यंहा आये लगभग 2-3 साल हो गए होंगे..जबकि सप्ताह में दो बार यंहा तक कि टिकट कटाना पड़ता है,मगर आधे रास्ते मे ही उतर कर नेचरोपैथी और एक्युप्रेशर क्लास के लिए चला जाता हूं..
कभी मन ही नही हुआ इधर आने का..मगर आज म्यूच्यूअल फण्ड से जुड़े कुछ काम था और नेचरोपैथी वाला क्लास था..म्यूच्यूअल फण्ड वाला काम जल्दी हो गया..तो सोचा चर्च गेट हो आऊ क्योंकि यंहा तक कि टिकट तो कटाना ही पड़ता है..समय भी बीत जाएगा,और मरीन ड्राइव भी हो आऊंगा..
मैं जितना बार यंहा आया हूं..उन सबसे अलग नजरिया इस बार का था.पानी बहुत दूर था,पत्थर सब दिख रहे थे..मैं पहली बार इस तरह से देखा हूँ..।
कुछ समय बैठने के बाद मैंने सोचा..
मैं यंहा क्यों हूँ.. यंहा क्यों आया..
कुछ 15 मिनट के बाद एक व्यक्ति डोनेशन मांगने के लिए आया..
50 रुपये की डिमांड था,करने का मन नही था,फिर भी ना जाने क्यों मैंने कर दिया..
और मन ही मन मुस्कुराया ...मैं इसलिए यंहा आया😊...।

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