मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

विनोद कुमार शुक्ल

कुछ दिन पहले ही तो आपको पढ़ा था,
कुछ दिन पहले ही तो आपको सुना था..।
किसको पता था की, 
आप यू ही छोड़ के चले जाओगे..।
शायद आपका मकसद पूरा हो गया..
हिंदी साहित्य का फिर से पुनरुत्थान जो आपके द्वारा हो गया..।।


आप आने वाले नई पीढ़ियों के लिए प्रकाशस्तंभ थे..
आपका यू ही छोड़ के चले जाना..
न जाने कितने लोगों के लिए असहनीय है..।।

मगर क्या करें..
जाना तो सबको है ही..तो चल दिये..।
वैसे कई हिंदी साहित्य के पुरोधा को पीछे छोड़ दिये है..
अब नई पीढ़ी..
अपने अनुसार अपनी कहानियां लिखें,पढें और सुने..
हम तो पुराना हो चुके थे,
इसलिए भी चल दिये..।

सच कहूं..
तो पहले शरीर साथ नही दे रहा था..
कुछ दिनों से तो, हाथ भी साथ नही दे रहा था..
कलम पकड़ के कागज पे कुछ उकेड़ नही पा रहा था..
अब तुम्हीं बताओ..
बिना कागज और कलम के, 
कैसे जिंदगी बिताऊँ..??
इसीलिए..
कागज की नाव बनाकर
कलम की पतवार बनाकर..
नोकर की कमीज,पहनकर..
दीवार में एक खिड़की थी,को यादकर में बह चला..
उससे मिलने जिससे सबको मिलना है एक दिन..।








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