सोमवार, 15 सितंबर 2025

पैसा,मनुष्य और प्रकृति..

"हम ज्यों ज्यों पैसों का अंबार लगाते जाते है,
त्यों-त्यों प्रकृति से दूरिया बढ़ाते जाते है.."


हम जितना पैसों की तंगी से जूझते है,उतना ही प्रकृति को स्वयं के पास पाते है..
और हम जितना ही आर्थिक रूप से सम्पन्न होते जाते है,हम उतना ही प्रकृति से स्वयं की दूरियां बढ़ाते जाते है..।।

मगर अफसोस हम इन सब से अनभिज्ञ होते है..??

जब हम आर्थिक तंगी से जूझ रहे होते है,तब प्रकृति के करीब होकर भी उसे महसूस नही कर पाते है..
वंही जब हम ज्यों-ज्यों आर्थिक रूप से संपन्न होते जाते है..
त्यों-त्यों हम स्वयं को प्रकृति से दूर करते जाते है..।

एक गरीब इंसान प्रकृति के हरेक चक्र को महसूस और सामना करता है,
एक अमीर इंसान प्रकृति के हरेक चक्र से दूरियां बनाता है,और उसे चुनौती देता है..।।

मगर अफसोस..
जीवन के एक चक्र में, अमीर और गरीब दोनों ऐसे जगह पर पहुंचते है..जब इन दोनों के जिंदगी में अफसोस के सिवा कुछ नही रहता..।।
गरीब ये सोच के अफसोस करता है कि प्रकृति के इतने करीब होकर भी कभी उसे जानने का कोशिस नही किया..
वंही अमीर इंसान सबकुछ न्यौछावर करके प्रकृति की अनुभूति पाना चाहता है..।
मगर दोनों के हाथ, अक्सरहाँ खाली हाथ ही लगता है..।

इसीलिए आप जंहा है जैसे है..
सूर्य के तेज का आनंद लीजिये..
चांद की रोशनी का दीदार कीजिये..
तारों की टिमटिमाहट का दीदार कीजिये..
बारिश की बूंदों का रसास्वादन कीजिये..
प्रकृति के हरेक चक्र के साथ स्वयं का तालमेल बिठाइए..।।

क्या पता जिंदगी के दौर में वो सबकुछ आपको प्राप्त हो..
जिसकी आपकी लालसा हो..
मगर आप प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने में सक्षम ना हो..।।

इसीलिए समय है..
प्रकृति के हरेक रंग में खुद को रंगे..
और ऐसा निरंतर करने से.. 
प्रकृति आपको अपने रंग में रंगने लगेगी..।।



खिड़कियां

आपने आखरी बार खिड़कियों से कब देखा था..और क्या-क्या देखा था..??


पहले घर मे खिड़कियां होता था घर से बाहर देखने के लिए....मगर अब खिड़कियां पे हम परदे टांग देते है,इसलिये की कंही कोई बाहर से न देखें..।।

कभी खिड़कियों से बाहर देखें..आपको वो दिखेगा जो किसी को दिख नही रहा है..वो अनंत आसमां, और स्वयं में अनंत शक्तियों का संचय का आभास होगा..।।

मगर अफसोस अब हमने खिड़कियों से बाहर देखना क्या खिड़कियां खोलना भी बंद कर दिया है..।।

हम यू ही परेशान होते है..

हममें से अक्सरहाँ लोग उन चीजों के लिए परेशान है,जो चीज हमारे हाथ मे नही है..।।
मगर हम इन परेशानियों पे कभी गौर ही नही करते..और बेवजह परेशान रहते है..।।
आपने अक्सरहाँ या फिर खुद को बेवजह परेशान होते हुए देखा होगा..
जैसे ट्रम्प का टैरिफ लगाना..इजरायल और ईरान में युद्ध होना,पंजाब में बाढ़ आना,उत्तराखंड में भू-स्खलन होना..
इत्यादि..इन घटनाओं का सीधे हमारे ऊपर कोई प्रभाव नही पड़ता..और इसके लिए हम सिर्फ चर्चा और सांत्वना के सिवा और कुछ नही कर सकते..।

चलिए और करीब से कुछ घटनाओं को देखते है,जो हमे परेशान करता है..
आप कभी सफर पर निकलते है तो हो सकता है,बस या ट्रैन लेट हो..जब आप को इंतजार करना पड़ता है तो आप पे क्या बीतता है..
आपने कभी गौर किया है..??
आप क्यों परेशान है..जबकि आपके और हमारे परेशान होने से कुछ नही होने वाला है..मगर इन घटनाओं के कारण हम इतना नकारात्मक हो जाते है कि ये हमे सूक्ष्म स्तर पर नुकसान पहुचाता है..।

चलिए दूसरे घटना पर गौर करते है..
एक बच्चा बुरी तरह से रो रहा है..
आप क्या करेंगे..??

आप  नोट बनाये..और देखे की आप किन-किन चीजों से परेशान होते है..और फिर सोचिये,क्या इन कारणों से परेशान होना जरूरी था..।।
जबकि आपके हाथ मे कुछ भी नही था..।।

हम यू ही परेशान होते है..
जबकि परेशान होने का कोई कारण नही है..।।

मंगलवार, 9 सितंबर 2025

नेपाल,सोशल मीडिया और जेन-Z

नेपाल में जो हुआ आप उसे किस नजर से देखते है..??
आपका क्या राय है..??


मैं तो यही सोचता हूँ..जो नेपाल में हुआ वो कंही भी हो सकता है..।।
क्योंकि जो गुलाम है,उससे चलाक मालिक कुछ भी करा सकता है..।।
भले ही हम इसे जेन-Z आंदोलन कहें..



मगर वास्तव में ये हज़ारों किलोमीटर दूर एक हॉल में बैठे कुछ क्रूर और उन्मादी लोगों का हरकत है,जो अपना मनमानी चला रहे है..।।

इसकी शुरुआत कंहा से हुई..??
इसकी शुरुआत नेपाल सरकार के एक फैसले से हुई,जिसमें उन्होंने हरेक सोशल मीडिया के मालिकों से कहा था कि हरेक कंपनी को नेपाल में रेजिस्ट्रेशन,डेटा सेंटर,और कर्मचारी को नियुक्त करने को कहा गया..
मगर इन कंपनी ने कुछ रिप्लाई तक नही किया..जबकि ज्यों-ज्यों समय सीमा नजदीक आ रहा था त्यों-त्यों ये कंपनियां सोशल मीडिया पे राजनेताओं एवं उनसे जुड़े हरेक रिस्तेदारों की रहीश लाइफ स्टाइल की फ़ोटो शेयर इस तरह करने लगे जैसे..कोई युद्ध मे बम के गोले फेकते है..
ये यंही नही रुके..बल्कि ये कंपनियां हरेक प्लेटफार्म पे भ्रस्टाचार से जुड़े मुद्दे की बमबारी करने लगे..

फिर क्या, इन्ही में से किसी एक नेता को चुना जो कल तक पर्यावरण के लिए काम करता(सूदन गुरुंग) था। अचानक इसके पास इतना कुछ कैसे आ गया कि इसने अपनी आवाज जेन-Z तक पहुँचाया..।।



हम आप सोच भी नही सकते..
ये सोशल मीडिया क्या करा सकता है..
नेपाल सिर्फ एक ट्रेलर है..
अगर हम और हमारी सरकार अभी भी सतर्क नही हुए तो ये सोशल मीडिया के आका कंही दूर कोने में बैठकर किसी भी देश को गृह युद्ध या फिर किसी भी युद्ध मे झोंक सकते है और देश की बागडोर अपने हाथ मे ले सकता है(बांग्लादेश,श्रीलंका में भी इसकी परछाई दिखी थी,मगर किसी ने गौर नही किया)..।।

आने वाला कल AI का है..
इसका दूसरा पक्ष इतना भयावह है..की लोग बात तक नही करते..
AI के लिए एक उक्ति है- "अहं ब्रह्मस्मि"

नेपाल में जो हुआ,इस बारे में हरेक लोगों को सोचना चाहिए..
इसमें कई कारण है..
मगर..
"दुनिया पे राज गुलामों के द्वारा ही किया जाता रहा है..
बस हरेक युग मे इसका स्वरूप बदलता रहा है..
इस युग मे हमलोग सोशल मीडिया के गुलाम है.."







अपने बुराइयों को कैसे पहचाने..

जिंदगी बहुत अजीब है..
कल तक जो अच्छे थे,आज वो बुरे हो गए..
क्यों..??
क्योंकि वो आदमी पहचानने लगे..।।

क्या सच में कुछ लोग बुरे होते है..??
कुछ नही,सब बुरे होते है..।
बस अनुपात का फर्क है..।

आखिर कैसे अपनी बुराइयों को पहचाने..
●अगर आप किसी एक व्यक्ति की बुराई किसी एक व्यक्ति से करते है तो ठीक है..मगर जब आप कई व्यक्तियों की बुराई कई व्यक्तियों से करने लगते है..तब आप खुद..बुरे है..।।
●जब हम किसी एक गलती को छिपाने का प्रयास करते है तब ठीक है,मगर जब हम अक्सरहाँ गलतियां करके दूसरों को दोषारोपण करते है,तब बात गंभीर है..
●जब हमें हरेक चीज में नकारात्मकता दिखने लगे, तो नजरिया बदलने की जरूरत है..
●जब लड़ने से पहले ही हारने के डर हावी हो,तो खुद को तैयार करने का वक़्त है..।।

ना जाने और कई बुराइयां है,जो हमारे जीवन का हिस्सा बन जाता है और हमें पता तक नही चलता..
ऊपर के 3 बुराइयों पे काम करके आप अपने जिंदगी में सकारात्मक बदलाव ला सकते है..
अगर 3 नही कर सकते है तो सिर्फ तीसरे पर ही काम करें..
क्या जादू होता है..??
अगर आप 3सरे बिंदु पर काम करें तो आप अपने जिंदगी में हो रहे जादू को देखना शुरू कर देंगे...😊


शनिवार, 6 सितंबर 2025

बनारस और यादें..

अभी-अभी अचानक बनारस नाम पर नजर पड़ गया..और तुम याद आ गई..।


यू ही बनारस की गलियों में भटकना याद है मुझे,
यू ही BHU के कैंपस में भटकना याद है मुझे..
यू ही गंगा घाट पे भटकना याद है मुझे..
पता है,क्यों..??
शायद तुम्हारा दीदार हो जाये..।

मगर कंहा..??
ऐसी किस्मत पाई थी मैंने.. 
जो तुम्हारा दीदार होता..।।
तुम्हारा दीदार तो ना हुआ..
मगर तुम्हारे कारण कई यादें अबतक जेहन मैं है..।।









बुधवार, 3 सितंबर 2025

क्या हुआ जो फिर गिर गए..

क्या हुआ,जो फिर गिर गए....

होंसला रख, चल खड़ा हो

और चल अपनी मंज़िल की और..।

वो तुम्ही हो,जो गिर के चलना सीखा है..                          

एक बार नही कई दफा गिर के चलना सीखा है..              

अगर तुम डर जाते,तो क्या तुम फिर चल पाते..??

क्या हुआ जो..फिर गए..।

वो तुम्ही तो थे..

जिसे अंधेरों से कभी डर लगता था..

अब अंधेरा अच्छा लगता है..।

वो तुम्ही तो थे..

जो काम ठान लिया उसे मुकाम तक पहुचाते थे..।

वो तुम्ही तो थे..

जो हार कर फिर से एक बार जीतने को खेलते थे..

मगर फिर हार जाते थे..

मगर फिर भी खेलना नही छोड़ते थे..

क्योंकि तुमने खेला था जी जान से..।।

क्या हुआ,जो फिर गिर गए..??

गिरना तो लाज़मी है, सफर में,

क्योंकि वो सफर..

सफर ही क्या..

जिस सफर में थोड़ा ग़म और खुशियां ना हो..।

क्या हुआ,जो फिर गिर गए..??

उठ खड़ा हो..

इस विराट आसमां को देख..

और अपने हौंसले को देख..

अपने हौंसले को विराट कर, 

अपने असफलता को परास्त कर..।।

क्या हुआ, जो फिर गिर गए..??

गिरना तो नियति है..

अगर गिर कर उठ ना सके तो फिर सोच ले..

क्या होगा..??

उठ खड़ा हो..

और अपने नियति से मिल..

तबतक आगे चलता चल,

जब तक अपने मुकाम को ना पा ले..।।

क्या हुआ,जो फिर गिर गए..??