ये शब्द मुझे औरों से बिल्कुल अलग अहसास करवाता था..और मुझसे ढेर सारा काम करवाता था..जब घंटों बैठे-बैठे आंखें थक कर बंद होने लगती..दिमाग कहता अब बस करो..सर टेबल पर रखकर आंख बंद करता तो सहसा इन शब्दों का तरंग शरीर के अंदर गूँजता और मुझे ऊर्जावान बना कर, फिर से पढ़ने और पन्ने पलटने को हिम्मत देता..।
मगर...
पिछले एक सालों से ये शब्द सुनते ही मानों ऐसे लगता है कि..
कोई गाली दे रहा है..जैसे शरीर मे कोई सुई चुभो रहा है..।
उस शब्द को एकीकार न कर पाने के कारण..
जिंदगी लक्ष्यविहीन हो गई है..
अब पता ही नही है कि करना क्या है..।
जबतक वो साथ था,तो पता था कि करना क्या है..
मगर जब से उसका साथ छुटा है तब से जिंदगी का उद्देश्य ही अब पता नही चलता..।
चलते फिरते उस शब्द से कही भी सामना होता है,तो ऐसे लगता है जैसे वो गाली दे रहा है..जैसे वो सुई चुभो रहा है..।।
क्या उसे मात देने का मेरे पास कोई और रास्ता नही है..??
क्या उस शब्द से सामने करने का कोई रास्ता नही है..??
रास्ते तो हमेशा एक-न-एक जरूर होता है..
मगर पहले से आसान नही कठिन होता है..
जितनी देर करोगे..उसका सामना करने में और कठिनाई आएगी..।
इसलिय अब खड़ा हो..
भेदने दो उसको..
चुभोने दो उसको..
यही दर्द तो उसे परास्त करने में मदद करेंगे..।
मंजिल जितनी दूर होगी..
अनुभव उतना ज्यादा होगा..
उन सारे अनुभवों से परास्त करने का अपना मजा होगा..।।

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