बुधवार, 24 दिसंबर 2025

प्यार की पांति..मैं तुमसे

मैं तुमसे मिलना चाहती हूं..
मगर कैसे..
तुम समुंद्र हो तो मैं नदी हूँ..
तुम वटवृक्ष हो तो मैं खजूर हूँ..
तुम गंगा की मैदान हो,तो मैं थार का रेगिस्तान हूँ..।
भला मैं तुमसे कैसे मिल सकता हूँ..।

मैं कुछ नही जानती..
मैं सिर्फ तुमसे मिलना चाहती हूँ..।।

मगर कैसे..??
कैसे समझाऊ तुम्हें..
तुम्हारी सुबह की शुरुआत सूर्य की मीठी तपिश से शुरू होती है,
और मेरी सुबह की शुरुआत,सूर्य की लालिमा की मासूमियत के साथ..।
तुम्हारी रात जब होने को होती है,तो मेरी सुबह होने को होता है..।
तुम्हें अपने चाँद-सितारे को देखने को लाखों खर्च करने होते है,और मेरे चाँद- सितारे यू ही आसमाँ में भटकते मिल जाते है..।।
तुम चलती हो अपने दस हज़ार स्टेप पूरा करने को,
और मैं चलता हूँ,अपने लक्ष्य को पाने को..।
अब तुम्हीं बताओ..
मैं भला कैसे...
तुमसे मिल सकता हूँ..।



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