मुझे भी अपनी कहानी खुद लिखनी है..।
भले ही वक़्त अभी साथ न दे..
भले ही अभी कलम साथ न दे..
या फिर भले ही किस्मत अभी साथ ना दे..।
कहानी तो मन-मस्तिष्क में रच चुकी है..
बस उसे धरातल पल कलम और कागज से उकेरना है..।
सबको अपनी कहानी खुद लिखनी होती है.
मुझे भी अपनी कहानी खुद लिखनी है..।
चाहे बार-बार जिंदगी में रुकावट क्यों न आये..
किसी-न-किसी बार रुकावट को पार कर ही जाऊंगा..।
पार करने को मनुष्य से अब रह ही, क्या गया है..
चाहे हिमालय की चोटी हो,या हो समुन्द्र की गहराई..
या फिर पृथ्वी से दूर चंद्र और मंगल ही क्यों न हो..
अब कोई अछूता न रहा है...।
बस जरूरत है एक दृढनिश्चय इच्छा शक्ति की..
और कठिन परिश्रम की..।
कहानी खुद-खुद बन जाएगी..
और वक़्त,कलम,कागज एकसाथ आकर..
नई कहानियां बुन देंगी..।
सबको अपनी कहानी खुद लिखनी होती है.
मुझे भी अपनी कहानी खुद लिखनी है..।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें