शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

सपने..

सपने अगर टूटते है..
तो उसे जोड़ना.. 
हमारे ही हाथों में होता है..।
सपने हमेशा हमारे ही होते है..
हां..
कभी-कभी हम दूसरों के नजरों से देखते है..
और वो हमारे सपने हो जाते है..।


सपने अगर टूटते है..
तो उसे जोड़ना..
हमारे ही हाथों मे होता है..।
सपने टूटकर इतना कभी नही बिखरता..
जिसे फिर से समेट न पाए..
बस जरूरत होती है..
फिर से बिखरे सपने संजोने का..।।

सच होते है सपने..
सपने अगर हो अपने..।
अपने सपने को साकार कर..
खुद को तुम स्वीकार कर..
सच होते है सपने..।

सपने अगर टूटते है..
तो उसे जोड़ना..
हमारे ही हाथों में होता है..।

वेदना..

एक समय था..जब इस शब्द को सुनकर गौरवान्वित महसूस करता था,ये शब्द मेरे शरीर के हरेक कोशिकाओं को तरंगित कर दिया करता था..
ये शब्द मुझे औरों से बिल्कुल अलग अहसास करवाता था..और मुझसे ढेर सारा काम करवाता था..जब घंटों बैठे-बैठे आंखें थक कर बंद होने लगती..दिमाग कहता अब बस करो..सर टेबल पर रखकर आंख बंद करता तो सहसा इन शब्दों का तरंग शरीर के अंदर गूँजता और मुझे ऊर्जावान बना कर, फिर से पढ़ने और पन्ने पलटने को हिम्मत देता..।
मगर...
पिछले एक सालों से ये शब्द सुनते ही मानों ऐसे लगता है कि..
कोई गाली दे रहा है..जैसे शरीर मे कोई सुई चुभो रहा है..।


उस शब्द को एकीकार न कर पाने के कारण..
जिंदगी लक्ष्यविहीन हो गई है..
अब पता ही नही है कि करना क्या है..।
जबतक वो साथ था,तो पता था कि करना क्या है..
मगर जब से उसका साथ छुटा है तब से जिंदगी का उद्देश्य ही अब पता नही चलता..।

चलते फिरते उस शब्द से कही भी सामना होता है,तो ऐसे लगता है जैसे वो गाली दे रहा है..जैसे वो सुई चुभो रहा है..।।

क्या उसे मात देने का मेरे पास कोई और रास्ता नही है..??
क्या उस शब्द से सामने करने का कोई रास्ता नही है..??
रास्ते तो हमेशा एक-न-एक जरूर होता है..
मगर पहले से आसान नही कठिन होता है..
जितनी देर करोगे..उसका सामना करने में और कठिनाई आएगी..।
इसलिय अब खड़ा हो..
भेदने दो उसको..
चुभोने दो उसको..
यही दर्द तो उसे परास्त करने में मदद करेंगे..।
मंजिल जितनी दूर होगी..
अनुभव उतना ज्यादा होगा..
उन सारे अनुभवों से परास्त करने का अपना मजा होगा..।।

प्यार की पांति..मन करता है..

मन करता है..
हरेक रोज..
तुम्हे कुछ लिखा करू..
मन कहता है..
हरेक रोज..
तुम्हें कुछ कहा करू..।
फिर यही मन कहता है..
छोड़ दे यार..
उन्हें बुरा लगेगा..।


मन करता है..
तुम्हारे साथ..
ढेर सारे..
गप्पे लड़ाऊँ...।
मन करता है..
तुम्हारे साथ..
ढेर सारे.. 
वक़्त बिताऊँ..।

मगर फिर..
वो कहती है..
मन को संभालो..
मन का क्या है..
वो तो चंचल..
बंदर है जी..।

वो कहती है..
जो है..मन में..
मन में, दबा लो..
और एक कब्रगाह बना लो..
और उसपे अश्रु बहाओ..।

मन का क्या है..
ये तो स्वछंद..
उन्मुक्त परिंदा है जी..।
इसको संभालों..
नही तो सच कहता हूं..
तुम्हारी भी कब्रगाह बन जाएगी..😀

मन करता है..
नहीं-नही जी..😊
कुछ नही करता..।।

न जाने ये मन चाहता क्या है..??

मन की भाषा, 
मन ही समझें..
अब हम..
कंहा से लाये..
वो मन..
जो इस मन की..
भाषा को समझें..।



संस्मरण..आखिर क्यों..??

कुछ घटना,कुछ वाकया मन मष्तिष्क पर छाप छोड़ देती है..
और सोचने को मजबूर कर देती है..।
आज शाम 3 दृश्य ने सोचने को मजबूर कर दिया..।

पहला दृश्य..
समुंद्र के किनारे टहलते टहलते मैं आखरी छोर तक चला गया जंहा कोई नही था बिल्कुल शांति थी..।मेरी नजर उन दो कुत्तों पे पड़ी जो समुंद्र के लहर से 10-11 फ़ीट की दूरी पर पाँव से गड्ढे खोद रहे थे..मुझे लगा मस्ती कर रहे है..।मगर जब करीब गया तो देखा कि ये दोनों कुते गड्ढे खोदने के बाद रेत से रिस कर आ रहे पानी का भरने का इंतजार करते है,जब पानी भर जाता है तब वो उसे पी लेते है..फिर इंतजार करते है,और फिर पीते है..।
मुझे दो चीज सोचने को विवश किया..
1.क्या समुंद्र का पानी इसे नुकसान नही करेगा..??
 मैंने झट से गूगल किया तो पता चला हरेक जानवर को समुंद्र का पानी नुकसान पहुचायेगा.. हो सकता है ये सब अपने आप को उसके अनुरूप ढाल लिया हो..।
2.इन्हें पानी फ़िल्टर कर पीने को किसने सिखाया..??
ये एक तरह से गड्ढा खोदकर पानी को फ़िल्टर ही तो कर रहें थे..।


दूसरा दृश्य..
समुंद्र के किनारे ही एक अकेली महिला थी..जो अपने में खुश थी मगर उसकी खुशी उसकी विक्षिप्त अवस्था को दर्शा रही थी..वो महिला अचानक मुझसे कही जरा मेरा वीडियो बना देंगे..मैंने कहा हां..तो उन्होंने अपना मोबाइल मेरे हाथ मे थमा कर बोली आप सिर्फ इसे पकड़े रहिये..।
थोड़ा इधर थोड़ा उधर थोड़ा ऊपर थोड़ा नीचे के बाद आखिर मोबाइल एडजस्ट हो गया..मन हो रहा था छोड़ के भाग जाऊ..
मगर इसके बाद जो हुआ वो सोचने को विवश कर दिया..
वो बनावटी मुस्कान के साथ बोलती है,
हाइ गाइज.. 
मैं रोज बिच पे आती हूँ, मेरा वजन कम हो रहा है..
मैं यंहा हीरोइन बनने आई थी आज कुछ भी नही बन पाई..
ये दरिंदो से भरा हुआ जगह है..
सब साले इस्तेमाल करेंगे..
इसलिय अपना स्वास्थ्य का ख्याल रखें और आपलोग गाँव मे ही रहें, अच्छे से रहें..।
उसके बाद उन्होंने कहा मेरा एक फोटो खींच दीजियेगा..मैंने 3-4 क्लिक करके वंहा से निकल गया..।
मगर उसका चेहरा और बातें अभी भी दिमाग मे चल रहा है..।

तीसरा दृश्य..
एक छोटा बच्चा लगभग 3 साल का रहा होगा..
वो माँ की अंगुली पकड़ कर जा रहा था कि उसकी एक चप्पल पाँव से निकल कर पीछे छूट जाता है..
जबतक वो माँ को बोलता तबतक वो कई कदम आगे बढ़ गया था..।
क्योंकि वो छोटा बच्चा अपने उम्र के अनुसार नही चल रहा था,बल्कि उसकी माँ अपने उम्र के अनुसार चला रही थी..।
जबतक बच्चा शब्दों का चयन कर वाक्य बनाता और माँ को कहता कि मेरा एक चप्पल पाँव से निकल गया है..तबतक वो कई कदम आगे बढ़ गया था..
माँ के कानों में ये शब्द जाते ही माँ ने एक थप्पड़ जड़ दिया..।
मैं ये दृश्य देखकर आवाक रह गया..??


एक तो माँ अपने स्पीड से बच्चें को चला रही थी,..
दूसरे में, माँ को बच्चे के चाल में बदलाव का महसूस नही हुआ..।
मैं इसी उधेड़बुन में हूँ...
कभी-कभी दूसरों की लापरवाही के वजह से किसी और को सजा भुगतना पड़ता है..।।

ये 3 दृश्य ने सोचने को मजबूर कर दिया..
● कुत्ते को पानी फ़िल्टर कर पीने को किसने सिखाया..??
●उस महिला के साथ क्या हुआ होगा..??
●आखिर हम बच्चों पर हाथ क्यों उठाते है..??
आखिर क्यों..??

बुधवार, 7 जनवरी 2026

प्यार की पांति..कभी-कभी

कभी-कभी तुम भी कुछ लिखा करो..

कभी-कभी तुम भी कुछ कहा करो..।

मैं ही कबतक अकेले लिखता रहूंगा..

मैं ही अकेले कबतक बकता रहूंगा..।

कभी-कभी तुम भी कुछ लिखा करो..

कभी-कभी तुम भी कुछ कहा करो..।


जानता हूँ..मैं भी..

जानती हो..तुम भी..

हमदोनों के बीच की दूरियों को..

और..

हमदोनों के बीच के खाइयों को..।

कभी-कभी हमदोनों मिलकर दूरियां मिटाये...

कभी-कभी हमदोनों मिलकर खाइयों के गहराइयों का पता लगाएं..

कभी-कभी..तुम भी कुछ लिखा करो..

कभी-कभी तुम भी कुछ कहा करो..।।


यू मुँह मोड़ने से क्या होगा..

यू चुप रहने से क्या होगा..

जबतक नजरें मिलाओगे नहीं..

जबतक चुपिया तोड़ोगे नही..

तुम्हीं बताओ मैं कैसे समझ पाऊंगा..।

कभी-कभी तुम भी कुछ लिखा करो..

कभी-कभी तुम भी कुछ कहा करो..।


माना कि आता नही..

मुझे प्यार जताना..

तुम्हीं सिखाओ..

तुम्ही बताओ..

की कैसे जताए..

की कैसे बताये..।

कभी-कभी तुम भी कुछ लिखा करो..

कभी-कभी तुम भी कुछ कहा करो..।


उम्मीद..

जब तुमसे कोई उम्मीद न करें,

तो तुम खुद से ही उम्मीद करना..।

क्योंकि ये उम्मीद ही तो है..

जो जीने का मार्ग प्रशस्त करती है..।।

चाहे कितनी भी परेशानियां जीवन मे क्यों न आये,

ये उम्मीद ही तो है,

जो हर परेशानियों से निकलने का हिम्मत देता है..।


जब तुमसे कोई उम्मीद न करें..

तो तुम खुद से ही उम्मीद करना..।।



शहर

ये शहर भी,
कभी खुशनुमा था...
जंहा हमेशा,
रहा करता था...
चहल-पहल..।
ये शहर कुछ इस तरह बढ़ता गया..
और सबको अपने आगोश में लेता गया..।
जो भी इसके रुकावट में आया..
सबके सब इसमें समाया..।
न जंगल बचा, 
ना जंगल में रहने वाले बचे..।
न नदियां बची....
न पर्वत,पठारें बचा..।
कुछ इस कदर शहर सबको निगलता गया..कि
समुंद्र को भी निगलने का दुःसाहस कर गया..।
न जाने फिर क्या हुआ..??
समुन्द्र की लहरों ने ही..
शहर को निगल लिया..।
ये शहर भी,
कभी खुशनुमा था..।।



Yoga for digestive system