बुधवार, 12 नवंबर 2025

अनुभूति..उस प्रकाश पुंज की...

पिछले कुछ दिनों से में अक्सरहाँ स्वामी अड़गड़ानंद जी का "यथार्थ गीता" सुन रहा हूँ...सुनने में अच्छा लग रहा है,क्योंकि जिन्होंने आवाज दी ही उनके आवाज में मानो एक जादुई माधुर्यता हो..इसलिय सुनते वक़्त बोर नही होता,बल्कि कभी-कभी तो ये लोरियां की तरह लगता है,न जाने कब सुनते-सुनते आंख लग जाता है,पता ही नही चलता..।।

आज दोपहर में सोया हुआ था..तो मेरे साथ भी वही हुआ जो अर्जुन के साथ हुआ था-
 "द्रष्टांकरालानि च ते मुखानि दृष्टवेव कालानलसन्निभानि।
  दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ।।11.25

मगर मैं अर्जुन कहा,मुझमें उतनी शक्ति कंहा,की मैं उनके तेज का सामना कर सकता..।
कैसे वर्णन करू मैं..उस छवि की..शायद में दिग्भ्रमित हो गया हूँ..
उनका स्वरूप अतिसूक्ष्म से विकराल हो रहा था,या फिर विकराल से अतिसूक्ष्म हो रहा था,कुछ समझ में नही आया..उनके उस स्वरूप में इतना तेज और प्रकाश था कि मैं कुछ कह नही सकता,मैंने सूर्य को कई बार ही नही,बल्कि रोज ही देखता हूँ,मगर सूर्य को मैं भरी दोपहरी में भी देख सकता हूँ,और उनके तेज का कुछ सेकेंड तक सामना कर सकता हूँ।
मगर उस दिव्य स्वरूप में इतना तेज,और प्रकाश था कि मैं बिल्कुल ही डर गया,और मेरी आँखें खुल गई..शायद सेकंड के दसवें हिस्से तक ही मैं उन्हें देख पाया हूंगा..।मैं इतना भयभीत हो गया कि मैं डर गया,और मेरी आँखें खुल गई..।।
आखिर क्यों..??
उस दिव्य प्रकाश को मैंने देखा..जबकि मैं उनके प्रकाश से डर गया..।
मगर मैं अभी खुश भी हूँ, क्योंकि मैं उतना बुरा भी नही हूँ, मुझमें अभी भी संभावना बची हुई है..।।
उनका शायद संदेश है,खुद को और मजबूत करने के लिए जिससे मैं उनसे अच्छी तरह से रूबरू हो सकू...।।

हे परमपिता परमेश्वर आपको बारंबार प्रणाम..


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