सोमवार, 21 नवंबर 2022

तुम वो नही ,जो दिखते हो


तुम वो नही ,जो दिखते हो।

तुम वो हो,जो दिखते नही ..।।

तराशो अपने आप को,

कुरेदे अपने आप को,

भट्टियों में तपाओ अपने आप को,

तब पता चलेगा..

तुम वो हो,जो दिखते नही ।।


ओढ़े हुए केंचुल को नोच फेंको,

उस आइने को तोड़ फेको,

जिसमें खुद को देख रहे हो..

तब ही खुद से साक्षात्कार होगा,

तुम वो हो,जो दिखते नही ..।।


समय आ गया, अब न देर करो..

अगर अब नही,तो फिर कब..?

खुद से साक्षात्कार करोगे..

तुम वो नही ,जो दिखते हो।

तुम वो हो,जो दिखते नही ...।।


रविवार, 20 नवंबर 2022

हार कर हारना, क्या हार है..



हार कर हारना, क्या हार है..

जिस हार से,हार का अहसास न हो,

वो हार भी क्या हार है..।


वो हार भी क्या हार है..

जिस हार से मन द्रवित न हो,

सीने में आग प्रजवल्लित न हो,

आँखों मे क्रोध की ज्वाला न हो,

और अपनी कमियों को,

भट्टियों में झोंकने की ताकत न हो,

वो हार भी भला क्या हार है..।


वो हार भी भला क्या हार है..

जो नए कीर्तिमान रचने को विवश न करें,

वो हार भी भला क्या हार है..

जो स्वर्णिम अक्षरों में नाम न खुदवा दे..

वो हार भी भला क्या हार है..

जो खुद से खुद का आत्म-साक्षात्कार न करा दे..

वो हार भी क्या हार है..

जिस हार से, हार का अहसास न हो..।।


शनिवार, 19 नवंबर 2022

कमर कस हुंकार भर


 हार कर, उदास होकर बैठने से क्या होगा

जबतल्क मंजिल न मिले , तबतल्क रुकना गुनाह है..।

हार कर ही हिमालय फतह हुआ,

हार कर ही समुन्द्र की गहराइयां पता चला,

हार कर ही आसमां की उचाइयां पता चला,

बिना हारें, किसी का अमिट अक्षर में कंहा नाम हुआ..

जबतल्क मंजिल न मिले , तबतल्क रुकना गुनाह है..।


अपने हार को भी जीत में तब्दील कर,

तू इस कदर कर्म कर, की हारकर भी जीत का अहसास हो।

वो जीत भी क्या जीत है..

जिस जीत से, हार की खुश्बू आती नही।

वो जीत भी क्या जीत है..

जिससे खुद का साक्षात्कार का अहसास न हो।

वो जीत भी क्या जीत है..

जिससे अपनों का अहसास न हो।।


अपने हार को भी जश्न बना..

जिस हार ने तेरी कमजोरियां दिखाई ..।

क्योंकि यंहा कौन है..??

जो तेरी कमजोरियां दिखायेगा..।

अपने हार का भी सम्मान कर..

जिस कदर करता गुरु का सम्मान है..।

अपने हार का भी आदर कर,

जिस कदर करता बड़ों का आदर..।।


मगर ये हार का सिलसिला कब तक चलेगा..

जब हार कर भी, हार का अहसास न हो...।

तब समझ ले तू, जीत के काबिल नही है..

अगर थोड़ी भी, आन-शान बचा हो

तो जीत के लिए जी-जान झोंक दे..।।


जब हार का अहसास न हो..

तो तू समझ ले, 

तू जीत के काबिल नही..।

क्योंकि तेरी कमियों ने तुझे जकड़ लिया है,

जीते-जी मृतप्राय होने से पहले,

इस जकड़न को तोड़ कर तू, जीत का स्वाद चख ले..।।


उस जीत से भी बड़ी जीत होगी,

जब अपनी कमियों के केचुल को उखाड़ फेंकोगे..।

क्योंकि जो अपनी कमियों पे विजय पा ले,

उसे जीतना सब आसान है..।।


कमर कस, हुंकार भर। 

अपनी कमियों को ललकार कर,

युद्धभूमि में सीना तानकर..

अपने कमियों पर प्रहार कर..।

अपने तरकश से पहला बाण निकालकर,

अपने काम(क्रोध,मोह) पर तुम वार कर।

दूसरे बाण से तुम अपने आलस्य पर प्रहार कर।

और तीसरे बाण से तुम अपने अंतर्द्वंद्व पर वार कर।

अगर इससे भी न हो, तो आखरी अस्त्र इस्तेमाल कर,

 पुनर्जीवन(ध्यान) को स्वीकार कर..

फिर से अंकुरित होकर अपने आप को स्वीकार कर..।।


गुरुवार, 17 नवंबर 2022

आज वो फिर रोएगी..

आज वो, फिर रोएगी..

मुझसे कंही ज्यादा,

क्योंकि मुझसे कंही ज्यादा उसने मेहनत की है..

मैं तो अपनी खामियां जानकर खुद को समझा लूंगा..

मगर वो खुद को कैसे समझाएगी..।।

बेवजह उस खुदा पे, और अपने कर्मों पे खिजेगी वो,

कैसे कहु मैं..

मैं अपनी असफलताओं के लिए, खुद ही जिम्मेदार हूँ..।।

आज वो फिर रोएगी,

मुझसे कंही ज्यादा..।।


हिम्मत नही है..


 हिम्मत नही है कि फोन करू,

या फिर मैं,निर्लज्ज हूँ..

शायद निर्लज्ज ही हूँ,

इसिलए तो असफलताओं की इमारत बनाये जा रहा हूँ।।

इस इमारत में,

मेरा ही नही , मेरे माता-पिता का भी दम घुट रहा है..

मेरे चाहने वालों को भी जख्म हो रहा है..।।

कब इन इमारतों को धराशायी करके,

सफलता का इमारत गढुंगा मैं..??

इन असफलताओं की बढ़ती हुई इमारतों की तरह,

मेरे उम्र के साथ,मेरी आकांक्षाएं भी धूमिल हो रही है...।।

शायद मेरी सफलता ही.. 

सिर्फ और सिर्फ मेरी सफलता ही...

इन असफलताओं के इमारतों के साथ मेरे ढलते हुई उम्र को भी धराशायी कर सकता है..

मगर कब..??

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2022

भारत में सिनेमा का सफर।

 भारत में सिनेमा का सफर।


20वीं शताब्दी में सिनेमा की कला अपने अविष्‍कार के कुछ वर्षों के भीतर भारत आ गई। भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहेब फाल्के ने 1913 में पहली मूक फीचर फिल्म राजा हरिशचंद्र रिलीज़ की।


इसके बाद यह इतिहास बन गया। और
पहली बोलने वाली फिल्म आलम आरा अर्देशिर ईरानी ने 1931 में बनाई।


द्वितीय विश्व युद्ध के बाद गीतों, नृत्य और रोमांस से मिली जुली फिल्म जिन्‍हें इंडियन मसाला कहा गया वो सामने आईं। 1940 के दशक में भारत के लगभग आधे सिनेमा हॉल्स और भारत की कुल फिल्‍मों में से करीब पचास फीसदी फिल्‍में बनाने वाला दक्षिण भारत सांस्कृतिक पुनर्जीवन का माध्यम बन गया।


स्वतंत्रता के बाद भारतीय सिनेमा का वास्तविक विस्तार शुरू हुआ। सरकार ने 1948 में फिल्म प्रभाग स्थापित किया


जो विश्व के विशाल डॉक्युमेंट्री 
फिल्म निर्माताओं में गिना गया और इसने वर्ष भर में दो सौ से अधिक लघु डॉक्युमेंट्री बनाईं जो प्रत्येक 18 भाषाओें में रिलीज़ की गई। देश में स्थाई फिल्म थिएटरों के लिए नौ हजार प्रिंट तैयार किए गए। देखते ही देखते विश्व में भारत फीचर फिल्मों का सबसे बड़ा निर्माता बन गया। देश में 2019 तक छह हजार तीन सौ 27 सिंगल स्क्रीन और तीन हजार दो सौ मल्टीपलेक्स स्क्रीन सिनेमा थे। और फिर विभिन्न भाषाओें के फिल्म उद्योग के कारण सामने आया भारतीय सिनेमा। 2021 में हिंदी में 495 फिल्में इसके बाद कन्नड़ में 336तेलगु में 281, तमिल में 254मलयालम में 219, बांग्ला में 193 और मराठी में 164 फिल्में बनीं। भोजपुरी में 101, गुजराती में 80, पंजाबी में 63, उड़िया में 42, असमी में 34 फिल्में बनीं। इनके अलावा अंग्रेंजी में 28 फिल्में बनाई गईं। तुलु में 16 और मणिपुरी में 15 फिल्में बनाई गईं।

भारत में हिन्‍दी सिनेमा के सफर की कहानी


बॉलीवुड के नाम से मशहूर हिंदी फिल्म उद्योग आज भारत में फिल्‍मों से होने वाली कुल आय में करीब चालीस फीसदी का हिस्‍सेदार है। अब यह अमरीकी फिल्‍म उद्योग हॉलीवुड को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे बड़ा फिल्‍म निर्माण केंद्र बन चुका है। व्यावसायिक फिल्मों के साथ-साथबगैर किसी नाच गाने वाली एक विशिष्ट शैली की यथार्थवादी कला फिल्में भी हिन्‍दी सिनेमा का ही हिस्‍सा हैं। "बॉम्बेऔर "हॉलीवुडके मेल से बना शब्द बॉलीवुड तब अंतरराष्ट्रीय चर्चा में आया जब 1957 में महबूब खान की फिल्म मदर इंडिया


सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के तौर पर अकादमी पुरस्कार के लिए नामांकित होने वाली पहली भारतीय फिल्म बन गई
पचास और साठ के दशक में बनाई गई अनेक हिंदी फिल्मों में सामाजिक मुद्दों को उठाया गया और उनका संगीत भी लोगों की जुबान पर चढ़ गया।

ऑस्कर पुरस्कार की सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म श्रेणी में आधिकारिक रूप से नामांकित सभी तीन भारतीय फिल्में मदर इंडियासलाम बॉम्बे और लगान हिंदी में बनी थीं।

भारत में तेलुगु सिनेमा के सफर।।


तेलुगू सिनेमा में मूक फिल्मो का निर्माण 1921 में रघुपथी वेंकैया नायडू र आर. एस. प्रकाश की "भीष्म प्रतिज्ञा" के साथ शुरू हुआ। 1932 में पहली तेलुगु टॉकीज फिल्म भक्त प्रह्लाद का निर्माण एच. एम. रेड्डी ने किया जिन्होंने पहली दक्षिण भारतीय टॉकीज फिल्म कालिदास (1931) निर्देशित की थी।


भारत के 10167 फिल्म थिएटर में से सर्वाधिक 2809 थिएटर आंध्र प्रदेश और तेलेंगाना राज्यों में है जहाँ तेलुगू भाषा में फिल्मो का निर्माण होता है। गिनेस वर्ल्ड रिकॉर्ड के अनुसार विश्व का सबसे बड़ा फिल्म निर्माण स्थल रामोजी फिल्मसिटी हैदराबाद में है। प्रसाद आईमैक्स, हैदराबाद विश्व का सबसे बड़ा और सबसे ज़्यादा दर्शकों वाला 3D आईमैक्स स्क्रीन है।


भारत में तमिल सिनेमा का सफर


भारत में प्रदर्शित पहली तमिल मूक फिल्म कीचक वधम वर्ष 1918 में आर. नटराज मुदलियार ने बनाई थी। वर्ष 1931 मेंआलम आरा के प्रदर्शन के सात महीनों के भीतरएचएम रेड्डी द्वारा निर्देशित एक तमिल फिल्‍म, कालिदासरिलीज़ हुई थी। मद्रास जिसे अब चेन्नई के नाम से जाना जाता हैउस समय दक्षिण भारतीय फिल्मों की फिल्म राजधानी और हिंदी फिल्मों के साथ-साथ श्रीलंकाई सिनेमा के लिए द्धितीय फिल्‍म केंद्र बन गया था। 

द्रविड़ आंदोलन के नेता सीएन अन्नादुरई ने वर्ष 1949 में वेलैक्करी और 1951 में ऑर इरावु फिल्‍म का लेखन किया। तमिलनाडु के पूर्व मुख्‍यमंत्री और पूर्व दक्षिण भारतीय फिल्‍म अभिनेता एम करुणानिधि ने वर्ष 1952 में ब्लॉकबस्टर फिल्‍म पराशक्ति का लेखन किया और देश के महानतम अभिनेताओं में से एक शिवाजी गणेशन किया को फिल्‍मों में लेकर आए।


इन तीन फिल्मों के बाद, तमिल फिल्‍म उद्योग में एक क्रांतिकारी बदलाव आया। एमजी रामचंद्रन एक दमदार नायक के रूप में उभरे और तमिल मूल्यों तथा संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाले सुपरस्टार बन गए। फिल्मों का राजनीतिक प्रभाव इतना अधिक था कि फिल्म उद्योग के पांच अभिनेताओं जैसे सीएन अन्नादुरई, एम. करुणानिधि, एम.जी. रामचंद्रन, वी.एन.जानकी और जे. जयललिता को मुख्यमंत्री बनते हुए देखा गया।


एमएस विश्वनाथन राममूर्ति, इलियाराजा और एआर रहमान जैसे महान संगीतकार अब भी तमिल फिल्‍म जगत पर छाये हुए हैं।


आकाशवाणी के संगीत कार्यक्रमों जैसे थेनकिन्‍नमउंगल विरुप्पम और साउंडट्रैक ओली चित्रम ने तमिल सिनेमा को काफी मदद की

 20वीं शताब्दी की अंतिम तिमाही मेंतमिल फिल्में सिंगापुरश्रीलंकामलेशियाजापानमध्य पूर्व एशियाअफ्रीका के कुछ हिस्सोंओशिनियायूरोपउत्तरी अमरीका और अन्य देशों में बड़े पैमाने पर प्रदर्शित की गई


भारत में कन्‍नड और मलयालम सिनेमा की यात्रा


पहली मलयालम फिल्‍म विगतकुमारम वर्ष 1930 में बनी और वर्ष 1938 में बालन सिनेमा गृह में रिलीज की गई। लेकिन मलयालम फिल्‍मों का निर्माण सक्रिय रूप से 20वीं सदी के दूसरे उत्‍तरार्द्ध में ही शुरू हो सका। मलयालम सिनेमा कथानक पर आधारित रहा और उसकी प्रकृति राजनीतिक रही

अभिनेता प्रेम नजीर ने रिकॉर्ड 520 फिल्‍मों में मुख्‍य भूमिका निभाकर गिनीज वर्ल्‍ड रिकॉर्ड बुक में अपना नाम दर्ज कराया


पहली कन्‍नड फिल्‍म वर्ष 1934 में वाई वी राव ने सती सुलोचना निर्देशित की। राजकुमारविष्‍णुवर्धन और अम्‍बरीष को कन्‍नड सिनेमा का त्रिमूर्ति माना जाता है।

अभिनेता यश की केजीएफ श्रृंखला का निर्देशन प्रशांत नील ने किया और इसने राष्‍ट्रीय स्‍तर पर बॉक्‍स ऑफिस पर इतिहास रच दिया।


कहा जाता है कि जनवरी से जुलाई 2022 तक कन्‍नड सिनेमा का घरेलू फिल्‍म बाजार में आठ प्रतिशत हिस्‍सा रहा है। इससे यह भारतीय फिल्‍म बाजार का चौथा सबसे बडा हिस्‍सेदार बन गया है।


मराठी, बंगाली, गुजराती, पंजाबी और भोजपुरी फिल्मों की यात्रा ।।


मराठी फिल्‍मों का निर्माण मुंबई में ही हिंदी सिनेमा के साथ-साथ होता है। दादासाहेब फाल्के और वी शांताराम जैसे दिग्गजों ने मराठी फिल्मों के लिए आधार तैयार किया जो अपने विषय-वस्‍तु के मूल्यों के लिए जाने जाते हैं।


बंगाली फिल्में ऑस्कर लाइफ टाइम पुरस्‍कार विजेता सत्यजीत रे की अनुकरणीय फिल्मों के लिए जानी जाती हैं।


द अपू ट्राईलॉजी ऑफ रे ने सभी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में वाहवाही हासिल की। वर्ष 1955 में ट्राईलॉजी के पहले भाग पाथेर पांचाली के साथ सत्‍यजीत रे ने भारतीय सिनेमा में अपनी पहचान बनाई।


गुजराती सिनेमा उद्योग ने 1930 के दशक में अपनी स्थापना के बाद से, 1,000 से अधिक गुजराती फिल्मों का सफलतापूर्वक निर्माण किया है। मौजूदा दौर की कुछ फिल्मों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्‍त की है। उपेंद्र त्रिवेदी सबसे सफल गुजराती अभिनेताओं और निर्माताओं में से एक थेकेतन मेहता द्वारा निर्देशित भावनी भवई ने राष्ट्रीय एकता के लिए सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता।



पंजाबी सिनेमा पहली बोलती फिल्म, हीर रांझा, वर्ष 1932 में रिलीज़ हुई थी। के.एल. सहगल, पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार, देव आनंद और धर्मेंद्र जैसे प्रमुख अभिनेताओं और मोहम्मद रफी, नूरजहां और शमशाद बेगम जैसे गायक-गायिकाओं ने पंजाबी फिल्म उद्योग के फलने-फूलने में महत्‍वपूर्ण योगदान दिया।



भोजपुरी सिनेमा की पहली बोलती फिल्म, गंगा मैय्या तोहे पियारी चढाईबो, वर्ष 1963 में प्रदर्शित हुई थी। 1980 के दशक में कई उल्लेखनीय और महत्‍वपूर्ण भोजपुरी फिल्‍में चंदवा के ताके चकोर, गंगा किनारे मोरा गांव और संपूर्ण तीर्थ यात्रा रिलीज हुई थी। भोजपुरी फिल्में उत्तरी अमरीका, यूरोप और एशिया के विभिन्न हिस्सों में देखी जाती हैं जहां दूसरी और तीसरी पीढ़ी के प्रवासी अभी भी भोजपुरी भाषा बोलते हैं। इसके साथ ही गयाना, त्रिनिदाद और टोबैगो, सूरीनाम, फिजी, मॉरीशस और दक्षिण अफ्रीका में भी भोजपुरी फिल्‍में देखी जाती हैं। 




रविवार, 26 जून 2022

कर्मों का फल..

 


क्या हमें दूसरों के कर्मों का भी परिणाम भुगतना होता है...??

हां, भुगतना ही होता है,जिससे आप स्नेह करते है।चाहे वो कोई भी हो...।

साधारण उदाहरण से समझिए ..

अगर आपका चाहने वाला आम का पेड़ लगाता है तो आप आम खाएंगे,अगर खजूर लगाएगा तो... शायद आप न खाना चाहे, हो सकता है आप खाये भी नही। मगर आपको प्रकृति किसी न किसी तरह से खिला ही देगी,भले आप न खाए,हो सकता है आपके संतति को खाना पड़े। मगर खाना ही पड़ेगा। क्योंकि आपने आम जो खाया है...।।

ये प्रकृति का नियम है,अगर आपके हिस्से में किसी के द्वारा खुशियां आएगा तो हो सकता है दुःख भी आये,और इसे आपको स्वीकारना ही होगा..।।

आप एक परिवार का ही उदाहरण ले..

आपके पिताजी बाजार से मिठाइयां लाते है और सब खाते है... मिठाइयां ज्यादा मीठी होने के कारण सबको जुकाम हो जाता है। मगर आपको नही क्योंकि आपने मिठाइयां नही खाई होती है। मगर आपको भी कुछ दिनों के बाद जुकाम का असर होने लगता है... आखिर क्यों...?? क्योंकि आपके पिताजी ने आपके लिए भी मिठाइयां लाया था।। 

ये ब्रह्मांड ऐसे ही काम करता है,यंहा हरेक कुछ एक दूसरे से जुड़ा हुआ है..।।

आपके शब्द भी,आपके कर्म भी, इस ब्रह्मांड में काम कर रहा है।।

आपने अपने समाज में देखा होगा... एक व्यक्ति, है तो बहुत अच्छा मगर उसे दुःख का सामना करना पड़ रहा है..       आखिर क्यों..?? हो सकता है उस दुःख का कारण वो स्वयं न हो .. उसका कारण वो हो सकता है,जिसके ऊपर वो या फिर उसके ऊपर जो आश्रित है/था ।।

प्रकृति इसी तरह काम करती है...।।

आपको सिर्फ अपने कर्मों का ही नही बल्कि अपने चाहने वालों के कर्मों का भी फल भुगतना होता है।।

अगर आपके पिताजी ने आम का पेड़ बोया है तो आप आम ही खाएंगे,अगर उन्होंने बेर का पेड़ बोया है तो आप बेर ही खाएंगे। तबतक, जबतक की आपने कुछ और न बोया हो.. ये चक्र चलता ही रहेगा.. तबतक, जबतक की आप अपने कर्मों के द्वारा इसमें बदलाव न लाएं..।।

हमारा कर्म हमारे परिवार और समाज से इस तरह जुड़ा हुआ है, जिस तरह जड़ पेड़ से, और पेड़ वन से..।।


Yoga for digestive system