गुरुवार, 20 जून 2024

जिंदगी एक यात्रा है..

जिंदगी एक यात्रा है..
अनवरत चलने वाली..
कभी न खत्म होने वाली..



जिंदगी एक यात्रा है..
इस यात्रा में सिर्फ पड़ाव आते है..
कुछ वंही रुककर,
ताउम्र के लिए वंहा आशियाना बना लेते है..
तो कुछ..
उस पड़ाव को छोड़कर,
अगले पड़ाव की ओर निकल जाते है..
जितना पड़ाव पार करते जाएंगे..
उतना जिंदगी का रसास्वादन करते जाएंगे..

जिंदगी एक यात्रा है..
अनवरत चलने वाली..
कभी न खत्म होने वाली..

जिंदगी की इस यात्रा में,
सबको किसी-न-किसी पड़ाव पे एक दिन पहुंचना ही है..
मगर कुछ अभागे होते है..
जो कई पड़ाव को छोड़कर,
आगे ऐसे मुहाने पे खुद को पाते है..
जंहा से न आगे,न ही पीछे...
किसी पड़ाव का पता चलता है..
कुछ यंही रुककर शोक मनाने लगते है..
और खुद को कोसने लगते है..
मगर कुछ हिम्मत जुटाकर आगे निकल जाते है..
और एक नए पड़ाव को पा लेते है..
ये वंही लोग होते है,
जो नए कीर्तिमान रचते है...

इतिहास साक्षी है...
उन्होंने ही अपनी अमिट छाप छोड़ी है,
जिन्होंने विपरित परिस्थितियों को पार कर,
एक नए पड़ाव को पाया है..

जिंदगी एक यात्रा है..
अनवरत चलने वाली..
कभी न खत्म होने वाली..
इस यात्रा में,
सिर्फ पड़ाव आते है..
जिंदगी एक यात्रा है..
अनवरत चलने वाली..


शनिवार, 15 जून 2024

निर्णय आपको करना है..

निर्णय आपको करना है,
कि आपको क्या करना है...
इतिहास पढ़ना है..
 लिखना है..
या फिर इतिहास बनना है..

हो सकता है,
आप ताउम्र या वर्तमान में तीनों में से कुछ, न कर पाए/ न कर पा रहे...
तो जरूर सोचिएगा..
इसकी परिणीति क्या होगी..??



शुक्रवार, 14 जून 2024

प्यार की पांति...तुम्हारी एक छवि..

तुम्हारी एक छवि मेरे जेहन में बस गई है..
वो हटती ही नही..
जब भी किसी और का दीदार करने की कोशिश करू..
तुम्हारी वो छवि मेरे सामने आ जाती है..
तुम्हारी वो मुस्कान मुझे तार-तार कर देती है..
तुम्हारी वो हया मुझे पागल कर देती है...

एक बार नही आजकल कई बार तुम्हारी छवि उभर कर आ जाती है.
मालूम नही क्यों..
तुम्हारी एक छवि मेरे जेहन में बस गई है..
वो हटती ही नही..


गुरुवार, 13 जून 2024

ब्रह्मांड और पृथ्वी

जब मैं इस ब्रह्मांड के बारे में सोचता हूँ तो आश्चर्यचकित होता हूँ,
जब इस ब्रह्मांड के सापेक्ष अपने पृथ्वी को देखता हूँ तो हंसी आती है..(विस्मयकारी वाली)
जब खुद को देखता हूँ..तो खुद को वैसा ही पाता हूँ..
जैसे इस ब्रह्मांड में पृथ्वी को पाता हूँ..।।

हमारा अस्तित्व भी इस पृथ्वी पर वैसा ही है,धूल-कण की तरह,
जैसे हमारा पृथ्वी का इस ब्रह्मांड में धूल कण की तरह...

जिस तरह हमारे जिंदगी का कोई ठीक नही..
उसी तरह हमारे पृथ्वी का भी कोई ठीक नही..
क्या पता कब कौन उल्का टकराएगा और पृथ्वी बूम..
इस तरह की घटनाएं रोज इस ब्रह्मांड में हो रही है..

ब्रह्मांड इतना विस्तारित है कि इसकी भनक तक भी हमें नही लग रही है..।।



जिस तरह हम एक उम्मीद में जी रहे है..
उसी तरह हमारी पृथ्वी भी,उम्मीद पर अपने कक्ष पर घूम रही है..की सब कुछ अच्छा होगा..

मगर आपको जानकर हैरान होगा कि पिछले 300 वर्षों में हम मनुष्यों ने पृथ्वी की 90% वनस्पतियों और जन्तुओ का समूल नाश कर दिया है.. और ये अभी भी जारी है..

मंगलवार, 11 जून 2024

क्या पता..

माना कि हार निश्चित है..
इसका मतलब ये नही की मैदान छोड़ दूं…
असली योद्धा तो वो है,
जो ये जानकर भी लड़ रहा है,कि हार निश्चित है..
बस एक आस में लड़ रहा है..
क्या पता कब किस्मत साथ दे-दे..और
हारी हुई बाजी को जीत में तब्दील कर दे..

मैंने जीत को हार में,
और हार को जीत में,
तब्दील होते हुए देखा है..
बस शर्त एक है..
मैदान पे डटे रहना है..
या तो इतिहास बन जाऊंगा..
या फिर इतिहास में कंही खो जाऊंगा..।।


रविवार, 2 जून 2024

क्या पता कल क्या होगा..

मैं वो फूल बन चुका हूं,
जिसकी सारी पंखुड़ियां बिखर चुकी है..
मगर अभी भी डाल से जुड़ा हुआ हूँ,
न जाने किस आस में..
कब क्या, प्रकृति का कोई करिश्मा हो जाये..
इसी आस में डटा हुआ हूँ..
ये जानते हुए भी..की कुछ नही होनेवाला
मगर फिर भी डटा हुआ हूँ..
कुछ तो जरूर होगा..
भले फिर से पंखुड़ियां न लगे..
क्या पता बीज का ही निर्माण हो जाये..
और ये बीज बिखर कर ढेर सारे पौधे में तब्दील हो जाये..
और इन पौधों पे ढेर सारे फूल खिल जाए..
और इनकी पंखुड़ियां हवा में उड़कर 
ढेर सारी खुशबुएं बिखेर जाए..।।

क्या पता कल क्या होगा..
मगर जो भी होगा अच्छे के लिए ही होगा..।।

रविवार, 12 मई 2024

माँ..

माँ..
मैं किसे कहु माँ..
जिसने मुझे जन्म दिया..
या जिस-जिस ने निःस्वार्थ स्नेह किया..??



नहीं..
जिस-जिस ने निःस्वार्थ स्नेह किया..
काश उन सबको कह सकू माँ..

मेरी दादी जो मुझसे असीम स्नेह करती है..
मेरी बुआ/चाची जो मुझे लाड़-प्यार करती है..
मेरी बहनें जो मेरे हिस्से का दुःख भी सहन करती है..
मेरी भांजिया/भतीजियां जो अपनी मुस्कान से मेरे सारे परेशानियां दूर कर देती है..

माँ..
मैं,ऋणी हूँ, इनसबका कभी उऋण नही हो पाऊंगा..

माँ..
मैं किसे कहु माँ..??
जिसने मुझे जन्म दिया..
या जिस-जिस ने निःस्वार्थ स्नेह किया..??

इस धरा का क्या..
जिसे जन्म से लेकर, अभी तक पाँवो से रौंद रहा हूँ..
उन पेड़-पौधों,पर्वत-पठार,नदी-झरने,सूर्य और चांद का क्या...??
जो मेरे जीवन को सवांर रहे है..
इस प्रकृति का क्या...??
जो मेरी आवाज को सिर्फ सुन ही नही रहा,
बल्कि मेरी इच्छाओं को पूर्ति करने में भी योगदान दे रहा है..

माँ..
मैं किसे कहु माँ..
जिसने मुझे जन्म दिया..
या जिस-जिस ने निःस्वार्थ स्नेह किया..??

माँ..
आपका स्थान कोई और नही ले सकता है...
क्योंकि मेरे जनते वक़्त..
जो पीड़ा आपने सही,वो कोई और कैसे सह सकता है..
बचपन में, मेरे झूठे रुआंसी को आपके सिवा और कोई नही पहचान सकता था..
अभी भी आपको याद करते ही,आपका फ़ोन आ जाना..
ये चमत्कार और कोई नही कर सकता है..
माँ आपका स्थान कोई और नही ले सकता है..
क्योंकि आपका स्नेह कभी नही बंटता..
बाकी सबका समय के साथ बंट जाता है...

माँ..
मैं किसे कहु माँ..
जिसने मुझे जन्म दिया..
या जिस-जिस ने निःस्वार्थ स्नेह किया..??