शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

दादी माँ और कृष्ण जन्माष्टमी..

कुछ लोग जिंदगी से तो चले जाते है..
मगर वो कई यादें छोड़ जाते है..।

ये पहली जन्माष्टमी होगा जो बिना दादी माँ के मनाऊंगा..
जब से होश संभाला हूँ..तबसे किसी-न-किसी तरह दादी माँ के साथ कृष्णजन्माष्टमी को मनाया ही है..।।


कुछ यादें जो कृष्णजन्माष्टमी से जुड़ी है..
मैं,दादी माँ,अमरूद का पेड़ और कृष्णजन्माष्टमी..
का एक अलग ही संबंध था..
आज न अमरूद का पेड़ है,और न ही दादी माँ रही..मगर जेहन में दोनों ही है..।


कंहा से शुरू करू.. वंही से शुरू करता हूँ जंहा से,मैं पेड़ पे चढ़ने के काबिल हो गया था..।
मेरे बड़े चाचा के आंगन में दो अमरूद के पेड़ थे..एक बहुत बड़ा था इतना बड़ा की पक्के अमरूद गिर के इतने नीचे गिरे रहते थे कि आप ये नही पता कर पाएंगे कि अभी पेड़ से कौन सा गिरा है..।

अमरूद इतने होते थे कि दादी माँ ने बेचना शुरू कर दिया 1₹ के चार अमरूद..पहले मेरी बड़ी बहन पेड़ पे चढ़ के तोड़ा करती थी..उसके कुछ सालों बाद मैंने चढ़ना शुरू किया..मैंने अपने दीदी को ही पेड़ पे चढ़ते हुए देख के चढ़ना सीखा है..।
सावन से ही अमरूद बिकना शुरू हो जाता था..घर के बगल में स्कूल था तो कई स्कूल के बच्चे भी अमरूद लेने आते थे..।जितना अमरूद बिकता उसका सारा पैसा दादी माँ के पास जमा होता था..हां उसमें से कभी-कभी 1-2₹ मिल जाया करता था कुछ खाने के लिए..हमलोग भी इतना ईमानदार थे कि दादी माँ के अनुपस्थिति में भी अमरूद बेचने पर वो पैसा दादी माँ को ही बाद में दिया करते थे..।

सावन खत्म होते ही भादो आता और भादो आते ही कृष्ण जन्माष्टमी आता, कृष्ण जन्माष्टमी से एक दिन पहले सारा पैसा गिना जाता और उसके बाद उन पैसों को सारे सदस्यों में बांटा जाता था..दरसल ये बंटवारा कार्य के हिसाब से नही बल्कि उम्र के हिसाब से होता था..किसी वर्ष 25₹ तो किसी वर्ष 30₹ भी मिलता था,जितना अमरूद बिकता था उसी हिसाब से, हमसबको कुछ न कुछ मिलता..।
और जो पैसा बच जाता, उस पैसा का दादी माँ घर के लिए कोई-न-कोई सामना ले लेती थी..कभी-कभी छठ का सूप भी इस पैसा से खरीदा जाता था..।
मगर हमलोगों को जितना पैसा मिलता वो मेला घूमने के लिए काफी था..।
ये सिलसिला तबतक चलता रहा जबतक में पढ़ने के लिए दरभंगा न आ गया..क्योंकि उसके बाद कोई अमरूद तोड़ने वाला था ही नही..।
मगर दादी माँ तब भी हरेक कृष्ण जन्माष्टमी को हमें कुछ न कुछ पैसा देती ही थी..क्योंकि बाबा को पेंशन जो मिलता था..30-40₹ दादी माँ दे ही देती थी..।
फिर जब मैने दरभंगा छोड़ दिया तो दादी माँ हरेक कृष्णजन्माष्टमी को फोन जरूर करती और खोज खबर लेती यंहा के माहौल के बारे में पूछती..।

मगर इस साल उनका कॉल नही आएगा..
क्योंकि वो पिछले साल ही छोड़ के चली गई..।

लोग चले तो जाते है..
मगर कई यादें छोड़ जाते है..
कुछ लोग उन यादों के सहारे उन्हें जिंदा रखते है..
तो कुछ लोग उन यादों को भूल कर उन्हें भूल जाते है..।


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