गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

प्यार की पांति..मैं जब तुम्हें..

मैं जब तुम्हें, कुछ लिखता हूँ,तो..
मेरे हाथ थरथराते है..
और हृदय घबराता है..।
इसलिय नही की..
मैं गलत कर रहा हूँ..।
इसलिए कि..
कंही मेरी लेखनी, तुम्हें पसंद न आये..।

मैं जब तुम्हें कुछ कहना चाहता हूं..
तो मेरे लब थरथराते है,
और मेरा शरीर कंपकपाता है..।
इसलिए नही की मैं तुमसे डरता हूँ,
इसलिय की..
तुम मुझे देख के असहज न हो जाओ..।

मैं जब तुम्हारे करीब आता हूँ..
तो खुद को निर्जीव पाता हूँ..
इसलिय नही की..
मेरी सांसें रुक जाती है..।
इसलिय की..
मेरी सांसे तुमसे चल रही होती है..।

मैं जब तुम्हें..



बुधवार, 24 दिसंबर 2025

खालीपन..

मैं जब-जब खुद को खाली महसूस करता हूँ..

तो मैं,तुम्हारे करीब आ जाता हूँ..

खुद को भरने के लिए..।


तुममें समाहित अथाह ऊर्जा में से..

कुछ ऊर्जा लेकर..

फिर से खुद को ऊर्जावान बनाने के लिए..

मैं तेरे करीब आ जाता हूँ..।


मैं जब भी खुद को खाली महसूस करता हूँ..

मैं तुम्हारे करीब आ जाता हूँ...।




प्यार की पांति..मैं तुमसे

मैं तुमसे मिलना चाहती हूं..
मगर कैसे..
तुम समुंद्र हो तो मैं नदी हूँ..
तुम वटवृक्ष हो तो मैं खजूर हूँ..
तुम गंगा की मैदान हो,तो मैं थार का रेगिस्तान हूँ..।
भला मैं तुमसे कैसे मिल सकता हूँ..।

मैं कुछ नही जानती..
मैं सिर्फ तुमसे मिलना चाहती हूँ..।।

मगर कैसे..??
कैसे समझाऊ तुम्हें..
तुम्हारी सुबह की शुरुआत सूर्य की मीठी तपिश से शुरू होती है,
और मेरी सुबह की शुरुआत,सूर्य की लालिमा की मासूमियत के साथ..।
तुम्हारी रात जब होने को होती है,तो मेरी सुबह होने को होता है..।
तुम्हें अपने चाँद-सितारे को देखने को लाखों खर्च करने होते है,और मेरे चाँद- सितारे यू ही आसमाँ में भटकते मिल जाते है..।।
तुम चलती हो अपने दस हज़ार स्टेप पूरा करने को,
और मैं चलता हूँ,अपने लक्ष्य को पाने को..।
अब तुम्हीं बताओ..
मैं भला कैसे...
तुमसे मिल सकता हूँ..।



क्या सोच रहे हो तुम..

क्या सोच रहे हो तुम..??
यही सोच रहा हूँ कि..
क्या सोच रहा हूँ मैं..।

सच कहूं तो..
कुछ तो सोच रहा हूँ मैं... 
मगर अफसोस क्या सोच रहा हूँ..
यही सोच-सोच कर..
कुछ तो सोच रहा हूँ मैं..।

क्या सोच रहा हूँ..
अब मत ये पूछना..
क्योंकि.. 
यही सवाल तो मैं खुद से..
वर्षों से पूछता आ रहा हूँ की..
क्या सोच रहा हूँ मैं..??

क्या सोच रहा हूँ मैं..??
या फिर क्या खोज रहा हूँ मैं..??
जैसे कस्तूरी मृग भटकता है..
वैसे ही शायद भटक रहा हूँ मैं..।
बस मालूम नही क्यों भटक रहा हूँ मैं..
शायद यही सोच-सोच कर..
कुछ तो सोच रहा हूँ मैं..।।

शायद उस "मैं" के बारे में ही सोच रहा हूँ मैं..
जिस 'मैं" का भान नही है..मुझको..।

जिस मैं से ये ब्रह्मांड है..
वो "मैं",
मैं कैसे हो सकता हूँ..??
शायद यही सोच-सोचकर
कुछ तो सोच रहा हूँ मैं..।।



प्यार की पांति..उसने कहा..

उसने कहा..
मेरे लिए ही सही..
काबिल तो बनो..।
कबतक यू ही..
खुद से मुँह फेरते रहोगे..
कबतक यू ही सबसे मुँह फेरते रहोगे..।

उस काबिल तो बनो..
जिससे अपना मुँह,
मुझको दिखा तो सको..।

उसने कहा..
सिर्फ तुम ही नही गिरे हो..
हरेक रोज कई गिरते है..।
मगर तुम उन जैसा तो न बनो..
जो गिर के उठ न सके..।
मेरे लिए ही सही..
काबिल तो बनो..।

उसने कहा..
कबतक जिंदगी यू ही अकेले काटते रहोगे..
कबतक यू ही सबसे मुँह फेरते रहोगे..
कंही ऐसा न हो..
की ये एकांकीपन तुमसे ही मुँह फेरने लगे..।
मेरे लिए ही सही..
काबिल तो बनो..।

उसने कहा..
मैं भी..भला कबतक तुम्हें झकझोरता रहूंगा..
एकदिन मैं भी कंही थक जाऊंगा..
तो फिर मेरा क्या होगा..??
मेरे लिए ही सही..
काबिल तो बनो..।

उसने कहा..
क्या कहा..??
उसने कहा..
बहुत कुछ कहा..
मगर मैं,नासमझ..
कुछ समझ न पाया..
उसने कहा..
क्या कहा..??


मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

विनोद कुमार शुक्ल

कुछ दिन पहले ही तो आपको पढ़ा था,
कुछ दिन पहले ही तो आपको सुना था..।
किसको पता था की, 
आप यू ही छोड़ के चले जाओगे..।
शायद आपका मकसद पूरा हो गया..
हिंदी साहित्य का फिर से पुनरुत्थान जो आपके द्वारा हो गया..।।


आप आने वाले नई पीढ़ियों के लिए प्रकाशस्तंभ थे..
आपका यू ही छोड़ के चले जाना..
न जाने कितने लोगों के लिए असहनीय है..।।

मगर क्या करें..
जाना तो सबको है ही..तो चल दिये..।
वैसे कई हिंदी साहित्य के पुरोधा को पीछे छोड़ दिये है..
अब नई पीढ़ी..
अपने अनुसार अपनी कहानियां लिखें,पढें और सुने..
हम तो पुराना हो चुके थे,
इसलिए भी चल दिये..।

सच कहूं..
तो पहले शरीर साथ नही दे रहा था..
कुछ दिनों से तो, हाथ भी साथ नही दे रहा था..
कलम पकड़ के कागज पे कुछ उकेड़ नही पा रहा था..
अब तुम्हीं बताओ..
बिना कागज और कलम के, 
कैसे जिंदगी बिताऊँ..??
इसीलिए..
कागज की नाव बनाकर
कलम की पतवार बनाकर..
नोकर की कमीज,पहनकर..
दीवार में एक खिड़की थी,को यादकर में बह चला..
उससे मिलने जिससे सबको मिलना है एक दिन..।








सोमवार, 22 दिसंबर 2025

मैं जब भी..

मैं जब ही इन राहों से गुजरता हूँ..
तुम मुझे हरेक बार ऊर्जावान बना देते हो..
मेरे चेहरे से उदासी हटा कर,ताजगी भर देते हो..।

मैं जब भी इन राहों से गुजरता हूँ..
तुम हरेक बार...
हताशाओं और निराशाओं से भरी जिंदगी को,
दलदल से निकाल कर...
एक नए मुकाम पे खड़ा कर देते हो..।

मैं जब भी इन राहों से गुजरता हूँ..
तुम हरेक बार..
मेरे मुरझाये हुए चेहरे पे मुस्कान बिखेर जाते हो..।

मैं जब भी इन राहों से गुजरता हूँ..
तुम हरेक बार...
मुझे नए जिंदगी से रु-ब-रु करवाते हो..।

मैं जब भी इन राहों से गुजरता हूँ..


Yoga for digestive system