शनिवार, 7 मार्च 2026

वोमेन्स डे:अधिकार,न्याय और अधिकार के लिए..

"वो मुस्कुराती भी है,तो दूसरों के लिए,
 वो जीती भी है,तो दूसरों के लिए,
वो जब भी खुद के लिए जीना चाहती है..
तब-तब..
परिवार, समाज,और देश  उसका दम घोंट देता है।"

क्या आपको पता है..
कल "अंतरराष्ट्रीय वोमेन्स डे" है..
कल महिलाओं के अधिकार और सम्मान की खूब बातें होंगी..
मगर फिर अगले दिन..
हम वही इंसान बन जाएंगे..नीच,क्रूर,कामी,हिंसक प्रवृति वाले..।
ये पढ़ कर थोड़ा आप असहज हो रहे है..
मगर इससे क्या फर्क पड़ेगा क्योंकि हम बदलने वाले नही है..।
क्योंकि बचपन से हमारे संस्कार ऐसे है कि स्त्रियों को सम्मान करना सिखाया नही गया,सिर्फ पढ़ाया गया..।



क्या आप स्त्रियों का सम्मान करते है..??
अगर आपका जबाब हां मैं है..तो आप गलत है..।।
क्योंकि मेरा अगला जबाब है..
आप किन स्त्रियों का सम्मान करता है..??
घर की स्त्री का या बाहर का..??
छोड़िए इस बहस में नही पड़ते है..।
मगर सोचियेगा..।

हमारी संस्कृति कहती है-
 "यत्र नारी पूज्यन्ते, तत्र देवता रमन्ते।"

वही हमारा संविधान महिलाओं के कुछ अधिकार की बात करता है-
अनुछेद 14 : समानता का अधिकार..
क्या आज मिल रहा है..हां कंही-कंही..
मगर सच कहूं तो नही मिल रहा है..।

अभी भी उन्हें असमानता का सामना करना पड़ता है,और इसकी शुरुआत घर से होते हुए समाज की गलियों से होते हुए,स्कूल,कॉलेज के गलियारे होते हुए,ऑफिस तक पहुँचता है..।

अनुछेद 15 : लिंग के आधार पर भेदभाव नही..
 मगर अभी भी हो रहा है..
आप अपने आसपास देख रहे होंगे.आसपास छोड़िए इसकी भी शुरुआत घर से ही होती है..।

अनुछेद 21 : गरिमामय जीवन का अधिकार देता है..।
 एक मनुष्य यही तो चाहता है,मगर क्या ये महिला को मिलता है..??
 आज भी महिला सड़क पर नजरें उठा के नही चल सकती..(10% को छोड़कर)

NCRB(नेशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो) के अनुसार 30% से कम ही महिलाओं को न्याय मिल पाता है..।
आखिर क्यों..??
क्योंकि..कानून तो है,मगर कानून लागू करने वाले पुरूष प्रवृति वाले है..
एक तो महिलाएं न्याय के लिए आगे नही आती,अगर कुछ आ भी गई तो थाने से डांट-डपट कर डरा धमका कर भगा देते है,अगर उनमें से कोई हिम्मतवाली होती है,तो वो कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते-काटते टूट जाती है..और हार मान लेती है..।
पुलिस में महिला की भागदारी ~10-12% है।
★पंजीकृत महिला वकील की संख्या ~15-20% है।
★ HC/SC में महिला न्यायाधीश की संख्या ~14-17% है।
★ विधानसभा और लोकसभा में भागीदारी ~10-15% है।



जरा सोचिए जंहा से न्याय की शुरुआत होती है,और जंहा न्याय के लिए कानून बनाया जाता है वंहा उनकी भागीदारी 20% से भी कम है..
तो कंहा से न्याय मिल पायेगा..??

NFHS(नेशनल फैमिली हाउस सर्वे) के अनुसार 30% से अधिक विवाहित महिलाओं को शारिरिक या यौन हिंसा का शिकार होना पड़ा है(2024-2025)।बहुत बड़ी संख्या तो उनकी है जो इस तरह की हिंसा को ताउम्र अपने अंदर छुपा कर रखती है और सहन करती रहती है..।

महिलाओं के साथ भेदभाव का शुरुआत जन्म लेते ही शुरू हो जाता है..अगर बेटा ने जन्म लिया तो खूब ढोल नगारे बजते है,अगर बेटी ने जन्म लिया तो..आप जानते ही है..😊

फिर जब यही लडकिया बड़ी होती है,तो परिवार और समाज इनसे भेदभाव करना शुरू कर देता है..ये नही करना है,वो नही करना है..यानी क्या करना है ये भी परिवार और समाज ही हद तक तय करती है..।

आज महिलाओं के लिए और समस्या बढ़ गया है..पहले समस्या खड़ा करने वाले सामने होते थे मगर आज डिजिटल माध्यम से नुकसान पहुंचा रहे है..सोशल मीडिया पे पीछा करना,गंदे कमेंट करना, ऑनलाइन उत्पीड़न करना,अश्लील तस्वीर को लेकर आये दिन धमकियां आना..
और जब से AI आया है,महिलाएं और असुरक्षित हो गई है,क्योंकि प्रॉम्प्ट फ़ोटो और वीडियो के माध्यम से अश्लील तस्वीर बनाकर आये दिन सोशल मीडिया पे फैलाने की धमकी देना..।।
सरकार को जल्द से जल्द इसके ऊपर कानून बनाकर सख्त सजा का प्रावधान करना चाहिए..।।

समस्या का हल क्या है..??
आर्थिक निर्भरता..जबतक महिला आर्थिक रूप से दूसरे पर निर्भर रहेंगी तबतक उन्हें हिंसा,अन्याय और शोषण का शिकार होना पड़ेगा..।।

LFPR(लेबर फ़ोर्स पार्टिसिपेशन रेट) के अनुसार सिर्फ 35% के आसपास ही महिला काम कर रही है..।।

संयुक्त राष्ट्र ने इस बार "महिला दिवस" की थीम रखी है-
"अधिकार,न्याय और कारवाई,
सभी महिलाओं और लड़कियों के लिए..।"

ये तबतक नही मिलेगा जबतक हमारी माताएं और बहने आर्थिक रूप से संपन्न नही होंगे..।।

जाते-जाते यही कहूंगा..
स्त्री को स्त्री की तरह नही,
बल्कि आप खुद को जैसे देखते है,
उसी तरह से देखे..।।




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