शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

लोग कंहा से कंहा चले गए..

लोग कंहा से कंहा चले गए..
मैं वही का वंही रह गया..।
जो मुझसे आगे थे वो तो आगे है ही,
जो मुझसे पीछे थे,वो भी मुझसे आगे निकल गए..
मैं वंही का वंही रह गया..।
जिंदगी से अबतक क्या हासिल की मैंने...??
कहू तो कुछ भी नही..जो था वो भी बर्बाद ही कि मैंने..
मैं वंही का वंही रह गया..।
मेरे चाहने वाले बस इतने है,जिसे मैं अंगुलियों पे गिन सकता हूँ..
मगर समय-दर-समय उनकी भी तादाद कम होती जा रही है..
कम हो भी क्यों ना..??
क्योंकि असफलता और सफलता दोनों बोझ होती है..
सफलता का बोझ सब बांटना चाहते है,क्योंकि सफलता से कंही-न-कंही सब का हित जुड़ा होता है,जिस कारण इस बोझ को सब बांट लेते है..
वंही हमारी असफलता से कंही-न-कंही हमारे चाहने वालों को भी शर्मिंदा होना पड़ता है...इसीलिए वो हमारे असफलता के भागीदार नही बनते..।
इसीलिए असफलता का बोझ भारी होता है..।।

लोग कंहा से कंहा चले गए..
मैं वही का वंही रह गया..।
जो मुझसे आगे थे वो तो आगे है ही,
जो मुझसे पीछे थे,वो भी मुझसे आगे निकल गए..
और मैं वंही का वंही रह गया..।


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