क्या हुआ,जो फिर गिर गए....
होंसला रख, चल खड़ा हो
और चल अपनी मंज़िल की और..।
वो तुम्ही हो,जो गिर के चलना सीखा है..
एक बार नही कई दफा गिर के चलना सीखा है..
अगर तुम डर जाते,तो क्या तुम फिर चल पाते..??
क्या हुआ जो..फिर गए..।
वो तुम्ही तो थे..
जिसे अंधेरों से कभी डर लगता था..
अब अंधेरा अच्छा लगता है..।
वो तुम्ही तो थे..
जो काम ठान लिया उसे मुकाम तक पहुचाते थे..।
वो तुम्ही तो थे..
जो हार कर फिर से एक बार जीतने को खेलते थे..
मगर फिर हार जाते थे..
मगर फिर भी खेलना नही छोड़ते थे..
क्योंकि तुमने खेला था जी जान से..।।
क्या हुआ,जो फिर गिर गए..??
गिरना तो लाज़मी है, सफर में,
क्योंकि वो सफर..
सफर ही क्या..
जिस सफर में थोड़ा ग़म और खुशियां ना हो..।
क्या हुआ,जो फिर गिर गए..??
उठ खड़ा हो..
इस विराट आसमां को देख..
और अपने हौंसले को देख..
अपने हौंसले को विराट कर,
अपने असफलता को परास्त कर..।।
क्या हुआ, जो फिर गिर गए..??
गिरना तो नियति है..
अगर गिर कर उठ ना सके तो फिर सोच ले..
क्या होगा..??
उठ खड़ा हो..
और अपने नियति से मिल..
तबतक आगे चलता चल,
जब तक अपने मुकाम को ना पा ले..।।
क्या हुआ,जो फिर गिर गए..??

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें