शनिवार, 29 नवंबर 2025

कुछ गलतियां

जिंदगी में कुछ गलतियां होनी चाहिए,
जिसका मलाल ताउम्र होना चाहिए..
अगर कोई गलतियां न हो..
और उसका मुस्कान भरा अफसोस न हो..
तो फिर ये भी कोई जिंदगी है..
इसलिए..
जिंदगी में कुछ गलतियां होना चाहिए..।
जब जिंदगी में अकेलापन सताये..
तो यही गलतियां तो साथ रह जाता है..
और एक नए होंसले के साथ आगे बढ़ने का मुकम्मल राज देता है..

इसलिए जिंदगी में कुछ गलतियां होनी चाहिए..
जिसका मलाल ताउम्र रहें...।।


शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

जिंदगी से कोई शिकायत नही है..

जिंदगी से कोई शिकायत नही है..,
खुद से ही शिकायत है..।
जिंदगी ने तो वो सबकुछ दिया..
जिस-जिस के में लायक था..
मगर मैं क्या...???
उस लायक बन पाया..
जिस लायक जिंदगी ने मुझसे अपेक्षा की थी..
तो जबाब है नही..।

जिंदगी से कोई शिकायत नही है..
खुद से ही शिकायत है..।
मैं ही काबिल न बन पाया..
अपने कमजोरियों से भागता रहा..
और कमजोरियों के बोझ तले दबता गया..।

जिंदगी से कोई शिकायत नही है...
खुद से ही शिकायत है..।
जिंदगी तो अब भी..
हाथ फैलाये हुए है,
मुझे आलीगं करने के लिए..।
मैं ही बेबकूफ हूँ..
इन बेड़ियों को अपना साथी मानकर इससे लिपटा हुआ हूँ,
जबकि ये बेड़ियां सिर्फ जख्म दे रही है..।

जिंदगी से कोई शिकायत नही है..


रविवार, 23 नवंबर 2025

मैं कंहा था,मैं कंहा हूँ

मैं कंहा था,मैं कंहा हूँ..
कभी दुनिया बदलने की बातें किया करता था,
अब खुद को बदलने की जुस्तजू में लगा रहता हूँ..।
मैं कंहा था,मैं कंहा हूँ..।
कभी दूसरों के सपनों को पूरे करने का सपना देखा करता था,
आज खुद के भी सपने पूरे नही कर पा रहा हूं..
मैं कंहा था,मैं कंहा हूँ..
कभी अपनों को मुझमें उम्मीद दिखती थी,..
आज सबों ने मुझसे उम्मीद छोड़ दी है..।
मैं कंहा था,मैं कंहा हूँ..
सबकुछ बदल गया है..
मगर बदला नही है,तो मेरे आदतों और मेरे असफलताओं का सिलसिला..
मैं कंहा था,मैं कंहा हूँ..
न जाने अब भी,
मैं खुद से उम्मीद किये बैठा हूँ..
मैं यू ही तो नही आया हूँ.. 
मगर क्यों आया हूँ..??
इसके जबाबों का इंतजार किये बैठा हूँ..
मैं यू ही तो नही आया हूँ..।
मैं कंहा था,मैं कंहा हूँ..
कभी दुनिया बदलने की बातें किया करता था,
अब खुद को बदलने की जुस्तजू में लगा रहता हूँ..
मैं यू ही तो नही आया हूँ..।।



कभी पूछा है खुद से..

कभी पूछा है खुद से..
की आखिर तुम कर क्या रहे हो..
कभी पूछा है खुद से..
की आखिर तुम जा किधर रहे हो..
कभी पूछा है खुद से..
की आखिर तुम चाहते क्या हो..
कभी पूछा है खुद से..
आखिर तुम्हारी मंजिल कंहा है...
कभी पूछा है खुद से...

क्यों पूछते डर लगता है..??
कंही सच्चाई से सामना न हो जाये..
क्या करना है,पता नही है,
किधर जाना है,पता नही है,
क्या चाहते है,पता नही है,
मंजिल कंहा है,पता नही है..।
इसीलिए पूछते डर लगता है..।

आखिर इस डर से भला कबतक भागोगे..
कभी तो सामना करना पड़ेगा..
हिम्मत जुटाओ और अपने सवालों का सामना करो..
क्योंकि सवाल में ही हल छुपा हुआ है..।
आखिर कब तक भागते रहोगे,
आखिर कब तक टालते रहोगे..।

जो हो तुम उसे स्वीकार कर..
स्वयं के वास्तविकता को अंगीकार कर..
फिर से खुद को तराशकर..
नव-निर्मित मानव तैयार कर..
अपने असफलताओं के बेड़ियों को तोड़कर..
सफलता के नए सोपान रचकर..
अपने आप को स्वीकार कर..
इस जीवन का उद्धार कर..।।

शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

ये उम्मीद ही तो है..

जब किसी को तुमसे उम्मीद न हो..
तो तब तुम खुद से उम्मीद रखो,
कोई रखें या न रखें तुम जरूर खुद से उम्मीद रखों..
ये उम्मीद ही तो है...
जो जीने का हौंसला देता है,
ये उम्मीद ही तो है..
जो असंभव को संभव बनाता है..
ये उम्मीद ही तो है..
जो नर को नारायण बनाता है..
ये उम्मीद ही तो है,
जो दानव को देवता बनाता है..
ये उम्मीद ही तो है..
जो नही है,उस से भी साक्षात्कार कराता है..
ये उम्मीद ही तो है..
जो कल का सूरज दिखाता है..
ये उम्मीद ही तो है..

बिना उम्मीद के यंहा, कंहा कुछ है..
उम्मीद की ज्योत तबतक जलाये रखो..
जबतक सांस और धड़कन चल रही है..
क्या पता कब उम्मीद की किरण आये..
और जिंदगी की दिशा बदल दे..।
ये उम्मीद ही तो है.


गुरुवार, 20 नवंबर 2025

मैं हारा नही हूँ..

मैं हारा नही हूँ, ना ही थका हूँ,
मैं तो सिर्फ राह से भटक गया हूँ,
मुझे अब भी उम्मीद है..
कभी तो खुद को सही राह पर लाऊंगा..
और अपनी मंजिल को पा जाऊंगा..
मैं हारा नही हूँ, ना ही थका हूँ...।



शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

चिल्ड्रेन्स डे....

क्या आपको पता है..चिल्ड्रेन्स डे क्यों मनाते है..??
आपको पता ही होगा..।

इस बाल दिवस पर हम ग्वाल-बाल से क्या सीख सकते है..??

1. वर्तमान में जिये...
   पता है आपको.. बच्चों का खुशियों का राज क्या है..??
वो हमेशा वर्तमान में जीते है,खेलते वक़्त खेल पर ध्यान,खाते वक़्त खाने पर ध्यान,सोते वक्त सोने पर ध्यान..।
इसलिए खुश रहना है तो इन बच्चों की तरह वर्तमान में जिये..।
मगर इस आधुनिक युग मे हम उनकी भी दिनचर्या खराब कर रहें है..।

2.बच्चों की तरह हँसिये..
 आपको याद है,आपने आखरी बार दिल खोलकर कब हँसा था..अगर नही हंसे थे तो बच्चों के साथ समय बिताइए दिल खोलकर हंसने का मौका मिलेगा..।
इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में हम हँसना भी भूल गए है..।

3.बच्चों की तरह दौड़िये..
आपको याद है..आप आखरी बार कब दौड़े थे..
अगर स्वस्थ रहना है,तो बच्चों की तरह दौड़िये..।

4.बच्चों की तरह खाइये..
बच्चें तब ही खाते है,जब उन्हें भूख लगता है और उतना ही खाता है,जितने की भूख रहती है..
और हम आप क्या करते है..पता ही है,पसंद की चीज मिले तो भूख न होने पर भी खा लेते है..इसीलिए तो सीने की जगह पेट आगे निकल जाता है..😊

5.धूप में समय बिताइए..
 आपको अपना बचपन याद है,कितनी दफा माँ-बाप से बात सुनने को मिला होगा धूप में नही खेलना है..।और आज हम अपने बच्चों को भी कह रहे है,धूप में नही खेलना है..
खुद विटामिन-D लेने के लिए बीच पे जाते है..😊

अगर स्वस्थ रहना है,तो इन प्यारे बच्चों के साथ समय बिताइए..
आप मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से स्वस्थ रहेंगे..।।


इस भागदौड़ भरी जिंदगी में,
इन बच्चों को भी प्यार चाहिए..
इस सोशल मीडिया के दौड़ में, 
इन्हें भी लाइक और सब्सक्राइब चाहिए..।

हम जितना ख्याल अपने गेजेट का रखता है
उतने ही ख्याल की उम्मीद ये हमसे रखते है..।
ध्यान रखिएगा इनका..
कंही गलती से गलती न हो जाये इनके परवरिश में,
नही तो अनफॉलो करने लगेंगे ये.. 
क्योंकि सोशल मीडिया के युग के बच्चे है ये..।

इस भागदौड़ भरी जिंदगी में,
इन बच्चों को भी प्यार चाहिए..
इस सोशल मीडिया के दौड़ में, 
इन्हें भी लाइक और सब्सक्राइब चाहिए..।


गुरुवार, 13 नवंबर 2025

अच्छे हो...

किसी ने पूछा अच्छे हो...??
तो सोचा..क्या जबाब दू..
क्योंकि ऑप्शन(विकल्प) ही क्या है..
अच्छे होने के सिवा..🙂



अगर कहु बुरा हूं...।
तो लंबी कहानी सुननी पड़ेगी..
मगर आज किसके पास समय है..कहानी सुनने की..
क्योंकि जो लोग 30सेकेंड का शार्ट/रील पूरा नही देख पाते,
वो कंहा से हमारी कहानी सुन पाएंगे..।

इसीलिए कोई पूछे..
अच्छे हो..
तो जबाब देना..
हां बिल्कुल अच्छा हूँ..।
क्योंकि इसके बाद वो कुछ नही पूछेंगे..।
अगर तुम मुस्कुराते हुए जबाब दिए..
तो वो स्वयं से पूछेंगे,ये मुस्कुरा क्यों रहा है..।
अगर हँस के जबाब दिए..
तो सोचो...वो क्या सोचेंगे..।
ये इतना खुश क्यों है..।।

सच कहूं तो आपको किसी की परवाह नही है..
सिर्फ कुछ लोगों को छोड़कर..।
पता है क्यों..??
क्योंकि आपको..
खुद की ही परवाह नही है..।

अगर किसी ने पूछा...
अच्छे हो..
तो मुस्कुरा के जबाब देना..
हां बिल्कुल अच्छा हूँ..
क्योंकि ऑप्शन ही क्या है..।।

बुधवार, 12 नवंबर 2025

लोग कहते है..

लोग कहते है कि मैं अच्छा हूँ..
मैं जब खुद से पूछता हूँ..
क्या मैं सच मे अच्छा हूँ..??
तो अंदर से एक जबाब आता है..
हां तुम अच्छे हो..
मगर अपने लिए नही,दूसरों के लिए..।

क्या सच में, मैं अच्छा हूँ..??
शायद नहीं..
दूसरों के नजर में अच्छा होना आसान है,
खुद के नजर में बुरा होना,सबसे बुरा है..।

दूसरों का क्या है..
जब तक स्वार्थ सधता रहेगा तबतक अच्छे बने रहेंगे,
जब तक मन,कर्म,वचन से ठेस न पहुँचाओ तबतक अच्छे बने रहोगे..।

मगर खुद के बारे में भी तो सोचो...
स्वयं को नुकसान पहुंचा कर कबतक खुद के नजरों में बुरा बने रहोगे..

इतिहास उसी का गुणगान करता है,
जो स्वयं के बारे में सोचता है,जो स्वयं के नजरों में अच्छे है..
चाहे वो राम हो,कृष्ण हो,या बुद्ध हो,या फिर वर्तमान में ही कोई सफल व्यक्तित्व हो..।

सफलता का एक ही ध्येय है..
खुद के प्रति स्वार्थी बने..।।
कड़वा है,मगर कटु सत्य है..।।

इसीलिये तो सफल लोगों की तादाद कम है,
नहीं...नही...खुशनुमा लोगों की तादाद कम है..।।






अनुभूति..उस प्रकाश पुंज की...

पिछले कुछ दिनों से में अक्सरहाँ स्वामी अड़गड़ानंद जी का "यथार्थ गीता" सुन रहा हूँ...सुनने में अच्छा लग रहा है,क्योंकि जिन्होंने आवाज दी ही उनके आवाज में मानो एक जादुई माधुर्यता हो..इसलिय सुनते वक़्त बोर नही होता,बल्कि कभी-कभी तो ये लोरियां की तरह लगता है,न जाने कब सुनते-सुनते आंख लग जाता है,पता ही नही चलता..।।

आज दोपहर में सोया हुआ था..तो मेरे साथ भी वही हुआ जो अर्जुन के साथ हुआ था-
 "द्रष्टांकरालानि च ते मुखानि दृष्टवेव कालानलसन्निभानि।
  दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ।।11.25

मगर मैं अर्जुन कहा,मुझमें उतनी शक्ति कंहा,की मैं उनके तेज का सामना कर सकता..।
कैसे वर्णन करू मैं..उस छवि की..शायद में दिग्भ्रमित हो गया हूँ..
उनका स्वरूप अतिसूक्ष्म से विकराल हो रहा था,या फिर विकराल से अतिसूक्ष्म हो रहा था,कुछ समझ में नही आया..उनके उस स्वरूप में इतना तेज और प्रकाश था कि मैं कुछ कह नही सकता,मैंने सूर्य को कई बार ही नही,बल्कि रोज ही देखता हूँ,मगर सूर्य को मैं भरी दोपहरी में भी देख सकता हूँ,और उनके तेज का कुछ सेकेंड तक सामना कर सकता हूँ।
मगर उस दिव्य स्वरूप में इतना तेज,और प्रकाश था कि मैं बिल्कुल ही डर गया,और मेरी आँखें खुल गई..शायद सेकंड के दसवें हिस्से तक ही मैं उन्हें देख पाया हूंगा..।मैं इतना भयभीत हो गया कि मैं डर गया,और मेरी आँखें खुल गई..।।
आखिर क्यों..??
उस दिव्य प्रकाश को मैंने देखा..जबकि मैं उनके प्रकाश से डर गया..।
मगर मैं अभी खुश भी हूँ, क्योंकि मैं उतना बुरा भी नही हूँ, मुझमें अभी भी संभावना बची हुई है..।।
उनका शायद संदेश है,खुद को और मजबूत करने के लिए जिससे मैं उनसे अच्छी तरह से रूबरू हो सकू...।।

हे परमपिता परमेश्वर आपको बारंबार प्रणाम..


शनिवार, 8 नवंबर 2025

आपबीती...अंदर से खुशी..

क्या आपको मच्छर ने कभी परेशान किया है..??
क्या मच्छर से जुड़ी कोई वाकया याद है..??
क्या फर्क पड़ता है..ये तो आमबात है..
मगर ये आमबात नही है..।
हरेक साल पूरे विश्व मे 10 लाख लोग मच्छर के कारण मरते है..और 70 करोड़ लोग मच्छर के कारण बीमार होते है..।।

क्या ये आम बात है..।

मेरे लिए तो नही है..।
पिछले 3 रात से मैं, सो नही पा रहा था..क्योंकि न जाने इतने मच्छर कंहा से आ गए है,मालूम नही..बेड पे जाते ही मच्छर का काटना शुरू हो जाता था,सारा रात रैकेट भांजते-भांजते हाथ दुख जाते थे,मगर मच्छर काटना बंद नही करते,मानो रक्तबीज की औलाद हो..कितना भी मारो कम होने का नाम ही नही लेते..।चादर ओढू तो गर्मी लगने लगता था..हार गया था मैं इन मछरों से..रैकेट भांजते-भांजते चाचा का याद आ गया,मुझे लगता था वो यू ही रैकेट भांजते थे,मगर नही उनके कारण मुझे मच्छर नही काटता था..।
आखिरकार 3 दिन बाद में दुकान में गया बोला कोई अगरबत्ती दे जिससे मच्छर से निजात मिले.. उसने बोला लिक्विड और मॉर्टिन से कुछ नही होगा..
ये स्टिक वाला अगरबत्ती ले जाइए,सारा मच्छर मर जायेगा..।
मैंने लाया और उसे जलाया,तब भी कुछ मच्छर थे,मगर में हारकर चुपचाप सो गया..और सुबह के अलार्म के साथ मेरा नींद खुला..
चेहरे पे एक अलग ही मुस्कुराहट थी..मानो मन अंदर से खुश था,प्रफुल्लित था,क्योंकि नींद अच्छी जो आई थी..।
और ये मुस्कुराहट अभी तक चेहरे पे बनी हुई है..।।

इसलिय नींद जरूरी है..
अगर नींद अच्छी नही हुई,तो सारा दिन निंदनीय हो जाएगा..😊।


मंगलवार, 4 नवंबर 2025

आपबीती..

कुछ देर पहले तक मैं सोच रहा था,मैं यंहा क्यों हूँ..??
यंहा आये लगभग 2-3 साल हो गए होंगे..जबकि सप्ताह में दो बार यंहा तक कि टिकट कटाना पड़ता है,मगर आधे रास्ते मे ही उतर कर नेचरोपैथी और एक्युप्रेशर क्लास के लिए चला जाता हूं..
कभी मन ही नही हुआ इधर आने का..मगर आज म्यूच्यूअल फण्ड से जुड़े कुछ काम था और नेचरोपैथी वाला क्लास था..म्यूच्यूअल फण्ड वाला काम जल्दी हो गया..तो सोचा चर्च गेट हो आऊ क्योंकि यंहा तक कि टिकट तो कटाना ही पड़ता है..समय भी बीत जाएगा,और मरीन ड्राइव भी हो आऊंगा..

मैं जितना बार यंहा आया हूं..उन सबसे अलग नजरिया इस बार का था.पानी बहुत दूर था,पत्थर सब दिख रहे थे..मैं पहली बार इस तरह से देखा हूँ..।

कुछ समय बैठने के बाद मैंने सोचा..
मैं यंहा क्यों हूँ.. यंहा क्यों आया..
कुछ 15 मिनट के बाद एक व्यक्ति डोनेशन मांगने के लिए आया..
50 रुपये की डिमांड था,करने का मन नही था,फिर भी ना जाने क्यों मैंने कर दिया..
और मन ही मन मुस्कुराया ...मैं इसलिए यंहा आया😊...।

सोमवार, 3 नवंबर 2025

क्या लोग बुरे होते है..??

आपने कभी सोचा है...
लोग बुरे क्यों होते है..??
क्योंकि उनके साथ बुरा होता है..
एक बार नही,दो बार नही,तीन बार नही..बल्कि बार-बार बुरा होता है..
इसलिए शायद वो बुरे बन जाते हो...।

बुरे लोगों की परिभाषा क्या है..??

वैसे कोई परिभाषा नही है,मगर जो अपने आचरण से दूसरों को मानसिक,शारीरिक,सामाजिक और आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाए ऐसे लोगों को प्रायः बुरा माना जाता है..।

इस परिभाषा के अनुसार हमलोग भी कंही-न-कंही बुरे लोग ही है..।
हम भी जाने-अनजाने में,किसी-न-किसी को, हरेक रोज मानसिक,शारिरिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाते ही हैं,और कमाल देखिए इसका पता तक नही चलता..।
पता है इसकी शुरुआत कंहा से होती है..??
इसकी शुरुआत हमारे घर से ही होती है..
आज तो ये और बढ़ गया है..हरेक रोज किसी-न-किसी चीज के लिए हम झल्लाते है,और अपने बड़े पे नही बोल पाते है तो अपने छोटे पे गुस्सा निकालते है..ये हरेक घर की कहानी है..।
पापा ने बात कहा तो अपनी भड़ास अपने छोटे भाई-बहन पर उतार देते है..
अगर शादी हो गई है,तो परिवार की भड़ास पत्नी पे उतर जाती है,और पत्नी की पति पर उतर जाता है..।

घर से बाहर समाज मे जाए तो हरेक रोज, कोई हमपे फब्तियां कसता है,तो हम किसी और पर फब्तियां कसते है..और ये सिलसिला निरंतर चलता ही रहता है..।

इसी तरह नॉकरी,व्यवसाय में आगे बढ़ने के लिए एक-दूसरे का पाँव खींचने में हममें से कई लोग निरंतर लगे रहते है..।

तो कई लोग खुलेआम हुड़दंग मचाते और लड़ाई-पीट करते मिल जाएगा..।

और ये सिलसिला चलता ही रहता है..
कभी हम इनमें से किसी का हिस्सा बनते है,तो कभी कोई और इसका हिस्सा बनता है..।।
और इस तरह से बुराई का दौड़ चलता रहता है..।

क्या दुनिया इतनी बुरी है..??
बिल्कुल नही..।
बुराई काले बादल की तरह है,जो अच्छाई को ढके रहता है..
और एक वक्त के बाद,बादल छट जाते है,और अच्छाई की रोशनी चारों तरफ फैल जाती है..।।
हमसब जितने बुरे है,उससे कंही ज्यादा अच्छे है..,😊
मगर अफसोस हम अपनी अच्छाइयों को खुद पे हावी नही होने देते है..।
आप अपने आसपास देखे..आपको सबसे ज्यादा गुस्सा किस पे आता है,या फिर आपके आसपास ऐसा कौन है,जिसपे आपको गुस्सा आता है..??
शायद एक या दो चेहरे सामने आ गए होंगे..
आपने कभी सोचा है..आखिर क्यों,उनका व्यवहार ऐसा है..
उनके जिंदगी में झांकने की कोशिश कीजिये..
सच कहता हूं,अगली बार से वो बुरे नही लगेंगे..।।

हम सब अच्छे और बुरे का मिक्स्चर है..
परिस्थितियों के अनुसार हम कभी अच्छे तो कभी बुरे बन जाते है..।
बिल्कुल पेंडुलम की तरह..।
इसीलिए आप जैसे हो,वैसे ही रहो,बदलने की जरूरत नही है..
अगर बदलना हो,तो अपनी गंदी आदतों,और अपनी बुराइयों को बदलों..
जो आपको नुकसान पहुंचा रहा है,क्योंकि इन्हें सिर्फ आप ही देख सकते है।


अब आप बताइए..
क्या सच में लोग बुरे होते है..??
नहीं, हरेक चीज के लिए परिस्थितियाँ जिम्मेदार होता है,और हम दूसरों के परिस्थितियों से अनभिज्ञ होते है,इसलिये उन्हें बुरा मान बैठ लेते है..।।

कबीर दास जी कहते है-
"बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोई,
 जब दिल झांका आपना, मुझसे बुरा न कोई ।।"


रविवार, 2 नवंबर 2025

उदास मत हो..

जब उदास हो तो उदास मत हो..
क्योंकि क्या मिलेगा उदास होकर..।
अगर किसी की सहानुभूति मिल भी गई तो उससे क्या होगा..।
ये सहानुभूति भी क्षणभंगुर होगी..
इसलिए जब उदास हो..तो उदास मत हो..।


तुम्हारे उदासी भरे चेहरे से शायद ही कोई करीब आएगा..
अक्सरहाँ लोग सिर्फ दूरियां और बातें बनाएंगे..
और जो तुम्हारा कद है उसे गिराएंगे..
इसीलिए जब उदास हो..तो उदास मत हो..।

इन उदासी भरे चेहरे से नूर नही सिर्फ नून ही टपकेगा..😊
और तुम्हारे आसपास ही नही बल्कि तुम्हारे जिंदगी को भी तुम्हारी उदासी
 नमकीन बना देगी..
इसीलिए जब उदास हो..तो उदास मत हो..।

शनिवार, 1 नवंबर 2025

गंगा में नहाने से क्या होता है..

"मल मल धोये शरीर को,धोये न मन के मैल,
  नहाए गंगा गोमती,रहे बैल के बैल ।" (कबीर दास)

गंगा नाम लेते ही रोंगटे खड़े हो जाते है..शायद आपके भी होते होंगे,अगर नही होते है,तो आप गंगा की विशालता और महत्वता से अनभिज्ञ है..।
इसकी विशालता और महत्वता के कारण ही हम भारतीय गंगा नदी को, गंगा माँ कहते है।


गंगा कंहा से शुरू होती है,कंहा खत्म होती है,ये हम सब को पता है,मगर कैसे शुरू होती है और कैसे खत्म होती है,इससे बहुत लोग अनभिज्ञ है..।।

क्या आपने सोचा है..अगर गंगा ना होती तो क्या होता..??
भारत के जितने भी प्राचीन और आधुनिक शहर है,सबके सब गंगा के किनारे या फिर उसके सहायक नदी के किनारे बसे हुए है..।गंगा भारत की भौगोलिक, सामाजिक,सांस्कृतिक और आर्थिक रूप रेखा तय करती है..।

गंगा सिर्फ नदी नही,बल्कि भारत की जीवन रेखा है..मगर आज ये जीवनदायिनी नदी खुद कराह रही है..और इसकी आवाज किसी को सुनाई नही दे रही है..अगर किसी को सुनाई दे भी रही है,तो वो चाह कर भी कुछ नही कर पा रहा है..इसके लिए हमसबको एकसाथ प्रयास करना पड़ेगा..।
मगर करेगा कौन..?? 
क्योंकि सब व्यस्त है अपने आप में.. सब व्यस्त है अपने आप को संवारने में..किस को सुध है उसका,जो भारत को, विष पी कर संवार रहा है..।।

भारत के फैक्टरियों के गंदगियों को अपने मे समाहित कब तक गंगा करती रहेगी..अब ये गंदगियां सिर्फ गंगा में ही नही बल्कि हमारी थाली तक पहुंच चुकी है..😢


आज हमारी औसत आयु भले ही बढ़ती हुई दिखाई दे रहा हो,मगर आप खुद से पूछिए क्या आप अपने बाप-दादा से ज्यादा स्वस्थ है..??
जबाब आएगा नही..सिर्फ शारीरिक रूप से ही नही हम मानसिक रूप से भी पहले से ज्यादा कमजोर हो चुके है..।

भले ही आज हमारे पास IIT,IIM,M.B.B.S etc. जैसे संस्थान है,मगर ये संस्थान मिलकर भी भारत की भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संरचना को संवार नही सकता..।
मगर आज भी गंगा हमारे द्वारा फैलाये हुए गंदगियों का विषपान करके भी, भारत की भौगोलिक,सामाजिक,सांस्कृतिक और आर्थिक संरचना को संवार रही है..
मगर हम गंगा के लिए क्या कर रहे है...??

इसी साल ही गंगा के किनारे महाकुंभ लगा...मीडिया वालों ने चिल्ला-चिल्ला के कहा यंहा इतना करोड़ नहाने के लिए आये,इतने करोड़ की आर्थिक गतिविधियां हुई..
मगर मैं पूछना चाहता हूं,जिसके कारण ये सब हुआ,उसके लिए हम सबने क्या किया..??

सिर्फ गंगा को अपनी गंदगियां भेंट की..
और गंगा चुपचाप उसे स्वीकार कर लिया..।।
आखिर क्यों..??
क्योंकि माँ, होती ही है ऐसी..
कुछ नही बोलती,चुपचाप सहन करती रहती..
मगर जब वो विकराल रूप धारण करती है,
तो उसके सामने कोई नही टिकता..या फिर वो स्वयं नही टिकती..
माँ होती ही है ऐसी..।।

आखिर गंगा में नहाने से होता क्या है..??
सच कहूं तो कुछ नही होता..
हमारे ऋषियों ने नहाने का प्रावधान इसलिए किया..कि हम गंगा के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट कर सके..मगर हमने क्या किया..गंगा को और मैला कर दिया..।

ऐसा नही है कि गंगा में नहाने से कुछ नही होता है..।
हम जब ऑनलाइन आर्डर करते है,तो हमें वही चीज मिलती है,जो हमने आर्डर किया होता है..।
उसी तरह हम जिस भाव से गंगा के तट पर जाते है और डुबकियां लगाते है,हमें उसी भाव का अहसास होता है..।
हम जब सिर्फ फ्लिपकार्ट और अमेज़ॉन पर स्क्रॉल करते रहते है तो क्या होता है..हमें कोई सामान नही मिलता है,जबतक की आर्डर न करें..।
उसी तरह, गंगा में सिर्फ डुबकियां लगाने से कुछ नही होता..
बल्कि आप किस भाव से डुबकियां लगा रहे है,ये मायने रखता है..।।

अगली बार जब गंगा में डुबकियां लगाए, तो कुछ सोच के डुबकियां लगाए, यू ही नही लगाए..
क्योंकि माँ सब जानती है..।।

जय गंगा मैया..।।
क्रमशः...

कुछ गलतियां