वही दशहरा का मतलब दसवें दिन से है..।
चलिए एक छोटी कहानी सुनाता हूं..
ये कहानी नही बल्कि सच्ची घटना है,ये घटना लगभग आज से 900-1000 साल पहले की है..एक खुशहाल प्रदेश जंहा हरेक प्राणी खुश थे,क्योंकि उन्हें खुश रहना आता था..।
उस क्षेत्र में खाने-पीने की दिक्कत नही थी, क्योंकि उस क्षेत्र के बीचों-बीच से नदी बहती थी जिससे वंहा की जमीन उपजाऊ थी,हरे-भरे मैदान के साथ जंगलों की लंबी शृंखला भी था..।
हरेक लोग मिलजुलकर रहते और साथ मे हरेक उत्सव मनाते..।
मगर कुछ वर्षों बाद मौसम बदलने लगा,नदी सुखने लगी,जंगल सिकुड़ने लगे,लोगों का व्यवहार बदलने लगा...।
कुछ लोगों ने मिलकर अपने क्षेत्र के प्रमुख अपने राजा से गुहार लगाई की,महाराज कुछ उपाय कीजिये नही तो लोग भूखे मर जायेंगे..
राजा भी इस समस्या से अवगत थे,मगर उन्हें उम्मीद थी कि समय सबकुछ सही कर देगा..मगर इतना समय सब के पास कंहा होता है,जो खुद पर आत्मविश्वास और भगवान पर विश्वास कर सकें..।
राजा ये समस्या लेके अपने गुरु के पास पहुंचे..गुरु ने उन्हें बताया ये कोई समस्या नही है..बल्कि ये तो हमारे ही कर्मों का फल है..हमने नदियों का दोहन किया इसलिय नदियां सूखने लगी,हमनें वनों का दोहन किया इएलिये वन सिकुड़ने लगे..
ये समस्या कंहा है..हम अगर इसका दोहन छोड़कर इसका सदुपयोग करना शुरू करें तो फिर से हमारी नदियां और वन पूर्णावस्था में आ जायेंगे..।।
गुरु ने राजा से कहा एक तरीका है...अगले तिथि को विजयदशमी है..उस रोज वन से सूखे लकड़ियों को एकत्र कर एक अहंकार रूपी मनुष्य का ढांचा तैयार करना है(ज्यों-ज्यों मनुष्य का अहंकार बढ़ता है,उसका स्वरुप बढ़ता जाता है,और उसका स्वरूप जब भीमकाय हो जाता है,तो वो खुद को ही नही संभाल पाता है।)..और उसको विजयदशमी के दिन दहन करना है..।
राजा खुशी हो गया, ये तो बड़ा आसान उपाय है..वो ज्यों ही अपने गुरु से जाने की अनुमति मांगा..त्योंही गुरु ने राजा से एक बात कही - राजन एक बात का ख्याल रखना,इस अहंकार रूपी रावण का दहन वही करें जो काम,क्रोध,लोभ, मोह,द्वेष,घृणा,छल,पक्षपात,अहंकार और व्यभिचार ना हो,अन्यथा इसके दहन का परिणाम नही मिलेगा..।
राजा ने खुशी पूर्वक गुरु से कहा - जी गुरुदेव इसका में ख्याल रखूंगा..।राजा खुशी-खुशी अपने राज्य को लौट आया..और पूरे क्षेत्र में ढिंढोरा पिटवा दिया कि समस्या का समाधान मिल गया..अगली दशमी तिथि को अहंकार रूपी पुतले का दहन होगा,और सबको इसमें भाग लेना है।मानो पूरे क्षेत्र में उत्साह की लहर दौड़ गई..मगर ये क्या राजा स्वयं चिंतित हो गए..।
आखिर क्यों..??
क्योंकि राजा को अपने गुरु की अंतिम बात बार-बार याद आ रहा था..राजा ने अपने सभासदों की बैठक बुलाई..इसमें सभी मंत्री,सैनिक और राज्य के सभी गणमान्य एवं विद्वान को बुलाया..।सब अपने-अपने जगह पर बैठे हुए राजा का सभा मे आने का इंतजार कर रहें थे..जबकि राजा पहले से ही सभा में मौजूद थे..मगर आज उनका सिंहासन ऊपर नही नीचे लगा था..वो स्वयं सबका दरबार मे दरबारी की तरह स्वागत कर रहें थे..मगर उन्हें कोई पहचान नही पाया..।क्योंकि राजा के सिंहासन पर बैठते ही कुछ आये न आये क्रोध और अहंकार रूपी अवगुण आ ही जाता है..मगर जब राजन सबका स्वागत कर रहें थे तब ये अवगुण भी दूर हो गया था,इसलिय अन्य लोग पहचान नही पाए..।।
जब सब दरबार मे आ गए तो राजन सभी सभासदों के बीच मे आये और उनसे,अपने गुरु की बातों का उल्लेख किया कि अहंकार रूपी पुतले का दहन वही कर सकता है- जिसमें काम,क्रोध,मोह,लोभ,द्वेष,घृणा,छल,पक्षपात,अहंकार, और व्यभिचार जैसे अवगुण ना हो..।
राजन ने अपने सभासदों से कहा मैं तो इनमें से कई अवगुणों से घिरा हुआ हूँ..इन अवगुणों में से तो कई अवगुण राजा के लिए अनिवार्य है..।क्योंकि स्वयं राम, तब रावण का वध कर पाए जब वो एक संन्यासी थे..।इसलिए मैं इन सभासदों से कहना चाहता हूं..अगर आपमें से ऐसा कोई है जो इन अवगुणों से परे है तो कृपा कर आगे आये और पुतले का दहन करने का नेतृत्व करें..।।
मगर उस सभासदों में से कोई आगे नही बढ़ा.. क्योंकि उन 10 अवगुणों में से कोई न कोई अवगुण हरेक में था..।
जब राजन को निराशा हाथ लगा तब उसने पूरे राज्य के नागरिकों से आवाहन किया कि, अगर कोई ऐसा व्यक्ति है,जो इन अवगुणों से परे है..तो कृपा कर पुतले का दहन करने के लिए आगे आये..ये खबर सुनकर सब उत्साहित हुए मगर ये उत्साह बुलबुले के समान था..क्योंकि हरेक इंसान में कोई न कोई अवगुण था ही..किसी को पड़ोसी से द्वेष, तो किसी को अपने धन पे अहंकार तो कोई लोभ,मोह से ग्रस्त इस तरह हरेक इंसान में कोई न कोई अवगुण था ही..।
पुतले दहन का सिर्फ एक दिन ही बच गया सारी तैयारी जोर-शोर से थी सूखे लकड़ियों के गट्ठर से विशालकाय पुतला बनके तैयार हो गया था..मगर इसको दहन करने वाला कोई नही था..क्योंकि सब अवगुणों से घिरे थे..जब शाम ढलने को आया और पूरे राज्य से कोई पुतला दहन करने को नही आया, तो राजा अपने अस्तबल में गया और अपने घोड़े पर सवार होकर अपने गुरु के आश्रम की और चल दिया। कुछ घण्टों के बाद वो गुरु के आश्रम पहुंचा..।मगर इस बार वो राजा नही बल्कि एक याचक की भांति गुरु के पास पहुंचा..
गुरु के आश्रम के बाहर कुछ मिनटों तक खड़ा ही रहा क्योंकि उसे हिम्मत नही हो रहा था कि वो गुरु से बोले कि मैं और मेरे राज्य के हरेक नागरिक इन अवगुणों से घिरे हुए है..।कुछ मिनेट खड़े रहने के बाद एक व्यक्ति दिखा उसे राजन ने आवाज दिया और उनसे पूछा क्या गुरु जगे हुए है..
उसने कहा नही,अभी गुरुजी सोये हुए है..।राजन उसी कुटिया के बाहर गुरु की प्रतीक्षा करने लगा..।
चारों बगल घुप अंधेरा सिर्फ कभी-कभी हवा बहने पर पेड़ो के ओट से चांद की रोशनी उस कुटिया को जगमगा देती..तो कभी-कभी जुगनु पूरे कुटिया को रोशनी से नहला देता..।
राजा कभी चांद की रोशनी, तो कभी जुगनू की रोशनी देखकर हतप्रभ रह जाता और सोचता, मैंने कितना व्यर्थ खर्च किया अपने राजमहल को रोशनी से नहलाने के लिए..।
तो कभी हवा के लहरों द्वारा लाया गया पारिजात का सुगंध इन्हें उदेवलित कर देता.. और सोचता, इस तरह की सुंगंध मेरे उद्यान के फूलों में क्यों नही..शायद इसलिय की, इन पुष्पों को प्रकृति ने सींचा है।कभी-कभी दूर से आनेवाली झींगुर की आवाज में इतनी मधुरता महसूस होता कि, इसके सामने दरबार के हरेक संगीतज्ञ फीका साबित हो जाए..।
इन रोशनी,सुगंध और संगीत में राजन इस तरह मशगूल हो गया कि उसे अहसास ही नही हुआ कि रात्रि का पहर कब बीत गया, और ब्रह्म मुहूर्त आ गया..।
कुटिया के अंदर से आने वाला मंत्रो का उच्चारण जब इनके कानों में पड़ा तब सहसा होश आया कि मैं क्यों आया था..।
वो गुरु के बाहर आने का इंतजार करने लगा..ज्योहीं गुरु कुटिया से बाहर आये, तो उनका नजर राजा पर पड़ा..गुरु ने कहा राजन तुम यंहा क्या कर रहे हो..??
राजा गुरु के चरणों मे गिर गया और रोते हुए गुरु से बोला- गुरुदेव हम पतित है.हममें अवगुणों का भंडार है..न ही हम और न ही हमारे राज्य में ऐसा कोई है,जो इन अवगुणों से घिरा ना हो..इसलिए गुरुदेव उपाय बताए..आखिर कैसे उस पुतला का दहन किया जाय जिस से राज्य की खुशियां लौट आये..।।
गुरु मुस्कुराए..और बोले हे राजन- काम,क्रोध,मोह,लोभ,द्वेष, घृणा,छल,पक्षपात,अहंकार और व्यभिचार जीवन का हिस्सा है, इससे अलग होना दूभर है,जैसे हम अपने शरीर से अपने चमड़ी को अलग नही कर सकते वैसे ही इन्हें भी खुद से दूर नही कर सकते..।जब हम इन अवगुणों का सही इस्तेमाल करते है तो ये हमारे लिए ही नही, बल्कि कइयों के लिए लाभदायक है..मगर जब हम इसका इस्तेमाल सिर्फ अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए करने लगते है तो ये सिर्फ स्वयं के लिए ही नही बल्कि कईयों के लिए अहितकर होता है..।।
हे राजन में तुम्हें एक-एक करके इन अवगुणों के बारे में बताता हूँ..जिनके बिना जीवन का कोई महत्व नही है..
काम- हमें प्रकृति में जो भी सजीव चीज दिख रहा है,उसके उत्पति का कारण काम ही है,मगर जब इस काम को क्रीड़ा बना लेते है तो हमारा पतन शुरू हो जाता है..
क्रोध:- निर्दयी दुश्मनों का सामना करने के लिए क्रोध जरूरी है,मगर जब हम अपने अवगुणों को छुपाने,और कमजोर लोगों पर क्रोध करते है तो ये हमें औरो के नजर में गिराता है।
मोह:- ये पूरा परिवार और समाज कंही-न-कंही मोह के बंधन से ही बंधा हुआ है..मगर जब मोह एक के प्रति ज्यादा और एक के प्रति कम रहता है..तब ये मनुष्य के लिए अवगुण बन जाता है।
लोभ:- अपने क्षुधा और जरूरत की पूर्ति के लिए लोभ जरूरी है,मगर जब इस लोभ के कारण जब हम दूसरों की हकमारी करने लगते है तो ये अवगुण बन जाता है..।।
द्वेष:- हे राजन द्वेष अपनी असफलता से करना जरूरी है न कि दूसरों की सफलता से..।
घृणा:- घृणा हमेशा पाप से करना चाहिए पापी से नही..।
छल:- राजन समाज हित,धर्म हित के लिए छल जरूरी है,मगर अपने स्वार्थ के लिए छल करना अपराध है।
पक्षपात:- राजन पिछड़ों,कमजोर और असहाय लोगों की सहायता करते वक़्त अगर पक्षपात का आरोप अगर लगे भी तो अपराध नही है..।
अहंकार:- अहंकार जब स्वयं को बड़ा और दूसरे को छोटा अहसास कराए तो ये अहितकर है..।
व्यभिचार:- हे राजन व्यभिचार उस अवस्था में सही है,जब कोई निःसंतान दंपति संतान प्राप्ती के लिए आपस में मिलते है तब उचित है,अन्यथा अनुचित।(वैसे वर्तमान समय में विज्ञान बहुत प्रगति कर चुका है।)
हे राजन ये इतना सरल नही है..क्योंकि मनुष्य मन बहुत चंचल है..।मनुष्य की उत्पत्ति ही काम से हुआ है,और जब काम के समय बाधा उत्पन्न होता है तो क्रोध जागृत होता है,और क्रोधाग्नि शांत होने पर काम के प्रति मोह और बढ़ता है..।और इसी मोह के बढ़ने के कारण छल,द्वेष,घृणा और पक्षपात की भावना जागृत होता है..।जब काम,क्रोध,मोह, लोभ की अभिपूर्ती होने लगता है,तो अहंकार बढ़ने लगता है,और ज्योहीं अहंकार का स्वरूप बहुत बड़ा हो जाता है, त्योंही सारे अवगुण एक साथ एकत्रित होकर अहंकार का श्रृंगार बन जाता है..।।
हे राजन इन दिनों तुम सारे अवगुणों से ऊपर उठ गए हो..
इसलिए तुम अहंकार रूपी पुतले को दहन कर अपने राज्य को खुशहाल बनाओ..।
गुरु की बातों को सुनकर राजा के चहेरे पे कोई भाव व्याप्त नही हुआ,उसने गुरु के चरण स्पर्श करके उनसे विदा मांगा..।
पूरे राज्य में आज एक अलग ही उत्साह था,मगर राज भवन में सन्नाटा क्योंकि राजा का कोई पता नही चल रहा था,सारे गुप्तचर,मंत्री,दरबारी ने चप्पा-चप्पा छानमारा मगर राजा का कोई पता नहीं..इधर बहुत बड़े मैदान में लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी,मगर उस भीमकाय पुतले के सामने सब बौने दिख रहे थे,मानो ताड़ के पेड़ के नीचे मनुष्य खड़ा हो..पुतला दहन करने के लिए सारी सामग्री तैयार हो गया था,सिर्फ इंतजार था तो पुतले का दहन करने वाले का..
इधर राजमहल की सुगबुगाहट लोगों के भीड़ से,भरे मैदान तक भी आने लगा था,की राजा कंही गए हुए है..इस तरह से कब भीड़ का उल्लास इस आश्चर्य में बदल गया कि आखिर राजा कंहा गए..।
राजमहल में अफरा-तफरी मची ही हुई थी कि राजा का घोड़ा राजमहल की और आता हुआ दिखाई दिया..फिर से राजमहल में रौनक पैदा हो गई..मगर ये क्या..ज्यों-ज्यों घोड़ा नजदीक आ रहा था,त्यों-त्यों लोगों के चेहरे पे उदासी छाती जा रही थी..क्योंकि घोड़ा के साथ राजा नही था..मंत्री और राजा के घुड़सवार दौड़ कर घोड़े के पास पहुंचा..घुड़सवार ने जब घोड़े पर राजा का वस्त्र और आभूषण देखा तो सिसकियां भड़ने लगा,मगर ये सिसकियां जैसे ही दहाड़ में बदली पूरे राजमहल में मानो सन्नाटा छा गए,और ये सन्नाटा बादल की भांति उस भीड़ तक पहुंच गया जंहा अबतक कोलाहल था,ये भीड़ भी बिल्कुल शांत और शोकाकुल हो गई..मानो अब कुछ बचा ही नही..राजमहल और उस राज्य से एकत्रित सभी लोग मृतप्राय हो गए..उनके सारे गुण-अवगुण सब गायब हो गए..।।
इधर राजमहल में मंत्री जब घोड़े का निरक्षण कर रहें थे तो उन्हें अहसास हुआ कि राजा पूर्णतया सुरक्षित है,इसका ऐलान करते ही मानो मायूसी के बादल छंटने लगे..।घोड़े का निरक्षण करते समय मंत्री को एक खत मिला,जिसमें लिखा था पुतले का निर्धारित समय पर दहन होगा,और सबको वंहा समय से उपस्थित होना है,और इस राज्य का सेवक पूर्णतया सुरक्षित है..।।
ये खबर राजमहल से होते हुए उस मैदान तक पहुंच गया जंहा भीड़ एकत्रित थी,उस भीड़ में एक नया उत्साह और खुशी की लहर दौड़ी जिससे उस भीमकाय अहंकार रूपी पुतले को अचंभित कर दिया हो..वो भी सोचने को विवश हो गया आखिर हुआ क्या..।
सारे लोग उस मैदान में एकत्रित हो गए..और उस व्यक्ति और अपने राजा का वाट जोहने लगे जो इस पुतले का दहन करें..
सूर्य जब रजत से सुवर्ण रूप में बदलने लगा तो दूर से कोई आता दिखाई दिया,लोगों के चेहरे पे मुस्कान छाने लगी..सूर्य मानो दूर से आ रहे मनुष्य का ओरा बन चुका हो..एक दिव्य और ओज से भरा हुआ व्यक्ति धीरे-धीरे भीड़ की ज्यों-ज्यो आ रहा था,त्यों-त्यों न जाने क्यों लोगों में श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो रहा था..।
जब वो व्यक्ति भीड़ के करीब पहुंचा तो सबको श्रद्धा से नमन किया..भीड़ ने भी उसका स्वागत किया..मगर भीड़ में एक दुविधा उत्पन्न हो गई,आखिर ये है कौन,कुछ लोग बोलते इसे कंही देखा है,तो कुछ लोग बोलते इसका चेहरा राजा से मिलता जुलता है..मगर फिर सवाल वंही का वंही आखिर ये है कौन..??
वो व्यक्ति भीड़ में हो रहे फुसफुसाहट को अच्छी तरह सुन पा रहा था,वो भीड़ को अपनी और आकर्षित करने के लिए जोर से कहा-मेरे मित्रों..मेरे सखा,मेरे माताएं,मेरे बहनों और भाइयों..मैं आपका सेवक हूँ..जिसे कल तक आप राजा मान रहे थे..हां में आपका ही सेवक हूँ..।
कलतक हममें से कोई भी इस अहंकार रूपी पुतले को दहन करने के योग्य नही था,मगर आज हमसब इस पुतले को दहन करने के योग्य है,क्योंकि हममें से कोई भी अभी, किसी तरह के अवगुणों से घिरा हुआ नही है,अगर कोई अभी भी घिरा हुआ है तो इस पुतले को दहन करते वक़्त अपने अवगुणों का भी दहन कर दे..आइए हम सब मिलकर इस पुतले को दहन करें..।
सबों ने उत्साहपूर्वक उस अहंकाररूपी पुतले को जलाना शुरू किया..।।
आग की लपटें क्षण भर में ऊपर उठने लगी..उससे निकलने वाला पूरा धुंआ आसमां में भर गया..लोगो के चेहरे पे उस अग्नि के समान ही एक उल्लास और तेज था..ज्यों-ज्यों लो कम होती गई लोग अपने घर को जाते गए..आग की लपटें अब शांत हो गई थी,मगर धुंआ अब भी ऊपर उठ ही रहा था,उस धुंआ ने उस पूरे क्षेत्र को ढक दिया था..कब सुबह हुई किसी को पता ही नही चला,सूर्य की रोशनी उस धुंए को भेद नही पा रही थी..ये क्या,ये धुंआ आसमां में और फैलने लगा देखते ही देखते पूरा आसमां काला हो गया..बिजलियां कड़कने लगी और छोटी-छोटी बारिश की बूंद गिरने लगी, लोगों में खुशियों और उत्साह का कोलाहल मचने लगा,उस कोलाहल को सुनकर मानो बादल घबरा गया हो,और जोर-जोर से बरसने लगा..।
इस बारिश में उस दस अवगुणी अहंकार रूपी पुतले की राख बह कर नदियों के साथ बहकर सागर के गर्त में चला गया..।।
और लोगों को पता भी नही चला..।
फिर से चारों और हरियाली छा गई..राजा अब सेवक बन गया और प्रजा मित्र बन गया..।
और इस तरह ये छोटी कहानी समाप्त होती है..।।
इस दशहरा अपने अवगुणों को जलाए..न कि खड़े होकर रावण को जलते हुए देखे..।।
हमारे अवगुणों से अवगत कराने के लिए एक मित्र की जरूरत होती है..हमारा सबसे बड़ा मित्र हमारा मन है..।।


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