सोमवार, 19 मई 2025

मौन...

मौन सभी समस्याओं का समाधान है..
जितनी बड़ी समस्या हो,उतना लंबा मौन धारण कीजिये...।
और चुप रहना कुछ समस्याओं का हल है,
हरेक समस्याओं का नही..।।



सवाल ये है कि..
आखिर मौन होता क्या है,
क्या चुप रहना मौन है..??
बिल्कुल नही..
तो फिर..??
मौन होके देखिए जबाब मिल जायेंगें..।
2मिनट ही सही,रखके तो देखिए..हां अभी..

हेलो..क्या हुआ..??
क्या आप मौन रह पाए..
अगर हां, तो आप झूठ बोल रहे है..
बुरा मत मानियेगे..क्योंकि आप जब मौन थे, 
तब भी आपके अंदर ढेर सारे विचार चल रहे थे..।।
तो आप ही बताइए..
क्या आप मौन थे..??

तो आखिर मौन कैसे धारण करें..??
आंख बंद करें और बैठ जाये..
तबतक जबतक कोई विचार मन मे न आयें..।
विचारशून्य होना ही मौन है..
मन का शांत होना ही मौन है..
मन से ही मौन की उत्पत्ति हुई है..।
जबतक मन वस में नही होगा तबतक हम मौन नही धारण कर सकते..।।
मन को कैसे वस में करें..??
शुरुआत आंख बंद करके सांस को देखें..।
अगर जाप(मंत्र,नाम) करते है,तो उसे काल्पनिक रूप से अपने भृकुटि पे आंख बंद करके लिखे..।
इससे मन नियंत्रित हो जाएगा..।।

जब मन नियंत्रित हो जाएगा तो खुद-व-खुद मौन धारण हो जाएगा..।।



रविवार, 27 अप्रैल 2025

वीर कुंवर सिंह...1857 के क्रांति के नायक

अगर आपका उम्र 80 साल है,और आपसे आपका सारा जायदाद(संपत्ति) छीन लिया जाय तो आप क्या करेंगे..??

आज की ज़ेनरशन वो सबकुछ जानती है जो उसके लिए उपयोगी नही है..।।
मगर क्या आज का जेनरेशन "वीर कुंवर सिंह" को जानता है..??
आज हमारे प्रधानमंत्री जी ने अपने "मन की बात"में वीर कुंवर सिंह का चर्चा किया..कुछ ने गूगल पे सर्च किया होगा..शायद नही किया होगा..क्योंकि मन की बात आज की जेनरेशन सुनती कंहा है...😊।।



चलिए कोई नही..
मैं आपको ले चलता हूँ 1857 के उस समर में..
जिस समर में अंग्रेज सभी को एक तरफा धूल चटा रहा था..
मानो भारतीयों की जान की कोई कीमत ही नही है..
गाँव के गाँव और बस्तियों के बस्तियां जला दी गई..जिन्होंने भी क्रांतिकारियों का मदद किया, उसे अंग्रेजो ने खुलेआम चौराहे पे फांसी पे लटकाया या तोप में बांधकर उड़ा दिया..
इससे भी मन नही भरा तो हमारी माताओं और बहनों को स्तनों को काट लिया गया..वो दानव यहीं तक नही रुके उन्होंने जननांगों में मिर्ची के पॉवडर डालकर तड़पने के लिए छोड़ देते थे..।।
ये अंग्रेज इतने असभ्य थे इतने कुकर्मी थे कि जब आप इतिहास पलटोगे तो आपको घिन्न आएगी..
मगर अफसोस हम इतिहास पढ़ते ही नही..
इसीलिए तो हम आज भी मानसिक रूप से गुलाम है..।।

1857 के क्रांति में अंग्रेज ने अपने हरेक विरोधियों को कुचल दिया..मगर एक ऐसा विरोधी था, जिसे अंग्रेज हरा नही पाया..
वो थे..80 साल के "वीर कुंवर सिंह"..
डलहौजी ने नया फरमान लाया जिसका कोई संतान नही है, उसका जमींदारी और क्षेत्र ब्रिटिश सरकार का हो जायेगा..।
मगर वो अपना जमींदारी अपने भाई अमर सिंह को देना  चाहते थे..।

इसी बीच मंगल पांडेय को फांसी पे चढ़ाते ही,सैनिकों में विद्रोह भड़क उठा, और सैनिकों का आक्रोश पटना तक पहुंच गया..दानापुर छावनी के 7वी,8वी और 40वी रेजिमेंट के सिपाही वंहा से हथियार लेकर जगदीशपुर पहुंच गए और कुँवर सिंह से कहें कि आप हमारा नेतृत्व करें..
कुँवर सिंह इन सैनिकों को लेकर आरा के जेल पर चढ़ाई कर दिये और वंहा से सभी कैदियों को रिहा कर दिए..और अपने सैनिकों में शामिल कर लिए..।

इस विद्रोह को दबाने के लिए डगलस आया..जो कुँवर सिंह के हाथों युद्ध मे मारा गया..।
फिर विंसेट आयर आया इसने आरा शहर पे कब्जा तो कर लिया मगर कुँवर सिंह को नही पकड़ पाया..।

कुँवर सिंह अपने सैनिकों को लेकर बलिया,गोरखपुर, मिर्जापुर,बनारस,कानपुर,प्रयागराज,बांदा ,रीवा एवं अन्य क्षेत्र तक गए और अंग्रेज से लड़ने के लिए इनसे सहयोग मांगा..
इनके इस उम्र में इतना हौंसला देखकर सब लोगों ने इन्हें अपना-अपना सहयोग देने का वादा किया..मगर..
इसमे से रीवा के राजा अंग्रेज से मिले थे इन्होंने कुँवर सिंह को कैद करने का सोचा मगर रीवा के सिपाहियों के मदद से वंहा से वो निकल गए..।

जब कुँवर सिंह अवध(सबसे धनाढ्य प्रदेश) पहुंचे तो उनका स्वागत अवध की रानी "बेगम हजरत महल" ने शानदार तरीके से किया..उन्होंने आजमगढ़ की जमींदारी वीर कुंवर सिंह को दे दिया..।
जब अंग्रेज को ये बात पता चला तो वो घबरा गया और आजमगढ़ में ही कुँवर सिंह को घेरने का योजना बनाया..
डनबर ने आजमगढ़ को चारों और से घेर लिया..
और यंहा "अतरौलिया का युद्ध" शुरू हुआ..
जिसमें कुँवर सिंह के हाथों डनबर की मृत्यु हुई..।।

ये खबर हवा की तरह कलकत्ता तक पहुंच गया..
जब ये खबर गवर्नर जेनरल "लार्ड केनिंग" को पता चला तो वो चिंतित हो गया...
उसने कुँवर सिंह के ऊपर 20 हज़ार का इनाम की राशि घोषित किया..(वर्तमान में अगर आकलन करें तो 2 करोड़ से ज्यादा) 
कुँवर सिंह को घेरने के लिए चारो और से सेना आजमगढ़ भेजा गया..
जब कुँवर सिंह को ये बात पता चला तो उन्होंने अपने सैनिकों को दो भागों में बांट लिया..एक को युद्ध मोर्चा पे लड़ने के लिए भेजे और एक के साथ जगदीशपुर के लिए निकल गये..।
अंग्रेज को लगा कि वो जीत रहे है,मगर कुँवर सिंह तो उनके हाथों से निकल रहे थे..।
जब ये बात अंग्रेज को पता चला तो उनके जनरल पागल हाथी की तरह बेकाबू हो गए..आजमगढ़ की जनता पर बेरहम अत्यचार किये..जो भी आया सबको मौत के घाट उतार दिया गया..।
कुँवर सिंह को पकड़ने के लिए ली ग्रांड के नेतृत्व में एक टुकड़ी भेजा गया..।

22 अप्रैल 1858 को गंगा नदी को पार करते वक़्त ली ग्रांड की सेना ने अंधाधुंध गोलियां चलाना शुरू किया..एक गोली कुँवर सिंह के बांह में आकर लग गई..उन्होंने तुरंत तलवार निकाला और उस हाथ को दूसरे हाथ से काटकर गंगा में बहा दिया...जिससे गोली की जहर पूरे शरीर मे ना फैल जाए..।।
ली ग्रांड की सेना ने जब इन्हें चारों और से घेर लिया तो इस अवस्था मे भी वो साहस से लड़ें और ली ग्रांड की सेना को हरा कर जगदीशपुर पहुंचे..।।

खून बहुत बह जाने के कारण इनकी तबियत खराब होने लगी और 26 अप्रैल 1858 को इस महान योद्धा ने अपना शरीर त्याग दिया..
जब इनकी मृत्यु हुई तो इनके किला पे यूनियन जैक का झंडा नही बल्कि जगदीशपुर का झंडा फहरा रहा था..।

1857 के क्रांति के इकलौते नायक जिसे अंग्रेज जीते जी नही हरा पाया...

1857 के क्रांति के इकलौता नायक जिसके ऊपर अंग्रेज को 20 हजार का इनामी राशि रखना पड़ा..

1857 के क्रांति के इकलौता नायक जो सिर्फ अपने क्षेत्र तक ही नही बल्कि पूरे उत्तर भारत से लेकर मध्य भारत तक अंग्रेजो से लड़ा..

1857 के क्रांति के इकलौते नायक जो सिर्फ क्षेत्रीय स्तर पर नही बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर उभरे..।।

अंग्रेज इतिहासकार ने इनके बारे में कहा-
"भाग्य मनाओ की ये बूढा है,अगर जवान होता तो क्या होता"

V. D सावरकर ने अपने किताब "1857 प्रथम स्वंतंत्रता संग्राम" में 7 क्रांतिकारियों की चर्चा की है जिसमे से वीर कुंवर सिंह एक है..।।

अब जरा आप सोचिये..
एक 80 साल का बूढा जिसने अंग्रेज हुकूमत को नाक में दम कर दिया..अंग्रेज उनसे जीते जी नही जीत पाया..हर बार मुँह की खानी पड़ी...।।
मगर आज की युवाओं की दशा क्या है..??
दशा इसलिए है क्योंकि कोई दिशा नही है..।।

आप तो युवा है..
और स्वतंत्र है..
तो फिर ये दशा क्यों है..??
जिस बुराइयों के बेड़ियो से बंधे है..
उन्हें तोड़ दे..।
जिस मोह में फंसे है..
उसे मरोर दे..।
अब नही तो और कब..।
80 साल का बूढा कुँवर सिंह अंग्रेज सामज्र्य को अपने अंगुलियों पे नचाया..
आप तो युवा है...
और स्वतंत्र है..
तो फिर ये दशा क्यों है..??


गुरुवार, 24 अप्रैल 2025

पापा से शिकायत है..

पापा से शिकायत है..
अगर हां,
तो खुद को पापा के जगह पर रख के देखो..।
पापा आपसे नाराज है..
आखिर क्यों..??
पापा कभी नाराज नही होते,
बल्कि वो अपने संतति को हारते हुए और किसी तरह की कालिख लगते हुए नही देखना चाहते है..।

पापा को हर रोज उनका सामना करना होता है,
जिनसे आप नजरें तक मिलाना नही चाहते..।।
पापा को हर रोज उनका सामना करना होता है,
जो उन्हें हारता देखना चाहते है..
वो जब उनसे नही जीत पाते है, 
तो वो उम्मीद अपने संतति से लगाते है..
मगर जब संतति भी उस पे खरा नही उतरता है..
तब सोचो..
उनपे क्या बीतती होगी..।।

अब वो फिर उनसे कैसे नजरें मिलाते होंगे..
उनपे कैसे कटाक्ष का वार होता होगा..।

इस जंहा में सिर्फ पापा ही है,
जो आपको आगे..और आगे..बढ़ते देखना चाहते है..।।

पापा से शिकायत है...??
क्यों..??
पापा की मजबूरियों को समझों..
समाज और परिवार से बंधी बेड़ियों को देखों..
उनपे दायित्व निर्वहन के बोझ को देखों..
इस सारी विपरित परिस्थितियों के बावजूद वो तुम्हारे सुनहरे भविष्य के लिए सपने संजो रहे है...
क्या ये मामूली बात है..।

पापा से शिकायत है..।।
अगर हां...
तो खुद को पापा के स्थान पर रखकर देखों..।।



बुधवार, 23 अप्रैल 2025

विश्व पुस्तक दिवस..

चलिए आज विश्व पुस्तक दिवस पर कुछ किताब और कहानियों को याद करते है...।



आपको पहली पुस्तक याद है..जिसे आपने खुद से पढ़ा था..??
क्या आपको उसकी सुंगंध याद है..??
और क्या-क्या याद है..।।


मुझे वो पुस्तक आज भी याद है..
जिसे मैंने कई बार पलटा और उसके इंक के सुंगंध को कई बार सुंघा..
उस पुस्तक का नाम "बाल भारती" था वो दूसरी क्लास की पुस्तक थी..
इस पुस्तक को देखते ही कई कहानियां याद आ गई..।।
अब आप याद कीजिये..
आपके द्वारा पढ़ी जाने वाली पहली पुस्तक कौन सी थी..??

पुस्तक पढ़ने के कई फायदे है..
मगर अफसोस किताबों से दूरियां बढ़ती जा रही है..और pdf का अंबार इतना लग गया है कि हमें मालूम ही नही की कौन सा pdf किस चीज का है..??

शायद आपके द्वारा पढ़ा गया पहला पुस्तक का नाम याद आ गया होगा...अगर नही तो छोड़िए..
आपने आखरी पुस्तक कौन सी पढ़ी थी या पढ़ रहे है..??

मैं तो गौहर रज़ा का "मिथकों से विज्ञान तक"को पढ़ कर खत्म करने वाला हूँ.. 


अच्छा आखरी सवाल...
आपको सबसे ज्यादा कौन सी बुक ने प्रभावित किया..जिसे आप फिर से पढ़कर बौर नही होंगे..??

मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित ब्रायन ट्रेसी की "लक्ष्य"(Goal) ने प्रभावित किया..और रामधारी सिंह दिनकर की "रशिमरथी" ने..मैं जब भी उदास होता हूँ तो रशिमरथी को पलटता हूँ और ऊर्जा प्राप्त करता हूँ..।।

बस ये आख़री है..
आपको वो पहली कहानी याद है जो आपके मन-मस्तिष्क में अभी तक छपा हुआ है..??
हां मेरे मन मस्तिष्क में छपा हुआ है, 9th क्लास में प्रेमचंद्र की कहानी "ईदगाह"पढ़ी थी..उसका पात्र हामिद आज भी याद है..।।

आज अपनी मनपसंद की किताब और पत्रिका पढ़ना बहुत आसान है..क्योंकि एक क्लिक में वो हार्डकॉपी और सॉफ्टकॉपी में उपलब्ध हो सकता है..
मगर अफसोस हममें पढ़ने की लालसा ही खत्म होती जा रही है...आखिर क्यों..??
खुद सोचियेगा...।।

किताब पढ़ने के अनेक फायदे है...

यूनिवर्सिटी ऑफ सक्सेस के एक अध्ययन में पाया गया कि सिर्फ 6 मिनेट पढ़ने से 68% तक तनाव कम होता है..यह योग या टहलने से भी ज्यादा असरदार है..
"पढ़ने से दिमाग काल्पनिक दुनिया मे चला जाता है, जो जीवन की चिंताओं से ध्यान हटाता है,और रक्तचाप कम करता है"

• अगर रोज 20 मिनट पढ़े तो साल के अंत तक 18 लाख शब्दों के संपर्क में आ जाएंगे।जिससे भाषा शैली में सुधार होता है।
एक अध्ययन में पाया गया कि-"किताब पढ़ने से हमदर्दी की भावना जागृत होती है"।

एक रिसर्च बताती है कि जो लोग किताब पढ़ते है, उनके जिंदगी से तनाव घटता है,नींद बेहतर आता है और भावनात्मक सेहत सुधरता है..यही नही किताब पढ़ने वाले कि उम्र आम लोगों के अपेक्षा 20% ज्यादा होता है..।

2013 में न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन के अनुसार,नियमित पढ़ने वालों की यादाश्त बेहतर होती है साथ ही अल्जाइमर का खतरा  20% तक कम हो जाता है..।।

क्या सोच रहे है..
आज आपके हाथ मे सिर्फ मोबाइल ही नही बल्कि विश्व की सबसे बड़ी लाइब्रेरी पड़ी हुई है..सिर्फ सर्च करने तक कि देरी है...।।मगर जो मजा कागजों को पलटते हुए,इंक की सुंगध लेते हुए पढ़ने में जो मजा है,वो किंडल और pdf पढ़ने में नही..।।


हिन्दू अपने ही देश में असुरक्षित हैं...

जरा सोचिए...
क्या यूरोपीय देश में, कोई ईसाई खुद को असुरक्षित महसूस करेगा..??
क्या कोई मुस्लिम देश में, कोई मुसलमान खुद को असुरक्षित महसूस करेगा..??
क्या कोई बौद्ध अनुयायी म्यांमार और थाईलैंड में खुद को असुरक्षित महसूस करेगा..??

क्या कोई हिन्दू,हिंदुस्तान में असुरक्षित महसूस करेगा..??
शायद कल सुबह तक हम खुद को सुरक्षित महसूस पा रहें थे..
मगर कल दोपहर की घटनाओं ने हिंदुओं को हिंदुस्तान में भी असुरक्षित कर दिया है...

जिस तरह कल कश्मीर में ना जाति पूछा, न भाषा पूछा, न राज्य पूछा..
धर्म पूछ कर गोली मार दिया...
जिन्होंने नही बोला उसे नंगा करके मारा गया...।।
ये घटना रूह को कंपा देने वाली है...।



आज हिंदुओं से ज्यादा मुस्लिम के ऊपर दायित्व बढ़ गया है..
उन्हें खुलकर विरोध करना होगा..
अगर वो आज विरोध नही करते है तो वो संदेह के नजर से देखें जाएंगे...।।
पाकिस्तान यही चाहता है..।।
हमारी सरकार को अब इस कायराना हरकतों की निंदा नही बल्कि उनके आकाओं को सदा के लिए नींद में भेज देने की जरूरत है..।
भारत मे जो उनके समर्थक है उन्हें लाल चौक पे चुनवाने का समय आ गया है..।।
अगर सरकार कड़ा कदम नही उठाती है तो..
फिर से किसी चौराहे पे धर्म पूछ के किसी हिन्दू को गोली न मार दिया जाय...।।

मंगलवार, 22 अप्रैल 2025

पोप फ्रांसिस की जीवन-यात्रा..

"हम मृत्यु नही, जीवन के लिए बने है.." पोप फ्रांसिस ने मरने से पहले दुनिया को ये आखरी संदेश दिया था..। 


हममें से बहुत बड़ी आबादी पोप फ्रांसिस को नही जानते होंगे..??
क्योंकि वो एक सेलेब्रिटी या राजनेता नही थे..
जिस तरह हिंदू धर्म के प्रमुख शंकराचार्य होते है और बौद्ध धर्म के प्रमुख दलाई लामा होते है..
इसी तरह पोप फ्रांसिस कैथोलिक ईसाइयों के सबसे बड़े धर्मगुरु थे..।।

पोप फ्रांसिस पहले गैर-यूरोपीय पोप बने...
इनका जन्म अर्जेटीना की राजधानी बीयूनर्स आयर्स में हुआ..
जॉर्ज मारियो बरगोगिल्यो(असली नाम) पादरी बनने से पहले अर्जेटीना के एक नाईट क्लब में बाउंसर का काम करते थे..
फिर उन्होंने एक केमिकल लैब में काम करना शुरू किया..
फिर उन्होंने अर्जेटीना के कॉलेज में साहित्य और मनोविज्ञान के शिक्षक के रूप में पढ़ाया..
उन्होंने 21 के उम्र में जेसुइट समुदाय से जुड़े..फिर अर्जेटीना में ही पादरी बन गए..
ये अपने माँ-बाप के साथ इटली आ गए और यही बस गए.
2001 में पॉप जॉन पॉल ii ने उन्हें कार्डिनल बनाया..और
2013 में 266वे पॉप की उपाधि दी गई..।

मैं आज से पहले इनसे उतना वाकिफ नही था..बस इनके मौन मुस्कान का कायल था..
जब भी कभी अखबार या टेलिविज़न पे देखता तो इन्हें मुस्कुराते देख बस मैं भी मुस्कुरा दिया करता था..।।

इनके व्यक्तित्व पे इनके जीवन का गहरा छाप था..
हम अक्सरहाँ हार जाते है..
मगर इनका जीवन यात्रा बताता है कि हार मानना गुनाह है..
क्योंकि भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है कोई नही जानता..

एक नाईट क्लब का बाउंसर, पोप बनकर पहली बार रोम की जेल में कैद महिलाओं का पाँव धोता है..।।(परंपरा के अनुसार पोप ईस्टर से पहले गरीबों का पाँव धोते है)इन दोनों घटना को जोड़ने की कोशिश कीजिये..।।



पोप होने के नाते उन्हें भव्य अपोस्टोलिक पैलेस में रहना था, मगर उन्होंने साधारण गेस्ट हाउस को चुना..।



पोप बनने पर 'रिंग ऑफ द फिशरमैन' पहनाते है,ये सोने की रिंग शक्ति का प्रतीक होता है..मगर उन्होंने चांदी का रिंग पहना..।

•जब वो आर्कबिशप थे, तो उन्होंने कभी महंगी गाड़ियां में  नही बैठे।हमेशा पब्लिक बस और मेट्रो से सफर करते थे..
पोप बनने के बाद भी वो बस से सफर करते थे..
(एक हमारे यंहा के भी संत लोग है..)

•वो अक्सरहाँ लोगों की मदद करने के लिए रात में निकल जाया करते थे..जिससे किसी को पता न चले..।।
(आज हम किसी की मदद करने से पहले सेल्फी लेते है)

उनकी जीवनयात्रा प्रेरणादायी है..
कंहा नाईट क्लब के बाउंसर(गार्ड) से वो कैथोलिक ईसाई के प्रमुख धर्म गुरु बने..।।
धैर्य रखें,और आगे बढ़ते रहें, और उस परमात्मा पे विश्वास रखें.. क्या पता किस मोड़ पे सफलता बाहें फैलाकर आपका इंतजार कर रहा हो..।

आज दुनिया की अधिकांश आबादी उदासी में डूबती जा रही है, और उस उदासी को दूर करने के लिए वो जिसका सहारा ले रही है..वो उसे और गहरे उदासी में धकेल रही है..।
ऐसे समय मे पॉप फ्रांसिस का अंतिम संदेश को याद करें-
" हम मृत्यु के लिए नही,जीवन के लिए बने है।।"



बुधवार, 16 अप्रैल 2025

क्या आप जानते है..

क्या आपको पता है..
मच्छर इस पृथ्वी पर कितनों सालों से है..??


अनुमान लगाइये..🤔
1 लाख सालों से,10 लाख सालों से, 100 लाखों सालों से..या फिर 1000 लाख सालों से...??
जब आप सोच रहे है तो हो सकता है मच्छर आपके आस-पास मंडरा रहे हो..
ये तब भी मंडरा रहे थे जब पृथ्वी पर डायनासोर अठखेलियां कर रहें थे..।

जरा कल्पना कीजिये..
जब मच्छर डायनासोर को काटता होगा तो वो खुद को कितना असहाय महसूस करता होगा..।जबतक उसे पता चलता होगा तबतक मच्छर तो काट करके आराम फरमा रहा होता होगा..।।
हमलोगों के साथ भी होता है ये, कभी-कभी जब मच्छर काट करके चला जाता है तब पता चलता है..😊।।



क्या डायनासोर की विलुप्ति में मच्छर का कोई योगदान था..??
इसका अबतक कोई साक्ष्य नही मिलता..
वैज्ञनिकों का कहना है कि इनकी विलुप्ति जलवायु परिवर्तन या फिर उल्कापिंडों के गिरने के कारण हुआ..।।
डायनासोर इस पृथ्वी पर ~230 मिलियन साल तक राज किया..और हम मानव कितने सालों से कर रहें है..
अंदाजा लगाइये...🤔
हम मानव इस पृथ्वी पर पिछले 5-7 मिलियन साल से ही रह रहे है..।

क्या आपको पता है.. मच्छरों की कितनी प्रजातियां है..??
अधिकांश लोग सोचेंगे ये जानकर मैं क्या करूँगा..
मगर इसमे पृथ्वी पर सर्वाइव करने का रहस्य छुपा हुआ है..।
मच्छर की लगभग 3600 प्रजातियां ज्ञात है..
और हम मनुष्यों की..??
मानव अपने विकाश के चरण से लेकर अबतक सिर्फ 9 प्रजातियां से ही गुजरा है..जिसमें से 8 विलुप्त हो चुके है..
सबसे अंतिम ज्ञात विलुप्त मानव प्रजाति "होमो इरेक्टस" था पता है इसके विलुप्ति का क्या कारण था..??
"होमो सेपियंस" के साथ संघर्ष, होमो सेपियंस ने अपने एकछत्र राज के लिए होमो ईरेक्टस को खत्म कर दिया..
या फिर जलवायु परिवर्तन के कारण उनका विनाश हुआ..अभी तक पहेली बनी हुई है..

क्या आपको पता है..
पिछले 2 लाख वर्षों में 10 हजार 800 करोड़ लोग पैदा हुए..
जिसमें से 5 हजार करोड़ लोगों की मृत्यु मच्छरजनित बीमारियों से हुई..(इतिहासकार "टिमोथी सी वाइनगार्ड")

WHO के अनुसार प्रत्येक साल 7 लाख लोगों की मृत्यु मछर के कारण होती है..।

पृथ्वी पर जीवन के उद्भव से लेकर अबतक पैदा होने वाले लगभग 99.9% प्रजातीय विलुप्त हो चुके है..

मगर क्या कारण है कि मच्छर अब तक जिन्दा है..??
जरा सोचिए..??

- वो अन्य जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों की तरह झगड़ते नही है..(क्या पेड़-पौधे भी झगड़ते है..जी हां..)

-वो प्रकृति के अनुसार खुद को ढालते है..

-उनमें म्युटेशन(उत्परिवर्तन) की क्षमता है..उनकी आने वाली पीढ़ी परिस्थिति के अनुसार खुद को ढाल लेती है..

-वो सबकों स्वीकारते है, किसी से भेदभाव नही करते..

अच्छा बताइये.. इस तरह के गुण और किसमें है..??
शायद आप जानते है..
नही जानते..चल झूठा..
मुस्कुराइए😊 वो आप भी है..
अपने शक्ति को पहचानिये..
और अपने अस्तित्व को बचाइए..।।