रविवार, 29 मार्च 2026

कहानी: "नी"

हम कब,कंहा किससे और कैसे मिलेंगे..
ये कोई नही जानता..।
ये वाकया ही कुछ ऐसा है..।

दरभंगा एक ऐसा जगह है,जंहा एक तरफ किला की लंबी दिवार खड़ा होकर अपना इतिहास बताता है..तो वंही लंबी-चौड़ी सड़के अपना भविष्य बताता है..।मुझे मालूम नही था,की एकदिन मुझे दरभंगा से अलग होना होगा..
मगर हो गया,सिर्फ दरभंगा से ही नही,बल्कि उसके यादो से भी..।

अब जब दरभंगा आता-जाता हूँ,तो दरभंगा नीरस दिखता है,मानों जो पेड़ हमने लगाया था,वो सूख गया हो..ऐसा ही प्रतीत होता है..
जिन गलियों में,मैं रहा करता था,उस गली में जाने से डर लगता है,क्योंकि मैं वंहा से चुपचाप भाग आया था..।।
मगर मुझे क्या मालूम कि,जिससे भागा था,उससे मुलाकात कुछ इस तरह से होगा..।।

रात हो गई थी,और मैं दरभंगा स्टेशन पर सिमरिया जाने वाले ट्रैन का इंतजार कर रहा था,ट्रैन स्टेशन पर आई और मैं एक बोगी में चढ़ा,सीट ढूंढ ही रहा था कि एक फैमिली दिखी जिसे देखकर मेरे खुशी का ठिकाना नही रहा..।
मैंने उन अंकल-ऑन्टी को प्रणाम किया..और एक छोटा सा प्यारा सा बच्चा था,मैंने पूछा ये कौन है..उन्होंने कहा ये इसकी बेटी है..
मैंने पूछा गोद मे उठा लू..
उन्होंने इशारा दिया..
और मैं हर्षित होकर उसे गोद मे उठाया..
और उसे सीने से लगाया..।



सीने से लगाते ही मैं इतना भावुक हो गया कि मैं रोने लगा..(क्योंकि ऐसा लगा जैसे मैं, उसे गले लगा रहा हूँ..जिसे लगाने की तमन्ना थी,उसके शरीर से भी उसकी खुश्बू आ रही थी जिसके खुशबू में,मैं डूबना चाहता था..)
और खुद को नियंत्रित करके मुस्कुराते हुए पूछा..
इसका नाम क्या है..
थोड़ी देर के लिए सब सुन हो गए..
मानो मैंने क्या पूछ लिया..।
फिर उस बच्ची के माँ ने मेरे तरफ देखते हुई कहा..
इसका नाम "नी" है..
उसके माँ-बाप इस नाम से शायद खुश नही थे..।
मैंने कहा अच्छा है..छोटा नाम है..
लोग के जुबां पे जल्दी आ जायेगा..।।

मैंने देखा कि माहौल थोड़ा शांत हो गया है,जोकि कुछ देर पहले तक ठीक था,मगर मेरा नाम पूछते ही माहौल बिल्कुल बदल गया है..
मुझे अहसास हुआ कि यंहा रहना सही नही है..।
मैं ने मुस्कुराते हुए कहा-
ठीक है मैं चलता हूँ, 
पीछे खाली जगह है..।।

मैं आकर खिड़की वाले सीट पर लेट गया,और खिड़की से अंधेरे को निघारता रहा..अचानक मेरी नजर दूसरी तरफ गई तो देखा वो खड़ी है..मालूम नही कब से वो खड़ी थी..।
मैंने उससे पूछा बाथरूम जाना है...
चलु मैं..
वो चुपचाप मेरे तरफ देख रही थी..।
मानो वो बिना बोले बहुत कुछ बोल रही थी..
और मैं उसके मौन को समझते हुए भी,
नासमझी का बहाना बना रहा था..।
मैं अपने सीट से खड़ा हो गया..
और कहा चलो..
वो आगे बढ़ी..बाथरूम तक आई..
उसे देखकर ऐसा लग रहा था..
जैसे दुनिया की सारी ताकत खुद में समेटकर..
वो मुझे गला लगाना चाह रही हो..।
मगर वो मेरे इशारे का इंतजार कर रही थी..।
एकबार में उसे ईशारा तो करू..
मगर मैंने उसे सहमति नही दी..
उसकी आँखें मुझसे ये कह रही थी की..
मानो सब गलती मेरी ही थी..।

वो अपने आँखों से कह रही थी..
"पहली दफा तुमसे प्यार न हुआ तो क्या हुआ..
 दूसरी दफ़ा तुम पहल तो करते..
 शायद तुम्हें मुझसे प्यार था ही नही..
 अगर प्यार होता..
 तो तुम मुझे पाने के लिए वो सब करते..
 जिससे मैं,तुम्हारे करीब आ सकू..
 शायद तुम्हें मुझसे प्यार था ही नहीं..
 सिर्फ आकर्षण था..।।

मैं स्तब्ध खड़ा रहा..
मेरे पास उसके सवालों का कोई जबाब नही था..।
मैं अपने सीट पे आ गया..
और वो अपने सीट पर चली गई..।

न जाने कब हम अपने गंतव्य पर पहुंचे,
पता ही नही चला..
गंगा मैं स्नान किया..स्नान करते वक़्त ऐसा महसूस हो रहा था..
जैसे मैं कोई पाप धो रहा हूँ..।
स्नान करके हम बाहर निकले..
मेरा नजर उन परिवार वालों से फिर मिला..
मगर इस बार ऐसा लगा..
जैसे हम दोनों एक-दूसरे को जानते ही नही..।।

हम भविष्य के बारे में क्यों चिंतित है..

भविष्य के गर्भ में क्या है..
ये कोई नही जानता..
जब हम भविष्य के बारे में जानते ही नही,तो फिर हम क्यों भविष्य को लेकर चिंतित है..??




क्योंकि हम अपने वर्तमान से संतुष्ट नही है..इसलिय भविष्य के बारे में सोचते है..।।
अगर हम वर्तमान में जिये तो फिर हमें भविष्य की चिंता होगी ही नही..।
मगर विडंबना ये है कि, आज पूरा विश्व भविष्य के लिए ही चिंतित है..
आखिर क्यों..??
क्योंकि हमपे बाजारबाद हावी है,और बाजारबाद भविष्य को बेहतर या डरा कर ही अपना कारोबार करता है..।

अगर वैज्ञानिक रूप से देखें..तो हमारे मस्तिष्क का अगला हिस्सा "प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (Prefrontal Cortex)" जिसकी बनावट ही इस तरह की होती है,जो हमें मानसिक रूप से भविष्य की यात्रा करवाता है..

आखिर "प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (Prefrontal Cortex)" ऐसा क्यों करता है..??
इसे जानने के लिए आपको अतीत में डुबकी लगाना होगा..जब मानव अपने जिंदगी के लिए जदोजहद कर रहा था,तब वो अपने जिंदा रहने के बारे में सोचता था..हिंसक जानवरों से कैसे बचें,कल क्या खाएंगे.. इसी सोच के कारण हमारा प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (Prefrontal Cortex)" का विकास हुआ,और यही से हम भविष्य के बारे में सोचने लगे..।
पहले हम जिंदा रहने के बारे में सोचते थे,
और आज हम, बेहतर जिंदगी के बारे में सोचते है..।।

शनिवार, 28 मार्च 2026

चार्ली चैपलिन..लंदन के सड़कों से उठकर विश्व के मानसपटल तक..

"मुस्कुराओ, भले ही तुम्हारा दिल टूट रहा हो... अगर तुम मुस्कुराओगे, तो देखोगे कि जीवन अभी भी जीने योग्य है।"

आज एक किताब पढ़ रहा था..और उसमें चार्ली चैपलिन का जिक्र आया..और तब से उन्हें और जानने की इच्छा हुई..इससे पहले भी कई दफा उनके बारे में पढ़ा,सुना और उनकी कई मूवीयाँ देखी है..मगर उन्हें जितने बार पढ़ो हरेक बार कुछ नया जानने को मिलता है,नया सीखने को मिलता है..।
आज की जेनरेशन उनके बारे में जानती तो होगी..मगर उन्हें नही जानते होंगे..जिन्होंने उन्हें चार्ली चैपलिन बनाया..।
चलिये उनके बारे में कुछ नया जानते है..।



क्या आपको पता है..वो पहली बार स्टेज पर परफॉरमेंस कितने साल के उम्र में किये..??
5 साल की उम्र में..हां 5 साल की उम्र में..
हो सकता है इसमें से कइयों को ये ताज्जुब न लगे..मगर इसके पीछे की कहानी आपको थोड़ा हैरान कर देगा..शायद नही करेगा..।

● चार्ली की माँ, हन्ना चैपलिन, लंदन के एक थिएटर में गा रही थीं। अचानक गाते समय उनकी आवाज़ फटने लगी और वे सुर खो बैठीं। दर्शकों ने शोर मचाना और उन पर चीजें फेंकना शुरू कर दिया।थिएटर के मैनेजर ने स्थिति संभालने के लिए नन्हे चार्ली को स्टेज पर भेज दिया, क्योंकि उन्होंने चार्ली को अपनी माँ की नकल करते हुए देखा था।

जब चार्ली स्टेज पर आए और गाना शुरू किया साथ ही माँ की आवाज का नकल करना शुरू किया,तो लोगों ने कुछ सिक्के उछालने लगे..वो गाना,गाना बंद करके सिक्के उठाना शुरू कर दिए..इस मासूमियत को देख करके सारा हॉल हंसी से भर गया..।और यंही से चार्ली चैपलिन का उदय हुआ..।

"आइना मेरा सबसे अच्छा दोस्त है, क्योंकि जब मैं रोता हूँ, तो वह कभी नहीं हंसता।"

मगर इसी रात इनकी माँ की आवाज सदा के लिए चला गया..पिता शराबी थे,शराब पीने के कारण ही इनकी मृत्यु हो गई,उस समय चार्ली चैपलिन 12 साल के थे..माँ काम न मिलने के कारण और गरीबी के कारण मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गई जिस कारण उन्हें कई बार पागलखाना जाना पड़ा..।और इन्हें वर्क हाउस(गरीबों के लिए बना सरकारी जगह) में रहना पड़ा और मजदूरी करना पड़ा,वंहा की जिंदगी जेल जैसी थी।

चार्ली चैपलिन अपने माँ से बहुत प्यार करते थे वो अपने आत्मकथा में लिखते है- "वे और उनके भाई अपनी माँ को सड़कों पर बदहवास हालत में देखते थे,और हम चाहकर भी कुछ नही कर पाते थे..।"

चार्ली अक्सर कहते थे- 

"जीने के लिए हंसी ज़रूरी है, खासकर तब जब आपके पास रोने के सौ कारण हों।"

​•जब चार्ली लगभग 9 साल के थे, उनकी माँ की बीमारी के कारण घर चलाना मुश्किल था। तब उनके पिता के संपर्कों के जरिए उन्हें 'द एइट लंकाशायर लैड्स' नाम के एक डांसिंग ग्रुप में काम मिला। यहाँ उन्होंने 'क्लॉग डांसिंग' (लकड़ी के जूतों के साथ डांस) सीखी। यह उनकी प्रोफेशनल ट्रेनिंग की शुरुआत थी।

चार्ली को असली पहचान तब मिली जब 14 साल की उम्र में उन्हें एक मशहूर नाटक 'शर्लक होम्स' में 'बिली' (एक न्यूज़बॉय) का रोल मिला।दिलचस्प बात ये है कि उस समय चार्ली को पढ़ने तक नही आता था,अपने भाई सिडनी के मदद से डायलॉग रटे थे..।

19 साल की उम्र तक चार्ली एक मँझे हुए कलाकार बन चुके थे। उन्हें प्रतिष्ठित 'फ्रेड कार्नो' की कॉमेडी कंपनी में जगह मिली,​यहाँ उन्होंने 'बिना बोले अभिनय' (Pantomime) और 'स्लैपस्टिक कॉमेडी' की बारीकियां सीखीं।​इसी कंपनी के साथ वे अमेरिका के दौरे पर गए, जहाँ हॉलीवुड की नज़र उन पर पड़ी

•अमेरिका के दौरे के दौरान, 'कीस्टोन स्टूडियो' के मालिक मैक सेनेट ने चार्ली का टैलेंट देखा और उन्हें फिल्मों के लिए साइन कर लिया।​शुरुआत में चार्ली कैमरा के सामने थोड़ा झिझक रहे थे, लेकिन जल्द ही उन्होंने अपनी जगह बना ली।​अपनी दूसरी ही फिल्म 'किड ऑटोस एट वेनिस' (1914) में उन्होंने पहली बार वह ड्रेस पहनी जो आगे चलकर "द ट्रैम्प" (The Tramp) के रूप में अमर हो गई


26 साल की उम्र में, उन्होंने उस समय का सबसे बड़ा कॉन्ट्रैक्ट साइन किया, जिसके लिए उन्हें $670,000 (सालाना) मिला,जो उस ज़माने में एक अविश्वसनीय रकम था।

उस समय के बड़े फिल्म स्टूडियो कलाकारों को बहुत कम पैसा देते थे और फिल्मों की कहानी में बहुत दखल देते थे। चैपलिन अपनी कला के साथ समझौता नहीं करना चाहते थे। 1919 में, चैपलिन ने उस समय के तीन अन्य बड़े दिग्गजों (मैरी पिकफोर्ड, डगलस फेयरबैंक्स और डी.डब्ल्यू. ग्रिफिथ) के साथ मिलकर अपनी खुद की कंपनी 'United Artists' बनाई।अब वे खुद अपनी फिल्मों के मालिक थे। वे अपनी फिल्मों के लेखक, निर्देशक, अभिनेता और यहाँ तक कि संगीतकार भी खुद ही थे। इससे उन्हें वह स्वतंत्रता मिली जिससे उन्होंने 'द गोल्ड रश' और 'सिटी लाइट्स' जैसी कालजयी फिल्में बनाईं

द ग्रेट डिक्टेटर' (1940) यह फिल्म चैपलिन के साहस का सबसे बड़ा उदाहरण हैयह फिल्म एडोल्फ हिटलर और नाज़ीवाद का मज़ाक उड़ाती थीजिस समय यह फिल्म बन रही थी, हिटलर का खौफ पूरी दुनिया में था।
(हिटलर और चैपलिन का जन्म एक ही साल और एक ही महीने (अप्रैल 1889) में हुआ था। दोनों की मूँछें भी एक जैसी थीं। चैपलिन ने इसी समानता का फायदा उठाकर हिटलर (फिल्म में हेंकल) का किरदार निभाया।)

"मेरा दर्द किसी के लिए हंसी का कारण हो सकता है, लेकिन मेरी हंसी कभी किसी के दर्द का कारण नहीं होनी चाहिए।"


क्या आपको पता है..चार्ली चैपलिन गांधी से मिले थे..??
जब गांधीजी दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन गए तो चार्ली चैपलिन उनसे मिलने की इच्छा जताया,शुरुआत में तो उन्होंने मना कर दिया क्योंकि गांधीजी चार्ली चैपलिन को नही जानते थे,फिर उन्हें बताया गया की वो दुनिया के मशहूर कलाकार और गरीब मजदूर के हितैषी है,तब गांधीजी उनसे मिलने के लिए राजी हुए..।
जब चैपलिन गांधीजी से मिले तो उन्होंने पूछा-आप मशीनों का विरोध क्यों करते हैं? मशीनें तो इंसान का काम आसान बनाती हैं और उसे गुलामी से मुक्त कर सकती हैं
गांधीजी ने जबाब दिया - "मैं मशीनों के खिलाफ नहीं हूँ, लेकिन मैं उस व्यवस्था के खिलाफ हूँ जो मशीनों का उपयोग करोड़ों लोगों को बेरोजगार करने के लिए करती है। भारत जैसे देश में, जहाँ आबादी इतनी ज्यादा है, वहां इंसान को काम की जरूरत है, मशीन की नहीं।"

गांधीजी के बातों से ही प्रेरित होकर उन्होंने "मॉडर्न टाइम्स" मूवी बनाया जिसमे दिखाया गया कि कैसे मशीन इंसान पर हावी होकर उनके भावनाओ को खत्म कर देता है।

"हमें मशीनों से ज्यादा इंसानियत की जरूरत है। चालाकी से ज्यादा दया और शालीनता की जरूरत है। बिना इन गुणों के, जीवन हिंसक हो जाएगा और सब कुछ खो जाएगा।"

चैपलिन के अंतिम दिन स्विट्जरलैंड में बीते। उन्हें अपने राजनीतिक विचारों के कारण अमेरिका छोड़ना पड़ा थालेकिन 1972 में, यानी करीब 20 साल बाद, वे दोबारा अमेरिका गए जब उन्हें 'मानद ऑस्कर' (Honorary Oscar) से नवाजा गया। उस समय उन्हें सिनेमा के इतिहास का सबसे लंबा (12 मिनट का) 'स्टैंडिंग ओवेशन' मिला था

चार्ली चैपलिन की मृत्यु 25 दिसंबर, 1977 को क्रिसमस के दिन 88 वर्ष की आयु में नींद में मुस्कुराते हुए हो गया..।

"इंसान की कीमत उसके कपड़ों या बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और दूसरों के प्रति उसकी संवेदना से तय होती है।"




शुक्रवार, 27 मार्च 2026

"माँ सिद्धिदात्री" पूर्णता और सिद्धियों की देवी

'सिद्धि' का अर्थ है अलौकिक शक्ति और 'दात्री' का अर्थ है देने वाली। भगवान शिव ने भी इन्हीं की कृपा से आठ सिद्धियाँ प्राप्त की थीं और उनका आधा शरीर देवी का हुआ था, जिससे वे 'अर्धनारीश्वर' कहलाए।


स्वरूप और प्रतीकवाद

  • कमल पर विराजमान: माँ सिद्धिदात्री कमल के पुष्प पर आसीन हैं (हालाँकि इनका वाहन सिंह भी है)।
  • चतुर्भुज: इनके चार हाथ हैं। दाहिने नीचे वाले हाथ में चक्र और ऊपर वाले में गदा है। बाएं नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले में कमल का पुष्प है।
  • पूर्णता: यह स्वरूप दर्शाता है कि साधना अब पूर्ण हो चुकी है और साधक को उसके तप का फल मिलने वाला है।

​◆ योग विज्ञान: निर्वाण (Nirvana)

आज साधक की चेतना सहस्रार चक्र (Crown Chakra) में पूर्णतः स्थित होती है।

  • अवस्था: यह 'अद्वैत' की अवस्था है जहाँ साधक और शक्ति एक हो जाते हैं।
  • प्रभाव: माँ सिद्धिदात्री की कृपा से ब्रह्मांड का सारा ज्ञान और सभी अष्ट सिद्धियाँ (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व) सुलभ हो जाती है

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।

सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥

अर्थ: जिन्हें सिद्ध, गंधर्व, यक्ष, असुर और देवता भी पूजते हैं, वे सिद्धियाँ देने वाली माँ सिद्धिदात्री हमें भी सफलता प्रदान करें।

गुरुवार, 26 मार्च 2026

प्यार की पांति..

मुझे लगा मैं ही हूँ ,
तुझे चाहने वाला..।
मगर में नादान समझ नही पाया..
मुझ जैसे कई है तुझे चाहने वाले..।।

हर बार मैं ही तेरे करीब जाता हूँ..
मुझे याद नही..
तुम आखरी बार करीब कब आई..
मैं तुझसे जुड़कर पूर्ण होना चाहता हूँ..
मगर तुम तो पहले से ही पूर्ण हो..।।

मुझे लगा मैं ही हूँ ,
तुझे चाहने वाला..।

सोचता हूँ तुमसे दूरियां बनाऊ..
मगर मैं,तुम्हारे मकड़ जाल में फंस गया हूँ..
तुमसे दूर जाकर भी..
तुमसे दूर नही जा पाऊंगा..
मगर किसी किनारे पे रहकर..
तुमसे दूरियां बना के रखूंगा..।

किसी दिन तुम उस किनारे पे आओगी..
जिस किनारे पे रहकर मैं..तुम्हे याद कर रहा होऊंगा..।।
तुम धीरे से मेरे कंधे पे हाथ रखोगी..
और मैं कंही खो जाऊंगा..।।

मुझे लगा मैं ही हूँ ,
तुझे चाहने वाला..।



​माँ महागौरी: पवित्रता और शांति की देवी

​'महा' का अर्थ है अत्यंत और 'गौरी' का अर्थ है श्वेत (सफेद)। कठिन तपस्या के कारण जब इनका शरीर काला पड़ गया था, तब भगवान शिव ने गंगाजल से इन्हें स्नान कराया, जिससे इनका वर्ण पूर्णतः गोरा हो गया। इसी कारण इन्हें 'महागौरी' कहा जाता है।



स्वरूप और प्रतीकवाद

  • श्वेत वर्ण: माँ का रंग पूर्णतः गोरा है और वे श्वेत वस्त्र ही धारण करती हैं। यह 'परम शुद्धि' (Pure Consciousness) का प्रतीक है।
  • चतुर्भुज: इनके चार हाथ हैं। ऊपर वाले दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले में त्रिशूल है। ऊपर वाले बाएं हाथ में डमरू और नीचे वाला हाथ वरमुद्रा में है।
  • वाहन: माँ महागौरी का वाहन वृषभ (बैल) है।

​◆योग विज्ञान: सोम चक्र (Soma Chakra)

महा अष्टमी पर साधक का मन सोम चक्र (सहस्रार के भीतर का एक सूक्ष्म केंद्र) की ओर बढ़ता है।

  • भाव: आज का दिन 'चित्त की शुद्धि' का है। जैसे माँ ने गंगाजल से स्नान कर कांति प्राप्त की, वैसे ही साधक प्राणायाम और ध्यान के जल से अपने अंतर्मन की मलिनता को धोता है।
  • प्रभाव: इस दिन साधना करने से संचित पापों का नाश होता है और बुद्धि अत्यंत सात्विक हो जाती है।


श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।

महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥ 

अर्थ: सफेद बैल पर सवार, श्वेत वस्त्र धारण करने वाली और महादेव को आनंद देने वाली पवित्र माँ महागौरी मेरा कल्याण करें।

बुधवार, 25 मार्च 2026

​माँ कालरात्रि: अंधकार का नाश करने वाली शक्ति

'काल' का अर्थ है समय और मृत्यु, और 'रात्रि' का अर्थ है अज्ञान का अंधकार। माँ कालरात्रि वह शक्ति हैं जो समय के चक्र को नियंत्रित करती हैं और अज्ञानता व दुष्टों का विनाश करती हैं।



​◆ स्वरूप और प्रतीकवाद

  • रंग: इनका शरीर रात के अंधकार की तरह काला है। इनके बिखरे हुए बाल और गले में बिजली की तरह चमकने वाली माला है।
  • त्रिनेत्र: माँ के तीन नेत्र ब्रह्मांड की तरह गोल हैं, जिनसे अग्नि की किरणें निकलती हैं।
  • चार भुजाएँ: इनके दाहिने हाथ 'अभय' और 'वरद' मुद्रा में हैं, जो भक्तों को सुरक्षा और वरदान देते हैं। बाएं हाथों में 'खड्ग' और 'कांटेदार अस्त्र' हैं।
  • वाहन: माँ कालरात्रि गर्दभ (गधा) पर सवार हैं।
  •  इनका रूप भयानक भले ही हो, लेकिन ये हमेशा शुभ फल देने वाली हैं, इसलिए इनका एक नाम 'शुभंकरी' भी है


    ​◆ योग विज्ञान: सहस्रार चक्र (Sahasrara Chakra)

    महा सप्तमी के दिन साधक का मन सहस्रार चक्र (ब्रह्मरंध्र) के पास पहुँचने की तैयारी में होता है।

    • स्थान: सिर का सबसे ऊपरी हिस्सा।
    • प्रभाव: माँ कालरात्रि की कृपा से साधक के भीतर का सारा 'भय' समाप्त हो जाता है। यह ब्रह्मांड की शक्तियों से जुड़ने का द्वार है।
    • साधकों के लिए: यदि आप मानसिक तनाव या किसी अज्ञात भय से जूझ रहे हैं, तो आज का ध्यान आपको परम शांति और साहस प्रदान करेगा।


    ​माँ कालरात्रि की वंदना के लिए इस श्लोक का पाठ करें:

    एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।

    लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥

    वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।

    वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

मंगलवार, 24 मार्च 2026

नजरिया : प्रकृति को समझिए

आप जब भी खुद को कमजोर,असहाय,बीमार और खुद को जर्जर महसूस करें तो अपने आपको भाग्यवान समझें..।।
क्योंकि प्रकृति आपको अपने करीब बुला रही होती है।।
ये एक रहस्य है..
इसे सब समझ नही पाते...।।



हम तो अक्सरहाँ इस परिस्थिति में,उस प्रकृति के ऊपर दोषारोपण ही करते है..
है भगवान ये क्या किया..मेरे साथ ही क्यों किया..??

कभी आपने सोचा है..
आपके ही साथ बुरा क्यों हुआ..??

सच कहूं तो हमारे जिंदगी में अच्छा और बुरा कुछ नही होता..
बल्कि हमें जो अच्छा लगता है,वो अच्छा होता है..
जो बुरा लगता है,वो बुरा होता है..।।

मगर प्रकृति कभी-कभी आपको असहाय महसूस करवाकर अपने करीब बुलाती है..मगर कुछ ही लोग होते है,जो उनके करीब जा पाते है...और उनके मौन को सुन पाते है..।।
ऐसे कुछ ही भाग्यशाली लोग होते है..
जो प्रकृति के इस इशारे को समझ पाते है..।।

भविष्य में या फिर वर्तमान में जब भी आप बुरी परिस्थितियों से गुजरे तो समझ लीजिए..प्रकृति आपको अपने करीब बुला रही है..।।
उनके करीब जाइये..
उनके मौन को समझिए..
वो आपको रूपांतरित कर देंगे..।।
आप-आप नही बल्कि आप कुछ और हो जाएंगे..।।




"माँ कात्यायनी"

ऋषि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था, इसीलिए इनका नाम 'कात्यायनी' पड़ाइन्हें महिषासुर का वध करने वाली 'युद्ध की देवी' भी माना जाता है।


​◆ स्वरूप और प्रतीकवाद

  • चतुर्भुज रूप: माँ की चार भुजाएँ हैं। बाईं ओर के ऊपरी हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में खड्ग है। दाईं ओर के हाथ अभय और वरद मुद्रा में हैं।
  • वाहन: माँ कात्यायनी का वाहन सिंह है।
  • ऊर्जा: इनका स्वरूप अत्यंत भव्य और चमकीला है, जो बुराई के विनाश और धर्म की स्थापना का प्रतीक है।

​◆ योग विज्ञान: आज्ञा चक्र (Ajna Chakra)

​एक योग साधक के लिए आज का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि आज चेतना आज्ञा चक्र (तीसरी आँख) में स्थित होती है।

  • स्थान: दोनों भौहों के बीच (Eyebrow Center)।
  • महत्व: यह चक्र अंतर्ज्ञान (Intuition), एकाग्रता और मानसिक स्पष्टता का केंद्र है। माँ कात्यायनी की कृपा से साधक को आत्म-साक्षात्कार की शक्ति प्राप्त होती है।


​माँ कात्यायनी की वंदना के लिए इस श्लोक का पाठ करना चाहिए-

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।

कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥

अर्थ: जिनके हाथों में चमकती हुई चंद्रहास तलवार है और जो श्रेष्ठ सिंह पर सवार हैं, वे दानवों का विनाश करने वाली माँ कात्यायनी मेरा कल्याण करें।

सोमवार, 23 मार्च 2026

​माँ स्कंदमाता: वात्सल्य और ज्ञान की देवी


भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र 'कार्तिकेय' का एक नाम 'स्कंद' भी है। स्कंद की माता होने के कारण ही देवी के इस स्वरूप को 'स्कंदमाता' कहा जाता है।


​◆ स्वरूप और प्रतीकवाद

  • चतुर्भुज रूप: माँ की चार भुजाएँ हैं। अपनी ऊपरी दो भुजाओं में वे कमल का पुष्प धारण करती हैं।
  • गोद में स्कंद: माँ अपनी एक भुजा से गोद में बाल कार्तिकेय (स्कंद) को पकड़े हुए हैं। यह स्वरूप ममता और वात्सल्य का प्रतीक है।
  • वरमुद्रा: इनका एक हाथ वरमुद्रा में रहता है, जो भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करने का संकेत है।
  • पद्मासना: चूँकि माँ कमल के आसन पर विराजमान होती हैं, इसलिए इन्हें 'पद्मासना देवी' भी कहा जाता है। इनका वाहन सिंह है।

​◆ योग विज्ञान: विशुद्ध चक्र (Vishuddha Chakra)

आज साधक की चेतना विशुद्ध चक्र में स्थित होती है।

  • स्थान: कंठ (गले) के मध्य में।
  • तत्व: आकाश (Space Element)।
  • प्रभाव: यह चक्र संचार, अभिव्यक्ति और रचनात्मकता का केंद्र है। माँ स्कंदमाता की कृपा से साधक की वाणी में माधुर्य आता है और वह सत्य को स्पष्ट रूप से व्यक्त कर पाता है।

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।

शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥

23 मार्च..क्यों है खास..।

इतिहास के कुछ ऐसे पन्ने है,जो कभी पुराने नही हो सकते..
और न ही वो मिट सकते है..चाहे इतिहास के वो पन्ने फाड़ ही क्यों न दिया जाय..मगर वो कंही न कंही अपना जगह बना ही लेंगे..।।
आप उसे इतिहास से हटाओगे तो वो साहित्य में शामिल हो जाएगा..
अगर उसे साहित्य से भी हटाओगे तो वो लोगों के जुबां पे आ जायेगा..।।

आज की तारीख़ यानी 23 मार्च उन्हीं लोगों को समर्पित है..
जिस उम्र में हम कैरियर और अपने भविष्य के बारे में सोचते है..
उस उम्र में वो तीन, वो मुकाम हासिल कर लिए..
जिस मुकाम पे कोई पहुंच नही सकता..।।

पता है वो 3 कौन थे..??
आज ही के दिन उन्हें उन गुनाह के लिए फांसी दे दी गई,जो गुनाह अंग्रेजी हुकूमत साबित नही कर पाया..(लाहौर षड्यंत्र)
वो इतने भयभीत थे कि उन्हें तय तारीख से एक दिन पहले चुपके से फांसी दे दी गई..।।
और वो 3 भारत माता की जय..और इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते-लगाते शहीद हो गए..।।

वो 3 कौन थे..??

शिवराम राजगुरु,सुखदेव थापर और तीसरा भगत सिंह थे..।।

भारत के चौराहों पे गांधी,अंबेडकर, बोस,के बाद सर्वाधिक अगर किसी की मूर्ति लगी है तो वो भगत सिंह की..।।




आज की युवा इन्हें थोड़ा बहुत तो जानती है..
मगर सच कहूं तो बहुत बड़ी आबादी इन्हें नही जानती है..।

इनके क्रांतिकारी कार्यों से कोई अवगत नही है..??
जब क्रूर,अमानुष,हिंसक,नीच अंग्रेज के नजरों से सब बचे रहते थे,उस समय इन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को नाको दम कर दिया था..
अंग्रेज इन क्रांतिकारियों से इतने भयभीत थे कि इन्हें किसी तरह अपने रास्ते से हटाना चाहते थे..।।

गांधी जी ने अगर लोगों को जागरूक किया..तो इन क्रांतिकारियों ने लोगों को अपने अधिकार के लिए लड़ना सिखाया..।।
मगर आज ये क्रांतिकारी कंही धूमिल हो गए है..।।

आज भारत को फिर से क्रांतिकारियों की जरूरत है..
जो भ्रष्टाचार के खिलाफ,अन्याय के खिलाफ, अधर्म के खिलाफ आवाज उठा सके..।।

मगर अफ़सोस आज के युवा तो खुद अघोषित गुलाम हो चुके है..।
आज उनके पास समय नही है..
जबकि सारा काम ऑनलाइन हो जा रहा है..।
हमारे युवा रील देखने मे या फिर सोशल मीडिया में व्यस्त है..।।
मगर खुद को शारीरिक,मानसिक,आध्यात्मिक रूप से कितने युवा खुद को मजबूत बना रहे है..??

अगर इन क्रांतिकारियों को जानना हो तो कुछ पुस्तक पढ़िए...

भगत सिंह ने अपने पुस्तक "why I am an atheist?" में लिखते है - 
"बम और पिस्तौल क्रांति नही लाते,क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है.."

"आलोचना और स्वतंत्र विचार एक क्रांतिकारी के दो अनिवार्य गुण हैं..।"

"क्रांति से हमारा तात्पर्य अंततः एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना से है जिसे इस प्रकार के घातक खतरों का सामना न करना पड़े और जिसमें सर्वहारा वर्ग (श्रमिक वर्ग) का प्रभुत्व हो।"

भगत सिंह को जानने के लिए इनकी पुस्तक "why I am an atheist?" पढ़ें..आप सोचने पे विवश हो जाएंगे..।

 


सुखदेव थापर
ये हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) के मुख्य रणनीतिकार थे। उन्हें दल का 'मस्तिष्क' माना जाता था..।

इनके अनुसार-
 ​"क्रांति केवल बम और पिस्तौल से नहीं आती, बल्कि एक अनुशासित संगठन और स्पष्ट विचारधारा से आती है।"

"हमें फांसी की सजा का स्वागत करना चाहिए, क्योंकि हमारी मौत सोई हुई जनता को जगाने का काम करेगी। एक जीवित क्रांतिकारी से कहीं अधिक शक्तिशाली एक मृत (शहीद) क्रांतिकारी होता है।"

सुखदेव जी ने गांधी जी को 7अक्टूबर 1930 को पत्र लिखा था,तबतक इन्हें फांसी की सजा सुना दिया गया था. उस पत्र के कुछ प्रमुख अंश-

क्रांतिकारियों को पथभ्रष्ट या हिंसक कहने पर गांधीजी से कहते है-

"आप हमें जनता के सामने अपराधी की तरह पेश करते हैं, लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि हम जो कर रहे हैं, वह देश के गौरव और स्वाभिमान के लिए है..?"

गांधी इरविन समझौता पर वार्ता के समय सवाल करते है-

 ​"यदि आप सरकार के साथ समझौता कर रहे हैं, तो याद रखें कि केवल कुछ कैदियों की रिहाई से क्रांति समाप्त नहीं होगी। जब तक पूर्ण स्वतंत्रता और शोषण का अंत नहीं होता, तब तक यह आग जलती रहेगी।"

"हम मौत से नहीं डरते। हम तो चाहते हैं कि हमारी फांसी देश के युवाओं के दिलों में आजादी की मशाल जला दे। क्या आपकी अहिंसा इस बलिदान की शक्ति को समझ पाएगी?"

सुखदेव इस बात के सख्त खिलाफ थे कि गांधीजी उनकी फांसी रुकवाने के लिए अंग्रेजों से 'दया' की भीख मांगें। उन्होंने गौरव के साथ कहा कि वे शहीद होना चाहते हैं ताकि उनका रक्त देश के काम आए। 

◆राजगुरु..

जहाँ भगत सिंह 'विचारक' और सुखदेव 'रणनीतिकार' थे, वहीं राजगुरु दल के सबसे घातक 'निशानेबाज' माने जाते थे।

राजगुरु महाराष्ट्र से थे और छत्रपति शिवाजी महाराज उनके सबसे बड़े आदर्श थे। वे अक्सर कहा करते थे...

"गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहकर सौ साल जीने से बेहतर है कि,स्वतंत्रता की वेदी पर एक दिन शेर की तरह शहीद हो जाना.."

 फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद, जब जेल में साथियों के बीच चर्चा होती थी, तब राजगुरु ने मुस्कुराते हुए कहा था..

"फांसी का फंदा मेरे लिए फूलों की माला जैसा है। मुझे गर्व है कि मैं अपने देश के काम आ रहा हूँ और भगत सिंह व सुखदेव जैसे शेरों के साथ शहीद हो रहा हूँ।"

 राजगुरु संस्कृत के विद्वान थे। वे अक्सर जेल में कठिन संस्कृत श्लोकों का पाठ करते थे। उनका मानना था कि भारतीय संस्कृति और शास्त्र हमें अन्याय के खिलाफ लड़ना सिखाते हैं..।।

 


रविवार, 22 मार्च 2026

Yoga for digestive system

पाचन तंत्र हमारे शरीर का इंजन है। योग के आसन और प्राणायाम 'पेरिस्टालिसिस' (Peristalsis - आंतों की गति) को विनियमित करते हैं और पोषक तत्वों के अवशोषण (Absorption) में सुधार करते हैं।

​◆ मयूरासन (Peacock Pose) और रक्त का अंतःप्रवाह

  • वैज्ञानिक साक्ष्य: यह आसन कोहनी के माध्यम से उदर महाधमनी (Abdominal Aorta) पर अस्थायी दबाव डालता है। जब आसन छोड़ा जाता है, तो पाचन अंगों में ताजे ऑक्सीजन युक्त रक्त की बाढ़ आ जाती है।
  • शारीरिक प्रभाव: यह लिवर और अग्न्याशय (Pancreas) को पुनर्जीवित करता है और पुरानी कब्ज को दूर करने में वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है।

​◆ पवनमुक्तासन (Wind-Relieving Pose) और आंतों की गतिशीलता

• वैज्ञानिक साक्ष्य: पेट पर पड़ने वाला शारीरिक दबाव बड़ी आंत (Large Intestine) में फंसी गैस को बाहर निकालने में मदद करता है और मल त्याग की प्रक्रिया को सुचारू बनाता है।

• शारीरिक प्रभाव: यह 'इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम' (IBS) के लक्षणों को कम करने और पेट फूलने (Bloating) की समस्या में राहत देता है

अग्निसार क्रिया और चयापचय (Metabolism)

  • वैज्ञानिक साक्ष्य: पेट की मांसपेशियों का तेजी से संकुचन और विस्तार 'पैरासिम्पेथेटिक नर्व' को उत्तेजित करता है। शोध बताते हैं कि यह बेसल मेटाबॉलिक रेट (BMR) को बढ़ाता है
  • शारीरिक प्रभाव: यह सुस्त पाचन को सक्रिय करता है और शरीर की अतिरिक्त चर्बी को कम करने में मदद करता है।

​◆ वज्रासन और वेगस नर्व (Vagus Nerve) का सक्रियण

  • वैज्ञानिक साक्ष्य: भोजन के बाद वज्रासन में बैठने से पैरों की ओर रक्त का प्रवाह कम होकर पाचन क्षेत्र की ओर बढ़ जाता है। यह वेगस नर्व को संकेत देता है कि पाचन प्रक्रिया शुरू की जाए।
  • शारीरिक प्रभाव: यह भोजन के बाद होने वाली भारीपन की भावना को कम करता है और एसिड रिफ्लेक्स (Acid Reflux) को रोकता है।


​माँ कुष्मांडा: सृष्टि की आदि-शक्ति

माँ कुष्मांडा: सृष्टि की आदि-शक्ति

​'कु' का अर्थ है छोटा, 'ष्म' का अर्थ है ऊर्जा और 'अंडा' का अर्थ है ब्रह्मांड। माना जाता है कि जब चारों ओर अंधेरा था, तब माँ ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी।

​◆ स्वरूप और प्रतीकवाद

  • अष्टभुजा देवी: माँ की आठ भुजाएँ हैं, इसलिए इन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। इनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृत-कलश, चक्र और गदा है।

  • अष्टसिद्धि और नवनिधि: इनके आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है।

  • वाहन: माँ कुष्मांडा सिंह पर सवार हैं, जो साहस का प्रतीक है।

​◆ योग विज्ञान: अनाहत चक्र (Anahata Chakra)

​आज साधक का मन अनाहत चक्र (हृदय चक्र) में स्थित होता है।

  • स्थान: हृदय के मध्य में।
  • तत्व: वायु (Air Element)।
  • प्रभाव: इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम, करुणा और क्षमा का भाव जागता है। यह वह केंद्र है जहाँ भौतिक और आध्यात्मिक ऊर्जाएँ मिलती हैं।

​◆ वैज्ञानिक पक्ष: जीवनी शक्ति (Vital Energy)

​माँ कुष्मांडा का निवास 'सूर्य मंडल' के भीतर माना जाता है। विज्ञान की दृष्टि से देखें तो सूर्य ही इस पृथ्वी पर ऊर्जा का मुख्य स्रोत है। माँ कुष्मांडा इसी जीवनी शक्ति (Pranic Energy) का प्रतिनिधित्व करती हैं जो हमारे स्वास्थ्य और बुद्धि को तेज करती हैं।

"सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥"


"बिहार दिवस": हां हम बिहारी है..

हां हम बिहारी है..

और बिहारी होने पे गुमान है..

क्योंकि मेरे कारण ही..

भारत कभी विश्वगुरु और सोने की चिड़िया था..

और मेरे कारण ही भारत फिर से सोने की चिड़िया और विश्व गुरु बनेगा..

हां हम बिहारी है..।।



मेरे ही गोद में..

जानकी,बुद्ध, महावीर,चंद्रगुप्त, चाणक्य, अशोक, समुंद्रगुप्त,आर्यभट, वराहमिहिर,विद्यापति,वाल्मीकि,गुरु गोविंद,शेर शाह,कुँवर सिंह,डॉ राजेन्द्र प्रसाद, रामधारी सिंह दिनकर, जयप्रकाश,बिस्मिल्लाह खां इत्यादि पले है..

कितना नाम गिनाऊँ..

किस-किस का काम गिनाऊँ..।

इस सबने मिलकर भारत को आयाम दिया..

विश्व में इक पहचान दिया..।।


मगर इस भारत ने..

आजादी के बाद इसको क्या दिया..??

इसके संसाधन का शोषण करके..

हरियाणा,गुजरात,महाराष्ट्र इत्यादि राज्यों में कंपनी और उद्योग का निर्माण किया..।

मजबूरन यंहा के लोगों को..

पेट भरने के लिए..

उस भारत में प्रस्थान किया..

कभी जिनके पूर्वजों ने..

भारत को विश्व का शिरमोर बनाया..।

आज उनके ही संतानों को..

पूरे भारत ने "बिहारी" कह कर सम्मान किया..।।

हां हम बिहारी है..।


भारत का शायद ही कोई कोना ऐसा हो.

जंहा हम बिहारी अपने पसीनों से उस क्षेत्र को न सींचा हो..

हां हम बिहारी है..।

आज भारत जिस संसाधन और जिन-जिन चीजों पे इतरा रहा..

उन सबको बिहारी ने अपने पसीनों से सींचा है..।

हां हम बिहारी है..।।


शनिवार, 21 मार्च 2026

संस्मरण:बचपन,जाति, धर्म

जब मैं छोटा बच्चा था..
तो मुझे जात-पात का भान नही था..
फिर जब थोड़ा बड़ा हुआ तो मुझे,
अपने जात का भान हुआ..
फिर जब थोड़ा और बड़ा हुआ..तो
ईद के बहाने मुसलमानों से मुलाकात हुआ..
थोड़ा और बड़ा हुआ तो..
जाति का भान हुआ..
और एक नए धर्म इस्लाम का ज्ञान हुआ..।
फिर जब अपने गाँव से अपने शहर पढ़ने गया..तो
जाति को गहरा करने वाला आरक्षण से मुलाकात हुआ..।
फिर कुछ महीनों सालों बाद 
क्रिसमस के दिन ईसाई धर्म का ज्ञात हुआ..।



अखबार पलटते-पलटते..
नेताओं के भाषणों को सुनते-सुनते..
मेरे अंदर भी, जाति,धर्म गहरा तक समा गया..
न जाने मैं कब समाजवादी,मार्क्सवादी..फिर पूंजीवादी बन गया पता ही नही चला..
गिरगिट की तरह रंग-बदलता रहा..।।

मगर वास्तविकता का भान तब चला..
जब दुनिया को देखना शुरू किया..
सच कहूं तो..
जो देश चलाते है..
न उनका कोई धर्म है,
न ही उनका कोई जाति है..
वो अपने अवसर के लिए समय-समय पर,
अपना जाति-धर्म बदलते रहते है।।

सच कहूं..
तो जाति धर्म के बोझ को वो ढ़ो रहे है..
जो दूसरों पर आश्रित है..
जो आर्थिक रूप से संपन्न है,
उनके लिए जाति-धर्म मायने नही रखता..।

हमारा एक ही जाति होना चाहिए..
वो सफलता..
और हमारा एक ही धर्म होना चाहिए..
अपने सफलता को ताउम्र बरकरार रखना..।।


"माँ चंद्रघंटा" निर्भयता, ध्वनि विज्ञान और मणिपूर चक्र का रहस्य

"माँ चंद्रघंटा"निर्भयता, ध्वनि विज्ञान और मणिपूर चक्र का रहस्य

नवरात्रि के तीसरे दिन हम माँ चंद्रघंटा की उपासना करते हैं। इनका स्वरूप जितना सौम्य है, उतना ही वीरता से भरा हुआ है। एक साधक के लिए यह दिन अपनी आंतरिक शक्ति (Inner Strength) को पहचानने का है।



​◆ स्वरूप - शांति और युद्ध का अद्भुत संतुलन

​माँ चंद्रघंटा का वाहन सिंह है और उनके दस हाथों में अस्त्र-शस्त्र सुशोभित हैं। उनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है। यह दर्शाता है कि एक संतुलित व्यक्तित्व वही है जो शांति (चंद्रमा) और शक्ति (घंटा/नाद) को एक साथ साध सके।

​◆ योग और मणिपूर चक्र (The Power House)

​आज चेतना मणिपूर चक्र (नाभि केंद्र) पर होती है।

  • तत्व: अग्नि।
  • महत्व: जैसे अग्नि अशुद्धियों को जला देती है, वैसे ही मणिपूर चक्र का जागरण हमारे डर और संशय को भस्म कर देता है।
  • साधकों के लिए: यदि आप जीवन में आत्मविश्वास की कमी महसूस करते हैं, तो माँ चंद्रघंटा का ध्यान आपको 'शेर जैसी निर्भयता' प्रदान करता है।

​◆ घंटे की ध्वनि का विज्ञान (Sound Healing)

​माँ के गले में स्थित घंटे की ध्वनि का रहस्य यह है कि यह 'नाद ब्रह्म' का प्रतीक है। वैज्ञानिक रूप से, घंटे की तीक्ष्ण ध्वनि मस्तिष्क के दोनों हिस्सों (Left & Right Brain) को संतुलित करती है और एकाग्रता बढ़ाती है

"पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।

प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥"

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

वर्ड हैप्पीनेस इंडेक्स..खुशियों का पैमाना

आपके अनुसा

र खुशियां क्या है..??
जरा सोचिए..
क्या खुशियों का कोई परिभाषा हो सकता है..
मेरे अनुसार तो नही..
क्योंकि जो चीज आपको दुःखी करता है..
हो सकता है वही चीज दूसरों के लिए खुशी का कारण हो..।


मगर कुछ तो सार्वभौमिक सत्य होता ही है..
मगर आपको जानकर हैरानी होगी कि खुशी सार्वभौमिक सत्य नही है...जबकि दुःख है..।

तो फिर खुश कैसे रहा जाए..??
हरेक परिस्थितियों को स्वीकार कर उसका सामना करके ही खुश रहा जा सकता है..।
और कोई उपाय नही है..।।

आप कोई भी ऐसा व्यक्ति दिखा दीजिए..
जो खुश है..
अगर कोई खुश है..
तो वो खुशी क्षणभंगुर होगी..
1 दिन,2 दिन, 2 महीना,2 साल..उसके बाद..
जिसे वो खुशी समझ रहे है,वही उनके लिए अभिशाप बन जायेगा।।

हम ताउम्र खुश नही रह सकते..
मगर हम ताउम्र आनंदमय जीवन जी सकते है..।।

आज 20 मार्च है,और दुनिया इस दिन को..
"विश्व हैप्पीनेस डे" के रूप में मनाता है..इसकी शुरुआत 2012 में "ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय" के "वेल बीइंग रिसर्च सेंटर" और "संयुक्त राष्ट्र सतत विकास समाधान नेटवर्क(UNSDSN)" द्वारा शुरू किया गया..।
ये दोनों मिलकर एक इंडेक्स भी जारी करते है..
147 देशों में फिनलैंड लगातार 9वे साल भी पहले पायदान पर है..
आपको जानकर हैरानी होगी कि इजरायल जो लगभग सालभर से युद्धरत है वो इस पायदान में 8वे स्थान पर है..।
और अगर आप भारतीय है..तो आपको जानकर और हैरानी होगी कि पाकिस्तान की रैंकिंग भारत से अच्छी है..पाकिस्तान 104वे स्थान पर है..जबकि भारत 116वे स्थान पर..।।

आखिर ये इंडेक्स जारी कैसे किया जाता है..??
इसके 6 पैमाने है..
प्रति व्यक्ति GDP, जीवन प्रत्याशा,सामाजिक संबंध,भ्रष्टाचार,उदारता, और निर्णय लेने की स्वतंत्रता..।।

अगर हम इन 6 पैमाने को देखें तो लगता है..सही ही है,हम भारतीयों की रैंकिंग..।
मगर एक सवाल है..
क्या खुशियों का कोई पैमाना होता है..??
सच कहूं तो खुशियों का कोई पैमाना नही होता..
बस खुश होने का एक बहाना ढूंढना होता है..।।

क्या आपको पता है..
मारी खुशियां सोशल मीडिया छीन रहा है..?

•देखा गया है कि जो 5 घंटे से ज्यादा समय सोशल मीडिया(व्हाट्सएप, फेसबुक,इंस्टाग्राम,यूट्यूब इत्यादि)पे समय बिताते हैं वो दुःखी होते है..।।

वंही जो 1घण्टे से कम समय सोशल मीडिया पे बिताते हैं,वो खुश होते है..।।
(अगर आपका आय का जरिया सोशल मीडिया है तो ये आपके लिए नही है..😊)

तो आपने क्या सोचा..
आपके लिए हैप्पीनेस के क्या मायने है..??




गुरुवार, 19 मार्च 2026

माँ ब्रह्मचारिणी

चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन माँ ब्रह्मचारिणी को समर्पित है। 'ब्रह्म' का अर्थ है तपस्या और 'चारिणी' का अर्थ है आचरण करने वाली। यह स्वरूप हमें सिखाता है कि बिना कठिन परिश्रम और एकाग्रता के जीवन में किसी भी उच्च लक्ष्य (सिद्धि) को प्राप्त करना असंभव है।



​◆ स्वरूप का प्रतीकवाद: नंगे पैर और हाथ में माला

माँ ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यंत सरल और भव्य है..

  • नंगे पैर चलना: यह सुख-सुविधाओं के त्याग और जमीन से जुड़े रहने का प्रतीक है।
  • दाहिने हाथ में जपमाला: यह निरंतर अभ्यास (Abhyasa) और मंत्र शक्ति का सूचक है।
  • बाएं हाथ में कमंडल: यह ज्ञान और वैराग्य के जल को संचित करने का प्रतीक है।


  • यह स्वरूप संदेश देता है कि ज्ञान (कमंडल) और क्रिया/अभ्यास (माला) का संतुलन ही सफलता की कुंजी है।

  • योग विज्ञान और 'स्वाधिष्ठान चक्र'

    ​नवरात्रि के दूसरे दिन साधक का मन स्वाधिष्ठान चक्र (Sacral Chakra) में स्थित होता है।

    • तत्व: जल (Water Element)
    • मनोवैज्ञानिक प्रभाव: यह चक्र हमारी सृजनात्मकता और भावनाओं का केंद्र है। माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा से व्यक्ति अपनी भावनाओं पर नियंत्रण (Self-restraint) पाना सीखता है।

    ◆  पौराणिक संदर्भ: शिव को पाने का संकल्प

    ​देवी ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए हजारों वर्षों तक कठिन तपस्या की। उन्होंने केवल फल-फूल खाए और अंत में केवल पत्तों (अपर्णा) पर जीवित रहीं। यह कथा हमें 'अनंत धैर्य' की सीख देती है। आज के युग में जहाँ हम तुरंत परिणाम (Instant Gratification) चाहते हैं, माँ ब्रह्मचारिणी हमें धैर्य की शक्ति सिखाती हैं।

    ​◆ वैज्ञानिक दृष्टिकोण: तपस्या और मस्तिष्क (Neuroplasticity)

    ​आज का विज्ञान मानता है कि 'तप' या अनुशासन से हमारे मस्तिष्क की Neuroplasticity बढ़ती है। जब हम किसी कठिन लक्ष्य के लिए अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण पाते हैं, तो हमारे मस्तिष्क का 'प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स' मजबूत होता है, जिससे निर्णय लेने की क्षमता और मानसिक शक्ति बढ़ती है।

    माँ ब्रह्मचारिणी का यह दिन हमें याद दिलाता है कि संघर्ष ही प्रगति का आधार हैयदि आपके जीवन में संघर्ष है, तो समझ लीजिए कि आप माँ के बताए 'तप' के मार्ग पर हैं, जिसका अंत 'सिद्धि' (सफलता) में ही होगा।

       

      दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।

      देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

      जिनके एक हाथ में अक्षमाला और दूसरे में कमंडल है, ऐसी परम श्रेष्ठ देवी ब्रह्मचारिणी मुझ पर प्रसन्न हों।

    आप सभी को नवरात्रि के द्वितीय दिन की मंगलकामनाएं..


संभावनाएं कभी खत्म नही होता

संभावनाएं कभी खत्म नही होता है,
बल्कि हम अपने जीवन से इतने हताश हो जाते है कि,
दस्तक दे रहे संभावनाओं के लिए दरवाजे ही नही खोलते..।
इसीलिए हताश मत होइये जनाब..
तैयार रहिये..
उन संभावनाओं के स्वागत के लिए..
जो आपको फर्श से अर्श पर ले जाने के लिए आनेवाला है..।

मगर ये आसान नही है..
हम अपनी असफलताओं और रोजमर्रा के जिंदगी से इतने थक जाते है कि, हमें उन संभावनाओं का पता ही नही चलता,जो हमारे जिंदगी में बदलाव लाने वाला होता है..।
हम उसे देखकर भी अनदेखा कर देते है..
और इसका फायदा कोई और उठा ले जाता है..।।

इसीलिए कभी हताश मत होइए..
क्योंकि संभावनाएं कभी खत्म नही होता..।।



कभी तो जागोगे..