..। सच कहूं तो.. कुछ तो सोच रहा हूँ मैं... मगर अफसोस क्या सोच रहा हूँ.. यह...
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अतीत से लेकर वर्तमान तक,हम सभी दुःखो से घिरे हुए है.. आखिर क्यों..?? इस क्यों का जबाब हम अतीत से ही ढूंढते आ रहे है..हमारे ऋषियों-मनीषियों न...
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हम सब खास(special) दिखना चाहते है.. मगर सवाल है क्यों..?? इसका सबसे बड़ा कारण है कि हम स्वयं को खास समझते ही नही..। जब हम स्वयं को खास समझने ...






















