शनिवार, 14 मई 2022

 प्रकृति जब किसी को चुनती है तो,

उसे प्रकृति का नियम भी बदलना पड़े तो वो बदलती है।।

भले ही उसके लिए बड़ी-से-बड़ी कुर्बानी ही क्यों न देना पड़े,

वो नही हिचकता,

क्योंकि वो जानता है कि ये कुर्बानी जरूरी है,बेहतर भविष्य के लिए।।

मगर हम मानव ये सब देखकर भी कुछ नही सीखते।।

गुरुवार, 12 मई 2022

प्यार की पांति...



काश आप उस काबिल होते,
कि मैं आपके बाहों में होता ।
पहली दफ़ा आपसे प्यार न हुआ तो क्या हुआ..
आप दूसरी दफ़ा,पहल तो करते..।।

शायद आपको मुझसे प्यार था ही नही,
अगर होता तो आप, वो सब कुछ करते
जिससे आप मेरे करीब आ सकते थे।।
आपने मुझसे प्यार किया ही नही,
शायद मेरे प्रति आपका सिर्फ आकर्षण था।।
अगर प्यार होता तो आप मेरे करीब आने के लिए
कोई-न-कोई कदम जरूर उठाते..।
मगर आपने कुछ भी नही किया..
क्योंकि आपको मुझसे प्यार था ही नही।

सोचा था, 
मैं भी दुनिया को बताऊंगा
कि मुझसे भी कोई प्यार करता था,
मेरे न करने पर भी..
इतना, जितना मैं सोच भी नही सकती थी।

मगर आपने वो कुछ भी नही किया..
जिससे मैं आपके करीब,
और आप मेरे करीब आ सकते थे।।

काश आप उस काबिल होते,
कि मैं आपके बाहों में होता ।
पहली दफ़ा आपसे प्यार न हुआ तो क्या हुआ..
आप दूसरी दफ़ा पहल तो करते..।।

रविवार, 10 अप्रैल 2022

राम से श्री राम बनने की यात्रा।।

 राम से श्री राम बनने की यात्रा।।




यात्रा कोई भी हो उतना आसान नही होता,
भले ही वो घर से बाहर और बाहर से घर जाने की ही यात्रा  क्यों न हो आसान नही होता क्योंकि इस दौरान क्या होगा, न आप जानते है और न ही कोई और।।

तो फिर  राम से श्री राम बनने की यात्रा इतनी आसान कंहा से हो सकती है।।
चलिए इनकी यात्रा में आज गोता लगाते है क्योंकि बिना गोते लगाए तो मोतियां भी नही मिलता।
यंहा से तो जीवन का सार मिलने वाला है..।।

हम किसी राजा दशरथ के पुत्र राम की बात नही करेंगें हम उस चरित्र की बात करेंगे जो राम से श्री राम बन गए..

जन्म साधारण ही हुआ जैसा सबका होता है, हां जन्म से पहले पूजा-पाठ यज्ञ-होम किया गया .... 
ऐसा अभी भी होता है अगर कोई जल्दी माँ-बाप नही बन पाते। मगर वर्तमान में तो कोई माँ-बाप बनना ही नही चाहते क्योंकि स्वछंद जीना जो चाहते है।।

इनका लालन-पालन भी सामान्य हुआ जैसा सबका होता है।

वो तो परिवार के आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है कि बच्चा माँ के दूध के साथ-साथ गाय का दूध पियेगा या फिर सेरोलेक भी पियेगा।।
आज के माएं तो अपने बच्चे को दूध पिलाना ही नही चाहती क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी खूबसूरती बिगड़ जाएगी।। कौन समझाए इन मूर्खों को, की अगर कम से कम 6 महीने तक अगर आप अपने बच्चों को स्तनपान नही कराए तो आपके बच्चे का रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर ही रहेगा जीवन भर चाहे जितना कॉम्प्लान,बोर्नविटा,हॉर्लिक्स पिला लो...।।

जब बड़े हुए तो गुरुकुल गए.. 
सामान्य बच्चों के तरह ही शिक्षा-दीक्षा ग्रहण किया.. 
कम बोलते थे,शांत स्वभाव के थे इसीलिए गुरु के नजर में आ गए..
अभी भी यही होता है.. अगर आप शांत स्वभाव के है और कम बोलते है तो आप अच्छे लोगों के दायरे में आ सकते है..।।

शिक्षा संपन्न हुआ तो घर आये ऐशो-आराम की जिंदगी जीना शुरू किया..
अभी भी होता है अगर आप संपन्न परिवार से है तो शिक्षा समाप्त करने के बाद आपको मौका मिलता है कि आप क्या करना चाहते है..
मध्यम वर्ग की तरह नही की शिक्षा ग्रहण करने का मतलब नॉकरी होता है.. शिक्षा समाप्त और नॉकरी शुरू..
गरीब को तो शिक्षा का अधिकार ही नही है, भले शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकार हो गया है मगर जब आप धरातल पर देखेंगे तब आपको पता चलेगा कि अच्छी शिक्षा भी पैसों से ही खरीदी जा सकती है..।।

कुछ दिन ऐशो आराम के बाद राम को लेने के लिए विश्वामित्र जी आ गए क्योंकि उनके यज्ञ-हवन में कुछ अतातायी लोग बाधा पहुंचा रहे थे.. 
राम-लक्ष्मण चल दिये उनकी रक्षा में क्योंकि राजा का कर्तव्य होता है कि वो अपनी प्रजा की रक्षा करें..
भले ही 100 में से 1-2 को नुकसान ही क्यों न पहुंचे..
पहले भी होता था आज भी होता है..
सरकार उन खनिजों को खोदने के लिए उन जनजाति लोगों के आवास उजाड़ने में नही हिचकती.. भले ही उनके लिए पुर्नवास की व्यवस्था क्यों न कर दिया जाए..
मगर आपको अपनी खेत की खुश्बू उस बंजर जमीन से थोड़े ही मिलेगी...

विस्वामित्र जी के ही आश्रम में जनक जी का संदेशा आया सीता जी का स्वयंवर का.. 
विस्वामित्र जी के साथ राम लक्ष्मण भी जनकपुर की और चल दिये...
उस सभा में एक-पर-एक योद्धा सब आये हुए थे..
 कोई भी धनुष उठाने में सक्षम नही था.. 
जनक जी उदास हुए और इस सभा को धिक्कारने लगे...
ये देख लक्ष्मण क्रोधित हुए और बोलना शुरू किया विस्वामित्र ने शांत होने का आदेश दिया और राम को धनुष तोड़ने की आज्ञा दी.. 
राम ने धनुष तोड़ा और सीता से व्याह रचाया..

वर्तमान समय में भी यही हो रहा है,जो सक्षम है वो समाज की बंदिशों को तोड़कर अपनी पसंद की शादी कर रहे है.. मगर उन लड़कियों का क्या जिनसे ये तक नही पूछा जाता कि उसे लड़का पसंद भी है कि नही...
मगर अब परिस्थितियां बदल रही है,मगर इसका सकारात्मक परिणाम कम नकारात्मक परिणाम बहुत ही देखने को आ रहा है..
क्योंकि हमारे मध्यम वर्ग को ये पता ही नही है कि इस समस्या से कैसे निजात पाये..
मैं उन लड़कियों से कहना चाहता हूं कि आप आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बने क्योंकि तब ही आपका आवाज कोई सुनेगा.. कोई भी शुरुआत में बदलाव पसंद नही करता मगर बदलाव जरूरी है...

शादी के बाद राम सपरिवार खुशी-खुशी रहने लगे..
कुछ दिन बाद राम का राज्याभिषेक होने की चर्चा पूरे अयोध्या में फैल गई..
राम की राज्यभिषेक की तैयारी शुरू हो गई,जिस दिन राज्यभिषेक होने वाला था उस दिन वो सबकुछ त्याग कर वन को चल दिए...
बिना किसी राग-द्वेष के, उनके चेहरे पर आज भी वही भाव था जो कल था..

यही से उनका राम से श्री राम बनने की यात्रा शुरू होती है..

मंगलवार, 8 मार्च 2022

महिला दिवस

 जरा सोचिए....

हमें महिला दिवस मनाने की जरूरत क्यों पड़ रहा है.. 



कंही-न-कंही इसके लिए हम पुरुष ही जिम्मेदार है..।।

हम कहते है- "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता"

हम सब भारतीय दीवाल पर और मंदिर में स्थित देवियो को तो रोज नमन करते है..।। मगर घर में अपनी माँ,बहन,दादी,बुआ,चाची सबसे क्या हम प्रेम से बात करते है..ये हमारे मूड के ऊपर निर्भर करता है,मूड खराब रहा तो झिड़क देते है।। 

अगर उनका मूड खराब रहे,और वो झिड़क दे तो क्या होगा.. हम सब भली-भांति जानते है..।। इसके लिए हमारी पितृसत्तात्मक समाज ही जिम्मेदार रहा है..।

महिलाओं की सम्मान की सब बात करते है...।।

मगर क्या आप जानते है कि 90% से ज्यादा भारतीय पुरुष, घर की महिलाओं की सम्मान नही करते..

आखिर क्यों...??

क्योंकि उन्हें कोई कहने वाला नही है कि आप जो कर रहे है वो गलत है,बल्कि उन्हें तो पुरुष होने का अहसास कराया जाता है।।

महिलाओं का हमारे समाज मे ऐसी दशा क्यों है...

क्योंकि वो शिक्षित नही है...

क्योंकि वो आर्थिक रूप से सम्पन्न नही है...।।

जिस रोज महिला शिक्षित और आर्थिक रूप से संपन्न हो जाएगी उस रोज हमें महिला दिवस मनाने की जरूरत नही पड़ेगी...

जब आप भारतीय देवी-देवता को देखेंगे तो आप पाएंगे कि सबसे ज्यादा अस्त्र-सस्त्र से देवी ही सुसज्जित है..

यंही तक नही बल्कि,

देवता भी इन देवियों की अस्तुति करते है,और अपने कल्याण की कामना करते है..।।

तो फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि हमारी भारतीय महिला समाज के सबसे निचले हाशिया पे चली गई..?


इसके लिए कंही-न-कंही भारतीय महिला ही जिम्मेदार है ,क्योंकि उन्होंने अपने अधिकार के लिए कभी आवाज नही उठाया...।।





मंगलवार, 1 मार्च 2022

भगवान शिव से क्या सीखें..



आज महाशिवरात्रि है..
मालूम नही कब से मनाया जा रहा है..??
शिवरात्रि क्यों मनाते है इसका भी कोई सटीक कारण नही मालूम है...।।
मगर विष्णुपुराण के अनुसार इस दिन भगवान शिव प्रकट हुए
एक मान्यता ये भी है कि इसी दिन भगवान शिव का माँ पार्वती से विवाह हुआ।। 
एक मान्यता ये भी है कि समुंद्रमंथन के समय भगवान शिव ने इसी दिन हलाहल(विष) पिया।।

मगर जो भी हो शिव आदिगुरु है..।।
क्योंकि जब आप इतिहास को पलटोगे तो आपको सिर्फ और सिर्फ आदि गुरु शिव के ही साक्ष्य मिलेंगे..।।
जब हड़प्पा जैसी प्रचीन और सबसे भव्य सभ्यता विकसित हुई थी उस समय सिर्फ और सिर्फ पशुपतिनाथ शिव ही मौजूद थे..।।


क्योंकि सिर्फ पशुपतिनाथ के मूर्ति ही हड़प्पा के खुदाई से मिले है..
शिव तब भी थे,
जब ये सृष्टि नही थी,
शिव तब भी रहेंगे,
 जब सृष्टि नही रहेगी..।
क्योंकि वो कालो के काल 
  महाकाल है..।।

चलिए भगवान शिव से कुछ सीखते है...।।

जीवनसाथी को पूरा सम्मान दे..।


  भगवान शिव ने माँ पार्वती को अपने बराबरी का आसन दिया।  
अगर पति-पत्नी के बीच में एक-दूसरे के लिए सम्मान और आदर का भाव नही है,तो दाम्पत्य जीवन कभी भी खुशमय नही रह सकता है।।

बच्चों में आपस मे कभी स्पर्धा न कराए..।।
 गणेश और कार्तिकेय के ब्रह्मांड के चक्कर लगाने वाली कहानी तो सब को मालूम ही होगी।।
दोनों की क्षमता अलग-अलग थी मगर दौड़ एक जैसी लगाई गई जिसके कारण आपस मे मतभेद हो गया।।
गलत स्पर्धा हमेशा नुकसानदेह होता है।।

स्वभाव भले अलग हो,मगर परिवार एक रहे..


 शिव के परिवार में ही देख लीजिए बैल,सिंह,चूहा,सांप,मोर का स्वभाव भले अलग-अलग है,मगर सब एक साथ रह रहे है।
प्रेम ही है जो हमें बांधे रखता है।

किसी से भेदभाव न करें..
 शिव को जिसने भी पूजा उसे उन्होंने बिना भेदभाव के आशीर्वाद दिया चाहे वो देव हो या दानव हो।
हम मनुष्यों को भी किसी से भेदभाव नही करना चाहिए।

ध्यान करें..


 भगवान शिव विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नही होते,
क्योंकि वो ध्यान के द्वारा अपने मन को स्थिर किये रहते है
एक स्थिर मनुष्य ही विपरीत परिस्थितियों में विजय हासिल कर सकता है।

शिव खुद में ही परिपूर्ण है.. 
क्योंकि वो स्वयंभू है..
न उनका आदि है और न ही अंत है,
क्योंकि वो अनंत है..



 

सोमवार, 28 फ़रवरी 2022

सफलता असफलता और लक्ष्य



सफलता
हमारे लिए कई रास्ते खोलता है,
और 
असफलता कई रास्तों को रोके रखता है।
इसीलिए उन सभी रास्तों को खोलने के लिए सफल होना बहुत जरूरी है।।
असफलता आपको गलत मार्ग पे चलने को प्रस्तत करने लगती है,
जबकि सफलता आपकों अनेकों को गलत मार्ग पे चलने से रोकने के लिए प्रस्तत करेगी।
परिस्थितियां किसी का अनुकूल नही हुआ है,
सभी को जूझना पड़ा है।
किसी ने सफल होके अपना नाम अमर करवा लिया,
तो किसी ने परिस्थितियों का बहाना बना कर भीड़ में कंही खो जाने का निर्णय लिया।
निर्णय आपको करना है।।
भीड़ में कंही खोना है या फिर भीड़ के लिए कुछ करना है।।
आप भीड़ के लिए तब ही कुछ कर सकते है,जब आप भीड़ से आगे निकलोगे.. और आगे निकलने के लिए सफल होना जरूरी है।


और सफल होने के लिए एक बेहतरीन लक्ष्य का होना जरूरी है,क्योंकि बिना लक्ष्य के सफलता को पा ही नही सकते क्योंकि बिना पतवार के नाव कंहा जाएगी उसे खुद भी नही पता..।।
और हममें से अनेकों लोगों को लक्ष्य के बारे में पता ही नही है..
इसिलिय वो अपने क्षमता का दोहन कर ही नही पाते।
जबकि सफल होने की पहली सीढ़ी अपने लक्ष्यों का चयन करना ही है..।। 


हम चले जा रहे है,
सिर्फ चले जा रहे है,
कंहा जाना है पता नही,
मगर हम चले जा रहे है।
कब-तक चलते रहोगे,
इस जीवननुमा चक्र में,
कभी तो रुकोगे,
फिर भी रुक के चलन ही पड़ेगा,
इस जीवननुमा चक्र में,
जबतक की लक्ष्य को हासिल न कर लो।
इसीलिए जितना जल्दी हो 
अपने लक्ष्य का तो चयन करो,
क्योंकि जिंदगी न रुकने वाला चक्र है,
ये चलता रहेगा 
तब तक जबतक लक्ष्य को न पा लो..।।
लक्ष्य का चयन करना भी दूभर है,
क्योंकि गलत लक्ष्य तुम्हें फिर से 
इसी चक्र में चक्कर लगवायेगा।
हम चले जा रहे है,
सिर्फ चले जा रहे है,
कंहा जाना है पता नही,
मगर हम चले जा रहे है।।


रविवार, 6 फ़रवरी 2022

लता मंगेशकर शून्य से शिखर की यात्रा

 भविष्य के गर्भ में क्या है..??

   ये किसी को नही पता ..।


28 सेप्टेम्बर 1929 को जब एक लड़की मध्यप्रदेश के इंदौर में पैदा हुई होगी तब किसी को अहसास तक नही हुआ होगा की ,ये लड़की सिर्फ परिवार की ही नही बल्कि पूरे भारत की विरासत हो जाएगी।।

"इस सृष्टि मैं आपका कुछ भी नही है,आपका नाम तक भी नही,यंहा सब कुछ खुद से अर्जित करना होता है,नही तो सब कुछ एक दिन छिन जाता है।बचता वही है जो आपने अर्जित किया है"।


हेमा को क्या पता था कि, एक दिन मेरा नाम भी मुझसे छिन जायेगा। पिता की अपनी ड्रामा कंपनी में लतिका का किरदार निभाने के बाद पिता ने लता नाम रख दिया।।

जिंदगी में कभी-कभी वो नही होता जो आप चाहते है,इसका ये मतलब नही की जिंदगी खत्म सी हो गई..।।

5 साल की उम्र तक लता पिता के सामने गाती तक नही थी,मगर एकदिन पिता ने गाते सुन लिया उसके बाद पिता ने खुद से गाना सिखाना शुरू किया।

शिक्षित आपको सिर्फ डिग्रियां नही,बल्कि परवरिश और परिस्थितियां भी बनाता है।

लता जी सिर्फ 2 दिन ही स्कूल जा पाई, मगर कई विश्वविद्यालय उन्हें डॉक्टरेट की उपाधियां देकर गौरवान्वित महसूस करती है।अपने जीवनकाल में उन्होंने 36 भाषाओं में 50,000 से ज्यादा गाना गाई। जिस कारण उन्हें 75 से ज्यादा अवार्ड दिया गया जिसमें 1989 में दादा साहब फाल्के अवार्ड2001 में भारत रत्न3बार बेस्ट प्लेबैक सिंगर का नेशनल अवार्ड शामिल है।

उन्होंने संगीत की सारी शिक्षा पिता से ही सीखा,और कई भाषाओं का ज्ञान भी घर पर ही अर्जित किया। वो पहली बार 16 दिसंबर 1941 को स्टूडियो में रेडियो प्रोग्राम के लिए गाई.. उसके बाद अनवरत 7दशक तक गाने का सिलसिला चलता रहा।

परिस्थितियां हमेशा आपके अनुकूल हो ये जरूरी नही,बल्कि जरूरी ये है कि आप परिस्थितियों का सामना किस तरह से करते है..??

लता जी सिर्फ 13 साल की थी तब पिता की मृत्यु(24अप्रैल 1942)हो गई। और बड़ी होने के नाते बहन-भाई और माँ की जिम्मेदारी इनके ऊपर आ गई।


आप जो चाहे.... वो पाओ जिंदगी में... ये जरूरी नही,कभी-कभी परिस्थितियां तय करती है कि क्या करना है,और क्या होना है।

लता जी पैसों की किल्लत के कारण मराठी और हिंदी फिल्मों में छोटे-छोटे किरदार करने लगी।पहली बार स्टेज पर गाने के लिए उन्हें 25₹ मिले। और उन्हें अहसास हुआ कि में किरदार निभाने के लिए नही बनी हूँ।

13 साल की उम्र में उन्होंने पहली बार 1942 में मराठी फिल्म "पहिली मंगलागौर" के लिए गाया। उन्हें गाते हुए जब संगीतकार गुलाम हैदर ने सुना तो उन्होंने उस समय के सबसे सफल फ़िल्म निर्माता शशधर मुखर्जी से मिलवाया। मगर मुखर्जी ने ये कह कर गवाने से इनकार कर दिया कि "आवाज बहुत पतली है नही चलेगी"। मगर गुलाम हैदर ने लता जी को पहला मौका दिया उसके बाद तो इनके पास काम का कमी न रहा।। आगे चलकर सशधर मुखर्जी को भी अपने गलती का अहसास हुआ और उन्होंने 'अनारकली' और जिद्दी फ़िल्म में लता जी से गवाया।।

असफलता जिंदगी का हिस्सा है,और निरंतर सीखते रहने से असफलता को सफलता में बदला जा सकता है।

लता जी को गुलाम हैदर ने हिंदी-उर्दू सीखने के लिए प्रेरित किया तो,अनिल विश्वास ने ये सिखाया की गाते वक़्त कैसे सांस लेना है और कैसे छोड़ना है। अपने आवाज को निखारने के लिए वो निरंतर कुछ-न-कुछ सीखती रही।

जो अपने वसूल से समझौता कर लेते है,उनका वजूद नही रहता।।

लता जी ने कभी द्विअर्थी वाले गाने नही गाये,और न ही उसका हिस्सा बना। इस वजह से कई बार राइटर से झगड़ा हो जाता मगर अंत मे राइटर को शब्द बदलना पड़ता या फिर वो काम करने से इनकार कर देती।।

सजा तो सब दे सकता है,मगर सजा देने में सक्षम होने के बाबजूद क्षमा करना महानता है।।

32 साल की उम्र में स्वर-कोकिला बन गई थी,मगर इसी समय किसी ने धीमा जहर दे दिया।जिसके कारण महीनों बीमार रही।जब स्वस्थ हुई तो किसी ने अफवाह उड़ा दी कि अब वो नही गाएंगी।। मगर उन्होंने  "कंही दीप जले, कंही दिल जले" गाकर फ़िल्म फेयर अवार्ड जीत लिया।। उनलोगों को भी तबतक पता चल गया जिसने धीमा जहर दिया था,मगर उन्होंने किसी को नाम नही बताया।।

परिवार एक माला है, अगर टूट गया तो फिर व्यक्ति का अस्तित्व नही रह जाता।।

लता जी ने ये सोचकर शादी नही किया कि अगर मैं शादी कर लुंगी तो फिर मेरे परिवार का ख्याल कौन रखेगा,क्योंकि शादी के बाद तो मैं दूसरे घर चली जाऊंगी।उसके बाद मैं कैसे अपने माँ-बहन का ख्याल रख पाऊंगा..।।



उन्होंने "सा रे गा मा प ध नी सा" को सिर्फ गाया ही नही बल्कि उसे अपने जिंदगी में उतारा भी।

सा-सादगी  ।। रे - रेश्मी ।।  गा-गायकी  ।।  मा-माधुर्य ।। 

-परंपरा ।। ध-धवलता ।। नी-निर्मलता


लता जी आज हमारे बीच नही रही,मगर उन्होंने जो अर्जित किया उसे आनेवाली पीढ़ी के लिए छोड़ गई।

जिंदगी जीने का यही तो सलीका होता है कि आप आनेवाली पीढ़ियों के लिए कुछ ऐसा छोड़कर जाए जो उन्हें अपनी जिंदगी को और बेहतरीन बनाने में मदद करे।। 





Yoga for digestive system