रविवार, 25 जनवरी 2026

कंहा ढूंढ रहे हो मुझे..

बप्पा..
कंहा ढूंढ रहे हो मुझे..
किस स्वरूप में ढूंढ रहे हो मुझे..
जिस स्वरूप में, तुम देख रहे हो मुझे..
क्या उस स्वरूप में कोई और देख सकता है मुझे..
तो फिर क्यों जंहा-तहाँ ढूंढ रहे हो मुझे..।

मुझे तुम खुद में समाहित करो..
और हरेक सांस से मुझे विस्तारित करो..
इतना विस्तार करों..
जितना तुम मेरा विस्तार देख रहे हो..।।

बप्पा..


कभी हार मत मानो..

कभी हार मत मानों..
क्योंकि जब हम हार मान लेते है..
तो आने वाली पीढियां भी हार मान लेती है..
और वर्तमान पीढ़ी भी..।

भले ही जीत सुनिश्चित न हो..
मगर मैदान में डटे रहों..
क्या पता,
पासा कब पलट जाए..
और जीत हमारे हिस्से में आ जाये..।।

इस तरह जितने वालें तुम सिर्फ अकेले नही होंगे...
इतिहास तुम्हारे जैसे योद्धाओं से भरा पड़ा है..
जिसने अंतिम क्षण तक मैदान में डटने का निर्णय लिया..
उसके ही सर पर जीत का सहरा सजा है..।

इसीलिए,
कभी हार मत मानों..
क्योंकि जब हम हार मान लेते है..
तो आने वाली पीढियां भी हार मान लेती है..
और वर्तमान पीढ़ी भी..।



शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

"पराक्रम दिवस" और सुभाष चंद्र बोस..

जब मैं पहली बार कोलकाता मेट्रो में सफर कर रहा था..तो एक चीज मुझे बहुत अच्छी लगी वो ये की - हरेक मेट्रो स्टॉपेज का नाम बंगाल के विभूतियों के नाम पर था,जिसे मैं इतिहास के पन्नों में पढ़ा करता था,उनका नाम कान में गूँज कर उन्हें जीवंत कर दे रहा था..।
मैं इस कारण बंगाल सरकार का फैन हो गया..और सोचने लगा की ये कदम हरेक सरकार को उठानी चाहिए..जिन विभूतियों ने अपना जीवन देश और समाज के लिए समर्पण किया उनके लिए हम इतना तो कर ही सकते है..।
जिससे हम उनके योगदान को भूले नही..।

आखिर ये परंपरा सिर्फ बंगाल में ही क्यों है,और किसी राज्य में क्यों नही..?
तो इसका जबाब मुझे आज मिला..
इस परंपरा की शुरुआत 1922 में हुई..जब सुभाष चंद्र बोस कलकत्ता महापालिका के कार्यकारी अधिकारी बने,तो उन्होंने गलियों और सड़कों का नाम स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर रखना शुरू किया..साथ ही जिन परिवार के लोग आजादी के लड़ाई में शहीद हुए थे उनके परिवार के सदस्य को महापालिका में नॉकरी देना शुरु किये थे..।
ये था स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि..
मगर आज क्या हो रहा है..??

2021 से सरकार ने 23 जेनुअरी को  "पराक्रम दिवस" के रूप में मनाना शुरू किया..जो एक बहुत ही अच्छी पहल है..और इनके लिए ये सम्मान वैसे ही है जैसे सूर्य को दीपक दिखाना..।


सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ध्रुव तारा है..सबसे अलग सबसे खास..।
उन्होंने वो किया..जो उस समय कोई सोच तक नही सकता था..
न ही भारतीय और न ही अंग्रेज..।
जब उनकी मृत्यु की खबर फैली तो ब्रिटिश लेखक,राजनीतिक चिंतक जॉर्ज ऑरवेल ने कहा-" दुनिया के लिए ये अच्छा हुआ" उनकी धमक सिर्फ भारत तक ही नही पूरे विश्व में था..।

आखिर उन्होंने ऐसा क्या किया कि हम उनके जन्मदिन के उपलक्ष्य में "पराक्रम दिवस" मनाते है..-

वो पहले ऐसे शख्स थे जो ICS(वर्तमान में IAS) की परीक्षा में 4थ रैंक लाने के बाद ये कहकर नॉकरी नही की..की मुझे अंग्रेजों की गुलामी नही करनी है..(ICS की परीक्षा उन्होंने पिता के दबाब में दिया था)
नॉकरी को ठुकराते ही वो अंग्रेजों के नजर पे चढ़ गए क्योंकि ये खबर ब्रिटिश अखबार में भी चर्चा का विषय बन गया था..।तब से ही वो अंग्रेजों के नजर पे चढ़ गए...।
"स्वतंत्रता केवल राजनीतिक ही नही,मानसिक भी होनी चाहिए"।

11 बार जेल जाना पड़ा,और हरेक बार मजबूत होकर निकले..।
 "तुम मुझे खून दो,मैं तुम्हें आजादी दूंगा।"

17 जनुअरी 1941 में 20वी सदी का सबसे बड़ा साहसिक राजनीतिक पलायन करने वाले सख्स बने..।
"गुलामी का सबसे बड़ा सहारा डर होता है-
 और डर को तोड़ना ही क्रांति है.."।

जर्मनी और जापान का समर्थन लेकर विश्व राजनीति को चौकाया..।
"स्वतंत्रता किसी से भीख में नही ली जाती,
 उसे हासिल किया जाता है.."।

विश्व का पहला "महिला सैन्य टुकड़ी" का गठन किया("रानी लक्ष्मीबाई रेजिमेंट")
"देश की सेवा करने का सबसे अच्छा तरीका है-
 अनुसाशन और त्याग"

भारत के बाहर आजाद हिंद सरकार की गठन कर उसके प्रधानमंत्री बने जिसे जापान,जर्मनी,इटली,बर्मा,थाईलैंड,क्रोशिया एवं अन्य देशों ने मान्यता दिया...।
 "मेरे जीवन का उद्देश्य भारत को पूर्ण स्वतंत्र देखना है।"

गांधी जी को "राष्ट्र पिता" कहकर संबोधित किया.(आज ढेर सारे भ्रम फैलाये जाते है गांधी,नेहरू और सुभाष को लेकर जबकि इनके विचार अलग-अलग थे मगर ये तीनों एक दूसरे के पूरक थे..)
 "एक सशक्त और संगठित राष्ट्र ही स्वतंत्र रह सकता है"।

वो सिर्फ क्रांतिकारी नही,बल्कि आध्यात्मिक भी थे,वो स्वामी विवेकानंद को भारत का "आध्यात्मिक गुरु" माना..।
 "राजनीति में समझौते हो सकते है,लेकिन राष्ट्रीय स्वाभिमान में नही।"

उनकी मृत्यु आज भी रहस्य है..।
 "जय हिंद"




कंहा से आई वो..

ये दूसरी दफा हो रहा है..
जब दिल फिर से धड़कना शुरू हो गया..।

पहले..एक अल्हड़ के लिए धड़कता था..
जिसे देखते ही मेरी फिजा रंगीन हो जाती थी..।

अब उसके लिए थोड़ा-थोड़ा धड़कना शुरू हुआ..
जो मुझसे मिलों दूर है..
उसका मेसैज मेंरे हृदय को स्पंदित कर देता है..।

मालूम नही कंहा से आई वो..??
और मेरे वीरान हो गई जिंदगी में..
हरियाली सी छा गई वो..।


गुरुवार, 22 जनवरी 2026

"ठीक-ठाक"..

मैंने पूछा..
कैसे हो..??
उसने कहा "ठीक-ठाक"..।
इस ठीक-ठाक में न जाने कितना दर्द छुपा था..
न वो बयां कर सकते थे...
और न ही मैं..
इस ठीक-ठाक में छुपा दर्द को समझ सकता था..।


अक्सरहाँ जब दर्द बयां नही कर पाते है..
तो "ठीक-ठाक" कह कर काम चला लेते है..
क्योंकि और ऑप्शन ही क्या है..😊??

कहने को,सिर्फ दो शब्द है "ठीक-ठाक"..
मगर इस शब्द में..
न जाने कितना दर्द और आहें छुपा हुआ है..
ये सिर्फ ठीक-ठाक कहने वाले ही जानते है..
या फिर जो जान लेते है..
वो भी "ठीक-ठाक" को स्वीकार कर लेते है..
क्योंकि और ऑप्शन ही क्या है😊..??





सोमवार, 19 जनवरी 2026

दादी माँ..

दादी माँ..
अब तक आपका..
कम से कम दो बार कॉल आ गया होता..
आप,पहली बार जन्मदिन की शुभकामना और ढेर सारा आशीर्वाद और प्यार देती..
और दूसरी बार कॉल करके पूछती क्या-क्या बनाया..
फिर तीसरी बार रात में कॉल करती...
मगर इस बार आपका कॉल नही आएगा..😢



मगर अभी भी,आपका मुस्कुराता चेहरा, मेरे सामने है..😊
ऐसा लग रहा है..
जैसे,उस जंहा से भी आप ढेर सारा प्यार मुझपे बरसा रही है..।।

आपका मुस्कुराता चेहरा आज भी मेरे जेहन में है..
और सदा रहेगा..।।
लव यू दादी माँ..





मैं अभी कुछ नही हूँ..

मैं अभी कुछ नही हूँ..
मगर अब भी मुझमें..
असीम संभावनाएं बची हुई है..।

बस एक बार खुद को समेटना है..
और खुद को समेट कर 
उस असीम संभावनाओं को
साकार करना है..।।

मैं अभी कुछ नही हूँ..
मगर अब भी मुझमें..
असीम संभावनाएं बची हुई है..।

Yoga for digestive system