बुधवार, 7 जनवरी 2026

शहर

ये शहर भी,
कभी खुशनुमा था...
जंहा हमेशा,
रहा करता था...
चहल-पहल..।
ये शहर कुछ इस तरह बढ़ता गया..
और सबको अपने आगोश में लेता गया..।
जो भी इसके रुकावट में आया..
सबके सब इसमें समाया..।
न जंगल बचा, 
ना जंगल में रहने वाले बचे..।
न नदियां बची....
न पर्वत,पठारें बचा..।
कुछ इस कदर शहर सबको निगलता गया..कि
समुंद्र को भी निगलने का दुःसाहस कर गया..।
न जाने फिर क्या हुआ..??
समुन्द्र की लहरों ने ही..
शहर को निगल लिया..।
ये शहर भी,
कभी खुशनुमा था..।।



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