आखिर क्यों..??
इस क्यों का जबाब हम अतीत से ही ढूंढते आ रहे है..हमारे ऋषियों-मनीषियों ने दुःख का कारण और निवारण भी बताया है..।
● सांख्य दर्शन दुःख का कारण "अविवेक"(पुरुष प्रकृति को एक समझना) को मानता है,और इसके निदान के लिए "विवेक ख्याति"(दोनों के बीच के अंतर को जानकर स्वयं का अनुभव करना) का मंतव्य प्रस्तुत करता है।
● वंही महर्षि पतंजलि दुःख का कारण "पंच-क्लेश"(अविद्या, अस्मिता,राग, द्वेष, और अभिनिवेश(मृत्यु भय)) को मानते है,और इससे निवारण के लिए "अष्टांगिक योग" का मार्ग बताते है।
●वही वेदांत दुःख का कारण "माया" को मानता है,और इसके निदान के लिए "आत्म ज्ञान" पर जोड़ देता है..।
●दूसरी तरफ महात्मा बुद्ध ने दुःख का कारण "तृष्णा(इच्छा)" को माना और इससे उबरने के लिए "अष्टांगिक मार्ग" का राह बताते है..।
●वंही महावीर जी दुःख का मूल कारण "कर्म और बंधन" को मानते है,और इससे छुटकारा पाने के लिए "रत्नत्रय"(सम्यक दर्शन,सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र) का मार्ग बताते है..।।
इसमें से कोई भी दर्शन दुःख से इंकार नही करता,वो दुःख को परम सत्य मानते है,आपका पृथ्वी पर पर्दापण होते ही,दुःख आपका साया बन जायेगा,आप और हम इससे बच नही सकते..मगर हम सब इससे बचने का निर्रथक प्रयास करते रहते है..।
हमारे संतों और ऋषियों ने जो मार्ग बताया है,वो इतना सरल नही है,जो हमसब उस राह पर चल सके..।
तो क्या किया जाय..??
◆सबसे पहले तो हमें, दुःख को वैसे ही स्वीकार करना होगा,जैसे हमने दिन और रात को स्वीकार कर लिया है..।
क्या अब हमें रात भयावह लगती है..??
शायद हममें से अधिकांश का जबाब नही में होगा..।
अब अपने आप को आज से 10000 वर्ष पीछे ले जाये और अपने आसपास के वातावरण का कल्पना कीजिये...न खाने,न पीने और न ही रहने का कोई ठिकाना है..दिन किसी तरह कट जाती है,मगर रात होते ही डर का शाया शुरू हो जाता है..।
हम ये भी नही सोच सकते कि,क्या हम कल का सवेरा देख पाएंगे..??
मगर वर्तमान में हम आने वाले भविष्य के बारे में भी सोच लेते है..😊
इसीलिए तो इन्वेस्टमेंट करते है..।
ये कैसे संभव हुआ..??
उस रात को स्वीकार कर,रात को बेहतर बनाने से..।
इसीलिए हमें दुःख को स्वीकारना होगा,और उसे बेहतर बनाना होगा..तब ही हम दुःख से छुटकारा पा सकते है..।।
◆ दुःख की उत्पत्ति कब होती है,और ये हमें कब प्रभावित करता है..??
दुःख की उत्पत्ति कभी भी हो सकती है..जैसे आंख बंद करते ही अंधेरा हो जाता है,उसी तरह दुःख का स्मरण करते ही दुःख की उत्पत्ति हो जाती है..।
जिस तरह हम दिन में आंख बंद करने के बावजूद उजियाला का अनुभव कर पाते है,उसी तरह हम दुःख को भी महसूस कर पाएंगे कि ये फालतू का दुःख है,या सच्चा का..।।
वर्तमान में हममें से अधिकांश लोग दुःख को स्वयं आमंत्रित कर रहे है,जिस तरह आंख बंद करके अंधेरे को आमंत्रित करते है..।
●हम दुःख को कैसे आमंत्रित कर रहे है..??
इसका जबाब आप स्वयं ढूंढिये..😊
•वर्तमान में दुःख का सबसे बड़ा कारण "डिजिटल गुलामी" है..ये आपको क्षणभंगुर आभासी सुख देता है..और उसके बाद निरंतर दुःख के दलदल में घसीटते जाता है..और हमें अहसास भी नही होता...।आज इसके कारण अवसाद(depression),चिंता(Anxiety) वैश्विक महामारी का रूप ले चुका है..।
• "खालीपन" हां दुःख का सबसे बड़ा कारण हमारा खालीपन है..
दुःख का अहसास भी तब होता है,जब आप खाली होते है..जबतक आप व्यस्त होते है,तबतक आपको दुःख स्पर्श नही करता..।
जरा सोचिए..आप दुःखी कब होते है 🤔..??
जब हम खाली होते है..और जब हम खाली होते है तो हमारे पास दो चुनाव होता है..दुःख की और ढुलकने का या फिर सुख की और बढ़ने का..जब हम सुख की और बढ़ने में सक्षम नही होते तो दुःख की और यू ही ढुलक जाते..हम दुःख की और न ढुलके इसके लिए हम कई माध्यम को अपनाते है..जैसे सोशल मीडिया यूज़ करना,मूवी देखना या कुछ ऐसी एक्टिविटी जो हमें दुःख से दूर करें..हम कामयाब भी होते है..मगर तबतक ही जबतक हम वो एक्टिविटी कर रहे होते है,और फिर हम वंही पे खुद को पाते है..।
तो फिर क्या करें..??
अपने आप को सार्थक कार्य मे व्यस्त करें..जिसे करने के बाद आपको कुछ आउटपुट मिले..(वो सोशल मीडिया भी हो सकता है,या संगीत,मूवी कुछ भी)
अगर हम ऐसा करते रहें तो धीरे-धीरे ये दुःख भी रात की तरह सहज होने लगेगा..।।
"दुःख को अस्वीकार नही,स्वीकार करें"
क्योंकि स्वीकृति ही निवृति है..।।


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