शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

लोग कंहा से कंहा चले गए..

लोग कंहा से कंहा चले गए..
मैं वही का वंही रह गया..।
जो मुझसे आगे थे वो तो आगे है ही,
जो मुझसे पीछे थे,वो भी मुझसे आगे निकल गए..
मैं वंही का वंही रह गया..।
जिंदगी से अबतक क्या हासिल की मैंने...??
कहू तो कुछ भी नही..जो था वो भी बर्बाद ही कि मैंने..
मैं वंही का वंही रह गया..।
मेरे चाहने वाले बस इतने है,जिसे मैं अंगुलियों पे गिन सकता हूँ..
मगर समय-दर-समय उनकी भी तादाद कम होती जा रही है..
कम हो भी क्यों ना..??
क्योंकि असफलता और सफलता दोनों बोझ होती है..
सफलता का बोझ सब बांटना चाहते है,क्योंकि सफलता से कंही-न-कंही सब का हित जुड़ा होता है,जिस कारण इस बोझ को सब बांट लेते है..
वंही हमारी असफलता से कंही-न-कंही हमारे चाहने वालों को भी शर्मिंदा होना पड़ता है...इसीलिए वो हमारे असफलता के भागीदार नही बनते..।
इसीलिए असफलता का बोझ भारी होता है..।।

लोग कंहा से कंहा चले गए..
मैं वही का वंही रह गया..।
जो मुझसे आगे थे वो तो आगे है ही,
जो मुझसे पीछे थे,वो भी मुझसे आगे निकल गए..
और मैं वंही का वंही रह गया..।


गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

मृत्यु..

मृत्यु यू ही नही स्पर्श करती है..जबतक की जीने की जिजीविषा खत्म न हो जाये..

जब जीने की जिजीविषा खत्म हो जाये,तब लाख प्रयत्न कर ले कोई,तब कोई जी नही सकता..।

अगर जीना है,तो जीने की जिजीविषा बनाये रखना होगा।

आखिर ऐसा क्या होता है,जब जीने की जिजीविषा खत्म हो जाता है..??

शायद मोह माया का अंत हो जाता है,अपनों से स्नेह का डोर टूट जाता है..शायद इसीलिए मृत्यु शरीर को स्पर्श कर पाती है..अन्यथा मृत्यु यू ही स्पर्श नही करती क्योंकि मृत्यु हरेक बंधनों को तोड़कर एक नई दुनिया मे ले जाती है,जंहा कोई बंधन नही है..।

मृत्यु एक नई दुनिया का दरवाजा खोलता है,जंहा किसी तरह का बंधन नही है,वंहा असीम ऊर्जा से संचालित ऊर्जावान शरीर है,जो मृत्यु लोक में जब चाहे तब झांक सकता है..।।

मृत्यु अंत नही बल्कि एक नई शुरुआत है..



मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025

परेशानियां

हम सब परेशानियों से घिरे हुए है,शायद ही कोई होगा जिसके जीवन में परेशानी न हो..।
मगर हम में से कई लोग ऐसे होते है,जिसके जिंदगी में हमारे आप से ज्यादा परेशानियां होता है,मगर हमें पता नही चलता..।
आखिर क्यों..??
क्योंकि हममें से कई लोग परेशानियों से निपटना जानते है,और परेशानी को समझते है,इसीलिए किसी को महसूस नही होता की वो परेशानियों से घिरे हुए है..।।

मगर हममें से कई लोग ऐसे होते है जो परेशानियों से निपटना नही जानते,और ना ही परेशानियों को समझने की कोशिस करते है, इसलिए ताउम्र परेशानियों से घिरे होते है..।।

कभी घर से बाहर निकलिये और अपने चारों तरफ देखने की कोशिस कीजिये, तब अहसास होगा कि हमसे भी ज्यादा परेशानियों दूसरों के जिंदगी में है..।।

कभी परेशानियों से घबराए नही बल्कि परेशानियों का सामना करें..क्योंकि परेशानियों ही हमारे जिंदगी में निखार लाता है.।।


सोमवार, 6 अक्टूबर 2025

मेरी दादी माँ..

दुनिया में माँ से भी ज्यादा अगर कोई प्यार करता है तो,वो है दादी माँ..और अगर आप पहले पोते/पोती हो तो मत पूछिए की कितना प्यार मिलेगा..।।
दादी इतना प्यार करती है कि उनके प्यार का अहसास ही नही होता..
उनका प्यार,उनका व्यवहार लगने लगता है,शायद इसीलिए उनके प्यार को हम अहसास नही कर पाते,जब दूर चली जाती है,तब अहसास होता है..।



मेरी दादी माँ..उनके बारे में जितना लिखू उतना कम है..।
मैं बचपन से ही दादी माँ के करीब था शायद इसलिए उनका प्यार ज्यादा पाने का मौका मिला..।

मेरी दादी माँ गलत घर में पैदा हो गई थी..।अगर वो किसी राजनीतिज्ञ के घर मे पैदा हु
हुई होती, तो आज शायद उन्हें सब जानता।अगर वो किसी उद्योगपति के घर पैदा हुई होती, तो बहुत बड़ी उद्योगपति होती..।अगर किसी कलाकार,लेखक के घर पैदा हुई होती तो अच्छा कलाकार/लेखक होती..।मगर प्रकृति को कुछ और ही मंजूर था..।

उनमें जितना करुणा और प्रेम था,उतना ही क्रोध भी..उनमें सब गुण था..।
भगवान ने उन्हें सब सुख दिया..लगभग उनकी सब इच्छायें पूर्ति हो ही गई,अगर कुछ बाकी रह भी गया तो,सब इच्छायें सबकी कंहा पूरी होती है..।।
दादीमाँ के कथनानुसार उन्होंने गरीबी के साथ संघर्ष भी देखा बचपन मे भी और शादी के बाद भी(जब बाबा दुर्घटना में महीनों घायल रहें) मगर भगवान के दया से उन्हें सबसु ख मिला..इसलिए शायद उन्हें भगवान से शिकायत ना के बराबर रही होगी..।

कुछ लिखने का मन नही करता..
शायद अपने साथ दादी माँ अपनी स्मृतियां भी ले गई..।
या फिर लिखने को इतना कुछ है कि कुछ लिख नही पाता..।


हमारा प्रथम प्राथमिकता..

हम सबके जीवन में शुरू से लेकर अंत तक किसी न किसी चीज की प्राथमिकता बनी रहती है..।
किसी के लिए परिवार,किसी के लिए समाज तो किसी के लिए पैसा पहला प्राथमिकता होता है..।हम ता उम्र इसे और बढ़ाने में लगे रहते है।जो कि सही भी है..अगर जिंदगी में हम किसी चीज को प्राथमिकता नही देंगे तो फिर जिंदगी का महत्व ही क्या रह जाएगा..।

मगर एक वक्त ऐसा आता है,जब हमारे पास पैसा,समाज,परिवार सबकुछ होते हुए भी,कोई काम का नही रह जाता आखिर क्यों..??
क्योंकि हमारा स्वास्थ्य हमारा साथ नही दे रहा होता..
आखिर क्यों..??
क्योंकि हमने अपने स्वास्थ्य को,कभी प्राथमिकता नहीं दी।
जबकि हमारा प्रथम प्राथमिकता हमारा स्वास्थ्य होना चाहिए..।

अगर आप स्वस्थ है तो आप सबकुछ पा सकते है..
अगर आप अस्वस्थ है तो सब कुछ होते हुए भी किसी चीज का उपभोग नही कर सकते..।।

हममें से अधिकांश लोग पूरी उम्र पैसा और परिवार के पीछे खर्च कर देते है..मगर अपने ऊपर कुछ वक्त खर्च नही करते...।।मगर जब आप कुछ दिनों के लिए बीमार होते है..तब ये पैसा और परिवार साथ तो होता है,मगर उस असहनीय पीड़ा से खुद ही जूझना पड़ता है..।।

इसीलिए हमारी प्रथम प्राथमिकता हमारा स्वास्थ्य होना चाहिए..
अपने लिए हरेक रोज समय निकालिय और अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखिये...।।
"क्योंकि स्वास्थ्य से बड़ा कोई धन नही है, और न ही कोई मित्र है"

पुनर्वित्तं पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही। एतत्सर्वं पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः ॥
हरेक चीज को हम दुबारा पा सकते है,मगर अपने स्वास्थ्य को नही,इसलिय अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखिये..।।

रविवार, 5 अक्टूबर 2025

प्यार की पाँति...कोई होती..

कोई होती जो मुझे भी खिड़की के ओट से देखती..
मेरी नजर पड़ते ही,नजरें झुका लेती..।

कोई होती जो मुझे देखने को घंटों टकटकी लगाए रहती..
जब मैं उसे देखता,तो मुँह फेर लेती..।

कोई होती जो मुझसे प्यार का इजहार करने का बहाना ढूंढती..
मगर बहाना मिलने पर भी, प्यार का इजहार न कर पाती..।

कोई होती जो मुझसे जी जान से प्यार करती..
मगर मैं कमबख्त उसके प्यार का कद्र न करता..।

कोई होती जो दूसरे का गुस्सा भी मुझपे उतारती..
और मैं चुपचाप उसके गुस्से को अनसुना कर देता..।

कोई होती जो मुझे भी खिड़की के ओट से देखती..



शनिवार, 4 अक्टूबर 2025

आप कितने अच्छे हो..ये मायने नही रखता..

आप कितने अच्छे व्यक्ति को जानते है..अतीत से लेकर वर्तमान तक..??
आप जितने भी व्यक्ति को जानते है,उनमें एक बात सामान्य है...
पता है क्या बात सामान्य है..??
वो अपने जिंदगी में सफल है..।।



ये मायने नही रखता की आप अच्छे है,या बुरे..।
मायने ये रखता है कि आप अपने जिंदगी में सफल है या असफल..।
क्योंकि अच्छे और बुरे का मूल्यांकन सबके लिए अलग-अलग है..
आपको जो अच्छे लगते है,हो सकता है वो किसी और को बुरा लगता है, जो आपको बुरा लगता है,हो सकता है वो किसी और को अच्छा लगे..।।
आप वर्तमान में ही,किसी सफल व्यक्ति को ले..या फिर जिसे आप अपना रॉल मॉडल मानते है,हो सकता है दूसरे के नजर में उनकी उतनी अहमियत न हो..।।
मगर आप दोनों उस सख्स को इसलिए जानते है कि..
वो अपने जीवन मे सफल है..।।

इसीलिए कौन अच्छा कहता है,कौन बुरा कहता है..
या फिर परिवार,सगे-संबंधी,समाज और दुनिया क्या कहती है..
उसपर ध्यान मत दे..सिर्फ और सिर्फ अपने सफलता पे ध्यान दे..।
क्योंकि जब आप अपने जिंदगी में सफल हो जाएंगे..
तो सबके बोल बदल जाएंगे..।।

अहमियत..

"लोगों की अहमियत का पता,हमें तब चलता है,
 जब वो हमसे कुछ पल,कुछ दिन,कुछ महीनों,कुछ साल या फिर हमेशा के लिए हमसे दूर चले जाते है.."।

हमारे जिंदगी में कुछ लोगों की अहमियत पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर होता है..ये ऐसे लोग होते है जिससे हम एक क्षण के लिए मिलते है..।(ये लोग कौन हो सकते है..??)इस तरह के लोग अक्सरहाँ हवा के झोंके के साथ जीवन में आते है,और चले जाते है..मगर कभी-कभी इनमें से कुछ लोग ऐसे होते है,जिनकी अहमियत जिंदगी में ताउम्र बनी रहती है..।।



कुछ लोग ऐसे होते है..जो हमारे जिंदगी को संवारने का काम करते है..(ये लोग कौन है..??)मगर शायद ही हम उन सबकी अहमियत को समझ पाते है..उनमें से कुछ ही लोग होते है,जो हमें भाते है,जो हमें प्रभावित करते है,और wo ताउम्र यादों में बने रहते है..।


कुछ ऐसे होते है..जो जिंदगी में रंग भरते है..अगर वो न होते तो जिंदगी कितना रंगहीन होता..(ये लोग कौन हो सकते है..??)इनके साथ बिताए हर पल खास थे,ये वही लोग थे,जो मुझसे भी झगड़ते और मेरे लिए दूसरों से भी झगड़ते..।ये वही कमीने यार है जो कभी प्रसंशा के झाड़ पे चढ़ाते तो कभी उसी के आड़ में झाड़ में फंसाते..।जिंदगी ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती जाती तो कई कुछ पीछे छूटते जाते..एक वक्त पे सब पीछे छूट जाते..।मगर उनमें से कुछ से पीछा नही छूट पाता..क्योंकि उनके बिना जिंदगी की अहमियत कंहा है..।।


आपने कभी सोचा है,सूरज न होता तो क्या होता..??

•जिंदगी में इसी तरह कुछ लोग होते है..जो जिंदगी में, हमेशा सूरज की तरह चुपचाप हमारे जिंदगी को सवार रहे होते है..।अगर सूरज न होता तो इस पृथ्वी पर जिंदगी न होता.. उसी तरह अगर वो लोग न होते तो हम न होते..मगर हमें, जिस तरह सूरज की अहमियत का पता नही चलता,उसी तरह उनकी अहमियत का पता नही चलता..।
जिस तरह कड़कती ठंड में जब सूरज नही होता है,तब उसके अहमियत का अहसास होता है..उसी तरह उनलोगों की अहमियत का तब अहसास होता है,जब वो या हम उनसे दूर हो जाते है,या दूर चले जाते है..या फिर बहुत दूर चले जाते है..।।.


          


वो पास थे,तो उनकी अहमियत का अहसास नहीं था..
वो अब दूर है,तो उनकी अहमियत का अहसास हो रहा है..।
वो फिर जब पास आएंगे तो फिर उनकी अहमियत का अहसास नहीं होगा..
वो फिर जब दूर चलें जाएंगे,तो फिर उनकी अहमियत का अहसास होगा..।

अगर वो फिर कंही बहुत दूरररर...चल गए..
तो हम फिर मुँह लटकाएँगे...और अश्रु बहाएंगे..
और उनकी अहमियत का,जिंदगी भर गुणगान करेंगे..।

वो पास थे तो उनकी अहमियत का अहसास नही था...

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

राष्ट्र,राष्ट्रपिता और गांधी..

क्या आप अल्बर्ट आइंस्टीन को जानते है..??
शायद जानते ही होंगे..
उन्होंने एकबार एक व्यक्ति के लिए कहा था -
" आने वाली पीढियां शायद ही विश्वास करेगी कि,ऐसा कोई हांड-मांस का व्यक्ति इस धरती पर चला था"।
पता है ये लाइने आइंस्टीन ने किसके बारे में लिखा था..कोई और नही वो "राष्ट्रपिता गांधी" थे..।।


आज सोशल मीडिया पे या फिर आपके घर के ही कोई सदस्य गांधी के बारे में अपमानजनक बातें करते हुए नजर आ जाएंगे..।
पता है क्यों..??
क्योंकि उन्होंने गांधी के बारे में खुद से कुछ पढ़ा ही नही है,अगर कुछ सुना है,या फिर देखा है, तो ऐसे लोगों को जो गांधी से नफरत करते है..क्योंकि जब हम किसी के कद की बराबरी नही कर पाते,तो उसके कद को गिराने लगते है..।

एक बात पता है आपको..गांधीजी को राष्ट्रपिता से सर्वप्रथम किसने संबोधित किया था...??
जरा सोचिए..शायद एक या दो नाम जेहन में आया होगा..अगर उसमें से कोई एक सही नाम हो तो अपना पीठ ठोकिये..।
वो व्यक्ति कोई और नही राष्ट्र का हीरो सुभाषचंद्र बोस थे..।।


आखिर सुभाष चंद्र बोस की क्या मजबूरी रही होगी कि उन्होंने रंगून(म्यांमार) के रेडियो स्टेशन से 1944 में उन्हें राष्ट्रपिता कहकर उनसे स्वतंत्रता की लड़ाई में उनसे आशीर्वाद मांगा..।
जबकि दोनों में वैचारिक मतभेद था एक अहिंसा के तो दूसरे सशत्र विद्रोह के समर्थक थे..।।
बोस की कोई मजबूरी रही होगी या फिर वो गांधी के व्यक्तित्व से अवगत थे..(एक बात और राज की बात बताता हूँ😊 बोस अकेले ऐसे व्यक्ति थे जो गांधी के आश्रम में जूते और चप्पल पहन कर अंदर जा सकते थे,और चाय सिर्फ उनके लिए ही आश्रम में बनती थी)

एक आधुनिक राष्ट्र का निर्माण कैसे होता है..??
दुनिया का कोई भी राष्ट्र का नाम मन मे सोचें..और गूगल पे सर्च करें..
उसकी भाषा,धर्म,नृजातीय समहू,और भौगोलिक अवस्थिति देखें..
आपको हरेक राष्ट्र में एक चीज कॉमन दिखेगी..
उस राष्ट्र की अधिकतम आबादी, कोई एक भाषा,या कोई एक धर्म,या कोई एक नृजातीय समूह की बहुलता अधिकतम दिखेगी,या फिर उसकी भौगोलिक स्थिति बिल्कुल अलग होगी..।

अब अपने भारत को देखें..
•यंहा कितने धर्म है..प्रमुखता से 8 धर्म है..
•यंहा कितने भाषा है..आठवीं अनुसूची में 22 भाषा शामिल है,जबकि उन सूची में शामिल कुछ भाषा से ज्यादा बोलने वाले अन्य भाषी लोग है..
•यंहा कितने नृजातीय समूह है..PVTG में 75 जनजाति शामिल है जबकि आधिकारिक रूप से इनका संख्या 705 है..।।
•भारत को भौगोलिक रूप में 8 भागों में विभाजित किया गया है..।



इतने विविध आधुनिक भारत को एक सूत्र में आखिर सर्वप्रथम किसने बांधने का प्रयास किया..??
आधुनिक भारत(1857 के बाद का समय) को अगर देखें तो उस समय ऐसा कोई व्यक्तित्व नहीं था जो पूरे भारत का नेतृत्व करता हो..
हरेक व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्र में कार्यरत थे..नरमपंथी कोट और टाई लगाकर अंग्रेज को चिट्ठी लिख रहे थे तो गरमपंथी शहरों में पत्र और पत्रिकाओं के माध्यम से या फिर कभी शहर के सड़को पे अंग्रेज का विरोध कर रहे थे..।
जबकि आजादी के समय तक शहरी आबादी 17% के आसपास ही था..क्या सिर्फ शहरी लोगों के सहायता से ही अंग्रेज से आजादी और राष्ट्र का निर्माण किया जा सकता था..।।

आखिर वो शख्स कौन था जिसने भारत की आजादी के लिए भारत के उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम के सुदूर क्षेत्र तक राष्ट्र के भावना को पहुँचाया..वो सख्स कोई और नही बल्कि गांधी जी थे..।

उनसे पहले कोई गाँव की सुध लेने वाला नही था,गांधी पहले सख्स थे जिन्होंने हर सख्स को अहसास कराया कि भारत अंग्रेज से आजादी पाकर एक स्वतंत्र राष्ट्र का निर्माण करेगा..।।
गांधी के आंदोलन में बच्चे,बूढ़े,जवान,महिलाये तक शामिल होते थे..
न धर्म,न जात,न पात सबकों भुलाकर सबका एक ही उद्देश्य उन्होंने बना दिया..अंग्रेजो से भारत की आजादी..।।

गांधी के विचारों से हम असहमत हो सकते है,मगर हम उन्हें नकार नही सकते..।।

ऐसा नही है कि गांधी नही होते तो भारत को आजादी नही मिलता..मगर क्या आजादी का ये स्वरूप होता..??

गांधी खुद में एक विश्वविद्यालय थे..जिसने नेहरू,पटेल,सुभाष से  लेकर भगत सिंह तक को आजादी के लिए तैयार किया,उन्होंने कई पौध तैयार किया जो कुछ बड़े होकर अलग रास्ता अख्तियार करके देश की आजादी के लिए लड़े..।।
आज भी उनके पौध अन्य रूप में कार्यरत है..भले ही वो स्वयं को उनसे नही जोड़ते मगर वो स्वयं जानते है कि उनकी जड़ें आज भी वंही से जुड़ी हुई है..।।

भारत के साथ और उसके बाद कई देश आजाद हुए..आज उनकी स्थिति देखें और भारत की स्थितियों को देखें..आखिर क्यों कई देश बिखर गए जबकि भारत दिन-प्रतिदिन मजबूत हो रहा है..??

क्योंकि अन्य देशों को आजादी सशत्र संघर्ष द्वारा मिला तो कइयों को अमेरिका के दबाब में,जिस कारण उस देश के हरेक नागरिक तक राष्ट्र की महत्वता नही पहुंच पाया,वो एक जुट नही हो पाए..
जबकि भारत के साथ इसके विपरीत हुआ,भारत के आजादी के लड़ाई में पूर्वोत्तर भारत से लेकर दक्षिण सुदूर भारत तक आजादी की गूंज थी..और हरेक जुबां पे गांधी का नाम था..गांधी से सब अवगत थे..क्योंकि गांधी ने सब कुछ देश के लिए न्यौछावर कर दिया था..।।

वो विश्व के इकलौते ऐसे नायक है जो आजादी की लड़ाई का नेतृत्व करने के बाद भी सक्ता से दूर रहें..।।

मगर आज भी कुछ लोगों को..गांधी विलेन दिखते है..
तो मैं उनसे पूछना चाहता हूं..उस समय आपके बाप,दादा,परदादा क्या कर रहें थे..??और आप स्वयं आज क्या कर रहें है,राष्ट्र की प्रगति में आपका क्या योगदान है..??
आप जिसे सुन कर गांधी का विरोध कर रहें है..उनके बाप-दादा उस समय क्या कर रहें थे..??

आप गांधी के विचार से असहमत होइए..इसमें कुछ बुरा नही है..।
मगर हरेक चीज के लिए गांधी को ही कसूरवार मत ठहराईये...।
क्योंकि गांधीजी और उनके अनुयायियों को अब आपके सवालों का जबाब देने का मतलब नही है..क्योंकि आपने खुद कभी इतिहास का किताब ही नही पलटा है..😊।

https://mnkjha.blogspot.com/2024/01/blog-post_30.html


दशहरा..

आज विजयदशमी है..जिसे हम दशहरा के नाम से भी जानते है..इसी दिन राम ने रावण को परास्त किया..इसलिए आज के दिन को विजयादशमी के रूप में मनाते है..।
वही दशहरा का मतलब दसवें दिन से है..।


चलिए एक छोटी कहानी सुनाता हूं..
ये कहानी नही बल्कि सच्ची घटना है,ये घटना लगभग आज से 900-1000 साल पहले की है..एक खुशहाल प्रदेश जंहा हरेक प्राणी खुश थे,क्योंकि उन्हें खुश रहना आता था..
उस क्षेत्र में खाने-पीने की दिक्कत नही थी, क्योंकि उस क्षेत्र के बीचों-बीच से नदी बहती थी जिससे वंहा की जमीन उपजाऊ थी,हरे-भरे मैदान के साथ जंगलों की लंबी शृंखला भी था..।
हरेक लोग मिलजुलकर रहते और साथ मे हरेक उत्सव मनाते..।
मगर कुछ वर्षों बाद मौसम बदलने लगा,नदी सुखने लगी,जंगल सिकुड़ने लगे,लोगों का व्यवहार बदलने लगा...।

कुछ लोगों ने मिलकर अपने क्षेत्र के प्रमुख अपने राजा से गुहार लगाई की,महाराज कुछ उपाय कीजिये नही तो लोग भूखे मर जायेंगे..
राजा भी इस समस्या से अवगत थे,मगर उन्हें उम्मीद थी कि समय सबकुछ सही कर देगा..मगर इतना समय सब के पास कंहा होता है,जो खुद पर आत्मविश्वास और भगवान पर विश्वास कर सकें..।
राजा ये समस्या लेके अपने गुरु के पास पहुंचे..गुरु ने उन्हें बताया ये कोई समस्या नही है..बल्कि ये तो हमारे ही कर्मों का फल है..हमने नदियों का दोहन किया इसलिय नदियां सूखने लगी,हमनें वनों का दोहन किया इएलिये वन सिकुड़ने लगे..
ये समस्या कंहा है..हम अगर इसका दोहन छोड़कर इसका सदुपयोग करना शुरू करें तो फिर से हमारी नदियां और वन पूर्णावस्था में आ जायेंगे..।।
गुरु ने राजा से कहा एक तरीका है...अगले तिथि को विजयदशमी है..उस रोज वन से सूखे लकड़ियों को एकत्र कर एक अहंकार रूपी मनुष्य का ढांचा तैयार करना है(ज्यों-ज्यों मनुष्य का अहंकार बढ़ता है,उसका स्वरुप बढ़ता जाता है,और उसका स्वरूप जब भीमकाय हो जाता है,तो वो खुद को ही नही संभाल पाता है।)..और उसको विजयदशमी के दिन दहन करना है..।
राजा खुशी हो गया, ये तो बड़ा आसान उपाय है..वो ज्यों ही अपने गुरु से जाने की अनुमति मांगा..त्योंही गुरु ने राजा से एक बात कही - राजन एक बात का ख्याल रखना,इस अहंकार रूपी रावण का दहन वही करें जो काम,क्रोध,लोभ, मोह,द्वेष,घृणा,छल,पक्षपात,अहंकार और व्यभिचार ना हो,अन्यथा इसके दहन का परिणाम नही मिलेगा..।

राजा ने खुशी पूर्वक गुरु से कहा - जी गुरुदेव इसका में ख्याल रखूंगा..।राजा खुशी-खुशी अपने राज्य को लौट आया..और पूरे क्षेत्र में ढिंढोरा पिटवा दिया कि समस्या का समाधान मिल गया..अगली दशमी तिथि को अहंकार रूपी पुतले का दहन होगा,और सबको इसमें भाग लेना है।मानो पूरे क्षेत्र में उत्साह की लहर दौड़ गई..मगर ये क्या राजा स्वयं चिंतित हो गए..।
आखिर क्यों..??
क्योंकि राजा को अपने गुरु की अंतिम बात बार-बार याद आ रहा था..राजा ने अपने सभासदों की बैठक बुलाई..इसमें सभी मंत्री,सैनिक और राज्य के सभी गणमान्य एवं विद्वान को बुलाया..।सब अपने-अपने जगह पर बैठे हुए राजा का सभा मे आने का इंतजार कर रहें थे..जबकि राजा पहले से ही सभा में मौजूद थे..मगर आज उनका सिंहासन ऊपर नही नीचे लगा था..वो स्वयं सबका दरबार मे दरबारी की तरह स्वागत कर रहें थे..मगर उन्हें कोई पहचान नही पाया..।क्योंकि राजा के सिंहासन पर बैठते ही कुछ आये न आये क्रोध और अहंकार रूपी अवगुण आ ही जाता है..मगर जब राजन सबका स्वागत कर रहें थे तब ये अवगुण भी दूर हो गया था,इसलिय अन्य लोग पहचान नही पाए..।।
जब सब दरबार मे आ गए तो राजन सभी सभासदों के बीच मे आये और उनसे,अपने गुरु की बातों का उल्लेख किया कि अहंकार रूपी पुतले का दहन वही कर सकता है- जिसमें काम,क्रोध,मोह,लोभ,द्वेष,घृणा,छल,पक्षपात,अहंकार, और व्यभिचार जैसे अवगुण ना हो..।

राजन ने अपने सभासदों से कहा मैं तो इनमें से कई अवगुणों से घिरा हुआ हूँ..इन अवगुणों में से तो कई अवगुण राजा के लिए अनिवार्य है..।क्योंकि स्वयं राम, तब रावण का वध कर पाए जब वो एक संन्यासी थे..।इसलिए मैं इन सभासदों से कहना चाहता हूं..अगर आपमें से ऐसा कोई है जो इन अवगुणों से परे है तो कृपा कर आगे आये और पुतले का दहन करने का नेतृत्व करें..।।

मगर उस सभासदों में से कोई आगे नही बढ़ा.. क्योंकि उन 10 अवगुणों में से कोई न कोई अवगुण हरेक में था..।
जब राजन को निराशा हाथ लगा तब उसने पूरे राज्य के नागरिकों से आवाहन किया कि, अगर कोई ऐसा व्यक्ति है,जो इन अवगुणों से परे है..तो कृपा कर पुतले का दहन करने के लिए आगे आये..ये खबर सुनकर सब उत्साहित हुए मगर ये उत्साह बुलबुले के समान था..क्योंकि हरेक इंसान में कोई न कोई अवगुण था ही..किसी को पड़ोसी से द्वेष, तो किसी को अपने धन पे अहंकार तो कोई लोभ,मोह से ग्रस्त इस तरह हरेक इंसान में कोई न कोई अवगुण था ही..।

पुतले दहन का सिर्फ एक दिन ही बच गया सारी तैयारी जोर-शोर से थी सूखे लकड़ियों के गट्ठर से विशालकाय पुतला बनके तैयार हो गया था..मगर इसको दहन करने वाला कोई नही था..क्योंकि सब अवगुणों से घिरे थे..जब शाम ढलने को आया और पूरे राज्य से कोई पुतला दहन करने को नही आया, तो राजा अपने अस्तबल में गया और अपने घोड़े पर सवार होकर अपने गुरु के आश्रम की और चल दिया। कुछ घण्टों के बाद वो गुरु के आश्रम पहुंचा..।मगर इस बार वो राजा नही बल्कि एक याचक की भांति गुरु के पास पहुंचा..
गुरु के आश्रम के बाहर कुछ मिनटों तक खड़ा ही रहा क्योंकि उसे हिम्मत नही हो रहा था कि वो गुरु से बोले कि मैं और मेरे राज्य के हरेक नागरिक इन अवगुणों से घिरे हुए है..।कुछ मिनेट खड़े रहने के बाद एक व्यक्ति दिखा उसे राजन ने आवाज दिया और उनसे पूछा क्या गुरु जगे हुए है..
उसने कहा नही,अभी गुरुजी सोये हुए है..।राजन उसी कुटिया के बाहर गुरु की प्रतीक्षा करने लगा..।

चारों बगल घुप अंधेरा सिर्फ कभी-कभी हवा बहने पर पेड़ो के ओट से चांद की रोशनी उस कुटिया को जगमगा देती..तो कभी-कभी जुगनु पूरे कुटिया को रोशनी से नहला देता..।
राजा कभी चांद की रोशनी, तो कभी जुगनू की रोशनी देखकर हतप्रभ रह जाता और सोचता, मैंने कितना व्यर्थ खर्च किया अपने राजमहल को रोशनी से नहलाने के लिए..।
तो कभी हवा के लहरों द्वारा लाया गया पारिजात का सुगंध इन्हें उदेवलित कर देता.. और सोचता, इस तरह की सुंगंध मेरे उद्यान के फूलों में क्यों नही..शायद इसलिय की, इन पुष्पों को प्रकृति ने सींचा है।कभी-कभी दूर से आनेवाली झींगुर की आवाज में इतनी मधुरता महसूस होता कि, इसके सामने दरबार के हरेक संगीतज्ञ फीका साबित हो जाए..।
इन रोशनी,सुगंध और संगीत में राजन इस तरह मशगूल हो गया कि उसे अहसास ही नही हुआ कि रात्रि का पहर कब बीत गया, और ब्रह्म मुहूर्त आ गया..।
कुटिया के अंदर से आने वाला मंत्रो का उच्चारण जब इनके कानों में पड़ा तब सहसा होश आया कि मैं क्यों आया था..।
वो गुरु के बाहर आने का इंतजार करने लगा..ज्योहीं गुरु कुटिया से बाहर आये, तो उनका नजर राजा पर पड़ा..गुरु ने कहा राजन तुम यंहा क्या कर रहे हो..??
राजा गुरु के चरणों मे गिर गया और रोते हुए गुरु से बोला- गुरुदेव हम पतित है.हममें अवगुणों का भंडार है..न ही हम और न ही हमारे राज्य में ऐसा कोई है,जो इन अवगुणों से घिरा ना हो..इसलिए गुरुदेव उपाय बताए..आखिर कैसे उस पुतला का दहन किया जाय जिस से राज्य की खुशियां लौट आये..।।

गुरु मुस्कुराए..और बोले हे राजन- काम,क्रोध,मोह,लोभ,द्वेष, घृणा,छल,पक्षपात,अहंकार और व्यभिचार जीवन का हिस्सा है, इससे अलग होना दूभर है,जैसे हम अपने शरीर से अपने चमड़ी को अलग नही कर सकते वैसे ही इन्हें भी खुद से दूर नही कर सकते..।जब हम इन अवगुणों का सही इस्तेमाल करते है तो ये हमारे लिए ही नही, बल्कि कइयों के लिए लाभदायक है..मगर जब हम इसका इस्तेमाल सिर्फ अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए करने लगते है तो ये सिर्फ स्वयं के लिए ही नही बल्कि कईयों के लिए अहितकर होता है..।।

हे राजन में तुम्हें एक-एक करके इन अवगुणों के बारे में बताता हूँ..जिनके बिना जीवन का कोई महत्व नही है..

काम- हमें प्रकृति में जो भी सजीव चीज दिख रहा है,उसके उत्पति का कारण काम ही है,मगर जब इस काम को क्रीड़ा बना लेते है तो हमारा पतन शुरू हो जाता है..

क्रोध:- निर्दयी दुश्मनों का सामना करने के लिए क्रोध जरूरी है,मगर जब हम अपने अवगुणों को छुपाने,और कमजोर लोगों पर क्रोध करते है तो ये हमें औरो के नजर में गिराता है।

मोह:- ये पूरा परिवार और समाज कंही-न-कंही मोह के बंधन से ही बंधा हुआ है..मगर जब मोह एक के प्रति ज्यादा और एक के प्रति कम रहता है..तब ये मनुष्य के लिए अवगुण बन जाता है।

लोभ:- अपने क्षुधा और जरूरत की पूर्ति के लिए लोभ जरूरी है,मगर जब इस लोभ के कारण जब हम दूसरों की हकमारी करने लगते है तो ये अवगुण बन जाता है..।।

द्वेष:- हे राजन द्वेष अपनी असफलता से करना जरूरी है न कि दूसरों की सफलता से..।

घृणा:- घृणा हमेशा पाप से करना चाहिए पापी से नही..।

छल:- राजन समाज हित,धर्म हित के लिए छल जरूरी है,मगर अपने स्वार्थ के लिए छल करना अपराध है।

पक्षपात:- राजन पिछड़ों,कमजोर और असहाय लोगों की सहायता करते वक़्त अगर पक्षपात का आरोप अगर लगे भी तो अपराध नही है..।

अहंकार:- अहंकार जब स्वयं को बड़ा और दूसरे को छोटा अहसास कराए तो ये अहितकर है..।

व्यभिचार:- हे राजन व्यभिचार उस अवस्था में सही है,जब कोई निःसंतान दंपति संतान प्राप्ती के लिए आपस में मिलते है तब उचित है,अन्यथा अनुचित।(वैसे वर्तमान समय में विज्ञान बहुत प्रगति कर चुका है।)

हे राजन ये इतना सरल नही है..क्योंकि मनुष्य मन बहुत चंचल है..।मनुष्य की उत्पत्ति ही काम से हुआ है,और जब काम के समय बाधा उत्पन्न होता है तो क्रोध जागृत होता है,और क्रोधाग्नि शांत होने पर काम के प्रति मोह और बढ़ता है..।और इसी मोह के बढ़ने के कारण छल,द्वेष,घृणा और पक्षपात की भावना जागृत होता है..।जब काम,क्रोध,मोह, लोभ की अभिपूर्ती होने लगता है,तो अहंकार बढ़ने लगता है,और ज्योहीं अहंकार का स्वरूप बहुत बड़ा हो जाता है, त्योंही सारे अवगुण एक साथ एकत्रित होकर अहंकार का श्रृंगार बन जाता है..।

हे राजन इन दिनों तुम सारे अवगुणों से ऊपर उठ गए हो..
इसलिए तुम अहंकार रूपी पुतले को दहन कर अपने राज्य को खुशहाल बनाओ..।
गुरु की बातों को सुनकर राजा के चहेरे पे कोई भाव व्याप्त नही हुआ,उसने गुरु के चरण स्पर्श करके उनसे विदा मांगा..।

पूरे राज्य में आज एक अलग ही उत्साह था,मगर राज भवन में सन्नाटा क्योंकि राजा का कोई पता नही चल रहा था,सारे गुप्तचर,मंत्री,दरबारी ने चप्पा-चप्पा छानमारा मगर राजा का कोई पता नहीं..इधर बहुत बड़े मैदान में लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी,मगर उस भीमकाय पुतले के सामने सब बौने दिख रहे थे,मानो ताड़ के पेड़ के नीचे मनुष्य खड़ा हो..पुतला दहन करने के लिए सारी सामग्री तैयार हो गया था,सिर्फ इंतजार था तो पुतले का दहन करने वाले का..
इधर राजमहल की सुगबुगाहट लोगों के भीड़ से,भरे मैदान तक भी आने लगा था,की राजा कंही गए हुए है..इस तरह से कब भीड़ का उल्लास इस आश्चर्य में बदल गया कि आखिर राजा कंहा गए..।
राजमहल में अफरा-तफरी मची ही हुई थी कि राजा का घोड़ा राजमहल की और आता हुआ दिखाई दिया..फिर से राजमहल में रौनक पैदा हो गई..मगर ये क्या..ज्यों-ज्यों घोड़ा नजदीक आ रहा था,त्यों-त्यों लोगों के चेहरे पे उदासी छाती जा रही थी..क्योंकि घोड़ा के साथ राजा नही था..मंत्री और राजा के घुड़सवार दौड़ कर घोड़े के पास पहुंचा..घुड़सवार ने जब घोड़े पर राजा का वस्त्र और आभूषण देखा तो सिसकियां भड़ने लगा,मगर ये सिसकियां जैसे ही दहाड़ में बदली पूरे राजमहल में मानो सन्नाटा छा गए,और ये सन्नाटा बादल की भांति उस भीड़ तक पहुंच गया जंहा अबतक कोलाहल था,ये भीड़ भी बिल्कुल शांत और शोकाकुल हो गई..मानो अब कुछ बचा ही नही..राजमहल और उस राज्य से एकत्रित सभी लोग मृतप्राय हो गए..उनके सारे गुण-अवगुण सब गायब हो गए..।।

इधर राजमहल में मंत्री जब घोड़े का निरक्षण कर रहें थे तो उन्हें अहसास हुआ कि राजा पूर्णतया सुरक्षित है,इसका ऐलान करते ही मानो मायूसी के बादल छंटने लगे..।घोड़े का निरक्षण करते समय मंत्री को एक खत मिला,जिसमें लिखा था पुतले का निर्धारित समय पर दहन होगा,और सबको वंहा समय से उपस्थित होना है,और इस राज्य का सेवक पूर्णतया सुरक्षित है..।।
ये खबर राजमहल से होते हुए उस मैदान तक पहुंच गया जंहा भीड़ एकत्रित थी,उस भीड़ में एक नया उत्साह और खुशी की लहर दौड़ी जिससे उस भीमकाय अहंकार रूपी पुतले को अचंभित कर दिया हो..वो भी सोचने को विवश हो गया आखिर हुआ क्या..।
सारे लोग उस मैदान में एकत्रित हो गए..और उस व्यक्ति और अपने राजा का वाट जोहने लगे जो इस पुतले का दहन करें..
सूर्य जब रजत से सुवर्ण रूप में बदलने लगा तो दूर से कोई आता दिखाई दिया,लोगों के चेहरे पे मुस्कान छाने लगी..सूर्य  मानो दूर से आ रहे मनुष्य का ओरा बन चुका हो..एक दिव्य और ओज से भरा हुआ व्यक्ति धीरे-धीरे भीड़ की ज्यों-ज्यो आ रहा था,त्यों-त्यों न जाने क्यों लोगों में श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो रहा था..।
जब वो व्यक्ति भीड़ के करीब पहुंचा तो सबको श्रद्धा से नमन किया..भीड़ ने भी उसका स्वागत किया..मगर भीड़ में एक दुविधा उत्पन्न हो गई,आखिर ये है कौन,कुछ लोग बोलते इसे कंही देखा है,तो कुछ लोग बोलते इसका चेहरा राजा से मिलता जुलता है..मगर फिर सवाल वंही का वंही आखिर ये है कौन..??
वो व्यक्ति भीड़ में हो रहे फुसफुसाहट को अच्छी तरह सुन पा रहा था,वो भीड़ को अपनी और आकर्षित करने के लिए जोर से कहा-मेरे मित्रों..मेरे सखा,मेरे माताएं,मेरे बहनों और भाइयों..मैं आपका सेवक हूँ..जिसे कल तक आप राजा मान रहे थे..हां में आपका ही सेवक हूँ..।
कलतक हममें से कोई भी इस अहंकार रूपी पुतले को दहन करने के योग्य नही था,मगर आज हमसब इस पुतले को दहन करने के योग्य है,क्योंकि हममें से कोई भी अभी, किसी तरह के अवगुणों से घिरा हुआ नही है,अगर कोई अभी भी घिरा हुआ है तो इस पुतले को दहन करते वक़्त अपने अवगुणों का भी दहन कर दे..आइए हम सब मिलकर इस पुतले को दहन करें..।
सबों ने उत्साहपूर्वक उस अहंकाररूपी पुतले को जलाना शुरू किया..।।



आग की लपटें क्षण भर में ऊपर उठने लगी..उससे निकलने वाला पूरा धुंआ आसमां में भर गया..लोगो के चेहरे पे उस अग्नि के समान ही एक उल्लास और तेज था..ज्यों-ज्यों लो कम होती गई लोग अपने घर को जाते गए..आग की लपटें अब शांत हो गई थी,मगर धुंआ अब भी ऊपर उठ ही रहा था,उस धुंआ ने उस पूरे क्षेत्र को ढक दिया था..कब सुबह हुई किसी को पता ही नही चला,सूर्य की रोशनी उस धुंए को भेद नही पा रही थी..ये क्या,ये धुंआ आसमां में और फैलने लगा देखते ही देखते पूरा आसमां काला हो गया..बिजलियां कड़कने लगी और छोटी-छोटी बारिश की बूंद गिरने लगी, लोगों में खुशियों और उत्साह का कोलाहल मचने लगा,उस कोलाहल को सुनकर मानो बादल घबरा गया हो,और जोर-जोर से बरसने लगा..।
इस बारिश में उस दस अवगुणी अहंकार रूपी पुतले की राख बह कर नदियों के साथ बहकर सागर के गर्त में चला गया..।।

और लोगों को पता भी नही चला..।
फिर से चारों और हरियाली छा गई..राजा अब सेवक बन गया और प्रजा मित्र बन गया..।
और इस तरह ये छोटी कहानी समाप्त होती है..।।


इस दशहरा अपने अवगुणों को जलाए..न कि खड़े होकर रावण को जलते हुए देखे..।।
हमारे अवगुणों से अवगत कराने के लिए एक मित्र की जरूरत होती है..हमारा सबसे बड़ा मित्र हमारा मन है..।



बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ(RSS)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS के बारे में भले ही आप कुछ नही जानते हो,मगर आपने ये नाम जरूर सुना होगा..।
इस विजयदशमी को RSS अपना 100 साल पूरा कर लेगा..

हममें से अक्सरहाँ लोग RSS मतलब हिंदूवादी संगठन मान लेते है..या फिर इसे BJP से जोड़ देते है..जो कुछ हद तक सही भी है..मगर RSS का प्रमुख कार्य राष्ट्रसेवा और समाजसेवा है..जब भी राष्ट्र पर आंच आता है तो ये खुलकर बोलता और राष्ट्रहित में कार्य करता है..
देशहित में सैन्य संगठन के बाद सर्वाधिक बलिदान इस संगठन ने दिया है..।
भले ही इस संगठन पर ये आरोप लगाया जाता है कि इसने 1942 के "भारत छोड़ो आंदोलन"का विरोध किया था जो सही है..मगर उनकी उस विचारधारा को नही बताया जाता कि इन्होंने क्यों विरोध किया था..(क्योंकि जब जिन्ना मुस्लिम राष्ट्र के लिए अड़ गए थे,उस समय RSS भी हिंदू राष्ट्र की मांग कर रहा था,और कांग्रेस का मत था कि आजादी के बाद इसके बारे में निर्णय किया जाएगा)मगर इसके अलावा RSS ने 1948,1962,1965,1971,1999 के युद्ध मे अभूतपूर्व योगदान दिया,साथ ही हरेक प्राकृतिक आपदा में सेना के साथ कंधे से कंधे मिला कर अपना योगदान दिया..।।

क्या आपको पता है RSS का गठन कैसे और क्यों हुआ..??
चलिए आपको 1923 ईसवी में ले चलते है..नागपुर में एक शुक्रवारी तालाब के पास एक "गणेश मंडली/मंडल" था इसके करीब ही एक मस्जिद था,मुसलमानों ने मस्जिद के सामने से हिन्दू धार्मिक जुलूस निकालने पर आपत्ति जताया..नागपुर के जिलाधिकारी ने हिंदुओं को झांकी निकालने पर प्रतिबंध लगा दिया..।
हिन्दू भी अड़ गए उन्होंने कहा जब तक अनुमति नही मिलेगा गणेश विसर्जन नही करेंगे..जिलाधिकारी एक कदम और आगे बढ़ गए और उन्होंने मस्जिद के सामने से दिंडी(भजन मंडली)को भी जाने से प्रतिबंधित कर दिया..जिससे दंगे भड़क गए..और हिंसा हुई..।।
इस घटना को देखते हुए एक कांग्रेसी कार्यकर्ता को अपने बड़े नेताओं से बड़ी उम्मीद थी कि वो हिंदुओं की आवाज उठाएंगे मगर उन्हें निराशा हाथ लगी..
उस कार्यकर्ता ने नागपुर के जिलाधिकारी के खिलाफ "दिंडी सत्याग्रह" का शुरुआत किया और देखते ही देखते जय विट्ठल का नारा लगाते हुए 20 हजार से ज्यादा लोग एकत्रित हो गए..।
और यंही से RSS के गठन की उधेड़बुन चालू हो गई..
और 27 सितंबर 1925 को RSS(राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) की स्थापना विजयदशमी के दिन हुई..।।

क्या आपको पता है..वो कांग्रेसी कार्यकर्ता कौन था..??
दिन था 22 जून 1897 रानी विक्टोरिया की ताजपोशी का 60वा सालगिरह पूरे भारत के साथ नागपुर में भी मनाया जा रहा था..एक 8 साल का बच्चा स्कूल से सामारोह छोड़कर घर आ गया,उसके भाई ने पूछा इतना गुस्सा क्यों हो,तुम्हें मिठाई नही मिला क्या..उसने कहा मिला था,मैंने फेंक दिया..ऐसे लोगों के समारोह में मुझे भाग नही लेना..
13 साल की उम्र में प्लेग से इनके माता-पिता की मृत्यु हो गई...तब इनके बडे भाई महादेव ने इनकी परवरिश की..
15 साल की उम्र में इनकी दोस्ती B.S मुंजे से हुई, स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े मुंजे ने इन्हें अपने घर पर बम बनाने की ट्रेनिंग दी..।
1910 में डॉक्टरी का पढ़ाई करने के लिए कोलकाता गए,5 साल बाद नागपुर लौटे तो नॉकरी के बजाय उन्होंने युवाओं के लिए व्यायामशाला खोला,यंहा पे व्यायाम के अलावा युवाओ को देश-विदेश के घटनाओं पे चर्चा करते और करवाते..।
1919 में कांग्रेस से जुड़ गए..
1920 में हिन्दूवादी नेता L.V परांजपे के "भारत स्वयंसेवक मंडल" से जुड़ गए,इस संगठन का मुख्य कार्य कांग्रेस के अधिवेशनों के लिए ज्यादा से ज्यादा युवाओ को एकत्रित करना था..
1921 में एक भाषण के कारण इनके ऊपर देशद्रोह का मुकदमा चला और एक साल तक जेल में रहे..जेल में ही इन्हें V.D सावरकर की किताब "हिंदुत्व:हिन्दू कौन है" पढ़ने को मिला, तब से ही इनके अंदर हिंदुओ के लिए एक संघ बनाने का विचार आया..
क्योंकि खिलाफत आंदोलन और मालाबार हिंसा ने कांग्रेस के प्रति इनके नजरिये को बदल दिया..।
1923 का नागपुर हिंसा ने इनके विचार को और प्रबल किया,क्योंकि कांग्रेस ने इस हिंसा के खिलाफ आवाज तक नही उठाई..और इनका कांग्रेस से मोहभंग हो गया..
और ये हिन्दू महासभा(1915) से जुड़ गए..।मगर कुछ समय बाद इन्होंने हिन्दू महासभा को छोड़ दिया क्योंकि इन्हें अहसास हुआ कि हिंदू महासभा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण हिन्दू हितों से समझौता कर सकता है..।
और उन्होंने 27 सितंबर 1925 को अपने घर पर 4 लोगों को बुलाया और कहा कि- आज से हम संघ की शुरूआत करते है..।।(गणेश सावरकर,B.S मुंजे,L.V परांजपे, B.B थोलकर)

17 अप्रैल 1926 को इस संगठन का नामकरण हुआ - "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ" यानी "RSS"..।

वो व्यक्ति कोई और नही बल्कि "केशव बलिराम हेडगेवारजी" थे..।

 20 जून 1940 को बीमार अवस्था मे एक पर्ची उन्होंने माधव सदाशिव गोवलकर को पकड़ाई.. और अगले सुबह उनकी मृत्यु हो गई..
13 दिन बाद ये पर्ची खोली गई..जिसमे लिखा था "ये संगठन चलाने की पूरी जिम्मेदारी तुम्हारी है"..
इससे तरह RSS के अगले प्रमुख- माधव सदाशिव गोवलकर बने..


 " RSS अमर है,चाहे इसके संस्थापक की मृत्यु हो गई हो,लेकिन ये संघ आगे बढ़ता रहेगा"

आज RSS के 100 वर्ष पूरे हो गए है..मगर आज भी संघ पहले से ज्यादा मजबूत और विस्तारित हुआ है..ये चुपचाप अपना काम कर रहा है..हां कभी-कभी इस संगठन के ऊपर राजनीति होती है,मगर ये स्वयं को राजनीति से दूर रखता है.।
इनके लिए हरेक भारतीय हिन्दू है..चाहे वो किसी भी धर्म और मजहब से हो..।इनके लिए राष्ट्रहित ही सर्वोपरि है..




कुछ गलतियां