बप्पा..
कंहा ढूंढ रहे हो मुझे..किस स्वरूप में ढूंढ रहे हो मुझे..
जिस स्वरूप में, तुम देख रहे हो मुझे..
क्या उस स्वरूप में कोई और देख सकता है मुझे..
तो फिर क्यों जंहा-तहाँ ढूंढ रहे हो मुझे..।
मुझे तुम खुद में समाहित करो..
और हरेक सांस से मुझे विस्तारित करो..
इतना विस्तार करों..
जितना तुम मेरा विस्तार देख रहे हो..।।
बप्पा..

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